शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-५, ब्राह्मण-७
जनयति॒ तं कृ॑त्स्नं य॒ज्ञं ज॑नयित्वा॒ तमा॒त्मन्ध॑त्ते॒ तमा॒त्मन्कु॑रुते ॥ ५ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ७ [५. ६.] ॥ ता वा॒ऽएताः॑ । चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ प्राय॑श्चित्तयो॒ नामै॑ष वै प्र॒जाप॑- ति॒र्य॒ ए॒ष य॒ज्ञस्ता॑यते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ऋ॒त्व्वे॒वाप्ये॑त॒र्ह्यनु प्र॒जाय॑न्ते ॥ १ ॥ अ॒ष्टौ वस॑वः । एकादश रु॒द्रा द्वाद॑शादित्या इ॒मेऽए॒व द्यावा॑पृथि॒वी त्रय॑स्त्रिंशौ त्रय॑स्त्रिंशद्वै दे॒वाः प्र॒जाप॑तिश्चतुस्त्रिं॒शस्तदे॑नं प्र॒जाप॑तिं करोत्ये॒तद्वाऽअ॒स्त्ये॒तदमृ॑- तं॒ यद्ध॒मृतं॒ तद्ध्यस्त्ये॒तद् तद्यन्मर्त्य॑ꣳ स ए॒ष प्र॒जाप॑तिः सर्वं॒ वै प्र॒जाप॑तिस्त॒द्देनं॑ प्र॒जाप॑तिं करोति तस्मा॑देताश्चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ प्राय॑श्चित्तयो॒ नाम॑ ॥ २ ॥ ता हैके॑ । य॒ज्ञत॒न्व इत्या॑चक्षते य॒ज्ञस्य ह्वेवैतानि॒ पर्वा॑णि स ए॒ष य॒ज्ञस्ता॑य- मान ए॒ता ए॒व दे॒वता भव॒न्नेति॑ ॥ ३ ॥ सा यदि॑ घ॒र्मधु॑ग्दुह्लेत् । अ॒न्यामु॒पसं॑- क्रामेयुः स यस्या॑मे॒वैनं॒ वेला॑यां पु॒रा पि॑न्व॒यन्ति॒ तद्दैवैनामुदीचीꣳ स्थापयेदग्रे॑ण वा शालां॒ प्राची॑म् ॥ ४ ॥ तयो॑ऽर॒त्नेऽअभितः॑ । पुरुषा॒ण्डꣳ शि॒खण्डा॒स्ये॑ऽउह्य॑ते तयो॒र्यद्द॑क्षि॒णं तस्मि॑न्नेताश्चतु॑स्त्रिंशतमाहु॒तीर्जुहुया॒द्येता॒वान्वै सर्वो॑ य॒ज्ञो या- वत्य ए॒ताश्चतु॑स्त्रिंशद्व्याहृ॑तयो भवन्ति॒ तद॒स्यां कृ॑त्स्न॒मेव सर्वं॑ य॒ज्ञं द॑धात्येषा ह्या- तो घ॒र्मं पिन्वत॒ऽऋषो तत्र॒ प्राय॑श्चित्तिः क्रियते ॥ ५ ॥ अथ यद्य॒ज्ञस्य॒ दुह्ले॑त् । त- त्समन्वीक्ष्य॑ जुहुयाद्दी॒क्षोप॒सत्स्वा॑हव॒नीये॒ प्रसूत॒ऽआ॑ग्नी॒ध्रे वि वाऽए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ पर्व॑ स्रꣳसते॒ यद्दुह्लति॒ सा यैव तर्हि॒ तत्र दे॒वता भव॑ति तयै॒वैतद्भिषज्य॑ति॒ तया॒ संद॑- धाति ॥ ६॥ अथ यदि॑ स्कन्दे॒त् । तद॒द्भिरुप॒निन॑येद॒द्भिर्वाऽइ॒दꣳ सर्व॒माप्तꣳ सर्व॑स्यैवा- प्त्यै वै॒ष्ण॒ववारु॒ण्यऽर्चा यद्वाऽइ॒दं किं चार्च्छ॑ति वरु॑ण ए॒वेदꣳ सर्व॒मर्प॑यति॒ द्यौरो॑- जसा स्कभिता रोच॑ना॒ दिवि वी॒र्ये॑भिर्वि॒रित॒मा शवि॑ष्ठा । या पत्ये॑ते॒ऽअप्र॑तीता॒ सहो॑- भिर्विष्णू॒ऽअगन्वरुणा पूर्व॒हूतौविति॑ य॒ज्ञो वै विष्णु॑स्तस्यैतदार्च्छ॒ति वरु॑णो वाऽआ- र्पयिता तद्य॒स्या॑श्चैवैतद्दे॒वता॑या आर्च्छ॒ति या च दे॒वताऽर्प॑यति ताभ्या॑मे॒वैतदु॒भाभ्यां
कां० ४, अ० ५, ब्रा० ६-७, क० ५ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६४७ को उत्पन्न करता है और सब यज्ञ को उत्पन्न करके वह उसको अपने में धारण करता है। वह उसको अपना बना लेता है ॥५॥ सोमप्रायश्चित्तानि अध्याय ५—ब्राह्मण ७ चौंतीस व्याहृतियां होती हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते हैं। यह जो यज्ञ किया जाता है वही प्रजापति है जिससे ये प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं और जिससे अब तक ये प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं ॥१॥ आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य और ये दो द्यौ तथा पृथिवी—ये हुए तैंतीस। प्रजापति है चौंतीसवाँ। यह (यजमान को) प्रजापति कर देता है। यह जो है वह अमृत है; जो अमृत है वह यह है। जो मर्त्य है वह भी प्रजापति है, क्योंकि प्रजापति सब-कुछ है। इस प्रकार वह इसको प्रजापति बनाता है। इस प्रकार ये चौंतीस व्याहृतियाँ हैं जिनको प्रायश्चित्ति कहते हैं ॥२॥ कुछ इनको 'यज्ञ का तनु' कहते हैं। ये यज्ञ के ही पर्व हैं। यह यज्ञ जब किया जाता है तो वह इन देवताओं का रूप धारण करता जाता है ॥३॥ यदि वह घर्मदुघा दूध न दें (वह गाय जिसके दूध को औटा कर घर्म बनाया जाता है घर्मदुघा कहलाती है) तो दूसरी को लेवें। और जिस स्थान पर उसको दुहते, उसी स्थान पर उसको खड़ा करें, उत्तराभिमुख या शाला की ओर मुख करके ॥४॥ और जो पूँछ की डण्डी के दोनों ओर जो शिखण्ड या निकली हुई हड्डियाँ हैं उनमें जो दाहिनी है, उसी पर वह चौंतीस आहुतियाँ देता है। ये सब यज्ञ ही तो हैं ये जो चौंतीस आहुतियाँ हैं। इस प्रकार वह उस सम्पूर्ण यज्ञ को उसमें स्थापित कर देता है। क्योंकि वहीं से घर्म निकलता है; यही उसका प्रायश्चित्त है ॥५॥ अब यज्ञ का जो भाग सफल न हो उसी के उद्देश्य से आहुति दे—उपसदों में और आहवनीय में, दीक्षा यज्ञ में, तथा सोम यज्ञ में, अग्नीध्र में। क्योंकि यज्ञ के जिस भाग में सफलता न हो वही टूटा हुआ समझो। और जो उसका देवता है उसी के द्वारा वह सम्पूर्ण होता है ॥६॥ यदि कुछ गिर जाय तो उस पर पानी डाल दे, क्योंकि वे सब जलों से ही व्याप्त हैं— सबकी प्राप्ति के लिए, विष्णु और वरुण की ऋचा पढ़कर। यहाँ जो कुछ कष्ट मनुष्य को होता है वह सब वरुण देवता के ही द्वारा होता है। "ययोरोजसा स्कभिता रजाꣳसि वीर्येभिर्वीरतमा शविष्ठा। य पत्येते ऽ अप्रतीता सहोभिर्विष्णु ऽ अगन्वरुणा पूर्वहूती" (यजु० ८।५६, अथर्व ७।२५।१)—"जिन दोनों के ओज से ये लोक ठहरे हुए हैं जो पराक्रमों के द्वारा सबसे वीर और उत्तम हैं; जो अपूर्व शक्ति से युक्त हैं। इन बुलाये हुए विष्णु और वरुण के पास (यह यज्ञ) गया है।" यज्ञ विष्णु है। यह यज्ञ ही कष्ट में है। वरुण ने कष्ट दिया है। जिस देवता की हानि होती है और जिस देवता के द्वारा हानि होती है उन दोनों के द्वारा उसका उपचार करता है।
अध्याय-५, ब्राह्मण-८
भि॒षज्य॒त्याभ्या॑ꣳ संद॑धाति ॥७॥ अथो॑ऽअ॒भ्येव॑ मृ॒शेत् । देवा॒न्दिव॑मगन्म॒ज्ञस्ततो॑ मा द्रवि॑णमष्टु मनु॒ष्यान॒न्तरि॑क्षमगन्म॒ज्ञस्ततो॑ मा द्रवि॑णमष्टु पि॒तॄन्पृ॑थि॒वीमग॑न्म- ज्ञस्ततो॑ मा द्रवि॑णमष्टु यं कं च लो॒कमग॑न्म॒ज्ञस्ततो॑ मे भ॒द्रम॑भूदि॒त्येवैतदा॑ह ॥८॥ तद् स्मैतदा॑रु॒णिरा॑ह । किं स य॒ज्ञेत॒ यो य॒ज्ञस्य॒ व्यृ॑द्धा पापी॑यान्म॒न्येत॒ यज्ञ॑स्य वाऽऋ॒द्धं व्यृ॑द्धा श्रेयान्भवा॒मीत्ये॒तद्व स्म स त॒दभ्या॑ह॒ यदे॒ता आ॒शिष॒ उप॑गृह्णाति ॥ १ ॥ ब्राह्मणम् ॥ ८ [५. ७.] ॥ ॥ तद्य॒त्रैतत्त्रि॑रा॒त्रे स॒हस्रं॑ ददा॑ति । तदे॒षा सा॒हस्री क्रियते॒ स प्रथ॒मेऽह॑ꣳस्त्री॒णि च शता॑नि नयति त्रय॑स्त्रिꣳशतं चैवमे॒व द्विती॒येऽह॑ꣳस्त्री॒णि चैव शता॑नि नयति त्र॒- यस्त्रिꣳशतं चैवमे॒व तृती॒येऽह॑ꣳस्त्री॒णि चैव शता॑नि नयति त्रय॑स्त्रिꣳशतं चयै॒षा सा॒हस्र्य॑ति॒रिच्य॑ते ॥१॥ सा वै त्रिरू॑पा स्यादित्याहुः । ए॒तद्द्यास्यै॑ रू॒पतम॑मि॒वेति॑ रो॒हिणी॑ तु॒ त्वे॒वोप॑धस्ता स्यादे॒तद्द्वैवा॒स्यै रूप॑तममिव ॥२॥ सा स्यादप्रवीता । वाग्वाऽए॒षा निदा॑नेन यत्साहस्र्य्यातायाम्नी वाग्ध्यं वाग्यातायाम्न्यप्रवीता त- स्मादप्रवीता स्यात् ॥३॥ तां प्रथ॒मेऽह॑न्नयेत् । वाग्वाऽए॒षा निदा॑नेन यत्सा॒हस्री॑ तस्या ए॒तत्सहस्रं वाचः प्रजा॑तं पूर्व्वा॒ ह्येषैति॑ पश्चादेनां प्रजा॒तमन्वे॒त्युत्त॑मे वैनाम्- अह॑न्नयेत्पूर्व्वम॒ह्लास्यै प्रजा॑तमेति पश्चादेषान्त्वेति॒ सोऽए॒षा मीमा॒ꣳसोत्त॑मऽए॒वैना- मह॑न्नयेत्पूर्व्वम॒ह्लास्यै प्रजा॑तमेति पश्चादेषान्त्वेति ॥४॥ तामुत्त॑रेण ह॒विर्द्धाने । द- क्षिणे॒नाग्नीध्रं॒ द्रोण॑कलशमव॒घ्राप॑यति य॒ज्ञो वै द्रोणकलशो य॒ज्ञमे॒वैनामे॒तद्दर्श॑य- ति ॥५॥ आ॒जिघ्र॑ कलश॒म् । मह्या त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑व॒ इति॑ रिचिचा॒न इ॑व वा ऽए॒ष भ॑वति यः स॒हस्रं॑ ददा॑ति तमे॒वैतद्रिरिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॒हाजि॑घ्र क- ल॒शं म॒ह्या त्वा विश॒न्त्विन्द॑व॒ इति॑ ॥६॥ पुन॒रूर्जा निवर्त्त॑स्वेति । तद्वै॒व रि॑रि- चा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ पुन॒रूर्जा निवर्त्त॑स्वेति ॥७॥ सा नः॑ स॒हस्रं॑ धु॒क्ष्वेति॑ । त॒त्स॒हस्रे॑ण रिचिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ सा नः॑ स॒हस्रं॑ धु॒क्ष्वेति॑ ॥८॥ ऊर्-
