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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

अध्याय-९, ब्राह्मण-३

१८६ शतपथ ब्राह्मण ल्पय॑ꣳस्तमे॒वैष ए॒तद्भागं॑ करोत्यथ॒ यद॒धोऽधः॑ कृ॒ष्णाजि॑नम॒पास्य॑त्यन॒ग्नावे॒वैष॒ ए॒तद॒न्धे तम॑सि प्र॒वेश॑यति तथोऽए॒वामृ॑क्पशो॒ रक्ष॑सां भा॒गोऽसी॒त्यन॒ग्नाव॒न्धे त॒- म॑सि प्र॒वेश॑यति त॒स्मात्प॒शोस्ते॑दनीं न कुर्वन्ति॒ रक्ष॑साꣳ हि॒ स भागः॑ ॥ ३५॥ ब्रा- ह्मणम् ॥ ३ [१.२.]॥ ॥ सꣳस्थि॑ते य॒ज्ञे । द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति तथा॒ ह्युद॑ग्भवति तस्मा- द्द॒क्षि॒णतः॒ परी॑त्य पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति दे॒वलो॒के मे॒ऽप्यस॒दिति॒ वै य॑ज॑ते॒ यो यज॑ते सो॒ऽस्यै॑ष य॒ज्ञो दे॑वलो॒कमे॒वाभि॒प्रेति॒ तदनू॑ची॒ दक्षि॑णा यां ददा॑ति॒ सेति॒ दक्षि॑णा- मन्वा॒रभ्य॒ यज॑मानः ॥ १॥ स ए॒ष दे॑वया॒नो वा॑ पितृया॒णो वा॒ पन्थाः॑ । तदु॑भय- तो॒ऽग्निशि॑खे समोष॑न्त्यौ तिष्ठतः॒ प्रति॑ त॒मोष॑तो यः॒ प्रत्युष्यो॒ऽन्यु तꣳ सृज॑तो॒ यो ऽतिसृ॑ज्यः॒ शान्ति॒राप॒स्तदे॑तमे॒वैतत्प॒न्थानꣳ॑ शमयति ॥ २॥ पूर्णं निन॑यति । स॒र्वं वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैन॑मेत॒च्छम॑यति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑नै॒वैन॑मेत॒दव्यव॑च्छि- न्नेन शमयति ॥ ३॥ यद्वे॑व पू॒र्णपा॒त्रं निन॑यति । यद्वै॒ य॒ज्ञस्य॑ मिथ्या क्रि॒यते॒ व्यस्य तदृच्छ॑ति॒ यद्व॑र्त्ति शान्ति॒राप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयति॒ तद॒द्भिः संद॑धाति ॥ ४॥ पूर्णं॑ निन॑यति । स॒र्वं वै पू॒र्णꣳ सर्वै॑णे॒वैत॒त्संद॑धाति संत॒तम॒व्यव॑च्छिन्नं॒ निन॑यति सं॒तते॑- नै॒वैत॒दव्यव॑च्छिन्नेन॒ संद॑धाति ॥ ५॥ तद॒ञ्जलि॑ना प्रति॒गृह्णा॑ति । सं वर्च॑सा॒ पय॑सा॒ सं तनू॒भिरगन्म॑हि॒ मन॑सा॒ सꣳ शि॒वेन॑ । त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ विद॑धातु रा॒योऽनु॑मार्ष्टुं त॒न्वो यद्विलि॑ष्ट॒मिति॒ यद्वि॒वृढं॒ तत्संद॑धाति ॥ ६॥ अथ॒ मुख॑मुपस्पृशते । द्वयं तद्य॒स्मान्मु- खमुपस्पृश॑ते॒ऽमृतं॒ वाऽआपो॒ऽमृते॑नै॒वैतत्संस्पृ॑शत॒ऽएत॒द्वै चैवैतत्कर्मात्मन्कु॑रुते त॒- स्मान्मु॒खमुप॑स्पृशते ॥ ७॥ अथ वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते । दे॒वान्वाऽए॒ष प्री॑णाति॒ यो य- जत॒ऽए॒तेन॑ य॒ज्ञेना॒ऽग्निर्हि वस्व॒ग्नि॑र्हि य॒दाहु॑तिभिरेव य॒त्स दे॒वान्प्री॒त्वा तेष्व- पि॒त्वी भव॑ति॒ तेष्व॑पि॒त्वी भूत्वा ताने॒वाभिप्रक्राम॑ति ॥ ८॥ यद्वे॑व वि॒ष्णुक्रमा॒न्क्रम॑ते । य॒ज्ञो वै विष्णुः॑ स दे॒वेभ्य॑ इ॒मां वि॒क्रान्तिं॒ विच॑क्रमे॒ येषा॑मि॒यं वि॒क्रान्ति॒रिद॑मे॒व प्र-

का० १, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / १८७ वह उन असुरों को देता है, अर्थात् (इस भूसी को) हिरन के लिए चमड़े के नीचे फेंक देता है। इस प्रकार वह इसे अन्धकार में डालता है, जहाँ आग नहीं है। इसी प्रकार पशु का रक्त भी अन्धकार में डालता है, यह कहकर कि तू राक्षसों का भाग है। इसलिए (यज्ञ में) प्रयुक्त नहीं करते क्योंकि यह राक्षसों का भाग है ॥३५॥ अध्याय ६—ब्राह्मण ३ यज्ञ की समाप्ति पर (अध्वर्यु) दक्षिण की ओर घूमकर पूर्णपात्र के जल को गिरा देता है। इस प्रकार (संकेत से बताता है) उत्तर की ओर गिराया जाता है। इसलिए दक्षिण की ओर घूमकर पूर्णपात्र को गिराता है। जो यज्ञ करता है वह इस कामना से करता है कि देवलोक में स्थान मिले। उसका यह यज्ञ भी देवलोक को चला जाता है। इसके पीछे दक्षिणा चलती है, जिसे वह (पुरोहित को) देता है। दक्षिणा को लेकर यजमान पीछे-पीछे आता है ॥१॥ मार्ग या तो देवयान होता है या पितृयान। दोनों ओर दो अग्नि-शिखाएँ जलती रहती हैं। जो मुरसाने के योग्य होता है उसे मुरसाती हैं और जो निकल जाने के योग्य होता है उसे निकल जाने देती हैं। जल शान्ति है इसलिए इसके द्वारा वह मार्ग को शान्त करता है ॥२॥ पूर्णपात्र को वह उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। इस प्रकार ‘सब’ से वह मार्ग को शान्त करता है। वह निरन्तर बिना धार को तोड़े हुए उँडेलता है। इस प्रकार वह मार्ग को निरन्तर लगातार शान्त करता है ॥३॥ वह पूर्णपात्र को इसीलिए उँडेलता है। यज्ञ में जो भूल हो जाती है वहाँ काट या फाड़ देते हैं। जल शान्ति हैं इसलिए जलरूपी शान्ति से शान्त करता है अर्थात् जलों से चंगा करता है ॥४॥ पूर्ण (पात्र) को उँडेलता है। पूर्ण का अर्थ है सब। ‘सब’ के द्वारा इसको चंगा करता है। वह लगातार बिना धार तोड़े हुए उँडेलता है, इस प्रकार निरन्तर चंगा करता है ॥५॥ उसको अञ्जलि से लेता है यह मन्त्र पढ़कर—'सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं ॓ शिवेन । त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोऽनुमार्ष्टु तन्तो (तन्वो ?) यद् विलिष्टम् (विलीष्टम् ?)”(यजु० २।२४)—“तेज, शक्ति, शरीरों और कल्याणकारी मन से हम मिल गये। दानी त्वष्टा हमको धन दे; और जो कुछ हमारे शरीर में घाव था उसे चंगा कर दे।” ऐसा कहकर जो व्रण था उसको चंगा कर देता है ॥६॥ अब मुख का स्पर्श करता है। मुख स्पर्श करने के दो कारण हैं—पहला, जल अमृत है। अमृत से ही इसको स्पर्श करता है। दूसरे यह कि इस प्रकार वह इस कर्म को अपना (निजी) कर लेता है। इसलिए मुख का स्पर्श करता है ॥७॥ अब वह विष्णु के पगों को चलता है। जो यज्ञ करता है वह देवों को प्रसन्न करता है। इस यज्ञ द्वारा ऋचाओं से, यजुषों से या आहुतियों से देवों को प्रसन्न करके वह उनका हिस्सेदार होकर उन तक पहुँच जाता है ॥८॥ विष्णु के पगों को इसलिए चलता है—विष्णु यज्ञ है। उस (यज्ञ) ने देवों के लिए इस विक्रान्ति (शक्ति) को प्राप्त कर लिया जो इस समय उनके पास है। पहले पद से इस (पृथिवी)

१८८ शतपथ ब्राह्मण थमेन॑ प॒देन॑ प॒श्या॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षं द्वि॒तीये॑न दि॒वमुत्त॑मेनैतान्त्वे॒वैष ए॒तस्मै॒ वि॒ष्णुर्व्य॑क्रस्तो विक्रान्तिं॒ विक्र॑मते॒ तस्मा॑द्वि॒ष्णुक्र॒मान्क्रम॑ते॒ तदा॑ऽङ्गत् ए॒व परा॑चीनं॒ भूयि॑ष्ठा-इव क्रम॑न्ते ॥ ९॥ तडु॒ तत्पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । गा॒य॒त्रेण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै॒ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑- क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मो दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त॒ जाग॑तेन॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इ॒त्येव॒मिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैषा॒ गति॑रे- षा प्रतिष्ठा॒ य ए॒ष तप॑ति॒ तस्य॒ ये र॒श्मय॒स्ते॑ सु॒कृतो॒ऽथ यत्प॑रं॒ भाः प्र॒जाप॑तिर्वा स॒ स्वर्गी॑ वा लो॒कस्त॑दि॒वमिमांल्लो॒कान्त्स॒मारु॒ह्याथैतां गति॑मेतां प्रति॑ष्ठां गच्छति प- र॒स्ता॒द्रे॒वार्वाङ् क्रमे॑त॒ य इतो॒ऽनु॒शासनं॑ चिकीर्षेद्वयं तद्य॒स्मात्पर॒स्ता॒दर्वाङ् क्र॑मति ॥ १०॥ अप॒सरणा॒तो ह॒ वाऽग्रे॑ दे॒वा जयन्तो॒ऽजय॑न् । दि॒वमे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम- थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नाननु॑दत॒ तथो॒ऽए॒वैष ए॒तदप॑सरणात ए॒वाग्रे॒ जय॒न्जय॑ति दि॒- व॑मे॒वाग्रे॒ऽथेद॒मन्तरि॑क्षम॒थेतो॒ऽनप॑सरणात्स॒पत्नान्नु॑दत॒ऽइयं वै पृ॑थि॒वी प्रति॑ष्ठा तद्- स्याने॒वैतत्प्रति॑ष्ठायां॒ प्रति॑तिष्ठति ॥ ११॥ तडु॒ तद्दि॒वि वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त । जाग॑तेन छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽन्तरि॑क्षे वि॒ष्णुर्व्य॑क्रम॑स्त त्रै- ष्टुभे॑न॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः पृ॑थि॒व्यां वि॒ष्णुर्व्य॑क्र- स्त गा॒यत्रे॑ण॒ छन्द॑सा॒ ततो॒ निर्भ॑क्तो योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मोऽस्माद॒न्नाद॒स्यै प्रति॑ष्ठायाऽहु॒त्यस्या॑ऽ कीदृ॒ सर्व॒मन्ना॑द्यं प्रति॑ष्ठित॒ तस्मा॑दाका॒स्माद॒न्नाद॒स्यै प्रति॑ष्ठा- याऽहुति ॥ १२॥ अथ॒ प्राङ् प्रेक्ष॑ते । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दि॒क्तस्मा॒त्प्राङ् प्रेक्ष॑ते ॥१३॥ न प्रेक्ष॑ते । अगन्म॒ स्व॒रिति॑ दे॒वा वै स्व॒रग॑न्म दे॒वानित्ये॒वैतदा॑ह॒ सं ज्योति॑षा- भू॒मति॒ सं दे॒वैर॒भूमेत्ये॒वैतदा॑ह ॥ १४॥ अथ॒ सूर्य्यमुदीक्ष॑ते । सैषा ग॒तिरे॒षाप्र॑तिष्ठा तदे॑तां ग॒तिमे॒तां प्रति॑ष्ठां गछति॒ तस्मात्सूर्य्यमुदीक्ष॑ते ॥ १५॥ स उ॒दीक्ष॑ते । स्वय- म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र॒श्मिरित्येष वै श्रेष्ठो॑ र॒श्मिर्यत्सूर्य्यस्तस्मा॑दाह॒ स्वय॒म्भूर॑सि॒ श्रेष्ठो॑ र-

