शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
कां० २, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १७-२४ व १ शतपथब्राह्मण / २६५ का मनुष्यों का और मूल पितरों का। इसलिए वे मूल से काटे जाते हैं। वे एक ही चोट से इसलिए काटे जाते हैं कि पितर लोग एक ही बार में गुजर गये ॥१७॥ वह उनके सिरों को दक्षिण की ओर करके फैलाता है। तब (पिण्ड) देता है। वह इस प्रकार पिण्ड देता है (हाथ से बनाकर)। देवों को इस प्रकार. दिया जाता है (यहाँ भी हाथ से विधि बताई जाती है)। मनुष्यों को इस प्रकार परोसते हैं, और पितरों के लिए इस प्रकार। इसलिए वह इस प्रकार देता है ॥१८॥ यजमान के बाप का नाम लेकर 'यह तुम्हारे लिए', कुछ लोग इसके साथ यह भी कहते हैं—'और उनके लिए जो तुम्हारे पीछे आवें।' परन्तु उसको ऐसा न कहना चाहिए, क्योंकि वह भी तो उन्हीं में से है। इसलिए पिता का नाम लेकर कहे 'यह तुम्हारे लिए', बाबा का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए', पर-दादे का नाम लेकर, 'यह तुम्हारे लिए।' वर्तमान समय से आरम्भ करके पिछले-पिछले के क्रम से देता है, क्योंकि पितरों के गुजरने का वर्तमान की अपेक्षा यही क्रम है ॥१९॥ अब वह जपता है, “अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्” (यजु० २।३१)— “हे पितरो ! यहाँ प्रसन्नता से खाओ जैसे बैल आकर खाते हैं अपने-अपने हिस्से का।” इसका तात्पर्य यह है कि 'अपना-अपना भाग खाओ' ॥२०॥ अब मुड़कर खड़ा होता है (अर्थात् उत्तर की ओर), क्योंकि पितर मनुष्यों से बिल्कुल दूसरी ओर हैं और वह भी पितरों से दूसरी ओर है। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक साँस रोक सके उस समय तक खड़ा रहे, क्योंकि प्राण इतने ही होते हैं। अस्तु, एक मुहूर्त्त रहकर—॥२१॥ (दाहिनी ओर) मुड़कर जपता है, “अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत" (यजु० २।३१) — “पितरों ने खा लिया। बैलों के समान उन्होंने अपना-अपना भाग पा लिया” ॥२२॥ अब जल-पात्र लेकर हाथ धुलाता है। यजमान के बाप का नाम लेकर 'तुम धोओ', बाबा का नाम लेकर 'तुम धोओ', परदादे का नाम लेकर 'तुम धोओ।' जिस प्रकार मेहमानों को खाना खिलाकर धुलाते हैं उसी प्रकार यहाँ भी ॥२३॥ नीवि (निचला कपड़ा और ऊपर का कपड़ा दोनों में गाँठ दी जाती है) को खोलकर नमस्कार करतो है। नीवि पितरों की है इसलिए उसे खोलकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ है। इसलिए इस प्रकार वह उनको यज्ञ के योग्य बनाता है। छः बार नमस्कार करता है। क्योंकि छः ऋतुएँ हैं और पितर ऋतुएँ हैं, इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब वह कहता है, “गृहान्नः पितरो दत्त” (यजु० २।३२)—“हे पितरो, हमको घर दीजिए।” पितर घरों के रक्षक हैं, इसलिए इस कर्म से आशीर्वाद चाहता है। पिण्डों को पीछे हटाकर सूंघता है, क्योंकि यह यजमान का भाग है। एक चोट में काटी हुई (कुश) को अग्नि पर रखता है, और जलती हुई लकड़ी (उल्मुक) को फेंकता है ॥२४॥ अध्याय ४—ब्राह्मण ३ कहोड कौषीतकि ने कहा, यह (वृक्षों का) रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है। हम देवों को आहुति देकर खावें। इसलिए 'आग्रयणेष्टि' यज्ञ किया जाता है ॥१॥
२६६ शतपथ ब्राह्मण
होवा॒च या॑ज्ञव॒ल्क्यः॑ । दे॒वाश्च॒ वाऽअसु॑राश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः प॑स्पृधिरे॒ ततो॒ऽसुरा॑ उ॒भयी॒रोष॑धी॒र्याश्च॑ मनु॒ष्या॑ उ॒पजी॑वन्ति॒ याश्च॑ पशवः॑ कृत्यये॑व लद्विषेणे॑व ब॒त्प्रलि॑- लि॒पुरू॒तैवं चि॑द्दे॒वान॑भिभवे॒मेति॒ ततो॒ न म॑नु॒ष्या आ॑श्न्रुव॒न् पश॑व आलि॑लिशिरे ता हे॒माः प्र॒जा अ॑नाश॒केन॒ नोत्प॑राबभूवुः ॥२॥ तद्वै॑ दे॒वाः शु॑श्रुवुः । अ॑नाश॒केन ह वा॒ऽइमाः प्र॒जाः प॑राभव॒न्तीति॒ ते हो॑चुर्ह॒न्तेद॒मासा॒मप॑जिघाꣳसा॒मेति॒ केनेति॑ य॒- ज्ञेनेवे॑ति य॒ज्ञेन॑ ह॒ स्म वै तद्दे॒वाः क॑ल्पयन्ते॒ यदे॑षां क॒ल्पमा॒सैर्यद्य॒ज्ञ ॥३॥ ते हो॒चुः । कस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ ते मम॑-म॒मेत्ये॑व न सम्पा॒द्यां च॑क्रुस्ते हास॑- म्पा॒द्योचु॑रा॒जिमे॒वास्मि॒न्नाजा॑महै स॒ यो न॒ उज्जे॑ष्यति॒ तस्य॑ न इ॒दं भ॑विष्य॒तीति॒ त- थेति॒ तस्मि॒न्नाजि॑माजत ॥४॥ ताविन्द्रा॒ग्नीऽउ॑दजयतां । तस्मा॑दिन्द्रा॒ग्नी द्वाद॑शकपा- लः पु॑रो॒डाशो भ॑वतीन्द्रा॒ग्नी ह्य॑स्य भाग॒धेय॒मुद॑जयतां॒ तौ यत्रे॑न्द्रा॒ग्नीऽउ॒ज्जिगि॑वाꣳ- सौ तस्या॒नुस्तद्दिश्ये॑ दे॒वा अन्वा॒ऽऽज॑ग्मुः ॥५॥ क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी । विशो॑ वि॒श्वे दे॒वा यत्र॒ वै क्ष॒त्रमु॒ञ्जय॑त्यन्वाभ॒क्ता वै तत्र॒ विट्द्वि॒द्यान्वि॒दान्व॒न्वाभ॑जतां॒ तस्मा॒द्वैश्व॑- दे॒वश्च॒रुर्भवति ॥६॥ तं वै पुरा॑णानां कुर्या॒दित्या॑हुः । क्ष॒त्रं वा॒ऽइन्द्रा॒ग्नी नेत्क्षत्र॑- म॒भ्यारो॑हा॒णीति॒ तौ वा॒ऽउभा॑वेव न॑वानाꣳ स्यातां॒ यदि॑ पु॒रोडा॑श इत॒रश्च॒रुस्ति॒- रस्तेनै॑व क्ष॒त्रमन॑भ्यारूढं॒ तस्मा॑दु॒भावे॑व न॑वानाꣳ स्याताम् ॥७॥ तऽउ॑ ह॒ विश्वे॑ दे॒वा ऊ॑चुः । अ॒नयो॒र्वाऽअ॒यं द्या॑वापृथि॒व्यो रसो॒ हन्ते॒मेऽअ॒स्मिन्नाभ॑जा॒मेति॒ ता- भ्यामे॒तं भा॒गम॑कल्पय॒न्नेतं द्या॑वापृथि॒व्यमे॑ककपालं पु॒रोडा॑शं॒ तस्मा॑द्द्यावापृथि॒व्य ए॑ककपालः पु॑रो॒डाशो भ॑वति तस्ये॒यमे॑व क॒पाल॒मेके॑व॒ हीयं॒ तस्मा॒देक॑कपालो भ॑वति ॥८॥ तस्य॑ परि॒चक्षा॑ । यस्यै॒ वै कस्यै॑ च दे॒वता॑यै ह॒विर्गृ॒ह्यते॒ सर्व॑त्रैव स्विष्ट॒कृद॑न्वाभ॒क्तोऽथैतꣳ॑ सर्व॑मेव जु॒होति॒ न स्विष्ट॒कृते॒ऽवद्य॑ति सा परि॒चक्षोतो॑ ह्रु॒तः पर्या॑वर्तते ॥९॥ तदा॑हुः । पर्या॑भूद्वा॒ऽअयमे॑ककपालो मोक्षि॒ष्यति॑ रा॒ष्ट्रमिति॑ नास्य॑ सा परि॒चक्षा॑हव॒नीयो॑ वा॒ऽआहु॑तीनां प्रति॒ष्ठा स यदा॑हव॒नीयं॒ प्राप्यापि॑