का० ४, अ० ५, ब्रा० ७-८, कं० ७-६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ६४६ उसी के द्वारा वह इसको संयुक्त करता है ॥७॥ इस मन्त्र से स्पर्श करे—"दे॒वान् दि॒वम॑गन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु मनु॒ष्यान॒न्तरि॑क्ष- मगन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु पि॒तॄन् पृ॑थि॒वीमग॑न् यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु यं कं च॑ लो॒कमग॑न् यज्ञस्ततो॒ मे भ॒द्रम॑भूत्" (यजु० ८।६०)—"यज्ञ देवों के पास द्यौलोक को गया। वहाँ से मुझे धन मिले। यज्ञ मनुष्य के पास अन्तरिक्ष में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। यज्ञ पितरों के पास पृथिवी में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। जिस किसी लोक में यज्ञ गया वहीं मेरा कल्याण हो।" इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ जहाँ कहीं जाय, वहीं मेरा कल्याण हो ॥८॥ इस पर आरुणि ने कहा था कि 'वह क्यों यज्ञ करे जो यज्ञ की त्रुटि पर अपने को पापी समझे। मैं तो यज्ञ की त्रुटि द्वारा अच्छा होता हूँ।' यह बात उसने आशीर्वाद को ध्यान में रखते हुए कही थी ॥६॥ सहस्र-दक्षिणा अध्याय ५—ब्राह्मण ८ जब वह उस त्रिरात्र यज्ञ में सहस्र गायें देता है तो गायें सहस्री होती हैं। पहले दिन तीन सौ तैंतीस गायें लाता है। इसी प्रकार दूसरे दिन तीन सौ तैंतीस लाता है। तीसरे दिन भी तीन सौ तैंतीस लाता है। अब हजारवीं रह गई ॥१॥ कुछ लोग कहते हैं कि वह तीन रंग की हो, क्योंकि यही इसका सबसे अच्छा रूप है। परन्तु वह रोहिणी (लाल) और उपध्वस्त (धब्बेदार) हो, यही उसका सबसे अच्छा रूप है ॥२॥ वह अप्रवीत (अक्षत योनि) होनी चाहिए। यह जो साहस्त्री है वह वस्तुतः वाणा है। यह वाणी आतयाम्नी (पूर्ण शक्तिवाली) है। जो अक्षतयोनि है वह पूर्ण शक्तिवाली है। इसलिए इसको अप्रवीत होना चाहिए ॥३॥ उसको पहले दिन ही ले आवे, क्योंकि यह साहस्त्री वस्तुतः वाणी है। यह जो सहस्र सन्तान (प्रजात) है वह इसी वाणी की है। वह आगे-आगे चलती है और उसकी सन्तति पीछे-पीछे। या अन्तिम दिवस लावे। उस दिन आगे-आगे उसकी सन्तति चले और पीछे-पीछे वह। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। उसको अन्तिम दिवस ही लाना चाहिए और आगे-आगे उसकी सन्तति हो और वह पीछे ॥४॥ हविर्धान के उत्तम और आग्नीध्र के दक्षिण को वह द्रोण कलश को सुंघवाता है। द्रोण- कलश यज्ञ है। इस प्रकार वह उसको यज्ञ के दर्शन कराता है—॥५॥ इस मन्त्र से—"आ जि॒घ्र क॒लश॑म् । म॒हा त्वा॑ वि॒शन्त्विन्द॑वः" (यजु० ८।४२)—"कलश को सूंघ। इस तुझ महान् में सोम की बूँदें प्रवेश करें।" यह जो एक हजार गायें दान करता है वह खाली-सा हो जाता है। इसी खाली को फिर भरता है। जब वह कहता है कि 'हे बड़ी गाय! कलश को सूंघ, जिससे ये सोम की बूँदें तुझमें प्रवेश करें' ॥६॥ "पुन॒रूर्जा नि व॑र्त्तस्व" (यजु० ८।४२)—"ऊर्ज के साथ फिर आ।" ऐसा कहने से वह मानो खाली चीज को भरता है ॥७॥ "सा नः॑ स॒हस्रं॑ धुक्ष्व" (यजु० ८।४२)—"हजार गुना हमारे लिए दूध दे।" ऐसा कहने से मानो वह खाली को भरता है ॥८॥
धारा॒ पय॑स्वती॒ पुन॒र्मावि॑शताद्र॒यिरिति॑ । तद्दे॒व रि॑रिचा॒नं पुन॒राप्या॑ययति॒ यदा॑ह॒ पुन॒र्मावि॑शताद्र॒यिरिति॑ ॥ ९॥ अथ द॒क्षिणे कर्णेऽआ॒जप॑ति । इडे॒ रन्ते॒ रव्ये॒ काम्ये॒ च॒न्द्रे ज्योति॑ऽअदिते॒ सर॑स्वति॒ महि॑ वि॒श्रुति॑ । ए॒ता ते॑ऽअघ्न्ये॒ नामा॑नि दे॒वेभ्यो॑ मा सु॒कृतं॑ ब्रूता॒दिति॒ वोचे॒रिति॒ वैतानि॒ ह वा॒ऽअघ्न्यै॑ देव॒त्रा नामा॑नि॒ ता यानि॒ तै देव॒त्रा नामा॑नि॒ तैरै॑नां दे॒वेभ्यः॑ सु॒कृतं॑ ब्रूता॒दित्ये॒वैतदा॑ह ॥ १०॥ तामन्वार॑भते । सा यद्यु॑पुरु॒षाभि॑वीता प्राची॑या॒त्तन्न वि॑द्याद॒रात्सीद॒यं यज॑मानः कल्या॒णं लो॒कम॑जेषी- दिति॒ यद्युदी॑चीया॒च्छ्रेया॒नस्मिँल्लो॒के यज॑मानो भवि॒ष्यती॑ति वि॑द्या॒द्यदि॑ प्र॒तीची॑या- द्द्विष्य॑तिल्ब्वल-इव धा॒न्य॑तिल्ब्वलो भवि॒ष्यती॑ति वि॑द्या॒द्यदि॑ द॒क्षिणे॑यात्क्षि॒प्रे ऽस्मा॒ल्लोका॒द्यज॑मानः प्रे॒ष्यती॑ति वि॑द्यादे॒तानि विज्ञाना॑नि ॥ ११॥ तस्या एतास्ति॒- स्रस्तिस्रस्त्रि॒ंशत्य॑धि भवन्ति । तास्वे॒तामुप॑समाकुर्व्वन्ति॒ वि वा॒ऽए॒तां वि॒राजं॑ वृश्च- न्ति यां व्याकुर्व्वन्ति॒ विच्छि॑न्नो॒ऽए॒षा वि॒राज्ञा विवृ॑क्ता दशाक्षरा॒ वै वि॒राट्त्कृ॒त्स्नां॑ वि॒राजं॒ संद॑धाति॒ ताꣳ होत्रे॑ दद्याद्धोता॒ हि सार्द्धम॒स्तस्मा॒त्ताꣳ होत्रे॑ दद्यात् ॥ १२॥ द्वौ वोन्नेता॒रौ कुर्वीत॑ । तयो॒र्यत॑रो ना॒न्नाव॑ये॒त्तस्मा॑ऽए॒नां दद्या॑द्वृ॒द्धो वा ऽए॒ष उन्ने॒ता य ऽऋक्सन्नान्नाव॑यति॒ वृद्धो॒ऽए॒षा वि॒राज्ञा विवृ॑क्ता तद्वृ॒द्धऽए॒वै- तद्वृ॒द्धं द॑धाति ॥ १३॥ तदा॑हुः । न स॒हस्रे॒ऽधि किं चन दद्यात्सङ्कलेण ह्येव स॒- र्व्वान्कामाना॒प्नोती॑ति॒ तदु॒ होवा॑चासुरिः काम॒मेव॑ दद्यात्सङ्कलेनाह॒ सर्व्वान्कामा- ना॒प्नोति का॒मिनो॒ऽअस्येतर॒द्दत्तं॑ भवती॑ति ॥ १४॥ अथ॒ यदि॒ रथं॑ वा यु॒क्तं दास्य- न्त्स्यात् । यद्वा॑ वशा॒यै वा वपा॒याꣳ हुतायां॑ दद्याद॒दव॑सानीयायां वेष्टौ ॥ १५॥ स वै द॑क्षिणा नयन् । अन्यूना दशतो नयेद्यस्माऽएकां दास्यन्त्स्याद्दशभ्यस्तेभ्यो दश- तमुपावर्तयेद्यस्मै द्वे दास्यन्त्स्यात्पञ्चभ्यस्तेभ्यो दशतमुपावर्तयेद्यस्मै तिस्रो दास्य- न्त्स्यात्त्रिभ्यस्तेभ्यो दशतमुपावर्तयेद्यस्मै पञ्च दास्यन्त्स्याद्द्वाभ्यां ताभ्यां दशतमुपा- वर्त्तयेदेवम् शतात्तथो हास्यैषान्यूना विराडुमुष्मिंल्लोके कामदुघा भवति ॥ १६॥
