भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / २४६ का। यह आहुति (अग्निहोत्र) भी यज्ञ ही है और जो कुछ वह (यजमान) वहाँ रहकर करता है वह यजमान के लिए आशीर्वाद है। इसलिए अवश्य सेवन करना चाहिए ॥५॥ सेवन के विरुद्ध यह युक्ति है— जो कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय के पास जाकर उसकी प्रशंसा करता है और कहता है 'यह मुझे दान देगा या मेरा घर बनवा देगा', वह उसको वाणी और कर्म से खुश करता है; परन्तु जो कहता है 'तू मेरा कौन है ? मुझे क्या देगा ?' तो वह मालिक उससे अप्रसन्न रहेगा, उससे द्वेष करेगा । इसलिए अग्नियों के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि प्रज्वलित करने और आहुति देने से वह माँग चुकता है, फिर (माँगने के लिए) अग्नियों के पास नहीं जाना चाहिए ॥६॥ अब सेवन के पक्षों में यह युक्ति है। जो मांगता है उसको दाता भी मिल जाता है। कोई मालिक अपने नौकर की आवश्यकताओं को नहीं जानता जब तक नौकर नहीं कहता कि 'मैं आपके ही ऊपर हूँ। आप मेरा पालन कीजिए।' जब जान जाता है कि यह मेरे ही आश्रित है तो उसका पालन करता है। इसलिए अग्नियों का सेवन ही करना चाहिए। अग्नियों के सेवन के पक्ष में ये युक्तियाँ हैं ॥७॥ अग्नि प्रजापति है। इसलिए जब अग्निहोत्र किया जाता है तो वह (अग्नि) जिस पर शासन करता है या जो उसके अनुकूल होता है उसके वीर्य का वह सिंचन करता है। (अग्नियों के) सेवन करनेवाला उस अग्नि का इन सब बातों में अनुकरण करता है और सन्तानोत्पत्ति करता है ॥८॥ वह 'उप'* वाले मन्त्र से प्रार्थना करता है। 'उप' का अर्थ है पृथिवी, और यह दो प्रकार से— जो कुछ इस संसार में उत्पन्न होता है वह इस पृथिवी पर उत्पन्न होता है ('उप' + जायते); और जो नष्ट होता है वह यहीं दबाया जाता है ('उप' + उप्यते)। इसलिए यहाँ रात- दिन आधिक्य होता रहता है (अर्थात् पृथिवी पर जो उत्पन्न हुआ वह भी आधिक्य है और जो उसमें गाड़ दिया गया वह भी आधिक्य हुआ)। इसलिए वह ('उप' वाले मन्त्र से आरम्भ करके) आधिक्य से आरम्भ करता है ॥६॥ अब वह कहता है, “उप प्रयन्तोऽअध्वरम्” अर्थात् "मैं अध्वर में (पर) जाऊँ ।” 'अध्वर' नाम है यज्ञ का। इसलिए "मैं यज्ञ में (पर) जाऊँ" ऐसा अर्थ हुआ। अब कहता है, “मन्त्रं वोचेमाग्नये ।”— “अग्नि के लिए मन्त्र बोले ।" क्योंकि वह मन्त्र बोलने ही को है। अब कहता है, "आरेऽअस्मे च शृण्वते ।”—“उसके लिए जो हमको दूर से सुनता है" अर्थात् 'यद्यपि तू हमसे दूर है तो भी तू इस प्रार्थना को सुन, और हमारा भला चीत' ॥१०॥ अब कहता है, “अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम्। अपाँ२रेताँ२सि जिन्वति” (यजुर्वेद ३।१२)— “अग्नि द्यौ लोक का सिर, महान्, पृथिवी का पति है। यह जलों में वीर्य को सींचता है।" इस प्रकार इस मन्त्र के द्वारा वह प्रार्थना करता हुआ उसके पीछे दौड़ता है जैसे माँगनेवाले दौड़ते हैं और कहता है, 'तू ऐसों की सन्तान है, तू ऐसा कर सकता है, तू ऐसा है' ॥११॥ अब इन्द्र और अग्निवाला मन्त्र— "उभा वामिन्द्राग्नीऽआहुवध्याऽउभा राधसः सह मादयध्यै । उभा दाताराविषाँ२ रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्” (यजु० ३।१३)— “इन्द्र और अग्नि, मैं तुम दोनों को बुलाता हूँ। मैं तुम दोनों को प्रीति की हवि से प्रसन्न करूँगा। तुम दोनों बल और धन के दाता हो। तुम दोनों को अन्न की प्राप्ति के लिए बुलाता हूँ।" इन्द्र सूर्य का नाम है। जब वह अस्त हो जाता है तो आहवनीय अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। इसलिए प्रार्थी उन दोनों मिले हुओं से प्रार्थना करता है कि ये दोनों मिलकर मुझको देंगे। इसीलिए इन्द्र और अग्निवाला मन्त्र पढ़ता है ॥१२॥ अब पढ़ता है, "अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातोऽअरोचथाः । तं जानन्नग्नऽआरोहाथा

  • उप प्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये । आरेऽअस्मे च शृण्वते । (यजु० ३।११)