का० २, अं० ४, ब्रा० ३, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २६७ याज्ञवल्क्य का भी कथन है कि प्रजापति की सन्तान देव और असुर बड़ाई के लिए लड़ पड़े। तब असुरों ने दोनों प्रकार की ओषधियों को, अर्थात् उनको भी जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और उनको भी जिनके सहारे पशु रहते हैं, कुछ अपनी चालाकी से (कृत्यया) और कुछ विष के द्वारा नष्ट कर दिया कि इस प्रकार हम देवों पर विजय पा लेंगे। इस पर न मनुष्य कुछ खा सके और न पशु, और भोजन के अभाव में ये सब पराजित-से हो गये ॥२॥ अब देवों ने सुना कि बिना भोजन के यह सब प्रजा पराजित हो रही है। उन्होंने कहा, 'इस सब (विष आदि) को हटाना चाहिए।' 'कैसे?' 'यज्ञ के द्वारा।' देव जो कुछ करना चाहते थे वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा किया और ऋषियों ने भी ॥३॥ तब उन्होंने कहा, 'यह (यज्ञ) हममें से किसका होगा?' हर एक ने कहा, 'मेरा'-'मेरा' और निश्चित न कर सके। निश्चय न कर सकने पर उन्होंने कहा, 'चलो बाजी बदकर दौड़ें। हममें से जो जीत जायगा यह (यज्ञ) उसी का होगा।' 'अच्छा' कहकर वे दौड़े ॥४॥ इन्द्र और अग्नि जीत गये। इसलिए पुरोडाश के बारह कपाल इन्द्र और अग्नि के होते हैं। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने अपना भाग जीत लिया और इन्द्र और अग्नि जीतने पर जहाँ खड़े थे वहाँ सब देव भी चले गये ॥५॥ इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं, सब देव वैश्य। जहाँ क्षत्रिय जीतता है वहाँ वैश्यों को अवश्य. भाग मिलता है। इसलिए देवों को भाग मिल गया, इसलिए चरु सब देवों (विश्वेदेवा) का होता है॥६॥ कुछ लोगों का विचार है कि (चरु) पुराने (अन्न) का हो, क्योंकि इन्द्र और अग्नि क्षत्रिय हैं इसलिए (विश्वेदेवों को भी यदि इन्द्र और अग्नि के समान नया अन्न दिया जायगा तो) वैश्य क्षत्रियों के बराबर हो जाएँगे। परन्तु दोनों को नया ही होना चाहिए। केवल यह पुरोडाश है और यह चरु है। इन दोनों के नये होने से ही क्षत्रियों के बराबर (वैश्य) नहीं हो सकते। इसलिए दोनों (पुरोडाश और चरु) नये अन्न के ही हों ॥७॥ अब देवों ने कहा, 'यह रस वस्तुतः द्यावापृथिवी का है, इसलिए हम इनको यज्ञ में भाग देवें।' इसलिए उन्होंने उन दोनों को भाग दिया अर्थात् एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी को दिया। इसलिए एक कपाल का पुरोडाश द्यावापृथिवी का होता है। अब चूंकि यह पृथिवी उस (रस) का कपाल है और वह एक ही है, इसलिए (पुरोडाश भी) एक कपाल का होता है ॥८॥ (ऐसा करने में) उसका एक दोष (है)। चाहे किसी देवता को हवि दी जाय, पीछे से एक भाग स्विष्टकृत् का होता है। परन्तु यहाँ (पुरोडाश) की पूरी आहुति दे दी जाती है। स्विष्टकृत् के लिए कुछ बचाया नहीं जाता। यह एक दोष है, इसलिए आहुति उलटी पड़ जाती है ॥६॥ इसलिए कहते हैं, 'यह एक कपाल उलटा पड़ गया। यह राष्ट्र को बिगाड़ देगा।' परन्तु इसमें कुछ दोष नहीं। आहुतियों की प्रतिष्ठा आहवनीय है। जब आहुति आहवनीय में पहुँच गई -
अध्याय-४, ब्राह्मण-४
॑त्रं॒ : ऽआग्रयणम॒न्यद॒ग्निहो॑त्रं॒ (line under ma, line under da, tick on ho, line under traṃ)
- तस्मा॒न्नाग्निहो॑त्रे (tasmā॒nnāgniho॑tre - line under mā, tick on ho)
- जुहुयात् (juhuyāt)
- ॥ १४॥
- ब्रा॒ह्मणम् (brā॒hmaṇam - line under brā)
- ॥ ५ [४. ३.] ॥
तृतीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या ११३ ॥ ॥ (No svaras on this line)
प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वाऽ॒एतेनाग्रे॑ य॒ज्ञेने॑जे । प्र॒जाका॑मो बहुः॑ प्र॒जया॑ प॒शुभिः॑ स्याꣳ श्रि- Let's check L18:
- प्र॒जाप॑तिर्ह॒ (pra॒jāpa॑tirha॒ - line under pra, tick on pa, line under ha)
- वाऽ॒एतेनाग्रे॑ (vā'॒etenāgre॑ - line under vā', tick on gre)
- य॒ज्ञेने॑जे (ya॒jñene॑je - line under ya, tick on ne)
- ।
- प्र॒जाका॑मो (pra॒jākā
का० २, अ० ४, ब्रा० ३-४, कं० १०-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / २६६ तो चाहे दस बार उलट जाय कुछ परवाह नहीं। और यदि कोई कहे कि इन (दोषों) के भार को कौन सहे तो केवल घी की ही आहुति दे, क्योंकि इन द्यावा-पृथिवी का प्रत्यक्ष रस घी है। इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में इनको वह इन्हीं के रस या मेध (तत्त्व) से तृप्त करता है, इसलिए घी की ही आहुति दे ॥१०॥ यज्ञ करके देवों ने उन सब ओषधियों को, जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं या पशु रहते हैं, (असुरों की) चालाकी और विष (के प्रभाव) से मुक्त कर दिया। इसलिए अब मनुष्य भोजन करने लगे और पशु चरने लगे ॥११॥ अब वह जो यज्ञ करता है, या तो इसलिए करता है कि कोई चालाकी या विष से (वनस्पति) को बिगाड़ने न पाये, या केवल इसलिए कि देवों ने ऐसा किया था। और जो भाग देवों ने अपने लिए निकाला था वह भी उनके लिए निकाल देता है। इसके अतिरिक्त वह दोनों प्रकार के पौधों को अर्थात् जिनके सहारे मनुष्य रहते हैं और जिनके सहारे पशु रहते हैं, उनको विषरहित कर देता है और ये मनुष्य और पशु इसके दोष-रहित पौधों के सहारे जीते हैं। इसलिए वह इस यज्ञ को करता है ॥१२॥ इस यज्ञ की दक्षिणा है पहलोटी बछड़ा, क्योंकि यह (गाय का) अग्र अर्थात् पहला फल होता है। यदि दर्श और पूर्णमास यज्ञ कर चुका हो तो पहले वह आहुतियां दे और फिर इस यज्ञ को पीछे से करे। और यदि (दर्श और पूर्णमास) नहीं किया तो अन्वाहार्य-पचन अग्नि पर चातुष्प्राश्य को पका ले और ब्राह्मणों को खिला दे ॥१३॥ देव दो प्रकार के हैं - एक तो देव; और दूसरे ब्राह्मण जो वेदपाठी हैं, ये मनुष्य-देव हैं। जिस प्रकार वषट्कार की आहुति होती है वैसी यह भी है। इस समय भी वह जितना हो सके उतनी दक्षिणा दे, क्योंकि कहते हैं कि कोई हवि दक्षिणा के बिना पूरी नहीं होती। अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले, नहीं तो झगड़ा होगा। आग्रयण भिन्न है और अग्निहोत्र भिन्न। इसलिए अग्निहोत्र में (नया अन्न) न डाले ॥१४॥ अध्याय ४-ब्राह्मण ४ प्रजापति ने पहले प्रजा की कामना से यह यज्ञ किया। उसने सोचा- 'मैं बहुत प्रजा और पशु-युक्त हो जाऊँ, श्री मिल जाय, यशस्वी हो जाऊँ, अन्न पचानेवाला हो जाऊँ' ॥१॥ उसका नाम दक्ष था। और चूंकि पहले उसने इस यज्ञ को किया, इसलिए यज्ञ का 'दाक्षायण यज्ञ' नाम पड़ा। कुछ लोग दक्ष को वसिष्ठ-यज्ञ कहते हैं, क्योंकि वह वसिष्ठ ही है। उसी के नाम पर यज्ञ का नाम पड़ा। उसने यज्ञ किया और इस यज्ञ से उस प्रजापति ने जो सन्तान, जो श्री, जो विभूति प्राप्त की उसी सन्तान, उसी श्री को वह भी प्राप्त होता है जो इस