का० ४, अ० ५, ब्रा० ८, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण ६५१ “उरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः” (यजु० ८।४२)–“हे बड़ी धार वाली और दूधवाली ! मुझे फिर धन मिले।” ऐसा कहने से वह खाली को फिर भरता है ॥६॥ अब वह उसके दाहिने कान में जपता है–“इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योतिरदिते सर- स्वति महि विश्रुति । एता ते ऽअघ्न्ये१ नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्” (यजु० ८।४३)–“हे गाय, तेरे इतने नाम हैं—इडा, रन्ता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, मही, विश्रुती। तू देवताओं से मेरे पुण्य को कह दे।” वस्तुतः देवों में इसके यही नाम हैं। इसका यही तात्पर्य है कि देवों में तेरे जो-जो नाम प्रचलित हैं उनके द्वारा मेरे पुण्य को देवलोक में पहुँचा दे ॥१०॥ उसको छोड़ देते हैं। यदि वह किसी पुरुष की प्रेरणा के बिना ही पूर्व की ओर चल दे तो समझना चाहिए कि यह यजमान सफल हो गया; उसने कल्याणलोक को जीत लिया। यदि उत्तर को जाय तो समझना चाहिए कि यजमान इस लोक में ही यशस्वी होगा। यदि पश्चिम की ओर जाय तो समझना चाहिए कि धन-धान्य आदि से पूर्ण होगा। यदि दक्षिण की ओर जाय तो समझना चाहिए कि यजमान शीघ्र ही इस लोक से चल बसेगा। ऐसी सूचनायें हैं ॥११॥ ये जो गायें तीस से तीन-तीन हजार ऊपर होती हैं, उनमें इसको मिला देते हैं। जब विराट् छन्द को लेते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं तो वह विच्छिन्न हो जाता है, अर्थात् उस विराट् छन्द के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। यह जो दश अक्षर का विराट् है वह पूरा-पूरा है। इस प्रकार दस अक्षर पूरा करने से विराट् छन्द पूरा हो जाता है। इस गाय को होता के अर्पण करना चाहिए। होता साहस्र (हजारवाँ) है, इसलिए इसको होता को देना चाहिए ॥१२॥ दो उन्नेताओं की नियुक्ति करनी चाहिए। इनमें से जो श्रौषट् न पढ़े उसी को इस गाय को दे। वह उन्नेता अपूर्ण है जो ऋत्विज् होता हुआ भी श्रौषट् नहीं पढ़ता। जिस विराट् छन्द का विश्लेषण कर दिया गया वह भी तो अपूर्ण है। इस प्रकार अपूर्ण में अपूर्ण को रखता है ॥१३॥ इस पर कुछ लोगों का कहना है कि हजार गायों से अधिक कुछ न देना चाहिए, क्योंकि हजार गायों का दान ही सब कामनाओं की पूर्ति कर देता है। परन्तु आसुरि का मत है कि जितनी इच्छा हो उतना देवे। अवश्य ही सहस्र गायों के दान से सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। परन्तु जो अधिक दिया जाय अपनी इच्छा से दिया जाय ॥१४॥ अब यदि घोड़े जुते हुए रथ को देना हो तो या तो उसकी वशा की वपा की आहुति के पश्चात् देना चाहिए या अन्तिम आहुति के पीछे ॥१५॥ जब दक्षिणा के लिए (गायें) लावे तो दस-दस करके लावे; कम न हों। यदि किसी को एक गाय देनी हों तो दस गायें दस को दे देवे। यदि किसी को दो-दो देनी हों तो पाँच को दे देवे। यदि तीन-तीन देनी हों तो दस गायों को तीन को दे देवें। यदि पाँच-पाँच देनी हों तो उन दस को दो को दे देवे। इस प्रकार सौ तक। इस प्रकार यह पूर्ण विराट् परलोक में उसके लिए कामधेनु हो जाती है ॥१६॥ १. मंत्र में गाय का 'अघ्न्या' नाम भी है, किन्तु मांसाहारियों ने व्याख्या में इसलिए छोड़ दिया है कि (उनके द्वारा प्रक्षिप्त) पशु-बलि के प्रसंग झूठे न पड़ जायें। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती
अध्याय-५, ब्राह्मण-९
६५२ शतपथ ब्राह्मण ब्राह्मणम् ॥१ [५.८.]॥ चतुर्थः प्रपाठकः॥ कण्डिकासंख्या १२५ ॥॥ तद्य॑त्रैतद्द्वादशा॒हेन॒ व्यू॑ढछन्दसा यज॑न्ते । तद्ब्र॒ह्मान्व्यू॑हति॒ व्यू॑हत उद्गा॒ता च॒ होता॑ च॒ छन्दा॒ग्ँसि॒ स ए॒ष प्र॒ज्ञात ए॒व पूर्व॒स्यहो भवति समू॑ढछन्दास्तैन्द्रवा- यवाग्रान्गृह्णाति ॥१॥ अथ चतुर्थे॒ऽह॒न्व्यू॑हति । ग्र॒हान्व्यू॑हति॒ छन्दा॒ग्ँसि॒ तदा॑ग्र- यणाग्रान्गृह्णाति प्राजापत्यं वाऽए॒तच्चतुर्थम॒हर्भवत्यात्मा वाऽआग्रयण आत्मा वै प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑दाग्रयणाग्रान्गृह्णाति ॥२॥ तं गृहीत्वा न सादयति । प्राणा वै ग्र- हा नेत्प्राणा॒न्मोह्या॒नीति॒ मो॒हये॒द्ध प्राणा॒न्यत्सा॒दये॒त्तं धा॒रय॑न्त ए॒वोपा॑सते॒ऽथ ग्र॒हान्गृ॑ह्णात्यथ यदा ग्र॒हान्गृ॑ह्णात्यथ यत्रैवैतस्य काल॒स्तदे॒नग्ं हिंकृत्य॑ सादयत्य- थैतत्प्रज्ञातमेव पञ्चममहर्भवति तदैन्द्रवायवाग्रान्गृह्णाति ॥३॥ अथ षष्ठे॒ऽह॒न्व्यू॑- हति । ग्र॒हान्व्यू॑हति॒ छन्दा॒ग्ँसि शु॒क्राग्रान्गृह्णात्यैन्द्रं वाऽए॒तत्ष॒ष्ठम॒हर्भवत्येष वै शुक्रो य एष तप॒त्येष उऽऐन्द्रस्तस्माच्छुक्राग्रान्गृह्णाति ॥४॥ तं गृहीत्वा न सादयति । प्राणा वै ग्रहा नेत्प्राणान्मोह्यानीति मोहयेद्ध प्राणान्यत्साद्येत्तं धा- रयन्त एवोपासतेऽथ ग्रहान्गृह्णात्यथ यदा ग्रहान्गृह्णात्यथ यत्रैवैतस्य कालस्तदे- नग्ं सादयति ॥५॥ अथ सप्तमेऽहन्व्यूहति । ग्रहान्व्यूहति छन्दाग्ँसि शुक्राग्रा- न्गृह्णाति बार्हतं वाऽएतत्सप्तममहर्भवत्येष वै शुक्रो य एष तपत्येष उऽएव बृहंस्तस्माच्छुक्राग्रान्गृह्णाति ॥६॥ तं गृहीत्वा न सादयति । प्राणा वै ग्रहा ने- त्प्राणान्मोह्यानीति मोहयेद्ध प्राणान्यत्साद्येत्तं धारयन्त एवोपासतेऽथ ग्रहान्गृ- ह्णात्यथ यदा ग्रहान्गृह्णात्यथ यत्रैवैतस्य कालस्तदेनग्ं सादयत्यथैतत्प्रज्ञातमेवाष्ट- मम॒हर्भव॑ति॒ तदैन्द्रवायवाग्रान्गृह्णाति ॥७॥ अथ नवमे॒ऽह॒न्व्यू॑हति । ग्र॒हान्व्यू॑- हति॒ छन्दा॒ग्ँसि॒ तदा॑ग्रयणाग्रान्गृह्णाति जागतं वाऽए॒तन्नवमम॒हर्भवत्यात्मा वा ऽआग्रयणः सर्वं वाऽइ॒दमात्मा जग॑त्तस्मादाग्रयणाग्रान्गृह्णाति ॥८॥ तं गृहीत्वा न॒ साद॑यति । प्राणा वै ग्रहा नेत्प्राणान्मोह्यानीति मोहयेद्ध प्राणान्यत्साद्येत्तं
का० ४, अ० ५, ब्रा० ६, क० १-६ शतपथब्राह्मण / ६५३ व्यूढ द्वादशाह धर्मः अध्याय ५—ब्राह्मण ६ जब द्वादशाह यज्ञ को (जो यज्ञ बारह दिन का हो वह द्वादशाह कहलाता है) व्यूढ छन्दों से करता है तो ग्रहों का क्रम बदल देता है (जिन छन्दों का क्रम बदल दिया जाय वे व्यूढ छन्द हैं)। उद्गाता और होता दोनों ही छन्दों के क्रमों को बदल देते हैं। पहले तो छन्दों के सामान्य क्रम से त्र्यह (तीन दिन का यज्ञ) होता है। इसमें वह ऐन्द्रवायव आदि ग्रहों को लेता है ॥१॥ चौथे दिन ग्रहों का क्रम बदल देता है। वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। इसमें वह आग्रयण आदि ग्रहों को लेता है। चौथा दिन प्रजापति का अपना है, और आग्रयण आत्मा है, प्रजापति आत्मा है। इसलिए आग्रयण से आरम्भ होनेवाले ग्रहों को लेता है ॥२॥ उस ग्रह को लेकर रखता नहीं। ये ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में कुछ विक्षोभ उत्पन्न हो जाय। यदि वह इसको रख देगा तो अवश्य ही प्राणों को विक्षुब्ध कर देगा। वे ग्रहों को लिये-लिये पास बैठे रहते हैं। अध्वर्यु दूसरे ग्रहों को लेता रहता है। जब वह ग्रहों को लेता है तो हर एक ग्रह की पारी आने पर वह हिङ्कार का उच्चारण करता है और ग्रह को रख देता है। अब साधारण पाँचवाँ दिन आता है। उस दिन ऐन्द्रवायव से आरम्भ होनेवाले ग्रह लिये जाते हैं ॥३॥ अब छठे दिन वह ग्रहों के क्रम को बदल देता है और वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन शुक्र से आरम्भ होनेवाले ग्रह लिये जाते हैं। यह जो छठा दिन है वह इन्द्र का अपना है। शुक्र वह है जो ऊपर तपता है (सूर्य) और वही इन्द्र है। इसलिए वह शुक्र से आरम्भ होनेवाले ग्रहों को लेता है ॥४॥ उसको लेकर रखता नहीं। ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ हो जाय। यदि रक्खेगा तो अवश्य ही प्राणों में विक्षोभ होगा। उसको लिये-लिये पास में बैठे रहते हैं। और अध्वर्यु दूसरे ग्रहों को लेता रहता है। इन ग्रहों के लेने में जब इनकी पारी आती है तो रख देता है ॥५॥ अब सातवें दिन वह ग्रहों के क्रम को बदल देता है, और वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन वह शुक्र ग्रह से आरम्भ करता है। यह सातवाँ दिन बृहस्पति का है। शुक्र वही है जो तपता है (सूर्य), और यह बृहत् अर्थात् बड़ा है। इसलिए शुक्र ग्रह से आरम्भ करता है ॥६॥ उसको लेकर रखता है। प्राण ग्रह हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ हो जाय। यदि रख देगा तो प्राणों में अवश्य विक्षोभ हो जायगा। उनको लिये-लिये पास बैठे रहते हैं। और अध्वर्यु दूसरे ग्रह निकालता रहता है। जब उसकी पारी आती है तो उसको रख देता है। आठवाँ दिन सामान्य होता है। उस दिन ऐन्द्रवायव ग्रह से आरम्भ करते हैं ॥७॥ अब नवें दिन वह ग्रहों के क्रम को बदलता है और वे लोग छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन आग्रयण ग्रह से आरम्भ करते हैं। यह नवाँ दिन जगती छन्द का होता है। आत्मा आग्रयण है। यह सब जगत् आत्मा है। इसलिए आग्रयण ग्रह से आरम्भ करते हैं ॥८॥ उसको लेकर रखता नहीं। ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ उत्पन्न हो
अध्याय-५, ब्राह्मण-१०
६५४ शतपथ ब्राह्मण
धार॒यन्त॑ ए॒वोपा॑सते॒ऽथ ग्र॒हान्गृ॑ह्णात्यथ॒ यदा॒ ग्र॒हान्गृ॒ह्णात्यथ॒ यत्रै॑वैतस्य कालस्त- देनग्ं हिंकृत्य॑ सादयति ॥ १॥ तदाहुः । न॒ व्यूहे॒दङ्गान्प्रा॒णा वै ग्र॒हा नेत्प्रा॒णा- न्मो॒ह॒यानीति॒ मोह्ये॑ड प्रा॒णान्यद्व्यू॒हेत्तस्मान्न॒ व्यूहे॑त् ॥१०॥ तदु॒ व्यूहे॑दे॒व । अ॒- ङ्गानि॒ वै ग्र॒हाः कामं वा॒ऽङ्गाम॒न्यङ्गानि॒ व्यत्यास॒ग्ं शेते॒ तस्मा॑डु॒ व्यूहे॑दे॒व ॥११॥ तदु॒ नैव॒ व्यूहे॑त् । प्रा॒णा वै ग्र॒हा नेत्प्रा॒णान्मो॒ह॒यानीति॒ मोह्ये॑ड प्रा॒णान्यद्व्यू॒- हे॒त्तस्मान्न॒ व्यूहे॑त् ॥१२॥ किं नु तत्रा॑ध्र्व॒र्योः । यदुद्गाता च॒ होता॑ च॒ छन्दा॑ग्ंसि व्यूह॑त ए॒तद्वा॒ऽअध्व॒र्युर्व्यूह॑ति ग्र॒हान्यदैन्द्रवायवा॒ग्रान्प्रातःसव॒ने गृह्णा॑ति शुक्राग्रा- न्माध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽआग्रयणाग्रांस्तृतीयसवने॑ ॥१३॥ ब्राह्मणम् ॥१ [५. १.] ॥ यदि॒ सोमम॑पह॒रेयुः॑ । वि॒धाव॑ते॒षते॑ति ब्रूयात्स॒ यदि॑ वि॒न्दन्ति॒ किमा॒द्रियेर॒न्यद्यु॑ न वि॒न्दन्ति॒ तत्र प्राय॑श्चित्तिः क्रियते ॥१॥ द्वयानि॒ वै फाल्गु॒नानि॑ । लो॒हितपु- ष्पाणि चारु॑णपुष्पाणि च स॒ यान्यरु॑णपुष्पाणि फाल्गु॒नानि॒ तान्य॑भिषुणुयादे॒ष वै सो॑मस्य॒ न्यङ्गो॒ यदरु॑णपुष्पाणि फाल्गु॒नानि तस्मादरु॑णपुष्पाण्य॒भिषु॑णुयात् ॥२॥ यद्य॑रु॒णपु॑ष्पाणि॒ न वि॒न्देयुः॑ । श्ये॒नहृत॑मभिषुणुयाद्यत्र॒ वै गाय॒त्री सो॑मम॒हापत- त्तस्या॑ऽआच्छु॒रन्त्यै॒ सोम॒स्या॑ऽशुरप॑तत्तच्छ्ये॒नहृ॑तमभवत्तस्माच्छ्ये॒नहृ॑तमभिषुणुयात् ॥३॥ यदि॑ श्ये॒नहृतं॒ न वि॒न्देयुः॑ । आदा॒रान॑भिषुणुयाद्यत्र॒ वै य॒ज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत॒ तस्य॒ यो र॑सो व्य॒प्रुष्य॒त्तत॑ आदा॒राः सम॑भवंस्तस्मादादा॒रान॑भिषुणुयात् ॥४॥ यद्यादा॒रान्न॒ वि॒न्देयुः॑ । अ॒रुण॑दूर्वा अ॒भिषु॑णुयादे॒ष वै सो॑मस्य॒ न्यङ्गो॒ यदरु॑णदूर्वास्तस्मादरु॑ण- दूर्वा॑ अ॒भिषु॑णुयात् ॥५॥ यद्य॑रु॒णदूर्वा॒ न वि॒न्देयुः॑ । अ॒पि याने॒व कांश्च॒ हरि॑ता- न्कु॒शान॑भिषुणुयात्तत्राप्येकमिव गां दद्यादथावभृथा॒दुदे॑त्य पुनर्दी॒क्षेत पुनर्य॒ज्ञो ह्ये॑व॒ तत्र॒ प्राय॑श्चित्ति॒रिति॒ नु सोमाप॑हृतानाम् ॥६॥ अथ कलशदि॒राम् । यदि॑ क॒लशो॑ दी॒र्येता॑नुलिप्स॒धमि॑ति ब्रूयात्स॒ यद्यनु॑ल॒भेरन्प्रसृ॑तमात्रं वाऽञ्जलिमात्रं वा तद॒न्यैरे॑कध॒नैर॒भ्युन्नीय॑ यथाप्रभा॒वं प्र॑चरेयु॒र्यद्यु॒ नानु॑ल॒भेरन्नाग्रयणा॑त्स्र्ये॒व प्रस्कन्द्या-
कां० ४, अ० ५, ब्रा० ६-१०, कं० ६-१३ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६५५ जाय। यदि रख देगा तो अवश्य ही प्राणों में विक्षोभ उत्पन्न कर देगा। उसको लिये-लिये बैठे रहते हैं और अध्वर्यु अन्य ग्रहों को लेता रहता है। जब पारी आती है तो उस-उस ग्रह को हिंकार बोलकर रख देता है ॥६॥ कुछ लोग कहते हैं कि ग्रहों का क्रम नहीं बदलना चाहिए। ग्रह प्राण हैं। कहीं ऐसा न हो कि प्राणों का क्रम बदल जाय। जब इनके ग्रहों का क्रम बदलेगा तो प्राणों में अवश्य ही विक्षोभ होगा। इसलिए ग्रहों के क्रम को न बदले ॥१०॥ परन्तु उसको बदल देना चाहिए, क्योंकि ग्रह अंग हैं और सोते में इच्छा होती है कि अंगों को एक ओर से दूसरी ओर को फेरा जाय। इसलिए क्रम को बदल देना उचित है ॥११॥ उनको कभी न बदलें। ग्रह प्राण हैं। कहीं प्राणों में गड़बड़ न हो जाय। क्योंकि जब वह ग्रहों को बदलेगा तो अवश्य ही प्राणों में गड़बड़ होगी। इसलिए न बदलना चाहिए ॥१२॥ अच्छा, जब उद्गाता और होता छन्दों के क्रम को बदलें तो अध्वर्यु क्या करे? प्रातः- सवन में वह ऐन्द्रवायव ग्रह को लेता है, दोपहर के सवन में शुक्र ग्रह को और तीसरे सवन में आग्रयण ग्रह को। इस प्रकार अध्वर्यु ग्रहों के क्रम को बदल देता है ॥१३॥ सोमापहरणादि अध्याय ५—ब्राह्मण १० यदि सोम चोरी जाय तो कहना चाहिए कि 'दौड़ो और तलाश करो।' यदि मिल जाय तो अच्छा ही है। परन्तु यदि न मिले तो इस प्रकार इसका प्रायश्चित्त हो जाता है ॥१॥ फाल्गुन वृक्ष दो प्रकार का होता है—लोहित-पुष्प और अरुण-पुष्प। जो अरुण-पुष्प फाल्गुन हों उनको निचोड़े, क्योंकि जो अरुण-पुष्प के फाल्गुन हैं वे सोम के समान होते हैं। इसलिए उन्हीं फाल्गुनों को पीसना चाहिए जिनके अरुण-पुष्प हों ॥२॥ यदि अरुण फूलवाले न मिलें तो श्येनहृत वृक्ष को निचोड़ना चाहिए। जब गायत्री सोम को लेने के लिए उड़ी और ला रही थी तो सोम की एक डाली उससे गिर पड़ी, वही श्येनहृत वृक्ष बन गई। इसीलिए श्येनहृत वृक्ष को निचोड़ना चाहिए ॥३॥ यदि श्येनहृत भी न मिले तो आदार वृक्ष को लेना चाहिए। जब यज्ञ का शिर काटा गया तो उससे जो रस बहा उससे आदार वृक्ष उगा। इसलिए आदार वृक्ष को निचोड़ना चाहिए ॥४॥ यदि आदार वृक्ष न मिले तो अरुण दूर्वा को पीसे। अरुण दूर्वा सोम के सदृश होती है। इसलिए अरुण दूर्वा को पीसना चाहिए ॥५॥ यदि अरुण दूर्वा न मिले तो कैसे ही हरित कुशों को पीस डाले। परन्तु एक गाय भी दान करे और अवभृथ स्नान के पीछे दीक्षा भी ले। सोम के चोरी जाने का यही प्रायश्चित्त है कि यह दूसरा यज्ञ रचा जाय ॥६॥ जिनका कलश टूट जाय उनका क्या कहना? जब कलश टूट जाय तो कहना चाहिए कि 'इसे पकड़ो।' यदि मुट्ठी-भर या पसों-भर सोम मिल जाय तो एक-धन पात्र से पानी मिलाकर यथाशक्ति काम निकालना चाहिए। परन्तु यदि कुछ भी न मिल सके तो आग्रयण में से कुछ लेकर दूसरे एक-धन पात्रों में से पानी मिलाकर यथाशक्ति काम निकालना चाहिए। यदि
अध्याय-६, ब्राह्मण-१