कां० १, अ० ६, ब्रा० ३, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण / १८६ को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौ को। यह विष्णु-यज्ञ यजमान के लिए इस शक्ति को प्राप्त करा देता है। इसीलिए विष्णु के पगों को चलता है। अब इसी (पृथिवी) से बहुत-से (ऊपर को) चलते हैं ॥६॥ वह इस मन्त्र से-“पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५), “अन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः”(यजु० २।२५), “दिवि विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः” (यजु० २।२५) – “पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ् छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है”, “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। जो हमसे द्वेष करते हैं या जिससे हम द्वेष करते हैं, वह यहाँ से बहिष्कृत है।” जब इन लोगों को प्राप्त हो गया तो यही गति है, यही प्रतिष्ठा है। जो यह तपता है अर्थात् सूर्य, उसकी ये किरणें हैं वे सुकृत हैं। यह जो परम-प्रकाश है वह प्रजापति या स्वर्ग-लोक है। इस प्रकार इन लोकों को प्राप्त होता है। वह इस गति और प्रतिष्ठा को पाता है। जो अनुशासन या उपदेश देना चाहे वह ऊपर से नीचे आता है। दो कारण हैं कि वह ऊपर से नीचे आता है—॥१०॥ (शत्रु के) भागने पर विजयी देवों ने पहले द्यौ को जीता, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उन शत्रुओं को इस (पृथिवी) से भी निकाला जहाँ से भाग जाना कठिन था। उसी प्रकार यह (होता) भी (शत्रुओं के) भागने पर पहले द्यौ लोक को जीतता है, फिर अन्तरिक्ष को, फिर उनको इस (पृथिवी) से निकालता है जहाँ से भाग जाना नहीं बन सकता। यह पृथिवी की प्रतिष्ठा है इसलिए वह इस प्रतिष्ठा में ही प्रतिष्ठित होता है ॥११॥ और इस प्रकार भी-“दिविविष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त । जागतेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽन्तरिक्षे विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त त्रैष्टुभेन च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः पृथिव्यां विष्ण॒व्य॑क्रꣳस्त गायत्रेण च्छन्दसा ततो निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मोऽस्मादन्नादान्द्यं प्रतिष्ठाया” (यजु० २।२५) – “द्यौ लोक में विष्णु जगती छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। अन्तरिक्ष में विष्णु त्रिष्टुभ छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। पृथिवी में विष्णु गायत्री छन्द से चला। वहाँ से वह निकाल दिया गया जो हमसे द्वेष करता है या जिससे हम द्वेष करते हैं। इस अन्न से और प्रतिष्ठा से (निकाल दिया गया)।” इस पृथिवी में ही सब अन्न आदि प्रतिष्ठित हैं इसीलिए कहा, 'इस अन्न से और इस प्रतिष्ठा से' ॥१२॥ अब वह पूर्व की ओर देखता है। पूर्व देवों का दिशा है। इसलिए पूर्व की ओर देखता है ॥१३॥ वह यह मन्त्र पढ़कर देखता है-“अग्न्म॒ स्वः”(यजु० २।२५) - “हम स्वर्ग को पहुँच गये।” देव ही स्वर्ग हैं इसलिए तात्पर्य है 'देवों को प्राप्त हो गये।' अब कहता है-“सं ज्योतिषा- भूम” (यजु० २।२५) -- “प्रकाश से हम मिल गये।” इससे तात्पर्य है कि हम देवों से मिल गये ॥१४॥ अब वह सूर्य की ओर देखता है, क्योंकि वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। इस गति को और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है, इसलिए सूर्य की ओर देखता है ॥१५॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर देखता है- “स्वयम्भूरसि श्रेष्ठो रश्मिः”(यजु०२।२६) – “हे श्रेष्ठ किरण ! तू स्वयम्भू है।” सूर्य श्रेष्ठ किरण है इसलिए कहा, 'हे श्रेष्ठ किरण, तू स्वयम्भू है।'

ेभ्यः" - "शतादर्धेभ्यः" (from शतात् + अर्धेभ्यः / शतादर्धेभ्यः). In line 12: शता- In line 13: र्द्धेभ्यः (with anudatta underneath). Wait, look at line 13: र्द्धे॒भ्यः or र्द्धेभ्यः? There is an anudatta under the first consonant cluster: र्द्धे॒भ्यः.

Line 14: मन्वावर्त्तऽइति॒ तदेतां गतिमेतां प्रतिष्ठां गतेतस्यैवावृतमन्वावर्तते ॥ २०॥ अथ मन्वावर्त्तऽइति॒: anudatta under ति. ग॒ते-: anudatta under ग. त॒स्यैवावृतमन्वावर्तते: anudatta under त. अ॒थ: anudatta under अ.

Line 15: पुत्रस्य नाम गृह्णाति । इदं मे॒ऽङ्गं वी॒र्यं पुत्रो॒ऽनुसंतनवदिति यदि पुत्रो न स्याद्- इदं: इ॒दं or इदं? Under दं or इ: इ॒दं. मे॒ऽङ्गं: anudatta under मे. वी॒र्यं: anudatta under वी.

कां० १, अ० ९, ब्रा० ३, कं० १६-२३ शतपथब्राह्मणम् / १६१ अब कहता है—‘‘वर्चोदाऽसि वर्चो मे देहि’’ (यजु० २।२६)—‘‘तू तेज देनेवाला है, तू तेज दे।’’ याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘मैं यही कहता हूँ कि ब्राह्मण यह चाहे कि मैं ब्रह्मवर्चसी होऊँ।’ औपदितेय ने कहा, ‘वह मुझे गायें देगा। इसलिए मैं कहता हूँ, तू गाय देनेवाला है मुझे गाय दे।’ इस प्रकार (यजमान) जो चाहता है वही उसको मिल जाता है ॥१६॥ अब वह (बाईं ओर से दाहिनी ओर को) मुड़ता है यह पढ़कर—‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु०२।२६)—‘‘मैं सूर्य के मार्ग को लौटता हूँ।’’ इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर वह लौटता है ॥१७॥ अब वह गार्हपत्य अग्नि के पास जाता है। गार्हपत्य घर है। घर ही प्रतिष्ठा है इसलिए वह घर में अर्थात् प्रतिष्ठा में ठहरता है और दूसरे, जो मनुष्य की पूरी आयु हो सकती है उसको प्राप्त करता है। इसलिए गार्हपत्य अग्नि के पास ठहरता है ॥१८॥ वह यह मन्त्र पढ़कर जाता है—‘‘अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाऽग्नेऽहं गृहपतिना भूयासँ॒ सुगृहपतिस्त्वम् मयाऽग्ने गृहपतिना भूयाः’’(यजु०२।२७)—‘‘हे गृहपति अग्नि ! मैं तुझ गृहपति की सहायता से अच्छा गृहपति हो जाऊँ। हे अग्नि ! मुझ गृहपति की सहायता से तू अच्छा गृहपति हो जा।’’ यह स्पष्ट ही है। अब कहता है —‘‘अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु’’ (यजु० २।२७) —‘‘हमारे घर के मामले एक बैल की गाड़ी जैसे न हों।’’ इस कहने का तात्पर्य है कि हमारे घर के मामले दुःख-रहित हों। अब कहता है—‘‘शतं॒ हिमाः’’ (यजु० २।२७)—‘‘सौ वर्ष तक।’’ इसका तात्पर्य है ‘मैं सौ वर्ष तक जीऊँ।’ परन्तु उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मनुष्य सौ वर्ष से अधिक जीता है। इसलिए उसको ऐसा नहीं कहना चाहिए ॥१९॥ अब वह (बाईं ओर से दाईं ओर) मुड़ता है यह पढ़कर —‘‘सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते’’ (यजु० २।२७)—‘‘सूर्य के मार्ग से लौटता हूँ।’’ वह इस गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त करके इस (सूर्य के) मार्ग से लौटता है ॥२०॥ अब (यह मन्त्र पढ़ता हुआ) अपने पुत्र का नाम लेता है—‘‘इदं मेऽयं वीर्यं पुत्रोऽनुसन्तन्- वत्’’—‘‘मेरा पुत्र मेरे इस वीर्य को जारी रखे।’’ यदि पुत्र न हो तो अपना ही नाम ले ॥२१॥ अब आहवनीय के पास खड़ा होता है। वह चुपके से खड़ा होता है यह जानकर कि पूर्व में मेरा यज्ञ समाप्त होगा ॥२२॥ अब व्रत का विसर्जन करता है (यह मन्त्र पढ़कर)—‘‘इदमहं यऽएवाऽस्मि सोऽस्मि’’ (यजु०२।२८)—‘‘यह मैं वहीं हूँ जो हूँ।’’ जब व्रत को किया था तो मनुष्य से ऊपर (देव) हो गया था। अब यह कहना तो उचित नहीं है कि मैं सच से झूठ को प्राप्त होऊँ; और वह मनुष्य हो ही जाता है, इसलिए उसको इस मन्त्र को पढ़कर ही व्रत का विसर्जन करना चाहिए-‘मैं वही हूँ जो हूँ।’ (यजु० २।२८) ॥२३॥ माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत ‘रत्नकुमारी-दीपिका’ भाषा व्याख्या का हविर्यज्ञनाम प्रथम काण्ड समाप्त हुआ। प्रथम काण्ड प्रपाठक कण्डिका-संख्या प्रथम [ १.२.२ ] १२१ द्वितीय [ १.३.३ ] १२२ तृतीय [ १.४.४ ] १२८ चतुर्थ [ १.६.१ ] १२१ पंचम [ १.७.२ ] १२१ षष्ठ [ १.८.२ ] १११ सप्तम [ १.६.३ ] ११४ योग ८३८