ते॒न य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ २॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । प्रतीद॒र्शः श्यै॒- क्यः॒ स ये॒ तं प्र॒त्यासु॒स्तेषां॑ वि॒वच॑नमिव॒ास वि॒वच॑नमिव ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ३॥ तमा॒जगा॑म । सु॒क्षा सार्ङ्गयो॒ ब्रह्मच॒र्यं॒ तस्मा॑दे॒तं च॑ य॒ज्ञमनू॒चेऽन्य॑मु च॒ सोऽनू॒च्य पुन॑ः सृञ्जया॒न्जगा॑म॒ ते ह॒ सृ॒- ञ्जया वि॒दां च॒क्रुर्यज्ञं॑ वै नो॒ऽनूच्या॑गन्निति॒ ते हो॑चुः सह॒ वै न॒स्तद्देवै॒राग॒न्यो नो॑ य॒ज्ञमनू॒च्याग॒न्निति॒ स वै सह॑देवः सार्ङ्गयस्तदु॒ह्ये॑तद्वि॒वच॑नमिवास्त्यन्य॒द्वाऽअ॒ग्रे सु॒- क्षा नाम॑ दधृ॒ङ्ङिति॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॑जे॒ स ए॒तेन॒ य॒ज्ञेने॒ष्ट्वा येयं॑ सृञ्जया॒नां प्र॒जाति॒र्या श्रीरे॒तद्बभू॑वेताँ॒ ह॒ वै प्र॒जातिं॑ प्र॒जायत॒ऽएताँ॒ श्रियं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ४॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । दे॒वभा॒गः श्रौत॒र्षः स उ॒भये॑षां कु॒रूणां॑ च सृञ्जया॒नां च॑ पु॒रोहि॑त॒ आस॑ पर॒मता॒ वै सा यो न्वेवै॑कस्य॒ राष्ट्रस्य॑ पु॒रोहि॑तोऽसत्सा॒ न्वेव॑ पर॒मता॒ किमु॒ यो द्वयो॑ः पर॒मतामिव ह॒ वै ग॒च्छ- ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त ॥ ५॥ तेनो॑ ह॒ तत॑ ईजे । द॒क्षः पा॑र्व॒तिस्त॒ऽइमे॒ऽप्येत॑र्हि दाक्षाय॒णा रा॒ज्यमि॑वैव प्राप्ता रा॒ज्यमि॑ह॒ वै प्राप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वाने॒तेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॑द्वाऽए॒तेन॒ यजे॑त॒ स वाऽऐ॒कैक॒ ए॒वानू॒- चीना॒कं पु॒रोडा॒शो भ॑वत्येते॒नो हास्यास॒प्तवा॒नुप॑बाधा॒ श्रीर्भव॑ति॒ स वै द्वे पौर्ण- मा॒स्यौ य॑जते॒ द्वेऽअ॑मावा॒स्ये॑ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ६॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमी॑येण॒ यज॑ते पौर्णमा॒स्यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒- वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ७॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वत्यैन्द्रा॒ग्नँ सांना॒य्यं ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ८॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्यु॑ः । ऐ॒- न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां ते द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒वैतत्प्र॒जननं॑ क्रियते ॥ ९॥ अथ प्रा॒तः । आ॒ग्ने॒यः पु॒रोडा॒शो भ॑वति मैत्रावरु॒णी प॒यस्या॑ नेद्यज्ञा॒द्यानी॒- ति॒ न्वे॒वाग्ने॒यः पु॒रोडा॒शोऽथैतावे॒व मि॑त्रावरु॒णौ द्वे दे॒वते॒ द्वे वै मि॑थु॒नं मि॑थु॒नमे॒-
कां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / २७१ यज्ञ को समझकर करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥२॥ प्रतीदर्श श्वैक्न ने भी इसी यज्ञ को किया। और जिन्होंने उसका अनुकरण किया उनके लिए वह विवचन (authority) से था। जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह विवचन ही हो जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥३॥ सृप्ला साञ्जय ब्रह्मचर्य व्रत के लिए उसके पास आया, इसलिए उसे यह यज्ञ और अन्य भी सिखाया। वह उनको सीखकर साञ्जय वाले लोगों के पास (अपने देश में) चला गया। अब उन्होंने जान लिया कि यह हमारे लिए यज्ञ को सीखकर आया है। उन्होंने कहा, 'यह जो यज्ञ सीखकर आया है मानो 'देवों के साथ' आया है, इसलिए उसका सहदेव साञ्जय नाम पड़ गया। अब तक यह कहावत चली आती है कि अरे सृप्ला का दूसरा नाम रख दिया गया। उसने उस यज्ञ को किया और जो सन्तान और वैभव इस यज्ञ के करने से सृञ्जयों को प्राप्त हुआ, उसी सन्तान को वह भी उत्पन्न करता है और उसी वैभव को प्राप्त होता है जो इस रहस्य को समझ- कर यह यज्ञ करता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥४॥ देवभाग श्रौतष ने भी यह किया था। वह कुरुओं और सृञ्जयों दोनों का पुरोहित था। जो एक राष्ट्र का पुरोहित होता है उसकी बड़ी पदवी होती है, और उसकी पदवी का क्या कहना जो दो राष्ट्रों का पुरोहित हो ! जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह उसी बड़ी पदवी को पाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे ॥५॥ दक्ष पार्वति ने भी यही यज्ञ किया था। और आज तक यह दाक्षायण (उसी की सन्तान) राज्य को पाये हुए हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है वह भी राज्य को पा जाता है। इसलिए इस यज्ञ को अवश्य करे। एक-एक पुरोडाश प्रतिदिन देना होता है। इसलिए उसकी श्री बिना सपत्नी के और बिना बाधा के होती है। वह पूर्णमासी के दो दिन और अमावस्या के दो दिन यज्ञ करता है। दो का नाम है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥ पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम को एक पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥७॥ दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार वह उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥८॥ अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि को पुरोडाश देता है। ये दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। इस प्रकार एक उत्पत्ति करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है ॥६॥ दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही (पयस्या)। अग्नि का पुरोडाश केवल इसलिए कि वह यज्ञ से चला न जाय। मित्र और वरुण दो देवता हैं। दो का अर्थ है जोड़ा। वह इस प्रकार उत्पन्न करनेवाले जोड़े से सम्पन्न हो जाता है। यह उसका वह रूप है
शतपथ ब्राह्मण
वै॒तत्प्र॒जननं॑ क्रिय॒त ऽए॒तद्वा॑स्य॒ तद्रू॒पं येन॑ बहुर्भव॑ति॒ येन॒ प्र॒जाय॑ते ॥१०॥ अथ॑ य॒त्पूर्वेद्यु॑ः । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यां य॒मेवामु॒मुपव॑सथेऽग्नीषोमी॒यं प॒शु- माल॑भते॒ स ए॒वास्य॒ सः ॥११॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भव॒त्यैन्द्रं॒ सां- नाय्यं॑ प्रातःस॒वन॑मे॒वास्या॑ग्ने॒यः पु॑रो॒डाश॒ आग्ने॒यो हि प्रातःस॒वन॒मैन्द्रं॒ सांनाय्यं॑ माध्यन्दिनमे॒वास्य॒ तत्सवन॒मैन्द्रं॒ हि माध्यन्दिनं॒ सव॑नम् ॥१२॥ अथ॒ यत्पूर्वे॑- द्युः । ऐ॒न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां तृतीयसवनमे॒वास्य॒ तद्वैश्वदे॒वं वै तृ॑तीयसवन- मिन्द्रा॒ग्नी वै विश्वे॑ दे॒वाः ॥१३॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो॑ भवति मैत्राव- रु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानीति॑ न्वेवाग्ने॒यः पु॑रो॒डाशोऽथ॒ यामे॒वामूं मै॒त्रावरु॒णीं व॒- शामनूबन्ध्या॒मालभ॑ते॒ सैवास्य मैत्रावरु॒णी पय॒स्या स पौ॑र्णमा॒सेन॑ चामावा॒स्येन॑ चे॒ष्ट्वा याव॒त्सौम्ये॑नाध्व॒रेणे॒ष्ट्वा जय॑ति॒ ताव॑ज्जयति॒ तदु॒ खलु॑ महाय॒ज्ञो भ॑वति ॥१४॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्यामे॒तेन॒ वाऽइ॒न्द्रो वृ॒त्रम॑हंस्तेनेनो ऽए॒वै॒ष व्य॑जयत॒ यास्ये॒यं विजि॑ति॒स्तां तथो॑ऽए॒वैष ए॒तेन॑ पा॒प्मानं॒ द्विषन्तं॒ भ्रातृ॑व्यं हन्ति॒ तथो॑ऽए॒व वि॑जयतेऽथ॒ यत्संन॑यत्यामावा॒स्यं वै सांनाय्यं॑ दू॒रे तद्यद॑मावा॒स्ये- ति क्षि॒प्रऽए॒वैतद्भूतं॒ शत्रू॑षे त॒मेते॑न॒ रसे॑नाप्रीणा॒न्क्षिप्रं॑ ह॒ वै पा॒प्मान॒मप॑हते॒ य ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संन॑यत्ये॒ष वै सोमो राजा॑ दे॒वाना॒मन्नं॒ यच्च॒न्द्रमा॒स्तमे॒त- त्यू॒र्वेद्युर॑भिषुण्वन्ति प्रा॒तर्भक्ष॑यिष्य॒न्तस्तमे॒तद्र॒द्धय॑न्ति॒ यदप॑क्षीयते ॥१५॥ अथ॒ यत्पू- र्वेद्युः॑ । अ॒ग्नीषोमीये॑ण य॒जते॑ पौर्णमा॒स्याम॑भिषु॒णोत्ये॒वैन॑मेत॒त्तस्मि॒न्नभि॑षुत॒ऽएत॑ रसं दधात्ये॒तेन॒ रसे॑न तीव्रीक॑रोति स्वदय॑ति ह॒ वै दे॒वेभ्यो ह॒व्यं स्वद॑ते हास्य दे॒वेभ्यो ह॒व्यं य ए॒वं वि॒द्वान्पौ॑र्णमा॒स्यां संनय॑ति ॥१६॥ अथ॒ यत्पूर्वेद्युः॑ । ऐ- न्द्रा॒ग्नेन॒ यज॑तेऽमावा॒स्या॑यां दर्शपूर्णमा॒सयो॒र्वे दे॒वते स्तः इन्द्रा॒ग्नीऽए॒व तेऽए॒वैतद्- ञ्ज॒सा प्र॒त्यक्षं॑ यजत्य॒ञ्जसा ह॒ वाऽअ॒स्य दर्श॑पूर्णमा॒साभ्या॒मिष्टं भव॑ति॒ य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥१७॥ अथ॒ प्रातः॑ । आ॒ग्नेयः॑ पुरो॒डाशो भव॑ति मैत्रावरु॒णी पय॒स्या नेद्य॑ज्ञाद॒यानी-
