शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ५, ब्रा० ७-८, कं० ७-६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ६४६ उसी के द्वारा वह इसको संयुक्त करता है ॥७॥ इस मन्त्र से स्पर्श करे—"दे॒वान् दि॒वम॑गन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु मनु॒ष्यान॒न्तरि॑क्ष- मगन्॒ यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु पि॒तॄन् पृ॑थि॒वीमग॑न् यज्ञस्ततो॒ मा द्रवि॑णमष्टु यं कं च॑ लो॒कमग॑न् यज्ञस्ततो॒ मे भ॒द्रम॑भूत्" (यजु० ८।६०)—"यज्ञ देवों के पास द्यौलोक को गया। वहाँ से मुझे धन मिले। यज्ञ मनुष्य के पास अन्तरिक्ष में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। यज्ञ पितरों के पास पृथिवी में गया। वहाँ से मुझे धन मिले। जिस किसी लोक में यज्ञ गया वहीं मेरा कल्याण हो।" इसका तात्पर्य यह है कि यज्ञ जहाँ कहीं जाय, वहीं मेरा कल्याण हो ॥८॥ इस पर आरुणि ने कहा था कि 'वह क्यों यज्ञ करे जो यज्ञ की त्रुटि पर अपने को पापी समझे। मैं तो यज्ञ की त्रुटि द्वारा अच्छा होता हूँ।' यह बात उसने आशीर्वाद को ध्यान में रखते हुए कही थी ॥६॥ सहस्र-दक्षिणा अध्याय ५—ब्राह्मण ८ जब वह उस त्रिरात्र यज्ञ में सहस्र गायें देता है तो गायें सहस्री होती हैं। पहले दिन तीन सौ तैंतीस गायें लाता है। इसी प्रकार दूसरे दिन तीन सौ तैंतीस लाता है। तीसरे दिन भी तीन सौ तैंतीस लाता है। अब हजारवीं रह गई ॥१॥ कुछ लोग कहते हैं कि वह तीन रंग की हो, क्योंकि यही इसका सबसे अच्छा रूप है। परन्तु वह रोहिणी (लाल) और उपध्वस्त (धब्बेदार) हो, यही उसका सबसे अच्छा रूप है ॥२॥ वह अप्रवीत (अक्षत योनि) होनी चाहिए। यह जो साहस्त्री है वह वस्तुतः वाणा है। यह वाणी आतयाम्नी (पूर्ण शक्तिवाली) है। जो अक्षतयोनि है वह पूर्ण शक्तिवाली है। इसलिए इसको अप्रवीत होना चाहिए ॥३॥ उसको पहले दिन ही ले आवे, क्योंकि यह साहस्त्री वस्तुतः वाणी है। यह जो सहस्र सन्तान (प्रजात) है वह इसी वाणी की है। वह आगे-आगे चलती है और उसकी सन्तति पीछे-पीछे। या अन्तिम दिवस लावे। उस दिन आगे-आगे उसकी सन्तति चले और पीछे-पीछे वह। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। उसको अन्तिम दिवस ही लाना चाहिए और आगे-आगे उसकी सन्तति हो और वह पीछे ॥४॥ हविर्धान के उत्तम और आग्नीध्र के दक्षिण को वह द्रोण कलश को सुंघवाता है। द्रोण- कलश यज्ञ है। इस प्रकार वह उसको यज्ञ के दर्शन कराता है—॥५॥ इस मन्त्र से—"आ जि॒घ्र क॒लश॑म् । म॒हा त्वा॑ वि॒शन्त्विन्द॑वः" (यजु० ८।४२)—"कलश को सूंघ। इस तुझ महान् में सोम की बूँदें प्रवेश करें।" यह जो एक हजार गायें दान करता है वह खाली-सा हो जाता है। इसी खाली को फिर भरता है। जब वह कहता है कि 'हे बड़ी गाय! कलश को सूंघ, जिससे ये सोम की बूँदें तुझमें प्रवेश करें' ॥६॥ "पुन॒रूर्जा नि व॑र्त्तस्व" (यजु० ८।४२)—"ऊर्ज के साथ फिर आ।" ऐसा कहने से वह मानो खाली चीज को भरता है ॥७॥ "सा नः॑ स॒हस्रं॑ धुक्ष्व" (यजु० ८।४२)—"हजार गुना हमारे लिए दूध दे।" ऐसा कहने से मानो वह खाली को भरता है ॥८॥