०२-द्वितीय काण्ड-०२

ओम् । स य॒द्वाऽइ॒तश्चे॒तश्च॒ सम्भर॑ति । त॒त्सम्भा॒राणाꣳ सम्भा॒रत्वं य॑त्र-यत्रा॒ग्ने- र्न्य॑क्तं तत॒स्ततः सम्भर॑ति तद्यश॑सेव तद्दे॒वैन॑मेतत्सम॑र्धयति प॒शुभि॑रिव तन्मि॒थुने॑- नेव व॒त्सम्भर॑न् ॥ १॥ अथो॒ल्लिख॑ति । तद्यद्दे॒वास्ये॑ पृथि॒व्याऽअ॒भिषि॑क्तं वा॒भिष्यु॑तं वा तद्दे॒वास्या॑ऽएतदु॒दल्ल्य॑थ य॒ज्ञिया॑यामे॒व पृ॑थि॒व्यामाध॑त्ते॒ तस्माद्वाऽउ॒ल्लिख॑ति ॥ २॥ अ॒थाद्भि॑र॒भ्युक्ष॑ति । ए॒ष वा अ॒पाꣳ सम्भा॒रो यद॒द्भिर॒भ्युक्ष॑ति तद्यद॒पः सम्भर॑त्यन्नं॒ वाऽअ॒पापो॒ऽन्नꣳ हि वाऽअ॒पास्तस्मा॒द्यदे॒मं लो॒कमाप॒ आग॑च्छन्त्यथै॒हान्नाद्यं॑ जायते तद॒न्नाद्ये॑नै॒वैन॑मेतत्सम॑र्धयति ॥ ३॥ योषा वाऽआपः॑ । वृषा॒ग्निर्मिथु॒नेनै॒वैन॑मेतत्प्रज॑- ननेन सम॑र्धयत्य॒द्भिर्वाऽइ॒दꣳ सर्व॒माप्तम॒द्भिरै॒वैन॑मेतदा॒प्त्वाध॑त्ते॒ तस्मा॒दपः॑ सम्भर॑ति ॥४॥ अथ॒ हिर॑ण्यꣳ सम्भर॑ति । अ॒ग्निर्ह॒ वाऽअ॒पो॒ऽभिदध्यौ॑ मिथु॒न्याभिः॑ स्या॒मिति॑ ताः सम्ब॑भूव तासु॒ रेतः॒ प्रासि॑ञ्चत्तद्धिर॑ण्यमभवत्तस्मादेतद॒ग्निसं॑काशम॒ग्नेर्हि रेत॑स्तस्माद॒- प्सु वि॑न्दन्त्य॒प्सु हि प्रासि॑ञ्चत्तस्मा॑द्दिनेन॒ न धाव॑यति॒ न किं च॒न क॑रोत्यथ॒ यशो॑ दैवे॒रेत॒सꣳ हि तद्यश॑सैवै॒नमे॑तत्सम॑र्धयति सरैतसमै॒व कृ॑त्स्नम॒ग्निमाध॑त्ते॒ तस्मा॒द्धि- र॑ण्यꣳ सम्भर॑ति ॥ ५॥ अथो॒षांत्सम्भर॑ति । अ॒सौ ह॒ वै द्यौर॒स्यै पृ॑थि॒व्याऽए॒तान्य॑- श्रून्प्र॒ददौ॒ तस्मा॒त्पश॒व्यमू॑षर॒मित्या॑हुः प॒शवो॒ ह्येवै॒ते साक्षा॑देव तत्प॒शुभि॑रै॒वैन॑मे- तत्सम॑र्धयति तेऽमुत॒ आग॑ता अ॒स्यां पृ॑थि॒व्यां प्र॑तिष्ठि॒तास्तम॒नयो॑र्द्यावापृथि॒व्यो रसं॑ म॑न्यन्ते॒ तदन॒योरे॒वैन॑मेतद्यावापृथि॒व्यो र॒सेन॒ सम॑र्धयति॒ तस्मा॑दू॒षांत्सम्भर॑ति ॥६॥ अ॒थाखु॑करी॒षꣳ सम्भर॑ति । आ॒खवो॒ ह वाऽअ॒स्यै पृ॑थि॒व्यै रसं॑ विदु॒स्तस्मा॒त्तेऽधो॑ ऽध इ॒मां पृ॑थि॒वीं च॑रन्तः॒ प्रवि॑ष्टा अ॒स्यै हि रसं॑ विदु॒स्ते यं ते॒ऽस्यै पृ॑थि॒व्यै रसं॑

कां० २, अ० १, ब्रा० १, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / १६३ द्वितीय काण्ड अथ एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डम् [अग्न्याधानम्, पुनराधेयम्, अग्निहोत्रम्, पिण्डपितृयज्ञः, आग्रयणेष्टिः, दाक्षायणयज्ञः, चातुर्मास्यानि] अग्न्याधानम् अध्याय १—ब्राह्मण १ वह इधर-उधर से इकट्ठा करता है। यही (भिन्न-भिन्न आवश्यक) वस्तुओं का इकट्ठा करना तैयारी है। जिस-जिस वस्तु में अग्नि रहता है उसी-उसी वस्तु में तैयारी की जाती है। इस तैयारी में यश से, पशुओं से और मिथुन अर्थात् जोड़े से युक्त करता है ॥१॥ अब वह रेखा खींचता है। इस पृथिवी के जिस भाग पर चला या जहाँ थूका उस भाग को निकाल देते हैं। इस प्रकार यज्ञ के योग्य पृथिवी में ही अग्न्याधान किया जाता है। इसीलिए रेखा खींची जाती है ॥२॥ अब जल छिड़कता है। यह जो जल से छिड़कना है मानो (अग्नि की) जल के साथ तैयारी है। जल लाया इसलिए जाता है कि जल अन्न है। अन्न ही जल है। इसलिए जब जल इस लोक में आ जाता है, तभी अन्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार वह अग्नि को अन्न आदि से युक्त करता है ॥३॥ 'आपः' जल स्त्री है। अग्नि पुरुष है। इस प्रकार वह अग्नि के लिए एक सन्तान-उत्पादक जोड़ा देता है। और चूँकि जल इस सब लोक में व्यापक है, इसलिए अग्नि को पहले जल के द्वारा तैयार करके ही स्थापित करता है। इसीलिए वह जल को लाता है ॥४॥ अब वह सोना (सुवर्ण) लाता है। एक बार अग्नि ने जल की ओर देखा और सोचा कि मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने जल के साथ प्रसंग किया और जो वीर्य सींचा वह स्वर्ण हो गया। इसीलिए वह अग्नि के समान चमकता है, क्योंकि वह अग्नि का ही बीज है। वह (सोना) जल में पाया जाता है, क्योंकि जल में ही उसने वीर्य सींचा था। इसलिए इससे न कोई उसको धोता है और न कोई और काम करता है! अब (आग के लिए) यश है। क्योंकि देव-वीर्य अर्थात् यश से वह उसको समृद्ध करता है और वीर्यरूप पूर्ण अग्नि को आधान करता है। इसलिए वह स्वर्ण को लाता है ॥५॥ अब वह नमक को लाता है। उस द्यौ ने इस पृथिवी के लिए इन पशुओं को दिया। इस- लिए कहते हैं कि नमक की भूमि (ऊषरम् या ऊसर) पशुओं के योग्य है। ये पशु ही इसलिए नमक हैं। इस प्रकार वह साक्षात् रूप से अग्नि को पशुओं से युक्त करता है। और पशु उस लोक (द्यौ) से आकर इस पृथिवी में प्रतिष्ठित हुए। उस (नमक) को इन द्यौ और पृथिवी का रस मानते हैं। इसलिए इन्हीं द्यौ और पृथिवी के रस से अग्नि को समृद्ध करता है। इसलिए नमक को लाता है ॥६॥ अब वह आखु-करीष (चूहों द्वारा निकाली हुई मिट्टी को) लाता है। चूहे इस पृथिवी के रस को जानते हैं, इसलिए यह इस पृथिवी को गहरा खोदते चले जाते हैं। इस पृथिवी के रस को प्राप्त करके वे मोटे हो गये, और जहाँ पृथिवी में उनको रस प्रतीत हुआ उन्होंने उसे खोदकर