कां० २, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १०-१८ शतपथब्राह्मण / २७३ जिससे वह बहुत (या अनेक) हो जाता है जिससे उत्पन्न होता है ॥१०॥ और जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि-सोम का पुरोडाश दिया जाता है, वह ऐसा ही है जैसा कि (सोम यज्ञ में) उपवास के दिन पशु-आलम्भन है ॥११॥ दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश और इन्द्र का सान्नाय्य । अग्नि का पुरोडाश वैसा ही है जैसा (सोम यज्ञ में) प्रातःकाल की आहुति, क्योंकि प्रातःकाल का सवन अग्नि का होता है। इन्द्र का सान्नाय्य वैसा ही है जैसा (सोम यज्ञ में) मध्य दिन का सवन, क्योंकि मध्य दिन का सवन इन्द्र का होता है ॥१२॥ अमावस्या को पहले दिन जो इन्द्र और अग्नि का पुरोडाश दिया जाता है वह वैसा ही है जैसा तृतीय सवन। क्योंकि तृतीय सवन विश्वेदेवों का है और वस्तुतः इन्द्र और अग्नि विश्वेदेव ही हैं ॥१३॥ और जो दूसरे दिन अग्नि के लिए पुरोडाश और मित्र-वरुण के लिए दही होता है, इसमें अग्नि का पुरोडाश केवल इसलिए है कि कहीं अग्नि यज्ञ को छोड़कर चला न जाय। और पयस्या अर्थात् दही मित्र और वरुण के लिए उसी प्रकार है जैसे (सोमयज्ञ में) मित्र और वरुण के लिए अनुबन्ध्या (बाँझ गाय) मारी जाती है। इस प्रकार पूर्णमासी और अमावस्या की इष्टियों से मनुष्य को उतना ही फल मिल जाता है जितना सोमयज्ञ से, क्योंकि यह महायज्ञ है ॥१४॥ और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए आहुति दी जाती है वह इसलिए है कि इन्द्र ने वृत्र को मारा था। इसी से उसको वह विजय प्राप्त हुई जो आज उसे प्राप्त है। इसी प्रकार यह (यजमान) भी इस यज्ञ से द्वेषी पापी शत्रु को मारता है और उस पर विजय प्राप्त करता है। और यह जो सान्नाय्य अर्थात् दूध और दही को मिलाना है, यह सान्नाय्य अमावस्या का है। अमावस्या का अर्थ है दूर होना । जिस (इन्द्र) ने वृत्र को मारा था उसको तुरन्त ही यह आहुति दी गई थी और तुरन्त ही उसको रस से प्रसन्न किया गया था। इसलिए जो पुरुष इस रहस्य को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य बनाता है, वह तुरन्त ही पाप को दूर भगा देता है। यह जो चरु है वह सोम राजा और देवों का अन्न है। वे पहले दिन रस निकालते हैं कि दूसरे दिन खायेंगे। इसलिए जब (चाँद) क्षीण होने लगता है तो मानो (देव) उसको खाने लगते हैं ॥१५॥ और यह जो पूर्णमासी को पहले दिन अग्नि और सोम के लिए पुरोडाश दिया जाता है, मानो उस प्रकार वह सोम-रस निचोड़ लेते हैं। और निचोड़ने के पश्चात् उसमें मिलाता है और उस रस को तीव्र करता है। जो पुरुष इस भेद को समझकर पूर्णमासी को सान्नाय्य तैयार करता है वह मानो देवों के लिए हव्य को स्वादिष्ट बनाता है और उसका द्रव्य देवों के लिए स्वादिष्ट हो जाता है ॥१६॥ और यह जो अमावस्या को पहले दिन इन्द्र और अग्नि के लिए पुरोडाश दिया जाता है वह इसीलिए है कि इन्द्र और अग्नि अमावस्या और पूर्णमासी के देवता हैं। इन्हीं के लिए वह सीधा प्रत्यक्ष रूप से हव्य देता है। और जो इस भेद को समझता है वह दर्श और पूर्णमास की इष्टियों को करता है ॥१७॥ और दूसरे दिन अग्नि का पुरोडाश होता है और मित्र और वरुण के लिए पयस्या (दही)।
अध्याय-५, ब्राह्मण-१
२७४ शतपथ ब्राह्मण ति॒ न्वे॒वाग्रे॒यः पु॑रोडाशो॒ऽथैतावे॒वार्धमासौ॑ मित्रावरुणौ॒ य ए॒वापूर्य॑ते॒ स वरु॑णो यो॒ऽपक्षी॒यते॒ स मि॒त्रस्तावे॒ताꣳ रात्रि॑मु॒भौ समा॑गच्छतस्तद्भावे॒वैतत्सह॒ सन्तो॑ प्री- णाति सर्वँ॑ ह॒ वाऽअ॒स्य प्री॒तं भ॑वति सर्व॑मा॒प्तं य ए॒वमे॒तद्वेद॑ ॥ १८ ॥ तद्वाऽए॒- ताꣳ रात्रि॑ । मि॒त्रो वरु॑णे॒ रेतः॑ सिञ्चति॒ तदे॒तेन॒ रेत॑सा प्रजा॒यते॒ यदा॒पूर्य॑ते॒ तद्य॒- द्वेषा॒त्र मै॑त्रावरु॒णी प॑य॒स्यावकॢ॑प्ततमा॒ भव॑ति ॥ १९ ॥ सां॒नाय्य॑भाजना॒ वाऽअ॑मावा॒- स्या । तद्द्यस्त॒त्पौर्ण॑मास्यां क्रियते॒ स य॒द्वात्रा॑पि सं॒नये॒त्सामि॑ कुर्यात्स॒मदं॑ कुर्यात्त॒- देनम॒द्य ओष॑धिभ्यः संभृत्या॒हुति॑भ्यो॒ऽधिप्र॑जनयति॒ स ए॒ष आ॒हुति॑भ्यो जा॒तः प॒- श्वादृशे॑ ॥ २० ॥ मिथुना॒द्विद्वाऽए॒नमेतत्प्र॒जन॑यति । योषा॒ पय॑स्या॒ रेतो॑ वा॒जिनं॑ त॒- द्धाऽअनु॒ध्या यन्मिथुना॒ज्जाय॑ते॒ तदे॒नमे॒तस्मान्मिथुना॒त्प्रज॑ननात्प्र॒जन॑यति॒ तस्मा॒द्येषा॒- त्र पय॑स्या भवति ॥ २१ ॥ अथ वा॒जिभ्यो॑ वा॒जिनं॑ जुहोति । ऋ॒तवो॒ वै वा॒जिनो॒ रेतो॑ वा॒जिनं॒ तदनु॑ह्येवैतद्रेतः॑ सिच्यते॒ तदृतवो॒ रेतः॑ सि॒क्तमि॒माः प्र॒जाः प्र॒जनय॑- न्ति॒ तस्मा॑द्वा॒जिभ्यो॑ वा॒जिनं॑ जुहोति ॥ २२ ॥ स वै प॒श्चादिव॑ य॒ज्ञस्य॑ जुहोति । प॒- श्चाद्धि॒ परीत्य॒ वृषा॒ योषा॑मधि॒द्रव॑ति त॒स्याꣳ रेतः॑ सिञ्चति॒ स वै प्रागे॒वाग्रे जुहो- त्यग्रे॒ वोद्गा॒त्यनु॑वषट्करोति॒ तत्स्वि॑ष्ट॒कृद्भाजनꣳ स वै प्रागे॒व जुहो॑ति ॥ २३ ॥ अथ॑ दि॒शो व्या॒घार॑यति । दि॒शः प्र॒दिश॒ आदि॑शो वि॒दिश॑ उद्दि॒शो दिग्भ्यः॒ स्वाहेति॑ प॒ञ्च दिशः॑ प॒ञ्चऽर्त॒वस्त॒दृतु॑भिरे॒वैतद्दि॒शो मि॑थुनीक॒रोति॑ ॥ २४ ॥ तद्वै प॒ञ्चैव भक्ष॑- यन्ति । होता॒ चाध्व॒र्युश्च॒ ब्रह्मा॑ चा॒ग्नीध्र॑ यज॑मानः प॒ञ्च वाऽऋ॒तवस्तदृतूनामे॒वैतद्रूपं॑ क्रियते॒ तदृतु॒ष्वेवैतद्रेतः॑ सि॒क्तं प्र॒तिष्ठा॑पयति प्रथमो यज॑मानो भक्षयति प्रथमो॒ रेतः॑ प॒रिगृह्ना॒नीत्यथो॒ऽअप्यु॑त्त॒मो मय्यु॑त्तमे॒ रेतः॒ प्रति॑तिष्ठा॒दित्य॑पृच्छत॒ उप॑ह्वय॒स्वेति॑ सो- ममे॒वैतत्कुर्वन्ति॑ ॥ २५ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [४. ४.] ॥ अध्यायः ॥ ४ [१३.] ॥ ॥ प्र॒जाप॑तिर्ह॒ वाऽइ॒दमग्र॒ऽएक॑ ए॒वास॑ । स ऐक्षत क॒थं नु प्र॒जाये॒येति॒ सो॑ऽश्रा- म्यत्स तपो॑ऽतप्यत॒ स प्र॒जा असृ॑जत ता अस्य प्र॒जाः सृ॒ष्टाः परा॑बभूवुस्ता॒नीमा॑नि