६५६ शतपथ ब्राह्मण न्यै॒रेक॑धनैर॒भ्युन्नीय॑ यथाप्र॒भावं॑ प्रचरेयुः स यद्यनी॑तासु॒ दक्षि॑णासु कलशो दीर्ये॑त तत्रा॒न्येका॑मेव॒ गां द॑द्यादथावभृ॒थादु॑वोदे॒त्य पुनर्दी॑क्षेत पुनर्य॒ज्ञो ह्ये॑व तत्र प्राय॑- श्चित्ति॒रिति॒ नु कलशदिराम् ॥७॥ अथ सोमा॑तिरिक्तानाम् । यद्य॒ग्निष्टोम॑मतिरि- च्ये॑त पूत॒भृत ऽव्वोक्थ्यं॑ गृह्णीया॒द्यद्यु॑क्थ्यमतिरि॒च्येत॑ षोड॒शिन॑मुपेयु॒र्यदि॑ षोड॒शि- नम॑तिरि॒च्येत॒ रात्रि॑मुपेयु॒र्यदि॒ रात्रि॑मतिरि॒च्येता॑हूरा॒त्रमुपे॑यु॒र्नैह्वेवातीरे॒कोऽस्ति॑ ॥८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥२ [५.१०.] ॥ पञ्चमोऽध्यायः [२१.] ॥॥ प्र॒जाप॑तिर्वाऽए॒ष यदं॒शुः॑ । सोऽस्यै॒ष आ॒त्मैवात्मा ह्य॑यं प्रजा॒पति॒स्तद॒स्यैत॑मा- त्मानं॑ कुर्व्वन्ति॒ यन्नैतं॑ गृह्णन्ति॒ तस्मि॑न्ने॒तान्प्रा॒णान्द॑धाति यथा॑ऽयथे॒ते प्रा॒णा ग्रहा॑ व्या॒ख्याय॑न्ते॒ स ह॒ सर्व्व॑तनूरेव यज॑मानोऽमु॒ष्मिंल्लो॒के सम्भ॑वति ॥१॥ तदा॑रम्भ- णवत् । यन्नैतं गृह्णीयु॒र्यैत॑दनारम्भण॒मिव॒ यन्नैतं॒ न गृह्णन्ति॒ तस्मा॒द्वाऽअं॒शुं गृ॑- ह्णाति॑ ॥२॥ तं वाऽऔदुम्ब॒रेण॒ पात्रे॑ण गृह्णाति । प्र॒जाप॑तिर्वा ए॒ष प्रा॑जाप॒त्य उ॑दुम्बर॒स्तस्मा॒दौदु॑म्बरेण॒ पात्रे॑ण गृह्णाति ॥३॥ तं वै च॑तुःस्रक्तिना॒ पात्रे॑ण गृह्णा॑- ति । त्रयो वाऽइ॒मे लो॒कास्तदि॒माने॑व लो॒कांस्ति॒सृभिरा॑प्नोति प्र॒जाप॑तिर्वाऽअ॒ती- मांल्लो॒कांश्चतु॑र्थस्तत्प्र॒जाप॑तिमे॒व चतु॑र्थ्याप्नोति॒ तस्मा॑च्चतुःस्रक्तिना॒ पात्रे॑ण गृह्णाति ॥४॥ स वै तूष्णीमेव ग्रावा॑णमाद॒त्ते । तूष्णी॒मंशु॒न्निव॑पति तूष्णी॒मप॑ उपसृजति तूष्णी॒मुन्नीय॑ सकृद॒भिषु॑णोति तूष्णी॒मन॑पानन्जुहोति॒ तदेनं॑ प्र॒जाप॑तिं करोति ॥५॥ अथास्या॑ऽछ हिर॒ण्यं बद्धं भ॑वति । तदुप॑जिघ्रति स यद्देवात्र क्षणु॒ते वा वि वा॑ लिश॒तेऽमृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तदमृ॑त॒मायु॑रा॒त्मन्ध॑त्ते ॥६॥ तडु॑ होवाच राम औ॑- पतस्विनिः । काममेव प्राण्यात्काममुदन्याद्यद्वै तूष्णीं जुहोति तद्देवैनं प्रजापतिं करोतीति ॥७॥ अथास्या॑ऽछ हिर॒ण्यं बद्धं भ॑वति । तदुप॑जिघ्रति स यद्देवात्र क्षणु- ते॒ वा वि॑ वा लिश॒तेऽमृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तदमृ॑त॒मायु॑रा॒त्मन्ध॑त्ते ॥८॥ तडु॑ होवाच बुडिल आश्वतराश्विः । उद्यत्यैव गृह्णीयान्नाभिषुणयादभिषुण्वन्ति वाऽअन्यान्भ्यो
का० ४, अ० ५-६, ब्रा० १०-१, कं० ७-८ व १-६ शतपथब्राह्मण / ६५७ दक्षिणा की गायें लाने से पहले कलश टूट जाय तो एक गाय दान दे और अवभृथ स्नान के पीछे फिर दीक्षित होवे, क्योंकि यह दूसरा यज्ञ ही इसका प्रायश्चित्त है। इतना उन लोगों के लिए जिनसे कलश टूट जाय ॥७॥ अब उन लोगों के विषय में जिनसे सोम कुछ शेष रह जाय। यदि अग्निष्टोम के पीछे कुछ सोम शेष रह जाय तो पूतभृथ में से उक्थ्य ग्रह को भर ले। यदि उक्थ्य भरने पर भी शेष रहे तो षोडशी करे। यदि षोडशी पर भी बच रहे तो अतिरात्र यज्ञ करे। यदि अतिरात्र से भी बच रहे तो दिन का यज्ञ (बृहत्साम या महाव्रत) करे। इसके पीछे तो अवश्य ही कुछ न बचेगा ॥८॥ अंशुग्रहः अध्याय ६--ब्राह्मण १ यह जो अंशु ग्रह है वह प्रजापति ही है। यह इस यज्ञ का आत्मा है, क्योंकि प्रजापति आत्मा है। 'इस प्रकार जब वे इस ग्रह को निकालते हैं तो मानो यज्ञ के आत्मा को बनाते हैं। इसमें प्राणों को स्थापित करता है, जैसे इन प्राणों अर्थात् ग्रहों की व्याख्या होती है। यजमान अपने सम्पूर्ण शरीरसहित परलोक में जन्म लेता है ॥१॥ जब इस ग्रह को ग्रहण करते हैं तो यह आरम्भण है। जब नहीं ग्रहण करते तो आरम्भण नहीं है। इसलिए अंशु ग्रह को ग्रहण करता है ॥२॥ वह उदुम्बर लकड़ी का होता है। यह प्रजापति है। उदुम्बर प्रजापति का है। इसलिए उदुम्बर लकड़ी का पात्र होता है ॥३॥ यह चौकोर पात्र होता है। लोक तीन हैं। तीन कोनों से तीन लोकों की प्राप्ति होती है। इन तीन लोकों के अतिरिक्त चौथा प्रजापति है। इस प्रकार चौथे कोने से प्रजापति की प्राप्ति करता है। इसलिए चौकोर पात्र होता है ॥४॥ सिल-बटने (ग्रावाण) को चुपके से लेता है। चुपके ही सोम अंशु को उस पर रखता है। चुपके से उस पर पानी छोड़ता है। चुपके से बटना उठाकर उसे एक बार पीसता है। चुपके से बिना सांस लिये आहुति देता है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता है ॥५॥ इसमें एक सोने का टुकड़ा रक्खा होता है। उसको सूंघता है। यदि कहीं खुजलाये या घाव हो जाय तो सोना अमृत है। इस प्रकार अपने में अमृत को धारण करता है ॥६॥ राम औपतस्विनि का कहना है कि जितना जी चाहे सांस ले। चुपके से आहुति देने-मात्र से ही यजमान प्रजापति बन जाता है ॥७॥ उसमें सोने का टुकड़ा होता है। उसको सूंघता है। यदि खुजलाये या घाव हो जाय तो सोना अमृत है। इसलिए इसमें अमृत या दीर्घ जीवन की स्थापना करता है ॥८॥ बुडिल आश्वतराश्वि का कहना है कि केवल बटने को उठाकर इसको ले लेवे, पीसे न।
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
६५८ शतपथ ब्राह्मण
दे॒वता॑भ्यस्त॒दन्य॒था ततः॑ करोति॒ यथा॑ चान्याभ्यो॑ दे॒वता॑भ्योऽथ॒ षड्ऋ॒तिति॒ तद्दे॒- वास्या॑भिषु॒तं भवतीति॑ ॥ ९॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः॑ । अ॒भ्ये॑व॒ षुण्णु॒यान्न सोम॒ इन्द्र॑मसुतो ममाद॒ नाब्र॑ह्माणो मघ॒वान॑ꣳ सु॒तास॒ इत्यृ॑षिणा॒भ्यनू॑क्तं॒ न वाऽअन्य- स्मै॒ कस्मै॑ चन॒ दे॒वता॑यै सकृद॒भिषु॑णोति॒ तद॒न्यथा॑ ततः॑ करोति॒ यथा॑ चान्याभ्यो॒ दे॒वता॑भ्यस्तस्माद॒भ्ये॑व॒ षुणुया॒दिति॑ ॥ १०॥ तस्य॒ द्वाद॑श प्रथम॒गर्भाः॑ । प॒ष्ठौ॒ह्यो दक्षि॑णा॒ द्वाद॑श॒ वै मासाः॑ संवत्सर॒स्य सं॑वत्स॒रः प्र॒जाप॑तिः प्रजा॒पति॑र॒ग्निस्तदे॑नं प्र॒जाप॑तिं करोति ॥ ११॥ ॥ शतम् २८०० ॥ ॥ तासां॒ द्वाद॑श॒ गर्भाः॑ । ताश्चतु॑र्विꣳशति- श्चतु॑र्विꣳशति॒र्वै सं॑वत्सर॒स्यार्ध॑मासाः॒ संव॑त्सरः प्रजाप॑तिः प्र॒जाप॑ति॒र॒ग्निस्तदे॑नं प्र- जाप॑तिं करोति ॥ १२॥ तदु॑ ह कौकूस्तः॑ । चतु॑र्विꣳशतिमे॒वैताः॑ प्रथम॒गर्भाः॑ प॒ष्ठौ- हीर्दक्षि॑णा ददावृष॒भं प॑ञ्चवि॒ꣳश॒ꣳ हिर॑ण्यमे॒तदु॑ ह स॒ ददौ॑ ॥ १३॥ स वा॒ऽए॒ष न सर्व॑स्येव ग्रही॒तव्यः॑ । आत्मा॒ ह्या॑स्यै॒ष यो॒ न्वे॑व॒ ज्ञातस्त॒स्य ग्र॑हीत॒व्यो यो॑ वा- ऽस्य प्रि॒यः स्याद्यो॑ वा॒नूचा॒नोऽनू॒क्तेनै॑नं प्राप्नु॒यात् ॥ १४॥ स॒त्रे ग्र॑हीत॒व्यः॑ । सर्वं॒ वै स॒त्रꣳ सर्व॑मे॒ष सर्व॑वेद॒से ग्र॑हीत॒व्यः सर्वं॒ वै सर्व॑वेद॒सꣳ सर्व॑मे॒ष वि॒श्वजि॑ति सर्व॑पृष्ठे ग्रही॒तव्यः॒ सर्वं॒ वै वि॒श्वजि॑त्स॒र्वपृ॑ष्ठः॒ सर्व॑मे॒ष वाज॑पेये राजसू॒ये ग्र॑हीत॒व्यः॒ सर्वꣳ॑ हि तत्स॒त्रे ग्र॑हीत॒व्यः सर्वं॒ वै स॒त्रꣳ सर्व॑मे॒ष ए॒तानि॒ ग्रह॑णानि ॥ १५॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [६. १.] ॥ ॥ ए॒तं वा॒ऽए॒ते गृ॒ह्वन्ति॑ । षड्भि॑र्मा॒सैरे॒ष त॑पति॒ ये सं॑वत्स॒रमास॑ते॒ तदु॒च्यत ऽए॒व साम॑तो यथै॒तस्य रू॒पं क्रिय॒तऽउ॒च्यत॒ऽऋक्तो॒ऽथैत॑दे॒व यजु॑ष्टः पुरश्चरणातो य- देत॑द् गृ॒ह्वन्त्ये॒तेनो॑ऽए॒वैनं॑ गृह्वन्ति॒ ॥ १॥ अथातो गृ॒ह्णात्ये॑व । उ॒दु त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑ । दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् । उपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सूर्या॑य त्वा भ्रा- जा॒यैष ते॒ योनिः॒ सूर्या॑य त्वा भ्राजा॒येति॑ ॥ २॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [६. २.] ॥ ॥ अथातः पशुबन्धनस्यैव । पञ्चैकादशिन्यैवेयात्स आग्नियं प्रथमं पशुमालभतेऽथ