अध्याय-१, ब्राह्मण-२

वि॒द्धस्तत॒ उत्किर॑न्ति॒ तद॑स्या॒ऽश्वेन॑मेत॒त्पृथिव्यै॒ रसे॑न॒ समर्धयति॒ तस्मा॑दाखुकरी॒षꣳ सम्भ॑रति पुरी॒ष श्इति॒ वै त॒माहु॑र्यः श्रियं॒ गच्छ॑ति समा॒नं वै पुरी॑षं च करी॒षं च॒ तदे॒तस्यै॒वाव॑रुद्धे॒ तस्मा॑दाखुकरी॒षꣳ सम्भर॑ति ॥ ७॥ अथ॒ शर्क॑राः स॒म्भर॑ति । दे॒- वाश्च॒ वाऽअ॑सुराश्चो॒भये॑ प्राजाप॒त्याः पस्पृधिरे सा हेयं पृ॑थिव्य॑लेलाय॒द्यथा॑ पुष्कर- प॒र्णमे॒वं ताँꣳ ह स्म॒ वातः॒ संवह॑ति सोपैव दे॒वान्जगामोपासु॑राꣳस्तद्यत्र॑ दे॒वा- नुपजगाम ॥ ८॥ तदूचुः । हन्ते॒मां प्र॑ति॒ष्ठां दृꣳहामहै॒ तस्यां॑ ध्रु॒वाया॑मशिथि॒लाया- म॒ग्नीऽआद॑धामहै॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्निर्भ॑क्ष्याम॒ इति॑ ॥ ९॥ तद्यथा॒ शङ्कुभि॒श्चर्म॒ वि- ह॒न्यात् । ए॒वमि॒मां प्र॑ति॒ष्ठाꣳ पर्य॑बृꣳहन्त॒ सेयं ध्रु॒वाशि॑थिला प्रति॒ष्ठा तस्यां॑ ध्रुवा- यामशि॑थिलायाम॒ग्नीऽआद॑धत॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्नि॑रभजन् ॥ १०॥ तथो॒ऽएवैष॒ ए- तत् । इ॒मां प्र॑ति॒ष्ठाꣳ शर्क॑राभिः॒ परि॑बृꣳहते॒ तस्यां॑ ध्रु॒वाया॑मशिथि॒लायाम॒ग्नीऽआ- धत्ते॒ ततो॑ऽस्यै सप॒त्नान्निर्भ॑जति॒ तस्मा॒च्छर्क॑राः स॒म्भर॑ति ॥ ११॥ ता॒न्वाऽए॒तान् ।- पञ्च॒ सम्भा॒रात्स॒म्भर॑ति पा॒ङ्क्तो य॒ज्ञः पा॒ङ्क्तः प॒शुः पञ्च॒ऽर्तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ ॥ १२॥ त॒- दाहुः । षडेव॒ऽर्तवः॑ संवत्स॒रस्येति॒ न्यूनं॒ तर्हि॑ मिथु॒नं प्र॒जननं॑ क्रियते न्यूना॒द्धा ऽइ॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ तद्भूय॑यसमुत्त॒राव॒त्तस्मा॒त्तच्च॒ भव॑ति॒ यद्यु॒ षडेव॒ऽर्तवः॑ संव- त्स॒रस्येत्यति॒रेवैतेषां॒ षष्ठस्तथो॒ऽएवैतन्न्यूनं॒ भव॑ति ॥ १३॥ तदा॒हुः । नैवैकं॑ चन॒ सम्भा॒रꣳ सम्भ॑रे॒दित्य॒स्यां वाऽए॒ते सर्वे॑ पृथि॒व्यां भव॑न्ति॒ स य॑दे॒वास्या॑माध॒त्ते तत्स- र्वाꣳत्सम्भा॒राना॑प्नोति॒ तस्मान्नैवैकं॑ च॒न सम्भा॒रꣳ सम्भ॑रे॒दिति॒ तदु॒ समे॑व॒ भरे॒द्यद्धे॒- वास्या॑माध॒त्ते तत्सर्वाꣳत्सम्भा॒राना॑प्नोति॒ यदु॒ सम्भारैः सम्भृ॑ति॒र्भव॑ति॒ तदु॒ भव॑ति॒ त- स्मादु॒ समे॑व॒ भरे॑त् ॥ १४॥ ब्राह्मणम् ॥ १॥ कृत्तिकास्व॒ग्नीऽआद॑धीत । ए॒ता वाऽअ॒ग्नेर्नक्ष॑त्रं॒ यत्कृत्ति॑कास्त॒द्वै स॒लोम॒ यो ऽग्निर्नक्ष॑त्रेऽ॒ग्नी आद॑धाते॒ तस्मा॑त्कृत्ति॑कास्वा॒दधी॑त ॥ १॥ एकं॑ द्वे त्रीणि॑ । च॒त्वा- री॑ति॒ वाऽअ॒न्यानि॒ नक्ष॑त्राण्यथै॒ता ए॒व भूयि॑ष्ठा॒ यत्कृत्ति॑कास्तद्भूमा॑नमे॒वैतदुपै॑ति

कां० २, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१४ व १-२ शतपथब्राह्मण / १६५ बाहर निकाल डाला। इसलिए वह अग्नि को पृथिवी के इस रस से युक्त करता है। यही कारण है कि वह आखु-करीष को लाता है। जो श्री को प्राप्त कर लेता है, उसे पुरीष्य कहते हैं। पुरीष और करीष एक ही बात है। इसलिए इसकी बढ़ोतरी के लिए आखु-करीष को लाता है ॥७॥ अब वह कंकड़ (शर्करा) लाता है। देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान अपनी बड़ाई के लिए झगड़ने लगे। यह पृथिवी कमल के दल के समान कांपने लगी, क्योंकि वायु इसको डगमगा रही थी। वह कभी देवों के पास जाती और कभी असुरों के। जब वह देवों के पास पहुँची तो—॥८॥ उन्होंने कहा, लाओ हम इसको दृढ़ कर लें; और जब यह दृढ़ और अचल हो जाय तो दोनों अग्नियों का आधान करें। इससे हम अपने शत्रुओं को यहाँ से बिल्कुल निकाल देंगे ॥९॥ इसलिए जैसे खूंटियों से चमड़े को तानते हैं, उसी प्रकार इसको दृढ़ किया; और यह अचल और दृढ़ हो गई। उसी दृढ़ अचल भूमि पर दो अग्नियों का आधान किया; और तब उन्होंने शत्रुओं को इसके भाग से बिल्कुल निकाल दिया ॥१०॥ इसी प्रकार यह (अध्वर्यु) भी कंकड़ों (शर्करा) से इसको दृढ़ करता है; और उस दृढ़ निश्चल पृथिवी में दो अग्नियों को स्थापित करता है; और शत्रुओं को मार भगाता है, इसलिए कंकड़ों को लाता है ॥११॥ इस प्रकार ये पाँच तैयारियां हैं क्योंकि यज्ञ पाँच भागों वाला (पांक्त) और पशु भी पाँच भागों वाला है; और वर्ष में पाँच ऋतुएं भी हैं ॥१२॥ इसके विषय में उनका कहना है कि साल में छः ऋतुएं हैं। न्यून के जोड़े से ही सन्तान उत्पन्न होती है। न्यून शरीर (के नीचे के स्थान) से ही यह प्रजा उत्पन्न होती है। यह भी (यजमान के लिए) श्रेयस्कर है। इसलिए पाँच तैयारियां होती हैं। और जब वर्ष की छः ऋतुएं होती हैं तो छठी अग्नि होती है। इसलिए कोई न्यूनता नहीं हुई। [तात्पर्य यह है कि पाँच संभारों में किसी प्रकार की न्यूनता नहीं माननी चाहिए। पाँच ऋतुओं के लिए पाँच संभार हो गये। यदि कोई कहे कि ऋतुएं छः होती हैं इसलिए पाँच संभारों से न्यूनता पाई जायगी, तो इसका उत्तर यह है कि न्यूनता बुरी नहीं, क्योंकि न्यून से ही तो सन्तान होती है। दूसरी बात यह है कि यदि छः ऋतुएं मानो तो पाच संभारों के साथ-साथ (अर्थात् जल, स्वर्ण, नमक, आखु- करीष और शर्करा) छठा अग्नि भी तो है। इससे छः संख्या भी पूरी हो गई और पाँच ही संभार ठीक ठहरे ॥१३॥ कुछ लोगों का मत है कि एक भी संभार नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस पृथिवी में तो सभी चीजें हैं। जब इसी पृथिवी में अग्नि को स्थापित किया तो मानो सभी संभार प्राप्त हो गये। इसलिए किसी संभार की आवश्यकता नहीं। परन्तु उसको संभारों को एकत्रित करना ही चाहिए। क्योंकि जब वह इस पृथिवी में अग्नि का आधान करता है तब सभी संभारों को प्राप्त होता है और जो कुछ संभारों का लाभ है वह उसको भी प्राप्त हो जाता है। इसलिए संभारों को इकट्ठा करना ही चाहिए ॥१४॥ अध्याय १—ब्राह्मण २ अग्नियों का आधान कृत्तिका नक्षत्रों में करे। कृत्तिका अग्नि के नक्षत्र हैं। जो अग्नि के नक्षत्र में अग्नियों का आधान करता है वह सलोम (अनुकूलता) स्थापित करता है। इसलिये कृत्तिका नक्षत्र में अग्न्याधान करे ॥१॥ अन्य नक्षत्र एक, दो, तीन अथवा चार होते हैं (जबकि कृत्तिका सात होते हैं), इसलिए कृत्तिका बहुल हुए। इस प्रकार बहुत्व को प्राप्त होता है इसलिए अग्न्याधान कृत्तिका नक्षत्र में

१६६ शतपथ ब्राह्मण त॒स्मात्कृत्तिकासु॒वादधी॑त ॥२॥ ए॒ता ह॒ वै प्राच्यै॒ दिशो॒ न॒ च्यव॑न्ते । सर्वा॑णि ह वा॒ऽअन्या॑नि॒ नक्ष॑त्राणि प्राच्यै॒ दिश॒श्च्यव॑न्ते तत्प्राच्या॑मे॒वास्यै॒तद्दि॒श्याहि॑तौ भवत- स्त॒स्मात्कृ॒त्तिकासु॒वादधी॑त ॥३॥ अथ॒ यस्मान्न॒ कृत्तिका॑स्वा॒दधी॑त । ऽर्क्षाणाꣳ ह वा॒ऽए॒ता अग्रे॒ पत्न्य॑ आसुः स॒प्तऋ॑षीनु॒ ह॒ स्म॒ वै पु॒रऽर्क्षा इत्याच॑क्षते ता मि॒थु- नेन॒ व्या॑र्ध्यन्तामी ह्युत्त॒राहि स॒प्तऋ॑षय उद्य॑न्ति पु॒र ए॒ता अ॒शमिव॒ वै तद्यो॑ मि- थुने॑न॒ व्यृद्धः॒ स नेन्मि॑थुनेन॒ व्यृध्या॒ऽइति॒ तस्मान्न॒ कृत्तिका॑स्वा॒दधी॑त ॥४॥ तद्वै॑व दधीत । अ॒ग्निर्वाऽए॒तासां॑ मिथुन॒मग्नि॑नैता म॒िथुने॑न॒ समृ॑द्धास्त॒स्माद्दै॑व दधीत ॥५॥ रो॒हि॒ण्याम॒ग्नीऽआद॑धीत । रो॒हि॒ण्याꣳ ह॒ वै प्र॒जाप॑तिः प्रजाकामो॒ऽग्नीऽआ॑दधे॒ स प्र॒जा असृ॑जत ता अस्य प्रजाः सृ॒ष्टा रु॒करू॑पा॒ उप॑स्तब्धास्तस्थू रो॒हिण्य इ॑वैव॒ तद्वै रो॒हि॒ण्ये॑ रो॒हि॒णीत्वं बहु॒र्हैव प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भवति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्रो॑हि॒ण्यामाद॑ध॒त्ते ॥६॥ रो॒हि॒ण्यामु॒ ह॒ वै प॒शवः॑ । अ॒ग्नीऽआ॑दधिरे मनु॒ष्याणां॒ काम॒ꣳ रोहे॑मेति॒ ते मनु॒ष्याणां॒ काम॒मरो॑ह॒न्यमु॒ हैव॒ तत्प॒शवो॑ मनु॒ष्ये॑षु॒ काम॒मरो॑हँस्त॒मु॒ हैव॒ प॒शुषु॑ काम॒ꣳ रो॑हति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्रो॑हि॒ण्यामाध॒त्ते ॥७॥ मृ॒ग॒शी॒र्षेऽग्नीऽआद॑धीत । ए- तद्वै प्र॒जाप॑तेः शि॒रो यन्मृ॑गशी॒र्षꣳ श्रियै॒ शिरः॒ श्रीर्हि वै शिर॒स्तस्मा॒द्योऽर्ध॑स्य॒ श्रे- ष्ठो भव॑त्यसावमु॒ष्यार्ध॑स्य॒ शिर॒ इत्या॑हुः श्रियꣳ ह गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्मृ॑गशी॒र्ष ऽआ॒धत्ते॑ ॥८॥ अथ॒ यस्मान्न मृ॒ग॒शी॒र्षऽआद॑धीत । प्र॒जाप॒तेर्वाऽए॒तच्छरी॑रं यत्र॒ वा ऽए॒नं तदवि॑ध्यंस्तद्द्विषु॒णा त्रि॒काण्डे॒नेत्या॑हुः स॒ एतच्छरी॑रमजहाद्वा॒स्तु वै शरी॑रम॒य- ज्ञियं॒ निर्वी॑र्य्यं॒ तस्मान्न मृ॒ग॒शी॒र्षऽआ॒दधी॑त ॥९॥ तद्वै॑व दधीत । न वाऽए॒तस्य॑ दे॒- वस्य॒ वास्तु॒ नाय॑ज्ञियं॒ न शरी॑रमस्ति॒ यत्प्र॒जाप॑तेस्त॒स्माद्दै॑व दधीत पुनर्वस्वोः पु॒- नराधेय॒माद॑धी॒तेति॑ ॥१०॥ फल्गुनीष्व॒ग्नीऽआ॒दधी॑त । ए॒ता वाऽइन्द्र॒नक्ष॑त्रं॒ यत्फ- ल्गुन्योऽस्य॑स्य॒ प्रतिनाम्न्यो॒ऽर्जुनी ह॒ वै ना॒मेन्द्रो॒ यद॒स्य गुह्यं॒ नामा॒र्जुन्यो॑ वै ना- मैता॒स्ता ए॒तत्परो॑ऽक्ष॒माच॑क्षते फल्गुन्य॒ इति॒ को ह्ये॒तस्या॒र्हति गुह्यं॒ नाम॒ ग्र-