कां० २, अ० ४, ब्रा० ४-५, कं० १८-२५ व १ शतपथब्राह्मण / २७५ अब अग्नि का पुरोडाश इसीलिए है कि अग्नि यज्ञ को छोड़कर न चला जाय। मित्र और वरुण अर्धमास हैं। बढ़ता हुआ वरुण है और घटता हुआ मित्र । उस (अमावस्या की) रात्रि को वे दोनों मिलते हैं। और जब वे मिलते हैं तब (यजमान) दोनों को प्रसन्न करता है। जो इस रहस्य को समझता है सब उससे प्रसन्न रहते हैं और उसको सब-कुछ प्राप्त होता है ॥१८॥ उसी रात को मित्र वरुण में वीर्य सींचता है। और जब यह (चन्द्र) घटता है तो फिर उसी वीर्य से उत्पन्न होता है। यह जो मित्र और वरुण की पयस्या (दही) है, वह (सान्नाय्य के) समान है ॥१९॥ अमावस्या सान्नाय्य के ही योग्य है। यह (अमावस्या को भी) और पूर्णमासी को भी तैयार किया जाता है। अब यदि वह यहाँ भी (अर्थात् पूर्णमासी को भी) सान्नाय्य बनावे तो दुहराने के दोष का भागी हो और देवताओं में झगड़ा हो जाय। इस (सोम) को जलों और ओषधियों से इकट्ठा करके आहुतियों में होकर उत्पन्न करता है। और यह (सोम या चाँद) आहुतियों से उत्पन्न होकर पश्चिम की ओर चमकता है ॥२०॥ इसको जोड़े से उत्पन्न करता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। जो जोड़े से उत्पन्न होता है वह ठीक होता है। इसलिए वह इसको जोड़े से उत्पन्न करता है और इसीलिए यहाँ पयस्या तैयार की जाती है ॥२१॥ अब मट्ठे की आहुति दोनों घोड़ों (वाजियों) के लिए दी जाती है। घोड़े (वाजी) ऋतुएँ हैं और (वाजी) मट्ठा वीर्य है। यह वीर्य अनुष्ठान से सींचा जाता है। सींचे हुए वीर्य से ऋतुएँ इन प्रजाओं को उत्पन्न करती हैं। इसीलिए 'बाजी' घोड़े के लिए 'वाजी' मट्ठे की आहुति देता है। ('वाजी' घोड़े को भी कहते हैं और मट्ठे को भी) ॥२२॥ वह यज्ञ के पीछे की ओर से आहुति देता है। पीछे की ओर से ही पुरुष स्त्री के पास जाता और वीर्य-सिंचन करता है। वह पहले पूर्व की ओर आहुति देता है। 'अग्ने वीहि' (हे अग्नि, स्वीकार करो) यह पढ़कर वषट्कार को दुहराता है। यह स्विष्टकृत् के बदले में है। इसको पूर्व की ओर देता है ॥२३॥ अब वह इस मन्त्र से दिशाओं के लिए आहुति देता है—'दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिश- ऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा' (यजु० ६।१९)। पाँच दिशाएँ हैं और पांच ऋतुएँ। इस प्रकार दिशाओं का जोड़ा मिलाता है ॥२४॥ (चमसे में जो मट्ठा बच रहता है उसे) पाँच लोग चखते हैं—होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, आग्नीध्र और यजमान। पाँच ही तो ऋतुएँ हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं का तद्रूप हो जाता है। और जो वीर्य सींचा जाता है वह प्रतिष्ठित हो जाता है। यजमान (यह सोचते हुए) पहले चखता है कि मुझे पहले वीर्य की प्राप्ति हो। और वह पीछे भी चखता है कि मुझमें वीर्य अन्त तक रहे। 'उपहूत उपह्वयस्व' कहकर वह इस (मट्ठे) को मोम बना लेता है ॥२५॥ चातुर्मास्यानि अध्याय ५—ब्राह्मण १ पहले केवल प्रजापति ही था। उसने सोचा कि कैसे प्रजा उत्पन्न करूँ.? उसने श्रम किया और तप तप। उसने प्रजा उत्पन्न की। वह उत्पन्न हुई प्रजा गुजर गई। यह वे पक्षी हैं। पुरुष
२७६ शतपथ ब्राह्मण व्॒याग्ꣳसि॑ पु॒रुषो॒ वै प्र॒जाप॑ते॒र्नेदि॑ष्ठं द्वि॒पाद्वाऽअ॒यं पु॑रु॒षस्तस्मा॑द्द्वि॒पादो॒ व्॒याग्ꣳसि॑ ॥ १॥ स॒ ऐक्ष॑त प्र॒जाप॑तिः । य॒था॒ न्वे॑व॒ पुरोको॒ऽभूव॑मे॒वम् न्वे॒वाय॑त्ये॒कैक॑ ए॒वास्मी॒- ति॒ स द्वि॒तीयाः॑ ससृजे ता अ॑स्य॒ परे॑व बभूवु॒स्तदि॒दं क्षु॒द्रꣳ स॑रीसृ॒पं यद॒न्यत्स॑र्पे- भ्यस्तृ॒तीयाः॑ ससृज॒ऽइत्या॑हु॒स्ता अ॑स्य॒ परे॑व बभूवु॒स्तऽइ॒मे सर्पा॒ इता॒ ह॒ न्वे॑व॒ द्वयोर्या॑ज्ञवल्क्य उवाच त्रयी॑रु तु॒ पुन॒र्मृचा॑ ॥ २॥ सो॒ऽर्चञ्छ्राम्यन्प्र॒जाप॑तिरी॒क्षां च॑- क्रे । क॒थं नु मे प्र॒जाः सृ॒ष्टाः प॒राभव॑न्तीति॒ स है॒तदे॒व द॑र्शानशनत॒या वै मे प्र॒- जाः प॒राभव॑न्तीति॒ स आ॒त्मन॑ ए॒वाग्रे॒ स्तन॑योः पय॒ आप्या॑ययां चक्रे॒ स प्र॒जा अ॑- सृजत॒ ता अ॑स्य प्र॒जाः सृ॒ष्टा स्तना॑वे॒वाभि॑पद्य॒ तास्ततः॒ सम्ब॑भूवु॒स्ता इ॒मा अप॑रा- भूताः॑ ॥ ३॥ तस्मा॑देतदृषि॑णा॒भ्यनू॑क्तम् । प्र॒जा ह॒ तिस्रो॒ऽअत्या॑य॒मीयु॒रिति॒ तयाः॑ प॒- राभू॑ता॒स्ता ए॒वैतद॒भ्यनू॑क्तं॒ न्यन्या अ॒र्कम॑भि॒तो वि॑विश्रु॒रित्य॒ग्निर्वाऽअ॒र्कस्तद्य॒ा इ॒- माः प्र॒जा अप॑राभूता॒स्ता अ॒ग्निम॑भि॒तो निवि॑ष्टा॒स्ता ए॒वैतद॒भ्यनू॑क्तम् ॥ ४॥ म॒हद्द्ध॒ तस्थौ॒ भुव॑नेष्व॒न्तरिति॑ । प्र॒जाप॑तिमे॒वैतद॒भ्यनू॑क्तं पव॑मानो॒ हरित॒ आवि॑वेशेति दि॒- शो वै हरि॑त॒स्ता अ॒यं वायुः॑ पव॑मान॒ आवि॑ष्ट॒स्ता ए॒वैषो॑ऽर्ग॒भ्यनू॑क्ता॒ ता इ॒माः प्र॒- जास्तथै॑व प्र॒जाय॑न्ते॒ यथै॑व प्र॒जाप॑तिः प्र॒जा अ॒सृज॑तै॒तद्ध॑ ह्य॒ य॒दैव स्त्रियै॒ स्तना॒वा- प्यायेते॒ऽऽधः प॒शूना॒मथै॑व यज्जाय॑ते॒ तज्जाय॑ते॒ तास्तत॑ स्तना॑वे॒वाभि॒पद्य॒ सम्भ॑व- न्ति ॥ ५॥ तद्वै पय॑ ए॒वान्न॑म् । ए॒तद्ध्य॑ग्रे प्र॒जाप॑तिर॒न्नमज॑नयत॒ तद्धाऽअन्न॑मेव॒ प्र॒जा अ॒न्नाद्धि सम्भ॑वती॒तद्ध॑ हि॒ यासां॒ पयो॒ भव॑ति स्तना॑वे॒वाभि॑पद्य॒ तास्ततः सम्भ॑व- न्त्यथ॒ यासां॒ पयो॒ न भव॑ति जा॒तमे॑व॒ ता अथा॑दयन्ति॒ तद्वा ता अ॒न्नादे॑व॒ सम्भ॑वन्ति तस्मा॒दन्न॑मेव॒ प्र॒जाः ॥ ६॥ स यः प्र॒जाका॑मः । ए॒तेन॑ ह॒विषा॒ यज॑त॒ऽआत्मान॑मे॒वै- तद्य॒ज्ञं वि॑धत्ते प्र॒जाप॑तिं भू॒त्व ॥ ७॥ ॥ शतम् १२०० ॥ ॥ स वाऽऽग्ने॒योऽष्टाक॑- पालः पुरोडा॑शो भव॑ति । अ॒ग्निर्वै दे॒वतानां॑ मु॒खं प्र॒जनयि॑ता स॒ प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑- दाग्ने॒यो भव॑ति ॥ ८॥ अथ सौम्यश्चरुर्भव॑ति । रेतो॒ वै सोम॑स्तद॒ग्नौ प्र॒जनयि॑तरि