कां० ४, अ० ६, ब्रा० १-२-३, कं० ६-१५ व १-२ एवं १ शतपथब्राह्मण / ६५६ क्योंकि अन्य देवताओं के लिए पीसते हैं। इस प्रकार वह जैसा अन्य देवताओं के लिए करता है उससे कुछ भिन्न इसके लिए करता है। यह जो बटने का ऊपर उठाना है वही पीसने के तुल्य है ॥६॥ इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि पीसना अवश्य चाहिए। ऋषि का कहना है कि “न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः” (ऋ० ७।२६।१)—“बिना पिसे सोम ने इन्द्र को तृप्त नहीं किया, न पिसे सोम ने बिना स्तुति के।” किसी अन्य देवता के लिए एक बार से अधिक नहीं पीसा जाता। इस प्रकार जैसा अन्य देवताओं के लिए किया जाता है इससे भिन्न इसके लिए। इसलिए पीसना अवश्य चाहिए ॥१०॥ इसकी दक्षिणा है बारह गर्भिणी गायें जो पहलौटीं हों। वर्ष के बारह मास होते हैं। संवत्सर प्रजापति है। प्रजापति अंशु है। इस प्रकार वह यजमान को प्रजापति बना देता है ॥११॥ उनके बारह गर्भ भी तो होते हैं। इस प्रकार चौबीस हुए। संवत्सर में चौबीस अर्ध-मास होते हैं। संवत्सर प्रजापति है। अंशु प्रजापति है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता है ॥१२॥ कौकस्त ने चौबीस प्रथम गर्भागार्यें अपने पहलौटी बच्चों के साथ दी थीं और पच्चीसवां सांड़ और सोना। इतना ही दिया था ॥१३॥ यह ग्रह सबके लिए नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि यह यज्ञ का आत्मा है ! या तो उसके लिए निकाले जिससे जान-पहचान हो या, जो अध्वर्यु का मित्र हो, या जो वेदाध्ययन के द्वारा इसका अधिकारी बन गया हो ॥१४॥ हजार-गाय-दान-वाले यज्ञ में इसको निकालना चाहिए। सहस्र का अर्थ है सम्पूर्ण। यह ग्रह भी सम्पूर्ण है। सर्ववेदस् यज्ञ में इसको निकालना चाहिए (सर्ववेद वह यज्ञ है जिसमें सम्पूर्ण सम्पत्ति दान कर दी जाती है)। सर्ववेद सब-कुछ है और यह ग्रह भी सब-कुछ है। सर्वपृष्ठ विश्वजित् में इसको निकालना चाहिए। विश्वजित् सर्वपृष्ठ सब-कुछ है, और यह ग्रह भी सब- कुछ है। वाजपेय और राजसूय यज्ञ में इसको निकालना चाहिए, क्योंकि वह सब-कुछ है। सत्र में निकालना चाहिए, क्योंकि सत्र सब-कुछ है और यह सब ग्रह निकालने की क्रिया में भी सब- कुछ है ॥१५॥ अतिग्राह्यग्रहग्रहणम् अध्याय ६—ब्राह्मण २ जो सालभर तक यज्ञ में बैठते हैं वे छः महीनों के द्वारा उसको प्राप्त होते हैं। जो वह चमकता है (अर्थात् सूर्य), ऐसा साम के अनुसार है। यह सूर्य का रूप हो जाता है ऐसा ऋक् का विधान है। यजुः के अनुसार भी यही है कि पुरश्चरण करके जो इस ग्रह को लेते हैं वे भी इसी सूर्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥ उसको इस मन्त्र से लेता है-‘उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्। उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय’ (यजु० ८।४१, ऋ० १।५०।१)—“उस सब के ज्ञाता देव सूर्य की ओर यह केतु ले जाते हैं, जिससे सब संसार की वस्तुओं को देखा जा सके। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे सूर्य के लिए, तेज के लिए। यह तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको ॥२॥ पश्वयनस्तोमायने अध्याय ६—ब्राह्मण ३ पशु-अयन (पशु-याग) का यह नियम है। ग्यारह पशुओं से ही यज्ञ करे। अग्नि के लिए
अध्याय-६, ब्राह्मण-४
६६० शतपथ ब्राह्मण वारु॒णमथ पुनराग्नेयमेवमेवैतया पश्वेकादशिन्येयात् ॥ १॥ अथोऽअ॒प्यैन्द्राग्नमेवाहु- र्व्वह्वः पशुमालभेत । अ॒ग्निर्व्वै सर्वा देवता अ॒ग्नी हि सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुह्व॒ती- न्द्रो वै यज्ञस्य देवता तत्सर्वाश्चैवैतद्देवता नापराध्नोति यो च यज्ञस्य देवता तां नापराध्नोति ॥ २॥ अथात स्तोमायनस्यैव । आग्नेयमग्निष्टोमऽआलभेत तद्धि स- लोम यदाग्नेयमग्निष्टोमऽआलभेत यद्युक्थ्यः स्यादैन्द्राग्निं द्वितीयमालभैतैन्द्राग्नानि ह्युक्थानि यदि षोडशी स्यादैन्द्रं तृतीयमालभैतेन्द्रो हि षोडशी यद्यतिरात्रः स्यात्सारस्वतं चतुर्थमालभेत वाग्वै सरस्वती योषा वै वाग्योषा रात्र्रिस्तद्यथा- यथं यज्ञक्रतून्व्यावर्त्तयत्येतानि त्रीण्ययनानि तेषां यतमत्कामयेत तेनेयादङ्गाऽउपा- लम्भ्यौ पशू सौर्य्यं द्वितीयं पशुमालभते विषुवतेऽह्नन्प्राजापत्यं महाव्रते ॥ ३॥ ब्रा- ह्मणम् ॥ ५ [६. ३.] ॥॥ अथातो महाव्रतीयस्यैव । प्रजापतेर्ह वै प्रजाः ससृजानस्य पर्वाणि विसस्रंसुः स विस्रस्तैः पर्व्वभिर्न शशाक संस्रोतुं ततो देवा अ॒र्चन्तः शाम्यन्तश्चेरूस्तऽएतं महाव्रतीयं ददृशुस्तमस्माऽअगृह्णंस्तेनास्य पर्वाणि समदधुः ॥ १॥ स संहितैः पर्व्वभिः । इद॒मन्नाद्यमभ्युत्तस्थौ यदिदं प्रजापतेरन्नाद्यं यदि मनुष्याणामशनं तद्देवा- नां व्रतं महद्वाऽइदं व्रतमभूद्येनायꣳ समहास्तेति तस्मान्महाव्रती॒यो नाम ॥ २॥ एवं वाऽएते भवन्ति । ये संवत्सरमासते यथैव तत्प्रजापतिः प्रजाः ससृजान आ- सीत्स यथैव तत्प्रजापतिः संवत्सरेऽन्नाद्यमभ्युदतिष्ठदेवमेवैतऽएतत्संवत्सरेऽन्नाद्य- मभ्युत्तिष्ठन्ति येषामेवं विदुषामेतं ग्रहं गृह्णन्ति ॥ ३॥ तं वाऽइन्द्रायैव विमृधे गृ- ह्णीयात् । सर्वा वै तेषां मृधो हता भवन्ति सर्वं जितं ये संवत्सरमासते तस्मा- द्विमृधे वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यछ पृतन्यतः । योऽअ॒स्मांꣳऽअभिदासत्य- धरं गमया तमः । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विमृधऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधऽइति ॥ ४॥ अथो विश्वकर्मणे । विश्वं वै तेषां कर्म कृतं सर्वं जितं भवति
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० १-३ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६६१ पहले पशु का आलभन करे- एक वरुण के लिए, फिर एक अग्नि के लिए। इस प्रकार ग्यारह पशुओं से यज्ञ करे ॥१॥ या प्रतिदिन इन्द्र-अग्नि के लिए एक-एक पशु का आलभन करे। अग्नि ही सब देवता हैं। अग्नि में ही सब देवताओं के लिए आहुति दी जाती है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। इस प्रकार न तो वह किसी देवता को अप्रसन्न करता है, न उसको जो यज्ञ का देवता है ॥२॥ स्तोम-अयन का नियम यह है। अग्निष्टोम में अग्नि के पशु का आलभन करे। अग्निष्टोम में अग्नि के लिए आलभन करना उचित ही है। यदि उक्थ्य यज्ञ हो तो दूसरे पशु को इन्द्र और अग्नि के लिए, क्योंकि उक्थ्य इन्द्र और अग्नि के हैं। यदि षोडशी हो तो तीसरा पशु इन्द्र के लिए होना चाहिए, क्योंकि इन्द्र षोडशी है। यदि अतिरात्र हो तो सरस्वती के लिए एक पशु हो, क्यों- कि सरस्वती वाणी है। वाणी स्त्री है और रात्रि भी स्त्री है। इस प्रकार यज्ञ-ऋतुओं की अलग- अलग-पहचान है। ये तीन अयन या यज्ञ की रीतियाँ हैं। जैसा चाहे वैसा करे। दो पशुओं का आलभन अवश्य करे। दूसरे पशु का सूर्य के लिए विषुवत् के दिन और प्रजापति के लिए महाव्रत के दिन ॥