कां० २, अ० १, ब्रा० २, कं० २-११ शतपथब्राह्मण / १६७ करे ॥२॥ ये (कृत्तिका) पूर्व दिशा से हटते नहीं; अन्य सब नक्षत्र पूर्व दिशा से हटते हैं। इस प्रकार उसकी दोनों अग्नियां पूर्व की दिशा में ही स्थापित होती हैं, इसलिए कृत्तिका नक्षत्रों में ही अग्न्याधान करे ॥३॥ परन्तु कुछ लोग युक्ति देते हैं कि कृत्तिकाओं में अग्न्याधान नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये कृत्तिका पहले ऋक्षों की पत्नियां थीं। सात ऋषियों को पहले ऋक्ष कहते थे। उनको मैथुन करने नहीं दिया गया, इसलिए उत्तर में सप्त-ऋषि निकलते हैं और ये (कृत्तिकाएँ) पूर्व में। मैथुन करने न देना यह दुर्भाग्य (अशम्) है। इसलिए कृत्तिका नक्षत्रों में अग्न्याधान न करे कि कहीं मैथुन से वंचित न हो जाय ॥४॥ परन्तु कृत्तिका में अग्न्याधान किया जा सकता है, क्योंकि इनका जोड़ा तो अग्नि है। अग्नि जोड़े के साथ ही इनकी वृद्धि होती है। इसलिए अग्नि का आधान (कृत्तिका में) करे ॥५॥ रोहिणी नक्षत्र में भी अग्न्याधान करे, क्योंकि रोहिणी नक्षत्र में ही सन्तान के इच्छुक प्रजापति ने अग्न्याधान किया था। उसने प्रजा सृजी और वह प्रजा एक-रूप और ठीक रही, रोहिणी (लाल गाय) के समान। इसलिए रोहिणी नक्षत्र रोहिणी गौ के समान है। इसलिए जो कोई इस रहस्य को समझकर रोहिणी नक्षत्र में अग्न्याधान करता है वह सन्तान और पशुओं से फूलता-फलता है ॥६॥ रोहिणी नक्षत्र में ही पशु अग्नियों का आधान करते हैं कि मनुष्यों की इच्छा तक चढ़ सकें (रोहेम)। उन्होंने मनुष्यों की कामनाओं तक रोहण किया। और जो कामना पशुओं की मनुष्यों के प्रति पूरी हुई, वही पशुओं के प्रति उसकी पूरी होगी जो इस रहस्य को समझकर रोहिणी नक्षत्र में अग्न्याधान करता है ॥७॥ मृगशीर्ष नक्षत्र में भी अग्न्याधान हो सकता है, क्योंकि मृगशीर्ष प्रजापति का सिर है। श्री ही शिर है। इसलिए जो मनुष्य-जाति में श्रेष्ठ होता है उसको कहते हैं कि यह जाति का शिर है। जो इस रहस्य को समझकर मृगशीर्ष नक्षत्र में अग्न्याधान करता है वह श्री को प्राप्त होगा ॥८॥ अब मृगशीर्ष नक्षत्र में अग्न्याधान न करने की (युक्ति कुछ लोग यह देते हैं) कि यह प्रजापति का शरीर है। जब इसको देवों ने त्रिकाण्ड तीर से बींधा तो कहते हैं कि उसने शरीर त्याग दिया। इसलिए यह शरीर केवल वास्तु, अयज्ञिय (यज्ञ न करने योग्य) और निर्वीर्य हो गया। इसलिए मृगशीर्ष में अग्न्याधान न करे ॥९॥ परन्तु वह कर सकता है। यह जो प्रजापति का शरीर है, न तो वास्तु है, न ही अयज्ञिय और न निर्वीर्य (इसलिए मृगशीर्ष में अग्न्याधान करे)। पुनर्वसु नक्षत्र में पुनराधेय कर्म करे। ऐसा आदेश है ॥१०॥ फल्गुनी नक्षत्र में अग्न्याधान करे। ये फल्गुनी इन्द्र के नक्षत्र हैं और उसी के नाम पर हैं। इन्द्र का नाम अर्जुन भी है। यह उसका गुह्य (गुप्त) नाम है, और इन (फल्गुनी नक्षत्रों) का भी नाम अर्जुनी है। इसलिए वह परोक्ष रीति से इनको फल्गुनी कहता है, क्योंकि (इन्द्र का) गुह्य नाम कौन ले सकता है ? इसके अतिरिक्त यजमान भी इन्द्र है। वह अपने ही

अध्याय-१, ब्राह्मण-३

१६८ शतपथ ब्राह्मण हीतुमि॒न्द्रो वै य॒जमानस्त॒त्स्व॒ऽए॒वैतन्नक्षत्रेष्व॒ग्नी आध॑त्त॒ऽइन्द्रो॑ य॒ज्ञस्य॑ दे॒वतेतेनो हास्यैतत्सैन्द्रमग्न्याधेयं भवति पूर्व॑योरा॒दधी॑त पुर॒स्तात्क्रतु॑र्हैवास्मै॒ भवत्युत्त॑रयो रा॒दधी॑त॒ श्वःश्रेय॒सं॒ ह्यै॒वऽस्मा॒ऽउत्तरा॒वद्भवति ॥११॥ ह॒स्तेऽग्नी॒ऽआद॑धीत । य इ- च्छेत्प्र मे दीयेतेति तद्वाऽअ॒नुब्या॒ यद्ध॒स्तेन प्र॒दीय॑ते॒ प्र है॒वास्मै॑ दीयते ॥१२॥ चि- त्रायाम॒ग्नीऽआद॑धीत । दे॒वाश्च वा अ॑सुराश्चोभये॑ प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे॒ तऽउ॒भय॒ऽए॒- वामुं लो॒कं॒ समारुरुक्षां च॑क्रुर्द्दिव॑मेव ततो॑ऽसुरा रौहि॒णमित्य॒ग्निं चि॑क्यिरे॒ऽने- नामुं लो॒कं समा॑रोक्ष्याम इति ॥१३॥ इ॒न्द्रो ह॒ वाऽईक्षां चक्रे । इमं चेद्दा॒ऽइमे चि॒न्वते॑ त॒त ए॒व नो॒ऽभिभ॑वन्तीति स ब्राह्मणो ब्रुवाण ए॒केष्ट॑कां प्र॒बध्ये॑याय ॥१४॥ स॒ होवा॑च । कृ॒ताहम॒मामु॑पद॒धाऽइ॑ति॒ तथेति ता॒मुपा॑धत्त॒ तेषामल्प- कादे॒वाग्निर॒संचित आस ॥१५॥ अथ॑ होवाच । अन्वा॒ऽअ॒हं तां दा॑स्ये या म॒मेष्ट॒के- ति ताम॒भिप॒द्याब॑ब॒र्हे त॒स्यामा॒बृह्य॑माणायाम॒ग्निर॑व॒शशा॒दाग्ने॒र्य्यव॑शाद॒मन्व॑सुरा व्य॑वशे- ष्ठुः स ता ए॒वेष्ट॑का वज्रान्कृ॒त्वा ग्री॒वाः प्रचि॑च्छेद ॥१६॥ ते ह देवाः स॒मेत्यो॑चुः । चित्र॒ वाऽअ॒भूम यऽइ॒यतः॑ सप॒त्नानब॑धि॒ष्मेति॒ तद्वै चि॒त्रायै॑ चित्रा॒त्वं॒ चित्रं॑ ह॒ भ- व॑ति ह॒न्ति सप॒त्नान्हन्ति द्विषन्तं भ्रातृ॑व्यं य ए॒वं वि॒द्वांश्चित्रायामाध॑त्ते॒ तस्मा॑दे॒तत्क्ष- त्रिय एव नक्ष॑त्रमुपे॒त्सं॒सि॑ञ्जिघा॒ꣳसती॑व॒ ह्येष सप॑त्नान्वीव जिगीषते ॥१७॥ नाना॑ ह॒ वाऽए॒तान्यग्रे क्षत्रा॑ण्यासुः । य॒थैवासौ सूर्य एवं तेषामेष उ॒द्यन्ने॒व वी॒र्यं॑ क्षत्र- माद॑त्त॒ तस्मा॑दादि॒त्यो नाम॒ यदे॑षां वी॒र्यं॑ क्षत्र॒माद॑त्त ॥१८॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । यानि॒ वै तानि॑ क्षत्रा॒ण्यभू॑वन्वै तानि॑ क्षत्रा॒ण्यभू॑वन्निति॒ तद्वै नक्ष॑त्राणां नक्ष॑त्रत्वं तस्मा॒द् सूर्य॑नक्षत्र॒ऽए॒व स्या॑दे॒ष ह्ये॑षां वी॒र्यं॑ क्षत्र॒माद॑त्त॒ यद्यु नक्ष॑त्रकामः स्या॑दे- तद्वाऽअ॑नप॒राद्धं नक्ष॑त्रं यत्सूर्यः॑ स॒ ए॒तेनै॒व पु॒ण्याहे॑न॒ यदे॑तेषां नक्ष॑त्राणां कामये॑त तदु॑पे॒त्सेत्तस्मा॒द् सूर्य॑नक्षत्र॒ऽए॒व स्या॑त् ॥१९॥ ब्राह्मणम् ॥२॥ व॒सन्तो ग्री॒ष्मो व॒र्षाः । ते दे॒वा ऋ॒तवः श॒रद्धे॑मन्तः शि॒शिर॒स्ते पितरो॒ य ए॒-