कां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २७७ प्रजापति के निकटतम है। पुरुष के दो पैर होते हैं, इसलिए चिड़ियों के भी दो पैर होते हैं ॥१॥ प्रजापति ने सोचा कि मैं पहले भी अकेला था और अब भी अकेला हूँ। इसलिये उसने दुबारा सृष्टि की। वह भी गुजर गई। ये वे कीड़े हैं जो साँप के अतिरिक्त हैं। कहते हैं कि उसने तीसरी बार सृष्टि की। वह भी गुजर गई। वे साँप हैं। याज्ञवल्क्य उसको दो प्रकार के बताते हैं, परन्तु ऋग्वेद के अनुसार तीन प्रकार के हैं ॥२॥ प्रजापति ने पूजा और श्रम करते हुए सोचा कि मेरी बनाई प्रजा गुजर कैसे जाती है ? तब उसे मालूम हुआ कि मेरी प्रजा बिना भोजन के मर जाती है। इसलिये उसने अपने स्तनों में पहले से ही दूध भर दिया। तब उसने प्रजा उत्पन्न की, और यह उत्पन्न प्रजा स्तनों का दूध पीकर जीती रही। ये वे हैं जो मरे नहीं ॥३॥ इसीलिये ऋषि ने ऐसा कहा—"प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः" (ऋ० ८।१०१।१४)— "तीन प्रजाऐं मर चुकीं" यह उसके लिए कहा गया जो मर चुकीं। "न्यन्याऽअर्कमभितो विविश्रे" (ऋ० ८।१०१।१४)--"दूसरी आग (प्रकाश) के चारों ओर बस गई।" 'अग्नि' ही 'अर्क' है। इसलिये कहा कि जो प्रजा जीती रही वह अग्नि के चारों ओर बस गई ॥४॥ "महद्ध (बृहद्व) तस्थौ भुवनेष्वन्तः" (ऋ० ८।१०१।१४)—"महान् (आत्मा) भुवनों के भीतर रही।" यह प्रजापति के विषय में कहा गया। "पवमानो हरितऽआविवेश" (ऋग्वेद ८।१०१।१४)—"पवमान (पवित्र करनेवाला वायु) देशों में प्रवेश हो गया।" 'हरित' का अर्थ है दिशाएं। 'पवमान' यह हवा है। यह हवा ही दिशाओं में भर गई। इसी का ऋचा में संकेत है। जिस प्रकार प्रजापति ने इन प्रजाओं को उत्पन्न किया, उसी प्रकार ये उत्पन्न होते हैं। क्योंकि जब स्त्रियों और पशुओं के थनों में दूध आ जाता है तभी बच्चा पैदा होता है, और स्तन को पीकर ही वे जीते हैं ॥५॥ यह दूध ही अन्न है, क्योंकि प्रजापति ने पहले इसी भोजन को उत्पन्न किया। अन्न ही प्रजा है क्योंकि अन्न ही से यह उत्पन्न होती हैं। जिनके स्तनों में दूध है उसको पीकर ही वे जीते हैं। और जिनके दूध नहीं होता वे अपने बच्चों को जन्मते ही 'चुगा' देते हैं। इस प्रकार वे अन्न से ही जीते हैं, इसलिये अन्न ही प्रजा है ॥६॥ जो सन्तान की कामना करता है वह इस हवि से यज्ञ करता है। इस प्रकार अपने को प्रजापतिरूपी यज्ञ बना लेता है ॥७॥ अग्नि का पुरोडाश आठ कपालों में होता है। अग्नि ही देवतागणों का मुख और उत्पादक है। वह प्रजापति है। इसलिए अग्नि के लिए पुरोडाश होता है ॥८॥ इसके पीछे सोम का चरु होता है। सोम वीर्य है और वह उत्पादक अग्नि में है। वह
२७८ शतपथ ब्राह्मण सोम॑ꣲ रे॒तः सिञ्चति॒ तत्पु॒रस्तान्मिथु॒नं प्र॒जन॑नम् ॥ ९॥ अथ सावि॒त्रः। द्वाद॑शक- पालो वा॒ष्टाक॑पालो वा पुरो॒डाशो॑ भवति सविता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता प्र॒जाप॑- तिर्मध्य॒तः प्र॒जनयिता॒ तस्मा॑त्सावि॒त्रो भ॑वति ॥ १०॥ अथ सारस्व॒तश्च॒रुर्भवति । पौष्णश्च॒रुर्योषा॒ वै सर॑स्वती॒ वृषा॑ पू॒षा तत्पुन॑र्मिथु॒नं प्र॒जनन॑मे॒तस्माद्द्वाऽउ॒भयतो मिथु॒नात्प्र॒जन॑नात्प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः स॒सृज॒ऽइत॒श्चोर्ध्वा इत॑श्चावाची॒स्तथो॒ऽए॒वैष ए॒त- स्मादु॒भयत॑ ए॒व मिथु॒नात्प्र॒जन॑नात्प्र॒जाः सृ॑जत॒ऽइत॒श्चोर्ध्वा इत॑श्चावाची॒स्तस्मा॑द्वाऽए॒- तानि॒ पञ्च॑ ह॒वीꣳषि॒ भव॑न्ति ॥ ११॥ अथातः पयस्याया ए॒वायत॑नं । मारु॒तस्तु स॒- प्तक॑पालो॒ विशो॒ वै म॒रुतो॑ दे॒ववि॒शस्ता हेद॒मनि॑षेद्धा-इव चेरुर॒न्तः प्र॒जाप॑तिं य- जमानमुपेत्योचुर्वि॒ वै ते मथिष्यामहू॒ऽइमाः प्र॒जा या ए॒तेन॑ ह॒विषा॒ सद्य॒त्सꣳ॑ऽस्कृति ॥ १२॥ स ऐक्षत प्र॒जाप॑तिः । पु॒रा मे पूर्वाः प्र॒जा अभू॑वन्नि॒मा उ॒ चेदि॒मे विम॑थुते न॑ ततः॒ किं चन परि॑शेक्ष्यत॒ऽइति॑ तेभ्य ए॒तं भाग॒मक॑ल्पयदे॒तं मारु॒तं स॒प्तक॑पा- लं पु॒रोडाशं॒ स ए॒ष मारु॒तः स॒प्तक॑पालस्तद्यत्स॒प्तक॑पालो भ॑वति स॒प्त-स॒प्त हि मारु॒तो ग॒णस्तस्मा॑न्मारु॒तः स॒प्तक॑पालः पुरो॒डाशो॑ भवति ॥ १३॥ तं वै स्वत॑वो- भ्य॒ इति॑ कुर्यात् । स्व॒यꣳ हि त॒ऽए॒तं भाग॒मकु॑र्वत॒ोतो स्वत॑वोभ्यो याज्यानुवाक्ये॒ न वि॒न्दन्ति॒ स उ॒ खलु मारुत॑ ए॒व स्यात्स वा॒ऽए॒ष प्र॒जाभ्य ए॒वाहि॑ꣳसायै क्रियते तस्मान्मारु॒तः ॥ १४॥ अथातः पय॒स्यैव । पयसो॒ वै प्र॒जाः सम्भ॑वन्ति॒ पय॑सः सम्भू- तास्तद्य॒त ए॒व सम्भू॒ता यतः सम्भ॑वन्ति॒ तदे॒वाभ्य ए॒तत्करोति तया॑ः पू॒र्वैर्ह॒विर्भिः प्र॒जाः सृ॒जते॒ ता ए॒तस्मात्पयस ए॒तस्यै॑ पय॒स्यायै॒ सम्भ॑वन्ति ॥ १५॥ तस्यां॑ मिथु॒नम॑- स्ति । योषा॒ पय॒स्या रेतो वा॒जिनं॒ तस्मान्मिथु॒नाद्वि॒श्वमसं॑मितमनु॒ प्राजा॑यत तद्य॒- देत॒स्मान्मिथु॒नाद्वि॒श्वमसं॑मितमनु॒ प्राजा॑यत॒ तस्मा॑द्वैश्वदे॒वी भ॑वति ॥ १६॥ अथ द्या- वापृथि॒व्य ए॑ककपालः पुरो॒डाशो॑ भव॑ति । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्यावा॑पृथिवी॒भ्यां पर्य॑गृह्णात्ता इमा द्यावा॑पृथिवी॒भ्यां परि॑गृहीतास्तथो॒ऽए॒वैष
कां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० ९-१७ शतपथब्राह्मणं / २७६ अग्नि उस सोम या वीर्य को सींचता है। इस प्रकार उत्पादक जोड़ा होता है ॥९॥ अब आठ या बारह कपालों में सविता के लिए पुरोडाश होता है। सविता देवों का प्रेरक है। वह प्रजापति है। बीच का जनक है। इसलिये पुरोडाश होता है ॥१०॥ अब सरस्वती के लिए चरु आता है, और एक चरु पूषा के लिए। सरस्वती स्त्री है और पूषा पुरुष। इस प्रकार जननेवाला जोड़ा मिल गया। इस प्रकार दो प्रकार के जोड़ों के मिलने से प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न किया-एक से ऊपर की और एक से नीचे की। इसलिये इनके पाँच हवियाँ होती हैं (अर्थात् १. अग्नि का पुरोडाश, २. सोम का चरु, ३. सविता का पुरोडाश, ४. सरस्वती की चरु, ५. पूषा का चरु) ॥११॥ अब इसके पश्चात् पयस्या का आयतन एवं मरुत् का सात कपालों का पुरोडाश। मरुत् हैं वैश्य अर्थात् देवों के आदमी। वे स्वतन्त्र फिरते थे। जब प्रजापति यज्ञ कर रहा था तो उन्होंने उसके पास जाकर कहा—'तू इस यज्ञ के द्वारा जो प्रजा उत्पन्न करेगा, उसे हम नष्ट कर डालेंगे' ॥१२॥ प्रजापति ने सोचा कि मेरी पहली प्रजाजायें तो मर चुकीं। यदि (मरुत्) इस प्रजा को भी मार डालेंगे, तो कुछ न बचेगा। इसलिये उसने उनके लिए अलग भाग रख दिया, अर्थात् सात कपालों में मरुत् के लिए पुरोडाश। ये सात कपाल इसलिए होते हैं कि मरुत् लोगों के सात- सात के गण* होते हैं। इसलिये मरुतों के सात कपाल होते हैं ॥१३॥ 'स्वतवोभ्यः' (अपने स्वत्व को बढ़ानेवालों के लिए) ऐसा कहकर आहुति देनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने स्वत्व को ले लिया। परन्तु यदि याज्ञिकों को याज्य-अनुवाक्य न मिले तो केवल 'मरुतों के लिए' ऐसा कर देवें। यह प्रजा की अहिंसा के लिए किया जाता है, इसलिये मरुतों के लिए होता है ॥१४॥ अब इसके बाद पयस्या की आहुति। दूध से ही प्रजाएँ पलती हैं, दूध से ही प्रजाएँ पली थीं। इसलिये वह अब उनके लिए उसी की आहुति देता है जिसके द्वारा वे पली थीं। जिसको प्रजापति ने पहली हवियों से उत्पन्न किया, वे दूध से ही पलती हैं अर्थात् उसी पयस्या से ॥१५॥ इसमें जोड़ा हो जाता है। पयस्या स्त्री है और मट्ठा वीर्य है। इसी जोड़े से क्रमानुसार अनन्त विश्व उत्पन्न हुआ। और चूंकि इस जोड़े से विश्वदेव उत्पन्न हुआ इसलिए इसको 'वैश्व- देवी' अर्थात् सब देवों की आहुति कहते हैं ॥१६॥ अब एक कपाल पर द्यावापृथिवी की आहुति होती है। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा को उत्पन्न करके द्यौ और पृथिवी के बीच में रख दिया, इसलिये ये द्यौ और पृथिवी के बीच