३॥ महाव्रतीयः अध्याय ६-ब्राह्मण ४ अब महाव्रतीय ग्रह के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने प्रजा को सृजा तो उसके शरीर के जोड़ थक गये और थके हुए जोड़ों से वह अपने को उठा न सका। तब देव अर्चना तथा श्रम करते रहे। तब उन्होंने इस महाव्रतीय ग्रह को देखा। उसको उन्होंने इस (प्रजापति) के लिए लिया और उससे इसके जोड़ स्वस्थ हो गये ॥१॥ उन स्वस्थ जोड़ों से वह उस अन्न को प्राप्त हुआ जो कुछ कि प्रजापति का अन्न है, क्योंकि जो मनुष्यों का खाना है वही देवों का व्रत है। चूंकि यह महान् व्रत था जिससे वह स्वस्थ हो गया, इसलिए इसका नाम 'महाव्रतीय' पड़ा ॥२॥ जो सालभर के यज्ञ में बैठते हैं वे उसी प्रकार के हो जाते हैं, जैसा प्रजापति हो गया था जब वह प्रजा बनाने बैठा। जिस प्रकार प्रजापति वर्षभर के पश्चात् अन्न को प्राप्त हुआ, इस प्रकार ये भी वर्षभर के पश्चात् अन्न को प्राप्त होते हैं। और जो इन रहस्यों को समझते हैं उन्हीं के लिए वे इस (महाव्रतीय) ग्रह को निकालते हैं ॥३॥ इसको इन्द्र विमृध के लिए निकालना चाहिए। जो वर्षभर के यज्ञ में बैठते हैं उनके साथ 'मृध' अर्थात् शत्रु या हँसी करनेवाले मर जाते हैं और वे सबको जीत लेते हैं, इसलिए 'इन्द्र विमृध' के लिए इस मन्त्र से, “वि.न ऽ इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः। यो ऽ अस्माँ२ ऽ अभिदा- सत्यधरं गमया तमः। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विमृध ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विमृधे" (यजु० ८।४४, ऋ० १०।१५२।४) — "हे इन्द्र, हमारे शत्रुओं का नाश कर। उनको जो हमसे लड़ते हैं नीचा कर। जो हमारे ऊपर आक्षेप करते हैं, उनसे घोर निकृष्ट अन्धकार को प्राप्त करा। हे ग्रह ! तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र मृध के लिए। यह तेरी योनि है। तुझे विमृध इन्द्र के लिए" ॥४॥ या विश्वकर्मा के लिए। जो सालभर के यज्ञ में बैठते हैं उनका सब काम पूर्ण हो जाता
अध्याय-६, ब्राह्मण-५
६६२ शतपथ ब्राह्मण ये संवत्सर॒मास॑ते॒ तस्मा॑द्विश्वकर्म॑णे वाच॒स्पतिं॑ वि॒श्वक॑र्माणमूत॒ये म॑नो॒जुवं वाजे॑ ऽअ॒द्या हु॑वेम । स नो॒ विश्वा॑नि॒ हव॑नानि जोषद्विश्वशम्भूरव॑से सा॒धुकर्मा॑ । उप॒- या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽइति ॥ ५ ॥ यद्यु॑ऽऐ॒न्द्रीं वै॑श्वकर्म॒णीं वि॒द्यात् । तथै॒व गृह्णी॑याद्विश्वकर्मन्ह॒विषा॑ वर्धनेन त्रा॒तार॒मिन्द्र॑मकृणोरव॒ध्यम् । तस्मै॒ विशः॒ सम॑नमन्त पू॒र्वी॒र॒यमु॒ग्रो वि॒हव्यो॑ यथा॒- सत् । उप॒यामगृ॑हीतोऽसीन्द्रा॑य त्वा वि॒श्वकर्म॑णऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा वि॒श्व- कर्म॑णऽइति ॥ ६॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [६. ४.] ॥ ॥ ए॒ष वै ग्रहः॑ । य ए॒ष तप॑ति येने॒माः सर्वाः प्रजा गृ॑हीतास्तस्मादादा॒ङ्र्य॒ह्यान्गृ- ह्लीम॒ इति॒ चर॑न्ति ग्रहगृहीताः स्म इति ॥ १॥ वागे॒व ग्रहः॑ । वाचा॒ हीदꣳ॒ सर्वं॑ गृ॒हीतं किमु॒ तद्य॑द्वाग्ग्रहः॑ ॥ २॥ नामै॒व ग्रहः॑ । नाम्ना॒ हीदꣳ॒ सर्वं॑ गृ॒हीतं किमु॒ तद्य॒न्नाम॒ ग्रहो॑ बहूनां वै नाना॑नि वि॒द्यान्न नस्तेन॒ ते न॒ गृही॑ता भवन्ति ॥ ३॥ अन्न॑मे॒व ग्रहः॑ । अन्ने॒न हीदꣳ॒ सर्वं॑ गृ॒हीतं॒ तस्मा॒द्याव॑न्तो नोऽशनमश्न॑न्ति॒ ते नः॒ सर्वे॑ गृहीता भवन्त्येषेव स्थितिः॑ ॥ ४॥ स य ए॒ष सोम॑ग्रहः । अन्नं॒ वाऽए॒ष स यस्यै दे॒वता॑याऽए॒तं ग्रहं॑ गृह्णा॒ति॒ सास्मै दे॒वतै॒तेन॒ ग्रहे॑ण गृहीता तं कामꣳ॒ स- मर्धयति यत्काम्या गृह्णा॒ति॒ स उ॒द्यतं वा॒दित्य॒मुप॑तिष्ठते॒ऽस्तं॒ यन्तं॑ वा गृहोऽस्य- मुमनया॒र्त्या गृ॑ह्णाणासाव॒दो मा प्रापदिति॒ यं द्वि॒ष्याद॒सावस्मै कामो मा सम॑र्द्धीति वा॒ न॒ हैवास्मै॑ स कामः॒ समृ॑ध्यते यस्मा॒ऽएव॒मुप॑तिष्ठते ॥ ५॥ ब्राह्मणम् ॥ ७ [६. ५.] ॥ ॥ देवा॒ ह वै यज्ञं त॑न्वानाः । तेऽसुररक्ष॒सेभ्य आस॒ङ्गाद्वि॑भयां चक्रुस्ते॒ होचुः को नो॒ दक्षि॑णत॒ आसि॑ष्यते॒ऽथाभ॑येऽनाष्ट्र॒ऽउत्तर॑तो यज्ञमु॑पचरिष्याम॒ इति॑ ॥ १॥ ते होचुः । य ए॒व नो वी॒र्य॑वत्तमः स दक्षि॑णत॒ आस्ता॒मथाभ॑येऽना॒ष्ट्रऽउत्तर॑तो यज्ञमु॑पचरिष्याम॒ इति॑ ॥ २॥ ते॒ होचुः । इन्द्रो॒ वै नो वीर्य॑वत्तम॒ इन्द्रो॒ दक्षि॑णत
का० ४, अ० ६, ब्रा० ४-५-६, कं० ५-६ व १-५ एवं १-३ शतपथब्राह्मण / ६६३ है, वे सबको जीत लेते हैं, इसलिए विश्वकर्मा के लिए इस मन्त्र से—"वाचस्पतिं विश्वकर्माणमूतये मनोजुवं वाजे ऽ अद्या हुवेम । स नो विश्वानि हवनानि जोषद्विश्वशम्भूरवसे साधुकर्मा । उप- यामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे' (यजु० ८।४५) — "आज हम इस युद्ध में वाचस्पति विश्वकर्मा को बुलाते हैं जो हमारे मनों का प्रेरक है। वह सब प्रकार से हित करनेवाला और शुभ कर्मवाला हमारे सब हवनों को रक्षा के लिए स्वीकार करे। हे ग्रह, तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझको विश्वकर्मा इन्द्र के लिए। यह तेरी योनि है, तुझ के इन्द्र विश्वकर्मा के लिए ॥५॥ यदि वह इन्द्र और विश्वकर्मा वाली ऋचा को जानता हो तो इस प्रकार निकाले, "विश्व- कर्मन् हविषा वर्धनेन त्रातारमिन्द्रमकृणोरवध्यम् । तस्मै विशः समनमन्त पूर्वीरयमुग्रो विहव्यो यथासत् । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा विश्वकर्मण ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा विश्वकर्मणे" (यजु० ८।४६) —"हे विश्वकर्मन् ! तूने उन्नति करनेवाली हवि के द्वारा इन्द्र को त्राता (बचानेवाला) और अवध्य (न मारे जानेवाला) बना दिया। उसके लिए पूर्व लोगों ने नमस्कार किया क्योंकि वह उग्र और पूजनीय है। हे ग्रह ! तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र विश्वकर्मा के लिए। यह तेरी योनि है। तुझको विश्वकर्मा इन्द्र के लिए" ॥६॥ ग्रहस्तुतिः अध्याय ६—ब्राह्मण ५ यह जो तपता है और जिसने सब प्रजाओं को थाम रक्खा है वह ग्रह है। इसलिए वे कहते हैं कि हम ग्रहों को ग्रहण करते हैं, या ग्रहों से थामे हुए हम चलते हैं। (यहाँ ग्रह के दो अर्थ दिये हैं—(१) जिसको ग्रहण किया जाय, (२) जिससे थामे हुए हम चलें) ॥१॥ वाणी एक ग्रह है। वाणी से यह सब थामा हुआ है। क्या आश्चर्य यदि वाणी ग्रह है ॥२॥ नाम ग्रह है। नाम से ही यह सब थामा हुआ है। क्या आश्चर्य है यदि नाम ग्रह हो ! हम बहुतों के नामों को जानते हैं, क्या वे इस प्रकार हमसे बाँधे नहीं गये ? ॥३॥ अन्न भी ग्रह है। अन्न से ये सब थामे हुए हैं। इसलिए जितने हमारा अन्न खाते हैं वे हमसे थामे जाते हैं। यह स्थिति है ॥४॥ यह जो सोम ग्रह है वह अन्न है। जिस देवता के लिए यह ग्रह निकाला जाता है वह देवता इस ग्रह से बद्ध होकर उसकी कामना पूरी कर देता है जिसके लिए इस ग्रह को निकालते हैं। वे उदय होते हुए या अस्त होते हुए सूर्य की उपासना करें, यह सोचकर—'तू पकड़नेवाला (ग्रह) है। अमुक पुरुष को अमुक रोग के द्वारा पकड़। अमुक पुरुष को अमुक वस्तु न मिले।' यह उसका नाम लेकर जिससे वह द्वेष करता है, या 'अमुक पुरुष की वृद्धि न हो, वह अपनी इच्छा को पूरा न करे।' वस्तुतः यदि वह सूर्य की उपासना किसी के अहित के लिए करता है तो उस पुरुष की समृद्धि नहीं होती और न उसकी कामना पूरी होती है ॥५॥ सौमिकं ब्रह्मत्वम् अध्याय ६—ब्राह्मण ६ यज्ञ रचाते हुए देवों को असुर राक्षसों के आक्रमण का भय हो गया। उन्होंने कहा— 'हममें से कौन दक्षिण की ओर बैठेगा कि हम अभय और निश्चिन्त होकर उत्तर की ओर यज्ञ करते रहें ?' ॥१॥ वे बोले—'जो हममें सबसे प्रबल हो वह दक्षिण की ओर बैठे जिससे हम अभय और निश्चिन्त होकर उत्तर की ओर यज्ञ करते रहें' ॥२॥ वे बोले—'इन्द्र ही हममें सबसे प्रबल है। इन्द्र दक्षिण की ओर बैठे जिससे हम अभय