कां० २, अ० १, ब्रा० २-३, कं० ११-१६ व १ शतपथब्राह्मण / १६६ नक्षत्र में अग्नि का आधान करता है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। इस प्रकार उसका अग्न्याधान सेन्द्र (इन्द्र वाला) हो जाता है। पूर्व-फल्गुनी में अग्न्याधान करे। इससे उसका ऋतु या यज्ञ पहला अर्थात् प्रथम कोटि का हो जाता है। या पिछले फल्गुनी (उत्तर) में अग्न्याधान करे, इससे उसका यज्ञ उत्तरा के समान अर्थात् उन्नतशील हो जाता है। [यहाँ शब्दों का सादृश्य दिखाया है। पूर्व-फल्गुनी में आधान करने से पूर्व-फल अर्थात् अच्छा फल होगा। उत्तर-फल्गुनी में आधान करने से उत्तर-फल अर्थात् अच्छा फल होगा] ॥११॥ हस्त नक्षत्र में अग्न्याधान करे। जो जिसकी इच्छा करे उसको वही दिया जाय। इसी अनुष्ठान से (कार्य सफल) होगा। जो हाथ से प्रदान किया जाता है, वह अवश्य ही दिया जाता है। 'हस्त' नक्षत्र का शाब्दिक सम्बन्ध हाथ द्वारा किये गये दान से जोड़ा गया है ॥१२॥ चित्रा नक्षत्र में अग्न्याधान करे। प्रजापति के पुत्र देव और असुर बड़ाई के लिए लड़ पड़े। दोनों ने चाहा कि उस लोक (द्यौ लोक) को चढ़ जावें। अब असुरों ने रौहिण अग्नि को प्रज्वलित किया कि इसके द्वारा हम उस लोक को चढ़ जायेंगे। [यहाँ अग्नि को रौहिण कहा। चढ़ने के लिए भी 'रुह' धातु आता है। यह शाब्दिक सादृश्य है] ॥१३॥ इन्द्र ने अब सोचा कि यदि ये इस अग्नि का आधान कर लेंगे तो हमको हरा देंगे। अब वह ब्राह्मण का भेष रखकर एक ईंट लेकर वहाँ गया ॥१४॥ उसने कहा, 'मैं भी इस (ईंट) को रख दूं।' उन्होंने कहा 'अच्छा।' उसने (वह ईंट) रख दी। उनके अग्न्याधान में अब बहुत थोड़ी-सी कसर रह गई ॥१५॥ अब उसने कहा, 'मैं इस (ईंट) को निकाले लेता हूँ। यह मेरी है।' उसने उसे पकड़ा। और खींच लिया। तब अग्नि की वेदी गिर पड़ी और अग्नि के गिरने से असुर भी गिर पड़े। उसने अब उन ईंटों को वज्र बना दिया और उनसे (असुरों के) गले काट डाले ॥१६॥ अब देव इकट्ठे होकर बोले—हमने शत्रु मार डाले, यह तो चित्र अर्थात् विचित्र बात हुई! इसलिए चित्रा नक्षत्र का चित्रत्व (विचित्रता) है। जो इस रहस्य को समझकर चित्रा नक्षत्र में अग्न्याधान करता है वह विचित्र हो जाता है और अहितकारी शत्रुओं का नाश कर देता है। इसलिए क्षत्रिय को अवश्य ही इस नक्षत्र में अग्न्याधान करने की इच्छा होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा आदमी प्रायः अपने शत्रु के नाश की इच्छा किया करता है ॥१७॥ पहले ये (नक्षत्र) बहुत-से क्षत्र थे जैसे वह सूर्य। जब वह उदय हुआ तो उसने उनके क्षत्र और वीर्य (शक्ति) को ले लिया। इसलिए उसको आदित्य कहते हैं कि वह इन (नक्षत्रों) के वीर्य और क्षत्र को ले लेता है। ['आदत्ते' का अर्थ है 'ले लेता है'। इसी 'आदत्ते' से आदित्य शब्द को निकाला है] ॥१८॥ अब उन देवों ने कहा, 'जो अब तक क्षत्र अर्थात् शक्ति थे वे अब क्षत्र न रहेंगे। इसीलिए नक्षत्रों का नक्षत्रत्त्व है। अर्थात् पहले वे 'क्षत्र' थे, अब देवों के कहने से क्षत्र नहीं रहे (अर्थात् न + क्षत्र = नक्षत्र हो गये)। इसलिए सूर्य को ही नक्षत्र मानना चाहिए क्योंकि उनका वीर्य सूर्य ने ले लिया। यदि (यजमान को) (अग्न्याधान के लिए) नक्षत्र की आवश्यकता हो तो यह सूर्य अच्छा नक्षत्र है। इस पुण्य दिन में वह जिन नक्षत्रों को चाहे उनका पुण्य ले ले। इसलिए उसको सूर्य को ही नक्षत्र मानना चाहिए ॥१९॥ अध्याय १—ब्राह्मण ३ वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा ये देव-ऋतुएँ हैं। शरद्, हेमन्त और शिशिर ये पितृ-ऋतुएँ हैं। जो

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

वापू॒र्यतेऽर्धमासः स दे॒वा योऽप॒क्षीय॑ते स पि॒तरो॒ऽहरे॑व दे॒वा रात्रिः पि॒तरः॑ पू- र्वा॒ह्णो दे॒वा अ॑परा॒ह्णः पि॒तरः॑ ॥ १ ॥ ते वाऽए॒तऽऋतवः॑ । दे॒वाः पि॒तरः॑ स यो ह्ये॑वं वि॒द्वान्दे॒वाः पि॒तर॒ इति॑ ब्रूयात्य॒ ह्वास्य दे॒वा दे॒वहू॑यं गच्छ॑न्त्या पि॒तरः॑ पि॒तृहू॑यमवन्ति हैनं॑ दे॒वा दे॒वहू॒त्येऽव॑न्ति पि॒तरः॑ पि॒तृहू॑ये य ए॒वं वि॒द्वान्दे॒वाः पि॒- तर॒ इति॑ ब्रू॒यति॑ ॥ २ ॥ स यत्रोद॒गावर्त॑ते । दे॒वेषु॒ तर्हि॑ भवति दे॒वांस्तर्ह्य॑भिगो- पायत्यथ॒ यत्र॑ दक्षि॒णावर्त॑ते पि॒तृषु॒ तर्हि॑ भवति पि॒तॄंस्तर्ह्य॑भिगोपायति ॥ ३ ॥ स यत्रोद॒गावर्त॑ते । त॒र्ह्य॒ग्नीरा॒दधीताप॑हतपाप्मानो दे॒वा अप॑ पा॒प्मान॑ꣳ हते॒ऽमृ॑ता दे॒वा ना॒मृत॑त्वस्याशास्ति॒ सर्व॒मायु॑रेति॒ यस्त॒र्ह्याध॑त्तेऽथ॒ यत्र॑ दक्षि॒णावर्त॑ते॒ यस्त॒- र्ह्याध॑त्ते॒ऽनप॑हतपाप्मानः पि॒तरो॒ न पा॒प्मान॒मप॑हते॒ मर्त्याः॑ पि॒तरः॑ पु॒रा ह्वायुषो॑ म्रियते॒ यस्त॒र्ह्याध॑त्ते ॥ ४ ॥ ब्रह्म॑ वै वस॒न्तः । क्ष॒त्रं ग्री॒ष्मो विशे॑व व॒र्षास्तस्मा॑द्ब्रा- ह्म॒णो व॑स॒न्त आद॑धीत॒ ब्रह्म॒ हि व॑स॒न्तस्तस्मा॑त्क्षत्रियो ग्री॒ष्मऽआद॑धीत क्ष॒त्रꣳ हि ग्री॒ष्मस्तस्मा॒द्वैश्यो॑ वर्षा॒स्वाद्॑धीत विड्ढि वर्षाः॑ ॥ ५ ॥ स यः का॒मये॑त । ब्रह्म- वर्च॒सी स्या॒मिति॑ वस॒न्ते स आ॒दधी॑त॒ ब्रह्म॒ वै व॑स॒न्तो ब्रह्मवर्च॒सी है॒व भ॑वति ॥ ६ ॥ अथ॒ यः का॒मये॑त । क्ष॒त्रꣳ श्रि॒या य॒शसा॑ स्या॒मिति॑ ग्री॒ष्मे स आ॒दधी॑त क्ष॒त्रं वै ग्री॒ष्मः क्ष॒त्रꣳ है॒व श्रि॒या य॒शसा॑ भवति ॥ ७ ॥ अथ॒ यः का॒मये॑त । ब॒हुः प्र॒ज- या प॒शुभिः॑ स्या॒मिति॑ व॒र्षासु॒ स आ॒दधी॑त वि॒ड्डै व॒र्षा अन्नं॒ विशो॑ ब॒हुरे॑व प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भवति य ए॒वं वि॒द्वान्व॒र्षास्वाध॑त्ते ॥ ८ ॥ ते वाऽए॒तऽऋतवः॑ । उ॒भय॑ऽए॒वा- प॑हतपाप्मानः सू॒र्य ए॒वेषां॑ पा॒प्मनोऽप॑हन्तोत्य॑त्रेवैषामु॒भये॑षां पा॒प्मान॒मप॑हन्ति त- स्मा॒द्यदै॒वैनं॑ क॒दा च॑ य॒ज्ञ उप॒नमे॒दथा॒ग्नीरा॒दधी॑त न श्वःश्व॒मुपा॑सीत को हि म- नु॒ष्य॑स्य॒ श्वो वे॑द ॥ ९ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥ यदु॑क॒रस्य॒ श्वोऽग्न्याधेय॑ꣳ स्यात् । द्वि॒वेवा॒श्नीयान्मनो ह वै दे॒वा म॑नु॒ष्य॑स्या- जानन्ति तेऽस्यैत॒च्छ्वोऽग्न्याधेयं॑ वि॒दुस्तेऽस्य॒ विश्वे॑ दे॒वा गृ॒हानाग॑च्छन्ति ते॒ऽस्य गृ॒हे-