- त्रिः षष्टिरत्वा मरुतो वावृधाना उस्रा इव राशयो यज्ञियासः। उप त्वेमः कृधि नो भागधेय शुष्मं त एना हविषा विधेम (ऋ० ८।६६।८)। यहाँ ६३ मरुत् हैं। उनके सात-सात के नौ गण हुए।
अध्याय-५, ब्राह्मण-२
ए॒तद्व्य॑ ए॒तैर्ह॒विर्भिः॑ प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्यावापृथि॒वीभ्यां॒ परि॑गृह्णाति॒ तस्मा॒द्द्यावा- पृथि॒व्य १ककपालः पुरोडा॒शो भ॑वति ॥ १७॥ अथात आवृदेव । नोप॑किर॒त्युत्त॑र- वे॒दिं विसृ॑ष्टमसत॒त्सर्व॑मसद्वैश्वदेव॒मस॒दिति॑ त्रे॒धा ब॒र्हिः संन॑द्धं भवति॒ तत्पुन॒रेक॑धे- तद्धि प्र॒जनन॑स्य रू॒पं प्र॒जनन॒मु हीदं॑ पि॒ता मा॒ता यज्जाय॑ते॒ तत्तृ॒तीयं॒ तस्मा॒त्त्रेधा सत्पुन॒रेक॑धा प्र॒स्व उप॒संन॑द्धा भवन्ति॒ तं प्र॒स्तरं॑ गृह्णाति प्र॒जनन॒मु हीदं॑ प्र॒जनन॑- मु हि प्र॒स्त्वस्त॑स्मात्प्र॒स्व॑ः प्र॒स्तरं॑ गृह्णाति ॥ १८॥ आ॒साद्य॑ ह॒वीᳪष्य॒ग्निं म॑न्थन्ति । अ॒ग्निꣳ ह॒ वै जाय॑मान॒मनु॑ प्र॒जाप॑तेः प्र॒जा अ॑सृजिरे तथो॒ऽए॒वैत॒स्याग्नि॑मेव॒ जाय॑मान- मनु॑ प्र॒जा जाय॑न्ते॒ तस्मा॒दासाद्य॑ ह॒वीᳪष्य॒ग्निं म॑न्थन्ति ॥ १९॥ नव॑प्रया॒जं भ॑वति । नवा॑नुया॒जं दशा॑क्षरा॒ वै वि॒राड्यैतामु॒भयतो॒ न्यूनां॑ वि॒राजं॑ करोति प्र॒जनन॑ायैत- स्मा॒द्वाऽउ॒भयतो॒ न्यूनात्प्र॒जननात्प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः स॒सृज॒ऽइ॒तश्चोर्ध्वा॑ इ॒तश्चावाची॑स्त- थो॒ऽए॒वैष ए॒तस्मादु॒भयत ए॒व न्यूनात्प्र॒जननात्प्र॒जाः सृज॒तऽइ॒तश्चोर्ध्वा॑ इ॒तश्चावा- ची॑स्त॒स्मान्नव॑प्रया॒जं भ॑वति॒ नवा॑नुया॒जम् ॥ २०॥ त्रीणि॒ समि॑ष्टय॒जूंषि॑ भवन्ति । द्व्याय॒ इव॒ हीदं॑ ह॒विर्य॒ज्ञाय॒त्र नव॑प्रया॒जं नवा॑नुया॒जमथो॒ऽअन्य॑कमे॒व स्याद्ध॒विर्य- ज्ञो हि तस्य॑ प्रथ॒मतो गौर्दक्षिणा ॥ २१॥ ए॒तेन॒ वै प्र॒जाप॑तिः य॒ज्ञेनेष्ट्वा॑ । येयं॑ प्र॒- जाप॑तेः प्र॒जाति॑र्या श्रीरे॒तदु॑भूवैताꣳ ह॒ वै प्र॒जातिं॑ प्र॒जायत॒ऽएताꣳ श्रियं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॑ने॒तेन॑ य॒ज्ञेन॒ यज॑ते॒ तस्मा॒द्वाऽए॒तेन॑ यजेत ॥२२॥ ब्रा॒ह्मणम् ॥ २ [५.१.] ॥ ४ ॥ वै॒श्व॒देवेन॒ वै प्र॒जाप॑तिः । प्र॒जाः स॒सृजे॒ ता अ॑स्य प्र॒जाः सृ॒ष्टा वरु॑णस्य यवा- न्ज॒क्षुर्गुरुण्यो॑ ह वाऽअ॒ग्रे यवस्ता॒स्त्वेव वरु॑णस्य यवा॒न्प्राद॒स्तस्माद्वरुणप्रघासा नाम ॥ १॥ ता वरु॑णो जग्राह् । ता वरु॑णगृहीताः प॒रिदी॑र्णा अन॒त्यश्च॒ प्राणत्य॑- श्च शिश्यि॒रे च॒ निषे॒दुश्च प्रा॒णोदा॒नौ हैवाभ्यो नाप॑चक्रमतुर॒न्यान्व्याः सर्वा॑ दे॒वता अप॑चक्रमुस्तयो॑र्हैवास्य हेतोः प्र॒जा न परा॑बभूवुः ॥ २॥ ता ए॒तेन ह॒विषा प्र॒जा- पति॑रभिषज्यत् । तया॒श्चैवास्य प्र॒जा जाता आस॒न्द्याश्चाजातास्ता उ॒भयी॑र्वरुणपाशा-
कां० २, अ० ५, ब्रा० १-२, कं० १७-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / २८१ में रखे हुए हैं। जो कोई इन आहुतियों से कोई आहुति देता है वह प्रजा को उत्पन्न करके द्यौ और पृथिवी के बीच में रख देता है। इसलिये द्यावापृथिवी का एक कपाल होता है ॥१७॥ अब इसके पीछे कार्यक्रम कहते हैं। उत्तर-वेदि नहीं बनाते जिससे यह परिमित न हो; पूर्ण हो और विश्वेदेवों की हो । बर्हि को तीन गट्ठों में बाँधते हैं, फिर एक में कर लेते हैं। उत्पत्ति का यही रूप है। माता-पिता दो होते हैं। जो सन्तान उत्पन्न होती है वह तीसरी होती है। इसलिये जो त्रित्व है वह पीछे से एक हो जाता है। बर्हि के फूले हुए सिरे (प्रस्वः) बँधे होते हैं। उनको वह प्रस्तर के रूप में ग्रहण करता है, क्योंकि यह जलनेवाला संयोग है। फूले हुए बर्हि उत्पन्न करनेवाले होते हैं। यही कारण है कि वह फूले हुए कुशों को प्रस्तर के रूप में ग्रहण करता है ॥१८॥ हवियों को रखकर अग्नि को मथता है। अग्नि के उत्पन्न होने के पश्चात् ही प्रजापति की प्रजा हुई। इसी प्रकार इस यजमान के भी अग्नि के उत्पन्न होने पर ही प्रजा होगी। यही कारण है कि वह हवियों को रखने के पश्चात् अग्नि का मन्थन करते हैं ॥१९॥ नौ प्रयाज होते हैं और नौ अनुयाज । विराट् छन्द में दस अक्षर होते हैं। इसलिये वह दोनों बार विराट् से न्यून (दस से कम नौ बार) ही जनने के लिए लेता है। क्योंकि प्रजापति ने न्यून प्रजनन से ही दो बार उत्पत्ति की, ऊपर की ओर और नीचे की ओर, इसलिए नौ प्रयाज होते हैं और नौ अनुयाज ॥२०॥ तीन समिष्ट-यजुष् होते हैं, क्योंकि यह हविर्यज्ञ से बड़ा होता है, क्योंकि इसमें नौ प्रयाज होते हैं और नौ अनुयाज । समिष्ट-यजुष् एक भी हो सकता है; तब यह हविर्यज्ञ ही होता है। इसकी दक्षिणा पहलौटी गौ होती है ॥२१॥ जो इस रहस्य को समझकर इस यज्ञ को करता है, उसको वही प्रजा उत्पन्न होती है और वही श्री प्राप्त होती है जो प्रजापति के यज्ञ करने से प्रजा उत्पन्न हुई और श्री उसको प्राप्त हुई ॥२२॥ अध्याय ५-ब्राह्मण २ प्रजापति ने वैश्वदेव यज्ञ करके ही प्रजा उत्पन्न की। वह उससे उत्पन्न हुई प्रजा वरुण के जौ को खा गई। जौ पहले वरुण का ही था। चूंकि उन्होंने वरुण के जौ खाये, इसलिये इस यज्ञ का नाम 'वरुण प्राघास' पड़ा ॥१॥ वरुण ने उनको पकड़ लिया। वरुण से पकड़े जाकर वे सूज गये, और वे लेट गये तथा साँस बाहर-भीतर लेते हुए बैठे रहे। केवल प्राण और उदान ने उनको न छोड़ा; और सब देवता छोड़ गये, और इन्हीं दो के कारण प्रजा मरी नहीं ॥२॥ प्रजापति ने इस हवि के द्वारा उनको चंगा किया। और जो प्रजा उत्पन्न हो चुकी थी और जो अभी उत्पन्न नहीं हुई थी, उस सबको वरुण के जाल से मुक्त कर दिया, और उसकी
