शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
अध्याय-२, ब्राह्मण-२
३५४ शतपथ ब्राह्मण अ॒न॒ग्ने॒व वा॒ऽअस्या॑तः पु॒रा जा॒या भ॑वती॒दꣳ स्या॒द्रु रु॒त्ना॑क्षसि योषि॑त॒मनु॒सच॑न्ते॒ तद्य॑त रु॒त्ना॑त्स्येव॒ रेत॒ आ॒दध॑तीत्यथाय॑त्रा॒दा जा॑यते॒ यो ब्रा᳡ह्म॒णो यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते॒ तस्मा॒द्- पि रा॒ज॒न्यं॑ वा वै॒श्यं॑ वा ब्राह्म॒ण इत्ये॑व ब्रूयाद्ब्राह्म॒णो हि जा॑यते॒ यो य॒ज्ञाञ्जाय॑ते तस्मा॒दाहु॒र्न स॑वन॒कृतꣳ॑ रुन्द्यादिन्स्वी॑ ह्येव स॑वन॒कृतेति॑ ॥४०॥ ब्राह्म॒णम् ॥५ [२.१] ॥ ॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२४ ॥ ॥ वाचं यच्छति । स वाचंयम आस्त॒ऽआस्त॒मया॒द्यद्वाचं॑ यच्छ॑ति ॥१॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जि॒ग्युर्येषामियं॑ जि॒तिस्ते॑ कोचूः कथं न इ॒दं मनु॒ष्यै॒रन्व॒भ्यारो॒- ढ्ꣳ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॒ निर्ध॑येयु॒रेवं॑ङ्क्त्वा य॒ज्ञं यूपे॒- न योपयि॒त्वा तिरो॒ऽभवं॒स्तद्यदे॒नेनायोपयं॒स्तस्मा᳡द्यू॒पो नाम॑ ॥२॥ तद्वा᳡ऋषीणा- म॑नु॒श्रुत॑मास । ते य॒ज्ञꣳ स॑मभ॑र॒न्यथायं॑ य॒ज्ञः सं॑भृत ए॒वं वा॒ऽए॒ष य॒ज्ञꣳ स॑म्भर॑ति यो दीक्ष॑ते वाग्वै य॒ज्ञः ॥३॥ तामस्त॑मिते वाचं विसृ॑जते । सं॒वत्स॒रो वै प्र॒जाप॑- तिः॒ प्र॒जाप॑तिर्य॒ज्ञो॒ऽहोरात्रे॒ वै सं॑वत्स॒र् ए॒ते ह्ये॑नं परि॒प्लव॑माने कुरुतः सो॒ऽह्न- र्दीक्षि॒त स रात्रिं प्राप॑त्स यावा॒नेव॑ य॒ज्ञो याव॑त्यस्य मा॒त्रा ताव॑न्तमे॒वैतदा॒त्ना वाचं॑ विसृ॑जते ॥४॥ तद्वे॑के । नक्ष॑त्रं दृष्ट्वा वाचं॑ विस॒र्ज॑यन्त्यत्रानु॒ध्यास्त॑मितो भवतीति॑ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यात्स्वा॒ ते स्यु॒र्यन्मे॒धः स्यात्तस्मा॒द्द्मत्रेवानु॒ध्यास्त॑मितं म॒न्येत॒ तदै॒व वाचं॑ विसर्जयॆत् ॥५॥ अने॑नो ह्वैके वाचं॑ विसर्जयन्ति । भूर्भुवः॒ स्वरिति॑ य॒ज्ञमाप्या॑ययामो य॒ज्ञꣳ संद॑ध्म इति॒ वद॑न्त॒स्तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यान्न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑य- यति॒ न संद॑धाति॒ य ए॒तेन॒ वाचं॑ विसर्जयति॑ ॥६॥ अने॑नैव वाचं॑ विस॒र्जयेत्॑ । व्र॒तं कृ॑णुत व्र॒तं कृ॑णुता॒ग्निर्ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इत्ये॒ष ह्यास्या॒त्र य॒ज्ञो भ॑- वत्येतद्ध॒विर्यथा पु॒राग्निहो॒त्रं तद्य॒ज्ञेनै॒वैतद्य॒ज्ञꣳ सं॒भृत्य॑ य॒ज्ञे य॒ज्ञं प्र॑तिष्ठापयति य॒- ज्ञेन य॒ज्ञꣳ संत॑नोति संत॒तꣳ ह्येवा॒स्यैतद्द्तं भ॑वत्या सु॒त्यायै॑ त्रि॒ष्कृ॒त्व आ॒ह त्रि॒वृ- द्धि य॒ज्ञः ॥७॥ अथा॒ग्निम॒भ्यावृ॑त्य वाचं॑ विसृ॑जते । न॒ ह्व स य॒ज्ञमाप्या॑ययति॒ न सं-