कां० २, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १-६ व १ शतपथब्राह्मण / २०१ आधा मास बढ़ता है (अर्थात् शुक्ल पक्ष) वह देवों का है और जो घटता है (अर्थात् कृष्ण पक्ष) वह पितरों का है। दिन देवों का है, रात पितरों की। फिर दिन का दोपहर से पूर्व का भाग देवों का है, पिछला भाग पितरों का ॥१॥ अब ये ऋतुएँ देवों और पितरों की हैं। जो मनुष्य इस रहस्य को समझकर देवों और पितरों को बुलाता है उसका देव-निमंत्रण सुनकर देव आ जाते हैं और पितृ-निमंत्रण सुनकर पितर। जो मनुष्य देव और पितरों को जानकर बुलाता है उसकी देव देव-निमंत्रण में और पितर पितृ-निमंत्रण में रक्षा करते हैं ॥२॥ वह (सूर्य) जब उत्तर की ओर होता है तो देवों में होता है और देवों की रक्षा करता है, और जब दक्षिण की ओर होता है तो पितरों में होता है और पितरों की रक्षा करता है ॥३॥ जब (सूर्य) उत्तरायण हो तो अग्न्याधान करे। (सूर्य के द्वारा) देवों का पाप नष्ट हो गया। उसका भी पाप दूर हो जायगा। देव अमर हैं। इसलिए जो इस समय अग्न्याधान करता है उसको अमरत्व की आशा तो नहीं हो सकती, परन्तु वह पूर्ण आयु को प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो दक्षिणायन सूर्य में अग्न्याधान करता है उसका पाप नहीं छूटता, क्योंकि पितरों का पाप नहीं छूटा। और वह आयु से पहले मर जाता है क्योंकि पितर अमर नहीं हैं ॥४॥ वसन्त ब्राह्मण है, ग्रीष्म क्षत्रिय, वर्षा वैश्य। इसलिए ब्राह्मण वसन्त में अग्न्याधान करे क्योंकि वसन्त ब्राह्मण है। इसलिए क्षत्रिय ग्रीष्म में अग्न्याधान करे क्योंकि ग्रीष्म क्षत्रिय है। इसलिए वैश्य वर्षा में अग्न्याधान करे क्योंकि वर्षा वैश्य है ॥५॥ जो इच्छा करे कि मैं ब्रह्मवर्चसी हो जाऊँ वह वसन्त में अग्न्याधान करे, क्योंकि वसन्त ब्राह्मण है। वह निश्चय करके ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥६॥ जो चाहे कि मुझे शक्ति, श्री और यश प्राप्त हो वह ग्रीष्म में अग्न्याधान करे, क्योंकि ग्रीष्म क्षत्रिय है। उसे शक्ति, श्री और यश मिलेगा ॥७॥ और जो चाहे कि बहुत सन्तान तथा पशु हो जायँ, वह वर्षा में अग्न्याधान करे, क्योंकि वर्षा वैश्य है। अन्न वैश्य है। जो इस रहस्य को समझकर वर्षा में अग्न्याधान करता है, उसके बहुत सन्तान और पशु होते हैं ॥८॥ (कुछ का मत है कि) ये दोनों प्रकार की ऋतुएँ (देव-ऋतु और पितृ-ऋतु) पापों से युक्त हैं। सूर्य इनके पापों का दूर करनेवाला है। जब वह चमकता है तो इनके पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिए जब कभी यज्ञ की इच्छा हो तभी अग्न्याधान कर ले। कल के ऊपर न डाले क्योंकि कौन जानता है कि कल क्या होगा ? ॥६॥ अध्याय १—ब्राह्मण ४ जिस दिन के अगले दिन अग्न्याधान करना है उस दिन (यजमान और उसकी स्त्री) दिन में ही भोजन करे, क्योंकि देव मनुष्यों के मन को जानते हैं। वे जानते हैं कि अगले दिन अग्न्याधान होगा। इसलिए सब देव घर मे आ जाते हैं। वे उसके घरों में ठहर जाते हैं

२०२ शतपथ ब्राह्मण षूपवसन्ति स उपवसथः ॥१॥ तन्न्वेवानवकॢप्तं यो मनु॒ष्ये॑ध्नन्त्संस्तु पूर्वोऽश्नीयादथ किमु यो दे॒वेध्नन्त्संस्तु पूर्वोऽश्रीयात्तस्माद् दिवैवाश्नीयात्तद्यद्यपि काममेव नक्तमश्री- यान्नो ह्य॒नाहि॑ताग्नेर्व्रतच॒र्या॑स्ति मानुषो ह्ये॑वैष तावद्भवति यावद॒नाहि॑ताग्निस्त- स्माद्य॒पि काममेव नक्तमश्रीयात् ॥२॥ तद्धैकेऽन्नमुपबध्नन्ति । आग्नेयोऽग्ने॑रग्ने॑रेव सर्व॒त्वायति॒ वद॑न्तस्तदु तथा न कुर्याद्य॒द्यस्या॒ज्ञः स्यादग्नीध्र ए॒वैनं॑ प्रातर्दद्यात्तेनेव तं काममाप्नोति तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥३॥ अथ चातुष्प्राश्यमोदनं पचन्ति । इ॒- न्द्रा॒ग्न्यनेन प्रीणीम इति यथा येन वाहनेन स्यन्त्स्यन्त्स्यात्तत्सुहितं क॑र्तवे ब्रूया- दे॒वमे॒तदिति॒ वद॑न्तस्तदु तथा न कुर्याद्यद्य॒ऽअस्य ब्राह्मणाः कुले वसन्त्यृ॒त्विजश्चा- नू॒त्विज॑श्च तेनैव तं काममाप्नोति तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥४॥ तस्य सर्पिरासिचनं कृ- त्वा॒ । सर्पिरासिच्या॒न्त्येति॑स्तिस्रः समिधो घृतेनान्वज्य समिद्धतीभिर्घृतवतीभिर्ऋग्भि- रभ्यादधति शमीगर्भमेतदारुंम इति वद॒न्तः स यः पुरस्तात्संवत्सरमभ्यादध्यात्स ह॒ तं काममाप्नुयात्तस्मादु तन्नाद्रियेत ॥५॥ तदु होवाच भाल्लवेयः । यथा वाऽअन्य- त्करिष्यन्त्सोऽन्यत्कुर्याद्यथान्यद्विद्यित्सोऽन्यद्वे॒द्ये॒थान्येन प॑थे॒ष्यन्त्सोऽन्येन प्रति- पद्येतेवं तद्य॒ एतं॑ चातुष्प्राश्यमोदनं पचेदुपराद्धिरेव सेति न हि तद्वकल्पते य- स्मिन्न॒ग्नावा॒ग्न्या वा साम्ना वा यजुषा वा समिधं वाभ्यादध्यादाहुतिं वा जुहुयाद्यत्तुं दक्षिणा वा कु॒रेयुरनु वा गमयेयुर्दक्षिणा वा ह्येतत् हरन्त्यन्वाहार्यपचनो भवि- ष्यतीत्यनु वा गमयन्ति ॥६॥ अथ जाग्रति जाग्रति देवाः । तद्देवानेवैतदुपार्वर्त- ते स स॑देवत॒रः श्वास्तनस्तपस्वितरोऽग्नीऽआधत्ते तद्यद्यपि काममिव स्वप्यानो ह्य॒- नाहिताग्नेर्व्रतचर्यास्ति मानुषो ह्ये॑वैष तावद्भवति यावदनाहिताग्निस्तस्माद्यद्यपि का- ममेव स्वप्यात् ॥७॥ तद्धैकेऽनुदिते मथित्वा । तमुदिते प्राञ्चमुद्धरन्ति तदु तदुभे ऽअहोरात्रे परिगृह्णीमः प्रा॒णोदा॒नयोर्मन॑सश्च वाचश्च प॒र्याप्त्या॒ऽइति॒ वद॑न्तस्तदु त- था न कुर्यादु॒भौ हैवास्य तथाऽनुदितऽआहितौ भवतोग्नुदिते हि मथित्वा तमु-

का० २, अ० १, ब्रा० ४, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २०३ (उपवसन्ति)। इसलिए इस दिन को उपवसथ (उपवास) कहते हैं ॥१॥ यह अनुचित है कि ठहरे हुए मनुष्यों के भोजन करने से पूर्व वह भोजन कर ले। इससे भी अधिक अनुचित यह है कि ठहरे हुए देवों के भोजन करने से पूर्व भोजन कर ले। इसलिए उस दिन, दिन में ही भोजन करना चाहिए। परन्तु यदि इच्छा हो तो रात में भी भोजन कर सकता है। क्योंकि अभी अग्न्याधान नहीं किया, इसलिए व्रत-चारी तो है नहीं। जब तक अग्न्याधान नहीं करता उस समय तक मनुष्य रहता है। इसलिए इच्छा हो तो रात में भी भोजन कर ले ॥२॥ कुछ लोग बकरे को बांध लेते हैं। बकरा अग्नि का है, और यह काम अग्नि के सर्वस्व अर्थात् पूर्ति के लिए किया जाता है। परन्तु उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। जिसके पास बकरा हो वह प्रातःकाल अग्नीध्र (आग्नीध्र) को दे दे, उसी से काम चल जायगा। इसलिए इस प्रथा का आदर न करे ॥३॥ अब वह चार मनुष्यों के योग्य ओदन (चातुष्प्राश्य भात) पकाते हैं (और कहते हैं कि) 'हम इसके द्वारा छन्दों को प्रसन्न करते हैं।' जैसे जिस वाहन (बैलों की जोड़ी) को जोतना चाहें उनको पहले से अच्छी प्रकार खिलाने-पिलाने की आज्ञा देते हैं। परन्तु उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। चूंकि ब्राह्मण उसी के कुल में रहते हैं, चाहे वे ऋत्विज हों, चाहे ऋत्विज न हों, इसलिए इसी से उसका काम निकल जाता है। इसलिए इस (प्रथा) का आदर नहीं करना चाहिए ॥४॥ उस (भात) में घी के लिए गड्ढा करके उसमें घी छोड़कर अश्वत्थ की तीन समिधायें घी में भिगोकर 'समिधा' और 'घी' वाली तीन ऋचाओं* से उनको अग्नि पर रख देते हैं, यह कहकर कि शमीगर्भ (शमी वृक्ष के भीतर उत्पन्न हुए अश्वत्थ की लकड़ियों से अग्नि निकाली जाती है) का फल इसी से मिल जाता है। परन्तु उसको यह फल तभी मिलता है जब वह निरन्तर सालभर तक अग्न्याधान से पहले ये तीन आहुतियाँ देता रहे। इसलिए इस प्रथा का आदर नहीं करना चाहिए। [अर्थात् जो फल शमीगर्भ में उत्पन्न हुई समिधाओं से होता है वह अश्वत्थ की तीन समिधाओं को भात में भरे हुए घी में भिगोकर चढ़ाने से होता है। परन्तु याज्ञवल्क्य इसको केवल एक अंश में मानते हैं] ॥५॥ इस पर भाल्लवेय का कहना है कि 'चातुष्प्राश्य' भात पकाना उसी प्रकार अनुचित है जैसे कोई एक कार्य की इच्छा करे और करे दूसरा, या एक बात कहना चाहे और कहे दूसरी, या एक मार्ग से जाना चाहे और जाये दूसरे से। यह ठीक नहीं है कि जिस अग्नि में ऋक्, यजु या साम से आहुति चढ़ावें उसी अग्नि को या तो दक्षिण में ले जाये या बुझा दे। परन्तु अन्वाहार्य- पचन (भात पकाने) के लिए या तो यह इस भाग को दक्षिण को ले जाते हैं या बुझा देते हैं। (इसलिए यह कार्य अनुचित है) ॥६॥ अब वह जागरण करता है। देव जागते रहते हैं। इसलिए वह इस प्रकार देवों के निकट हो जाता है और अधिक देवता बनकर, श्रान्त बनकर और तपस्वी होकर अग्न्याधान करता है। परन्तु यदि उसकी इच्छा हो तो सो भी रहे, क्योंकि अग्न्याधान करने से पहले तो व्रतचारी होता नहीं। जब तक अग्न्याधान नहीं किया तब तक वह साधारण मनुष्य है और इच्छा के अनुसार सो सकता है ॥७॥ कुछ लोग सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथकर सूर्योदय के पश्चात् पूर्व की ओर (गार्हपत्य से आहवनीय की ओर) ले जाते हैं जिससे रात और दिन दोनों का काम निकल आवे तथा प्राण उदान और मन वाणी का भी। परन्तु उसको ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब सूर्योदय के