२८२ शतपथ ब्राह्मण त्वामुञ्चता॒ ऽनमीवा॒ ऽअकिल्बिषाः प्रजाः प्राजा॑यन्त ॥ ३॥ अथ य॒देष ए॒तैश्चतु- र्थे मासि॒ यज॑ते । तन्नाहु॒ र्न्यैवैतस्य॒ तया॑ प्रजा॒ वरु॑णो गृह्णातीति॑ दे॒वा अ॑कुर्व- न्निति॒ न्यैवैष ए॒तत्क॑रोति याश्च॒ न्ये॑वास्य प्रजा जाता याश्चा॑जातास्ता उ॒भयी॑र्वरु- णपाशात्प्रमु॑ञ्चति ता अ॒स्यानमीवा॑ अकिल्बिषाः प्रजाः प्रजाय॑न्ते तस्माद्वाऽए॒ष ए॒- तैश्चतु॒र्थे मासि॑ यजते ॥ ४॥ तद्धै द्वे वेदी॒ द्वाव॒ग्नी भवतः । तद्यद्द्वे वेदी॒ द्वाव॒ग्नी भ- वतस्तदु॑भयतः ए॒वैतद्वरुणपाशात्प्रजाः प्रमु॑ञ्चतीतश्चो॒र्द्धा इतश्चावाची॑स्तस्माद्द्वे वेदी॑ द्वाव॒ग्नी भवतः ॥ ५॥ स उत्तरस्यामेव वेद्यौ । उत्तरवेदिमुपकिरति न दक्षिणायां क्षत्रं वै वरुणो विशो मरुतः क्षत्रमेवैतद्विश उत्तरं करोति तस्मादुपर्यासिनं क्ष- त्रियमधस्तादिमाः प्रजा उपा॑सते तस्मादुत्तरस्यामेव वेद्या॑ऽउत्तरवेदिमुपकिरति न दक्षिणायाम् ॥ ६॥ अथैतान्येव पञ्च हवीं॑षि भवन्ति । एतैर्वै ह॒विर्भिः प्रजाप- तिः प्रजा असृज॑तितैरुभयतो वरुणपाशात्प्रजाः प्रामु॑ञ्चदितश्चो॒र्द्धा इतश्चावाची॑स्त- स्माद्वाऽए॒तानि पञ्च हवीं॑षि भवन्ति ॥ ७॥ अथैन्द्राग्नो द्वादशकपालः पुरोडाशो भवति । प्राणोदानौ वाऽइन्द्राग्नी तद्यथा पुण्यं चक्रेषे पुण्यं कुर्यादेवं तत्त्तयोर्है- वास्य हेतोः प्रजा न पराबभूवुस्तत्प्राणोदानाभ्यामेवैतत्प्रजा भिषज्यति प्राणोदा- नौ प्रजासु दधाति तस्मादिन्द्राग्नो द्वादशकपालः पुरोडाशो भवति ॥ ८॥ उभयत्र प॒य॒स्ये॑ भवतः । पय॑सो॒ वै प्र॒जाः स॒म्भव॑न्ति॒ पय॑सः सम्भू॑ता॒स्तद्यत॑ ए॒व स॒म्भूता॑ यतः॑ सम्भव॑न्ति तत॑ ए॒वैत॑दु॒भय॑तो वरु॑णपाशात्प्र॒जाः प्रमु॑ञ्चती॒तश्चो॒र्द्धा इ॒तश्चा॒वा- ची॒स्तस्मा॑दु॒भय॑त्र प॒य॒स्ये॑ भव॑तः ॥ ९॥ वारु॑ण्युत्त॒रा भव॑ति । वरु॑णो ह वाऽअस्य॑ प्र॒जा अ॑गृह्णा॒त्तत्प्र॒त्यक्षं॑ वरु॑णपाशात्प्र॒जाः प्रमु॑ञ्चति मारु॒ती दक्षि॑णा॒ऽमिता॑यै न्वे॒- व मारु॒ती भव॑ति जामि॑ ह कु॒र्याद्यदु॒भे वारु॒ण्यौ स्याता॑मतो ह वाऽअस्य॑ द॒क्षि- णतो॑ म॒रुतः॑ प्र॒जा अजि॑घाꣳसं॒स्ताने॒तेन॑ भा॒गेना॑शमय॒त्तस्मा॑न्मारु॒ती दक्षि॑णा ॥ १०॥ तयो॑रु॒भयो॑रे॒व क॒रीरा॒ण्याव॑पति । कं वै प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाभ्यः॑ क॒रीरै॑रकुरुत कमे॒वै-
कां० २, अ० ५, ब्रा० २, कं० ३-११ शतपथब्राह्मणं / २८३ प्रजा रोगरहित और दोषरहित उत्पन्न हुई ॥३॥ यह यजमान जो चौथे मास में यज्ञ करता है, वह इसलिये करता है कि प्रजा वरुण के जाल से बची रहे, या चूंकि देवों ने यह यज्ञ किया था, और वह जो सन्तान उत्पन्न हो चुकी और जो होनेवाली है, उसको वरुण के जाल से मुक्त कर देता है और उसकी सन्तान निर्दोष और नीरोग उत्पन्न होती है, इसलिये वह चौथे मास में (वरुण प्रघास यज्ञ) करता है ॥४॥ इस (यज्ञ) में दो वेदियां होती हैं और दो अग्नियां। दो वेदियां और दो अग्नियां क्यों होती हैं ? इसलिये कि वह दोनों ओर से प्रजा को वरुण के जाल से छुड़ा देता है, ऊपर की भी और नीचे की भी । इसलिये दो वेदियां और दो अग्नियां होती हैं ॥५॥ उत्तर की दिशा में उत्तर की वेदी बनाई जाती है, दक्षिण की दिशा में नहीं। वरुण क्षत्रिय है और मरुत् वैश्य लोग । वह इस प्रकार क्षत्रियों को वैश्यों से उच्च ठहराता है, इसी- लिये क्षत्रियों को उच्च आसन पर बिठाकर सर्वसाधारण उनकी पूजा करते हैं। यही कारण है कि उत्तर की दिशा में वेदी बनाते हैं, दक्षिण की दिशा में नहीं ॥६॥ पहले पाँच हवियां होती हैं। क्योंकि इन पाँच हवियों के द्वारा ही प्रजापति ने प्रजायें उत्पन्न कीं और इन्हीं के द्वारा प्रजाओं को दोनों ओर से वरुण के जाल से बचाया, वे जो ऊपर की ओर थे और जो नीचे की ओर। यही कारण है कि पाँच हवियां होती हैं ॥७॥ अब इन्द्र-अग्नि के लिए बारह कपालों में पुरोडाश दिया जाता है। इन्द्र-अग्नि वस्तुतः प्राण और उदान हैं। यह एक प्रकार से उसके लिए पुण्य करना है जिसने पुण्य किया। क्योंकि इन्हीं दो के कारण प्रजा मरी नहीं। इसलिए अब वह अपनी प्रजा को प्राण और उदान के द्वारा चंगा करता है। प्रजाओं में प्राण और उदान को स्थापित करता है। इसलिये बारह कपालों का पुरोडाश इन्द्र और अग्नि के लिए होता है ॥८॥ दोनों (अग्नियों) के लिए पयस्या की आहुतियां होती हैं। दूध से ही प्रजा जीती है और दूध से ही जीते रहे। इसलिये उसी वस्तु के द्वारा जिससे वे बचे रहे और जिससे वे पलते हैं, वह उनको वरुण के जाल से दोनों ओर छुड़ाता है, ऊपर की ओर से और नीचे की ओर से। इसलिये दोनों (अग्नियों) के लिए पयस्या की आहुति होती है ॥६॥ उत्तर की हवि वरुण के लिए होती है। क्योंकि वरुण ने ही तो उसकी प्रजा पकड़ी थी। इसलिये वह प्रत्यक्ष ही वरुण के जाल से प्रजा को छुड़ाता है। दक्षिण की हवि मरुतों के लिए होती है। एक-सी न हो, इसलिये मरुतों के लिए होती है। यदि दोनों आहुतियां वरुण के लिए होतीं तो एक-सी हो जातीं। दक्षिण से ही मरुतों ने प्रजा को मारना चाहा था और उसी भाग से (प्रजापति ने) उनको शान्त किया। इसलिये दक्षिण की आहुति मरुतों की होती है ॥१०॥ उन दोनों आहुतियों के ऊपर करीर-फल* (करीराणि) डालता है। प्रजापति ने करीर- फल से ही प्रजाओं को सुखी (संस्कृत में 'क' का अर्थ सुख है) किया। इसलिये वह प्रजाओं
- क्या यह व्रज का करील तो नहीं है ? एगेलिंग के अनुसार Capparis Aphylla.
२८४ शतपथ ब्राह्मण ष॒ ए॒तत्प्र॒जाभ्यः॑ कुरुते ॥ ११॥ तयोरुभ॒योरे॒व श॑मीपलाशान्यावपति। शं वै प्र॒- जापतिः॑ प्र॒जाभ्यः॑ शमीपला॒शैर॑कुरुत शमे॒वैष ए॒तत्प्र॒जाभ्यः॑ कुरुते ॥ १२॥ अथ का- य ए॒कक॑पालः पुरोडाशो भवति । कं वै प्र॒जापतिः॑ प्र॒जाभ्यः॑ काये॒नैक॑कपालेन पु॒रोडा॑शेनाकुरुत कम्त्वे॒वैष ए॒तत्प्र॒जाभ्यः॑ काये॒नैक॑कपालेन पुरो॒डाशे॑न कुरुते त॒- स्मात्काय ए॒कक॑पालः पुरो॒डाशो॑ भवति ॥ १३॥ अथ पूर्वे॒द्युः । अन्वाहार्य॒पचने ऽतुषा॒निव॒ यवा॑न्कृ॒त्वा तानीष॒द्विवो॑पत्य॒ तेषां॑ करम्भपात्रा॑णि कुर्व॒न्ति याव॑न्तो गृ॒ह्याः॑ स्युस्तावत्येकेनातिरिक्ता॑नि ॥ १४॥ तत्रापि मेषं च मेषीं॑ च कुर्व॒न्ति । त- योर्मे॒षे च मे॒ष्यां च यद्य॑नेडकौर्णा विन्दे॒त्ताः प्रणि॒ड्य निश्ले॑षयेद्यद्यु॒ऽअने॑डकौर्ना विन्दे॒द॒थोऽअपि॑ कुशोर्णा एव स्युः ॥ १५॥ तद्यन्मे॒षञ्च॑ मे॒षी च॒ भवतः॑। ए॒ष वै प्र॒त्यनं॒ वरु॑णस्य प॒शुर्यन्मे॒षस्त॒त्प्रत्य॑नं वरु॒णपाशा॑त्प्र॒जाः प्रमु॑ञ्चति यवम॒यौ भव॑तो य॒वान्द्धि वरुणो॑ऽवरु॒णोऽगृह्नान्मिथुनौ भ॑वतो मिथुना॒द्वैवैतद्वरु॑णपाशात्प्र॒जाः प्रमु॑- ञ्चति ॥ १६॥ स उत्तरस्यामेव पय॒स्यायां॑ मे॒षीमव॑दधाति। दक्षि॑णास्यां मेषमेवमिव हि मिथुनं॑ कॢप्तमुत्तरतो हि स्त्री पुमा॑ꣳसमुप॒शेते ॥ १७॥ स सर्वाण्येव ह॒वीꣳष्य- र्ध्वर्युः॑। उत्तरस्यां वेदावासाद्यत्यथैतामेव पय॒स्यां प्रतिप्रस्थाता दक्षि॑णास्यां वेदा- वासा॑दयति ॥ १८॥ आसाद्य ह॒वीꣳष्य॑ग्निं मन्थति। अ॒ग्निं मन्थि॒वानु॑प्रकृत्याभि॒नु- होत्यथा॑ध्र्व॒र्यु॒रेवाह॒ग्नये॑ स॒मिध्य॑मानायानु॒ब्रूहीति ताऽउ॒भावे॒वेध्मावभ्याध॑त्त उ॒भौ स॒मिधौ॒ परिशि॑ष्ट उ॒भौ पूर्वा॑वाघारावाघारयतोऽथा॑ध्र्व॒र्यु॒रेवाह॒ग्निम॒ग्नीत्स॑मृ॒द्धीत्य- संमृष्टमेव भ॑वति स॒म्प्रेषि॑तम् ॥ १९॥ अथ प्रतिप्रस्थाता प्रतिपरैति। स पत्नीमु- दानेष्यन्पृ॑च्छति केन चरसी॑ति वरु॒ण्यं वा॒ऽएतत्स्त्री क॑रोति यदन्यस्य स॒त्यन्येन च- रत्यथो नेन्मे॒ऽन्तः॑शल्या जुह्व॒दिति तस्मात्पृच्छति निरुक्तं वाऽएनः॑ कनी॑यो भव- ति स॒त्यꣳ हि भव॑ति तस्मा॒देव पृच्छ॑ति सा यन्न प्रतिजानीत ज्ञातिभ्यो हास्यै त- द्दहितꣳ स्यात् ॥ २०॥ तां वाचयति। प्रघासिनो हवामहे मरुतश्च रिशादसः ।