भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 699 में से

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कां० २, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १७-२४ व १ शतपथब्राह्मण / २६५ का मनुष्यों का और मूल पितरों का। इसलिए वे मूल से काटे जाते हैं। वे एक ही चोट से इसलिए काटे जाते हैं कि पितर लोग एक ही बार में गुजर गये ॥१७॥ वह उनके सिरों को दक्षिण की ओर करके फैलाता है। तब (पिण्ड) देता है। वह इस प्रकार पिण्ड देता है (हाथ से बनाकर)। देवों को इस प्रकार. दिया जाता है (यहाँ भी हाथ से विधि बताई जाती है)। मनुष्यों को इस प्रकार परोसते हैं, और पितरों के लिए इस प्रकार। इसलिए वह इस प्रकार देता है ॥१८॥ यजमान के बाप का नाम लेकर 'यह तुम्हारे लिए', कुछ लोग इसके साथ यह भी कहते हैं—'और उनके लिए जो तुम्हारे पीछे आवें।' परन्तु उसको ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि वह भी तो उन्हीं में से है। इसलिए पिता का नाम लेकर कहे 'यह तुम्हारे लिए', बाबा का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए', पर-दादे का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए।' वर्तमान समय से आरम्भ करके पिछले-पिछले के क्रम से देता है, क्योंकि पितरों के गुजरने का वर्तमान की अपेक्षा यही क्रम है ॥१९॥ अब वह जपता है, “अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्” (यजु० २।३१)— “हे पितरो ! यहाँ प्रसन्नता से खाओ जैसे बैल आकर खाते हैं अपने-अपने हिस्से का।” इसका तात्पर्य यह है कि 'अपना-अपना भाग खाओ' ॥२०॥ अब मुड़कर खड़ा होता है (अर्थात् उत्तर की ओर), क्योंकि पितर मनुष्यों से बिल्कुल दूसरी ओर हैं और वह भी पितरों से दूसरी ओर है। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक साँस रोक सके उस समय तक खड़ा रहे, क्योंकि प्राण इतने ही होते हैं। अस्तु, एक मुहूर्त्त रहकर—॥२१॥ (दाहिनी ओर) मुड़कर जपता है, “अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत" (यजु० २।३१) — “पितरों ने खा लिया। बैलों के समान उन्होंने अपना-अपना भाग पा लिया” ॥२२॥ अब जल-पात्र लेकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'तुम धोओ', बाबा का नाम लेकर 'तुम धोओ', परदादे का नाम लेकर 'तुम धोओ।' जिस प्रकार मेहमानों को खाना खिलाकर धुलाते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥२३॥ नीवि (निचला कपड़ा और ऊपर का कपड़ा दोनों में गाँठ दी जाती है) को खोलकर नमस्कार करतो है। नीवि पितरों की है इसलिए उसे खोलकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ है। इसलिए इस प्रकार वह उनको यज्ञ के योग्य बनाता है। छः बार नमस्कार करता है। क्योंकि छः ऋतुएँ हैं और पितर ऋतुएँ हैं, इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब वह कहता है, “गृहान्नः पितरो दत्त” (यजु० २।३२)—“हे पितरो, हमको घर दीजिए।” पितर घरों के रक्षक हैं, इसलिए इस कर्म से आशीर्वाद चाहता है। पिण्डों को पीछे हटाकर सूंघता है, क्योंकि यह यजमान का भाग है। एक चोट में काटी हुई (कुश) को अग्नि पर रखता है, और जलती हुई लकड़ी (उल्मुक) को फेंकता है ॥२४॥ अध्याय ४—ब्राह्मण ३ कहोड कौषीतकि ने कहा, यह (वृक्षों का) रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है। हम देवों को आहुति देकर खावें। इसलिए 'आग्रयणेष्टि' यज्ञ किया जाता है ॥१॥

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