  • समिधा और घी वाली तीन ऋचाएँ यह हैं-- १. समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्। आस्मिन् हव्या जुहोतन ॥ २. सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन। अग्नये जातवेदसे ॥ ३. तं त्वा समिद्भिरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य ॥ —यजु० ३१, २, ३

२०४ शतपथ ब्राह्मण

दिते प्राञ्च॒मुद्ध॑रति स य उ॒दित॑ऽआहव॒नीयं॒ मन्ये॑त्स ह॒ तत्पूर्या॒न्नुया॑त् ॥ ८॥ अ- र्ह॒र्वे दे॒वाः । अन॑पहतपाप्मानः पितरो न पाप्मान॑मप॒हते॒ मर्त्याः पितरः पुरा ह्यायु॑षो म्रियते योऽनु॑दिते मन्य॑त्यपहृतपाप्मानो देवा अप पाप्मानं॑ ह॒तेऽमृ॑ता दे॒वा नामृ॑तत्वस्या॒शास्ति॒ सर्व॒मायु॑रेति॒ श्रीर्देवाः श्रियं गच्छति॒ यशो॑ दे॒वा यशो॑ ह भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वानु॑दिते मन्य॑ति ॥ ९॥ तदाहुः । यन्न॒ऽऋचा न साम्ना॑ न यजु॑षा- ऽग्नि॒राधीय॑तेऽथ॒ केना॑धीयत॒ऽइति॒ ब्रह्म॑णो ह्यै॒वैष ब्रह्म॑णाधीयते॒ वाग्वै ब्रह्म॒ तस्यै॑ वाचः स॒त्यमे॒व ब्रह्म॑ ता वा॒ऽएताः स॒त्यमे॒व व्याहृतयो भव॑न्ति॒ तद॒स्य स॒त्येनै- वाधीयते ॥ १०॥ भूरिति॒ वै प्र॒जाप॑तिः । इ॒माम॑जनयत॒ भुव॒ इत्य॒न्तरि॑क्षं॒ स्वरिति॑ दि॒वमे॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑दि॒मे लो॒काः सर्वे॑णैवाधीयते ॥ ११॥ भूरिति॒ वै प्र- जाप॑तिः । ब्रह्म॑ाजनयत॒ भुव॒ इति॑ क्ष॒त्रं॒ स्वरिति॒ विश॑मे॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑- द्ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं विट् सर्वे॑णैवाधीयते ॥ १२॥ भूरिति॒ वै प्र॒जाप॑तिः । आ॒त्मान॑मजनयत भुव॒ इति॑ प्र॒जां॒ स्वरिति॑ प॒शूनि॒ताव॒द्वाऽइ॒दं सर्वं॒ याव॑दा॒त्मा प्र॒जा प॒शवः॒ सर्वे॑- णैवाधीयते ॥ १३॥ स वै भूर्भुव॒ इति॑ । ए॒ताव॑तैव गार्हपत्य॒माद॑धात्यथ॒ यत्सर्वे॑- रादध्यात्केनाहवनीय॒माद॑ध्याद्वे॒ऽअन्त॑रे परिशि॒नष्टि॒ तेनो॑ऽए॒तान्य॑यातयामानि भ- व॑न्ति॒ तैः सर्वैः प॒ञ्चभि॑राहवनीय॒माद॑धाति॒ भूर्भुवः॒ स्वरिति॒ तान्य॒ष्टाव॒क्षरा॑णि स॒- म्पद्य॑न्ते॒ऽष्टाक्ष॑रा वै गाय॒त्री गाय॒त्रम॑ग्नेश्छन्दः॒ स्वेनै॒वैन॑मेतच्छन्द॑साधत्ते ॥ १४॥ दे- वान्हु वाऽअ॒ग्नीऽआधास्य॑मानान् । तानसु॒ररक्ष॑सानि ररन्धु॒र्नाग्नीर्निर्मिनिष्यते॒ नाग्नी आधास्य॒ध्वेऽइति तद्य॒दर॑क्षंस्तस्माद्रक्षांसि ॥ १५॥ ततो दे॒वा ए॒तं वज्रं॑ ददृशुः । यदृक्षं॒ तं पु॒रस्ता॑दुदञ्च॒मुदय॑स्तस्याभयेऽना॒ष्ट्रे नि॒वाते॑ऽग्नि॒रद्यायत॒ तस्माद्य॒त्राग्निं मन्थि- ष्या॑न्त्स्यात्तदृक्ष्य॑मनिवर्ते ब्रूयात्स पूर्वे॑णोप॒तिष्ठ॑ते व॒ज्रमे॒वैतदु॒द्धूय॑ति तस्या॑भयेऽना॒ष्ट्रे नि॒वाते॑ऽग्नि॒र्नाधीयते ॥ १६॥ स वै पूर्ववा॒ट् स्यात् । स ह्य॑परिमितं वी॒र्य॑मभिवर्धते यदि पूर्ववाहं न विन्देदपि य एव कश्चाश्वः स्याद्यद्यश्वं न विन्देदप्यनड्वानेव

कां० २, अ० १, ब्रा० ४, क० ८-१७ शतपथब्राह्मण / २०५ पश्चात् पूर्व की ओर ले जाते हैं तो दोनों अग्नियां सूर्योदय के पूर्व की ही हो जाती हैं। सूर्योदय के पश्चात् आहवनीय को मथने से भी यही कार्य निकल सकता है ॥८॥ देव दिन हैं। पितर पाप-शून्य नहीं हैं, (अर्थात्) सूर्य ने पितरों के पाप छुटाये नहीं; इसलिए जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है वह पापों से मुक्त नहीं होता। और पितर अमर नहीं हैं इसलिए वह जो सूर्योदय से पूर्व अग्नि को मथता है, पूर्ण आयु से पूर्व मर जाता है। जो पुरुष इस रहस्य को समझकर सूर्योदय के पश्चात् अग्नि को मथता है, वह पापों से छूट जाता है क्योंकि देव पापों से मुक्त हैं। और यद्यपि अमर नहीं होता तो भी पूर्ण आयु को अवश्य प्राप्त होता है क्योंकि देव अमर हैं। श्री को प्राप्त होता है क्योंकि देव श्री हैं। यश को प्राप्त होता है क्योंकि देव यश हैं ॥९॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यदि ऋक्, साम और यजुः से अग्न्याधान न किया जाय तो किससे किया जाये ? (इसका उत्तर यह है कि) यह अग्नि ब्रह्म की है इसलिए ब्रह्म से ही इसका आधान होना चाहिए। वाणी ब्रह्म है। उसी वाणी का यह (अग्नि) है। ब्रह्म सत्य है और इन व्याहृतियों में सत्य है। इसलिए सत्य के द्वारा इसका आधान होता है ॥१०॥ प्रजापति ने 'भू' से इस (पृथिवी) को उत्पन्न किया, 'भुवः' से अन्तरिक्ष को और 'स्वः' से द्यौलोक को। ये जो तीन लोक हैं उतना ही जगत् है। इसलिए 'सब' से ही आधान किया जाता है ॥११॥ प्रजापति ने 'भू' से ब्राह्मण उत्पन्न किये, 'भुवः' से क्षत्रिय और 'स्वः' से वैश्य। ये जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं इतना ही सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान किया जाता है ॥१२॥ प्रजापति ने 'भू' से आत्मा को, 'भुवः' से प्रजा को और 'स्वः' से पशुओं को उत्पन्न किया। ये जो आत्मा, प्रजा और पशु हैं उतना ही यह सब जगत् है, इसलिए 'सब' से ही आधान किया जाता है ॥१३॥ वह 'भूर्भुवः' से गार्हपत्य अग्नि का आधान करता है। यदि सब (तीनों व्याहृतियों) से आधान करता तो आहवनीय का आधान किससे करता ? इसलिए दो अक्षर (स्वः) छोड़ देता है। इससे (शेष तीन अक्षर) अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं। इन पाँचों अक्षरों से अर्थात् 'भूर्भुवः स्वः' से आहवनीय का आधान करता है। इस प्रकार आठ अक्षर हो जाते हैं। गायत्री में भी आठ अक्षर होते हैं। गायत्री अग्नि का छन्द है। इस प्रकार वह (अग्नि का) आधान (अग्नि के ही) छन्द से करता है ॥१४॥ देवों ने अग्नियों का आधान करना चाहा। असुर और राक्षसों ने उनको रोका (और कहा कि) 'अग्नि उत्पन्न न होगी', 'अग्नि का आधान मत करो।' चूंकि उन्होंने रोका (अरक्षन्) इसलिए 'रक्ष' धातु से उनका नाम राक्षस पड़ा ॥१५॥ तब देवों ने इस वज्र अर्थात् 'अश्व' को देखा। उन्होंने उसको सामने खड़ा कर लिया और उसके भयरहित, शत्रुरहित संरक्षण में अग्नि को उत्पन्न किया। इसलिए जहाँ अग्नि को मथना हो वहाँ अश्व को ले जाओ, ऐसा (अध्वर्यु अग्नीध्र को) बोले। वह सामने खड़ा होता है, वज्र को उठाता है और उसके भयरहित और शत्रु-शून्य संरक्षण में अग्नि उत्पन्न होती है ॥१६॥ इसको पूर्ववाट् (पूर्व को चलनेवाला या शायद अगुआ या युवा घोड़ा) होना चाहिए, क्योंकि इसमें अपरिमित वीर्य होता है। यदि पूर्ववाट् अश्व न मिले तो जैसा अश्व मिले वही सही। यदि अश्व न मिले तो अनड्‌वान (बैल) ही ले ले, क्योंकि यह (अग्नि) बैल का बन्धु