कां० ३, अ० २, ब्रा० १-२, कं० ४० व १-८ शतपथब्राह्मण / ३५५ कहा जाता है कि राक्षस लोग स्त्रियों के पीछे घूमा करते हैं और उनमें अपना वीर्य स्थापित कर देते हैं। इसलिए सच्चा ब्राह्मण वही है जो यज्ञ से उत्पन्न होता है। इसलिए क्षत्रिय या वैश्य को भी ब्राह्मण कहना चाहिए, क्योंकि जो यज्ञ से उत्पन्न होता है वह ब्राह्मण ही है। इसलिए कहते हैं कि यज्ञ करनेवाले को कभी न मारे । ऐसा करना महापाप है ॥४०॥ अध्याय २—ब्राह्मण २ वह बोलता नहीं । सूर्यास्त तक मौन रखता है। न बोलने का कारण यह है ॥१॥ देवों को जो महत्ता प्राप्त है वह उनको यज्ञ से मिली है। उन्होंने कहा, 'कौन-सी विधि हो कि जो लोक हमको प्राप्त हैं उसे मनुष्य न ले सकें ?' उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस लिया जैसे मधुमक्खी शहद को चूसती है, और चूसे हुए यज्ञ के फोक को यूप के पास फैलाकर छिप गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके पास उन्होंने यज्ञ को बिखेर दिया (अयोपयन्) ॥२॥ ऋषियों ने इस बात को सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया गया, इसी प्रकार जो पुरुष दीक्षित हो जाता है वह भी यज्ञ को इकट्ठा करता है। वाणी ही यज्ञ है ॥३॥ सूर्य के अस्त होने पर मौन तोड़ता है। प्रजापति सम्वत्सर है। प्रजापति यज्ञ है। रात- दिन सम्वत्सर हैं, क्योंकि दोनों घूम-फिरकर सम्वत्सर बनाते हैं। वह दिन में दीक्षित हुआ और अब उसने रात प्राप्त कर ली। जितना यज्ञ है, जितनी इसकी मात्रा है उतना ही प्राप्त करके वह मौन को तोड़ता है ॥४॥ कुछ लोगों की राय है कि जब तारा दीख जाय तो मौन तोड़ दे, क्योंकि तभी सूर्य अस्त हुआ समझा जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि यदि बादल हो तो कैसा होगा ? इसलिए जब समझे कि सूर्य अस्त हो गया तभी मौन तोड़ दे ॥५॥ कुछ लोग 'भूर्भुवः स्वः' कहकर मौन तोड़ते हैं। क्योंकि इस प्रकार यज्ञ में बल आ जाता है, यज्ञ चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि ऐसा करने से न तो यज्ञ में बल आता है न वह चंगा ही होता है ॥६॥ इस मन्त्र से मौन तोड़े— "व्रतं कृणुत व्रतं कृणुताग्निर्ब्रह्माग्निर्यज्ञो वनस्पतिर्यज्ञियः" (यजु० ४।२१)—"व्रत (व्रत का भोजन) करो क्योंकि अग्नि ब्रह्म है, अग्नि यज्ञ है, वनस्पति यज्ञ के लिए है।" यही उसका इस समय का यज्ञ है। यही हवि है जैसे पहले अग्निहोत्र था। इस प्रकार यज्ञ से यज्ञ को पुष्ट करता है, यज्ञ में यज्ञ की प्रतिष्ठा करता है, यज्ञ से यज्ञ को तानता है। क्योंकि यह व्रत का भोजन सोम खींचने तक काम देता है। वह 'व्रतं कृणुत' को तीन बार दुहराता है क्योंकि यह यज्ञ तीन भागोंवाला है ॥७॥ वह अग्नि की ओर घूमकर मौन तोड़ता है। जो और कुछ पढ़कर मौन तोड़ता है वह न