अध्याय-६, ब्राह्मण-७
६६४ शतपथ ब्राह्मण आ॑स्ता॒मथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पच॒रिष्या॑म॒ इति॑ ॥३॥ ते॒ हेन्द्र॑मूचुः । त्वं वै नो वी॒र्य्य॑वत्तमोऽसि॒ त्वं दक्षि॑णत॒ आस्वाथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑रतो य॒ज्ञमु॑पच॒रिष्या॑म इति॑ ॥४॥ स॒ हो॑वाच । किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॑ ब्राह्मणा॒हू॒त्त्या ते॒ ब्रह्म॑सा॒म् तᳵइति॑ तस्मा॑द्ब्राह्मणा॒हूत्सिनं॑ प्र॒वृणी॑त॒ऽइन्द्रो॒ ब्रह्मा॒ ब्राह्म॑णादितीन्द्र॑स्य॒ ह्ये॑षा॒ स इन्द्रो॑ द॒क्षि॒णत॒ आ॑स्ता॒थाभ॑ये॒ऽनाष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञम॒पाच॑रं॒स्तस्मा॒द्य ए॒व वी॒र्य्य॑वत्तमः स्या- त्स द॑क्षिण॒त आ॑सी॒ताथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ उत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पचरे॒युर्यो वै ब्रा॑ह्मणा॒नामनू॑- चानत॑मः स॒ षां॑ वी॒र्य्य॑वत्तमो॒ऽथ यदि॒दं य ए॒व क॑श्च॒ ब्रह्मा॒ भव॑ति कु॒वित्त्सू॒क्षीमा॑- स्तᳵइति॒ तस्मा॒द्य ए॒व वी॒र्य्य॑वत्तमः स्यात्स दक्षि॑णत॒ आसी॒ताथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र- तो य॒ज्ञमु॑पचरेयु॒स्तस्मा॑द्ब्राह्म॒णो दक्षि॑णत॒ आस्तेऽथा॑भ॒येऽना॑ष्ट्र॒ऽउत्त॑र॒तो य॒ज्ञमु॑पच- रन्ति॑ ॥५॥ स य॒त्राह॑ । ब्रह्मᳵस्तो॒ष्या॑मः प्रशास्त॒रिति॒ तद्ब्रह्मा॑ जपे॒त्येतं॑ ते देव सवितर्य्य॒ज्ञं प्राहु॒र्बृह॑स्पतये॒ ब्रह्म॑णे । तेन॑ य॒ज्ञम॑व॒ तेन॑ य॒ज्ञप॑तिं॒ तेन॒ माम॑व । स्तुतं॑ सवि॒तुः प्र॑स॒वᳵइति॒ सोऽसा॑वे॒व ब॒न्धुरेते॑न॒ न्वेव भूयि॑ष्ठा-इवो॑पच॒रन्ति॑ ॥६॥ अने॑न त्वे॑वो॑पच॒रेत् । दे॒व स॑वितरे॒तद्बृह॑स्पते॒ प्रेति॒ तत्स॑वि॒तारं॑ प्रस॒वायो॑- पधावति स॒ हि दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता बृह॑स्पते॒ प्रेति॒ बृह॒स्पति॑र्हि दे॒वानां॒ ब्रह्मा॑ तद्य ए॒व दे॒वानां॒ ब्रह्मा॒ तस्मा॒ऽएवैत॒त्प्राह॒ तस्मा॑दाह॒ बृह॑स्पते॒ प्रेति॑ ॥७॥ अथ॑ मै॒त्राव॑रु॒णो ज॑पति । प्रसू॑तं दे॒वेन॑ सवि॒त्रा जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॒ तत्स॑वि॒तारं॑ प्र॒स॒वायो॑पधावति स॒ हि दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॑ मित्रावरु॑- णौ वै मै॒त्राव॑रु॒णस्य॑ दे॒वते॒ तद्येऽए॒व मै॒त्रावरु॑णस्य दे॒वते॒ ताभ्या॑मे॒वैतत्प्राह॒ त- स्मा॑दाह॒ जुष्टं॑ मित्रावरु॑णाभ्या॒मिति॑ ॥८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ८ [६. ६.] ॥ ॥ त्रयी॒ वै वि॒द्या । ऋचो॒ यजूं॑षि सामा॒नीयमे॒वऽर्चो॒ऽस्या॒७॒॑ ह्यर्च॑ति॒ योऽर्च॑ति स वागे॒वर्ची वा॒चा ह्यर्च॑ति॒ योऽर्च॑ति॒ सोऽन्तरि॑क्षमेव॒ यजूं॑षि॒ द्यौः सामा॑नि सैषा त्रयी॑ वि॒द्या सौम्येऽध्व॒रे प्रयु॑ज्यते ॥१॥ इ॒ममे॒व लो॒कमृचा जय॑ति । अ॒न्तरि॑क्षं
कां० ४, अ० ६, ब्रा० ६-७, कं० ३-८ व १-२ शतपथब्राह्मण / ६६५ और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥३॥ उन्होंने इन्द्र से कहा—'तू हममें सबसे प्रबल है, तू दक्षिण की ओर बैठ जिससे हम अभय और निश्चिन्त होकर उत्तर में यज्ञ करें' ॥४॥ उसने उत्तर दिया—'तो मुझे क्या मिलेगा ?' उन्होंने कहा कि 'ब्राह्मणाच्छंसी का पद तेरा होगा, ब्रह्मसाम तेरा होगा।' इसलिए ब्राह्मणाच्छंसी का वरण करते हैं तो कहते हैं कि 'इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणात्' अर्थात् 'इन्द्र ब्राह्मण होने के कारण ब्रह्मा है।' यह पदवी इन्द्र की है। इन्द्र दक्षिण की ओर बैठा और वे अभय तथा निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करने लगे। इसलिए जो सबसे बलिष्ठ हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त स्थान में उनको यज्ञ करना चाहिए। ब्राह्मणों में जो सबसे अधिक वेद पढ़ा है वही सबसे प्रबल है। अब जो कोई ब्रह्मा हो जाता है वह क्या चुपचाप नहीं बैठता ? इसलिए जो कोई सबसे प्रबल हो उसको दक्षिण की ओर बैठना चाहिए और औरों को उत्तर की ओर अभय तथा निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करना चाहिए। इसलिए ब्राह्मण वेदी के दक्षिण भाग में बैठते हैं और दूसरे लोग उत्तर की ओर अभय और निश्चिन्त स्थान में यज्ञ करते हैं ॥५॥ जब प्रस्तोता कहता है कि 'हे ब्रह्मन् प्रशास्ता, हम स्तुति करेंगे।' तब ब्रह्मा जपता है, “एतं ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे । तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव” (यजु० २।१२)—“हे देव सविता ! तेरे इस यज्ञ को ब्रह्म बृहस्पति के लिए विज्ञप्त किया है। इसलिए यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की रक्षा कर, मेरी रक्षा कर।” सविता की प्रेरणा से स्तुति करो। इसका भी वही फल है। वे अधिकतर स्तुति इसी मन्त्र से करते हैं ॥६॥ ऐसा कहकर भी स्तुति हो सकती है कि 'हे देव सविता' यह, 'हे बृहस्पति, आगे बढ़िए ।' इससे वह प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है। वही देवों का प्रेरक है। बृहस्पति, बढ़ो' वह इसलिए कहता है कि बृहस्पति देवों का ब्रह्मा है। इस प्रकार जो देवों का ब्रह्मा है उसकी घोषणा करता है। इसलिए कहता है कि 'बृहस्पति, बढ़ो' ॥७॥ अब मैत्रावरुण जपता है, 'देव सविता से प्रेरित होकर मित्र और वरुण के लिए प्रिय हो ।' इस प्रकार प्रेरणा के लिए सविता की उपासना करता है क्योंकि वह देवों का प्रेरक है। 'मित्र और वरुण के लिए प्रिय' इसलिए कि मैत्रावरुण के दो देवता हैं—मित्र और वरुण । इस प्रकार मैत्रावरुण के जो दो देवता हैं उनके प्रति घोषणा करता है। इसलिए कहता है 'मित्र और वरुण के लिए' ॥८॥ ब्रह्मत्व-सदो-हविर्धान-विधिशेषः अध्याय ६-ब्राह्मण ७ विद्या के तीन भाग हैं—ऋक्, यजुः और साम। यह पृथिवी ऋक् है क्योंकि जो कोई ऋक् पढ़ता है यही पढ़ता है। वाणी ऋक् है क्योंकि जो कोई पढ़ता है वाणी से पढ़ता है। अन्तरिक्ष यजुः है और द्यौ साम है। सोम यज्ञ में इस तीनों भाग वाली विद्या का प्रयोग होता है ॥१॥ इस लोक को ऋक् से जीतता है, अन्तरिक्ष को यजुः से और द्यौ को साम से । इसलिए