शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ६, ब्रा० १-२-३, कं० ६-१५ व १-२ एवं १ शतपथब्राह्मण / ६५६ क्योंकि अन्य देवताओं के लिए पीसते हैं। इस प्रकार वह जैसा अन्य देवताओं के लिए करता है उससे कुछ भिन्न इसके लिए करता है। यह जो बटने का ऊपर उठाना है वही पीसने के तुल्य है ॥६॥ इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि पीसना अवश्य चाहिए। ऋषि का कहना है कि “न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः” (ऋ० ७।२६।१)—“बिना पिसे सोम ने इन्द्र को तृप्त नहीं किया, न पिसे सोम ने बिना स्तुति के।” किसी अन्य देवता के लिए एक बार से अधिक नहीं पीसा जाता। इस प्रकार जैसा अन्य देवताओं के लिए किया जाता है इससे भिन्न इसके लिए। इसलिए पीसना अवश्य चाहिए ॥१०॥ इसकी दक्षिणा है बारह गर्भिणी गायें जो पहलौटीं हों। वर्ष के बारह मास होते हैं। संवत्सर प्रजापति है। प्रजापति अंशु है। इस प्रकार वह यजमान को प्रजापति बना देता है ॥११॥ उनके बारह गर्भ भी तो होते हैं। इस प्रकार चौबीस हुए। संवत्सर में चौबीस अर्ध-मास होते हैं। संवत्सर प्रजापति है। अंशु प्रजापति है। इस प्रकार यजमान को प्रजापति बना देता है ॥१२॥ कौकस्त ने चौबीस प्रथम गर्भागार्यें अपने पहलौटी बच्चों के साथ दी थीं और पच्चीसवां सांड़ और सोना। इतना ही दिया था ॥१३॥ यह ग्रह सबके लिए नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि यह यज्ञ का आत्मा है ! या तो उसके लिए निकाले जिससे जान-पहचान हो या, जो अध्वर्यु का मित्र हो, या जो वेदाध्ययन के द्वारा इसका अधिकारी बन गया हो ॥१४॥ हजार-गाय-दान-वाले यज्ञ में इसको निकालना चाहिए। सहस्र का अर्थ है सम्पूर्ण। यह ग्रह भी सम्पूर्ण है। सर्ववेदस् यज्ञ में इसको निकालना चाहिए (सर्ववेद वह यज्ञ है जिसमें सम्पूर्ण सम्पत्ति दान कर दी जाती है)। सर्ववेद सब-कुछ है और यह ग्रह भी सब-कुछ है। सर्वपृष्ठ विश्वजित् में इसको निकालना चाहिए। विश्वजित् सर्वपृष्ठ सब-कुछ है, और यह ग्रह भी सब- कुछ है। वाजपेय और राजसूय यज्ञ में इसको निकालना चाहिए, क्योंकि वह सब-कुछ है। सत्र में निकालना चाहिए, क्योंकि सत्र सब-कुछ है और यह सब ग्रह निकालने की क्रिया में भी सब- कुछ है ॥१५॥ अतिग्राह्यग्रहग्रहणम् अध्याय ६—ब्राह्मण २ जो सालभर तक यज्ञ में बैठते हैं वे छः महीनों के द्वारा उसको प्राप्त होते हैं। जो वह चमकता है (अर्थात् सूर्य), ऐसा साम के अनुसार है। यह सूर्य का रूप हो जाता है ऐसा ऋक् का विधान है। यजुः के अनुसार भी यही है कि पुरश्चरण करके जो इस ग्रह को लेते हैं वे भी इसी सूर्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥ उसको इस मन्त्र से लेता है-‘उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्। उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय’ (यजु० ८।४१, ऋ० १।५०।१)—“उस सब के ज्ञाता देव सूर्य की ओर यह केतु ले जाते हैं, जिससे सब संसार की वस्तुओं को देखा जा सके। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे सूर्य के लिए, तेज के लिए। यह तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको ॥२॥ पश्वयनस्तोमायने अध्याय ६—ब्राह्मण ३ पशु-अयन (पशु-याग) का यह नियम है। ग्यारह पशुओं से ही यज्ञ करे। अग्नि के लिए