३५६ शतपथ ब्राह्मण द॒धाति॒ योऽतोऽन्ये॑न॒ वाचं॑ विसृ॒जते॒ स प्र॑थ॒मं व्याह॑र॒त्सत्यं॒ वाचोऽभिव्या॑हरति ॥८॥ अ॒ग्निर्ब्रह्म॒ति । अ॒ग्निह्र्ये॑व॒ ब्रह्मा॒ग्निर्य॒ज्ञ इ॒त्य॒ग्निह्र्ये॑व य॒ज्ञो वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इ- ति॒ वन॒स्पत॑यो॒ हि य॒ज्ञिया॒ न हि मनु॑ष्या य॒जेर॒न्यद्वन॒स्पत॑यो॒ न स्यु॒स्तस्मा॑दाह वन॒स्पति॑र्य॒ज्ञिय॒ इति॑ ॥९॥ अथास्मै॑ व्र॒तं श्रपयन्ति । दे॒वान्वाऽए॒ष उ॒पाव॑र्तते यो दी॒क्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवति शृतं वै दे॒वानाᳵ ह॒विर्ना॑शृ॒तं तस्मा॑च्छ्रपयन्ति तद्य॑दे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॒ तद्य॑दे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॑ ॥१०॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जिग्यु॒र्या॑मे॒षामि॒यं जि॑ति॒स्ते हो॑चुः क॒थं न इ॒दं मनु॑ष्यै- रनभ्या॒रोह्यᳵ स्या॒दिति॒ ते य॒ज्ञस्य॒ रसं॑ धी॒त्वा य॒था मधु॑ मधुकृ॒तो निर्ध॑येयु॒रेवं॒ ऽह्य य॒ज्ञं यूपे॑न यो॒पयि॒त्वा ति॒रोऽभ॑व॒न्नथ॒ यदे॑नेनायो॒पयं॒स्तस्मा॑द्यू॒पो नाम॑ ॥११॥ तद्वा ऽऋषी॑णामनुश्रु॒तमा॑स । ते य॒ज्ञꣳ स॒मभ॑र॒न्यथायं य॒ज्ञः संभृ॑त ए॒ष वाऽअ॒त्र य॒ज्ञो भ॑वति॒ यो दी॒क्षत॒ऽए॒ष ह्ये॑नं तनु॒तऽए॒ष एनं॑ जनयति॒ तद्य॑दे॒वात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑- तं यद्विदु॑ग्धं॒ तद्दे॑वै॒तत्पुन॒राप्या॑ययति॒ यदे॒ष ए॒व व्रतय॑ति॒ नाग्नौ जु॒होति॒ न ह्याप्या॑- पये॒द्यद॒ग्नौ जु॑हु॒याद्य॒ज्जुहु॑याद्वै॒व मन्येत॒ नाजु॑ह्वत् ॥१२॥ इ॒मे वै प्रा॒णाः । मनो॒ज्ञा- ता मनोयुजो दूर्जनक्रतवो वागेवाग्निः प्रा॒णोदा॒नौ मि॒त्रावरु॑णौ॒ चक्षु॑रादि॒त्यः श्रोत्रं॑ विश्वे॑ दे॒वा ए॒तासु॒ है॒वास्यै॒तद्दे॑वतासु हु॒तं भ॑वति ॥१३॥ तद्धैके । प्र॒थमे॒ व्रत॒ऽउ- भौ व्री॒हिय॒वावाव॑पन्त्युभाभ्याᳵ र॒साभ्यां॒ यदे॑वा॒त्र य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑तं॒ यद्विदु॑ग्धं॒ तत्पुन॒- राप्या॑ययाम॒ इति॒ वद॑न्तो॒ यद्यु॑ व्रतदु॒घा न दु॒हीत॒ यस्यै॒वातः॒ काम॑येत॒ तस्य॑ व्र॒तं कुर्यादित्यु॒ ह्येवा॑स्यैता॒ऽउभौ व्री॒हिय॒वावन्वा॑रब्धौ भवत॒ इति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॒र्यान्न ह स य॒ज्ञमाप्या॑ययति॒ न संद॑धाति॒ य उ॒भौ व्री॒हिय॒वावाव॑पति॒ तस्मा॑दन्यत॒रमे॒वा- वपेद्य॒दिर्वा॒ऽऽग्र॒स्यैता॒ऽउभौ व्री॒हिय॒वौ भ॑वतः स॒ यदे॒वास्यैतौ॑ ह॒विर्भव॑त॒स्तदे॑वास्ये- तावन्वा॑रब्धौ भवतो॒ यद्यु॑ व्रतदु॒घा न दु॒हीत॒ यस्यै॒वातः॒ काम॑येत॒ तस्य॑ व्र॒तं कु- र्यात् ॥१४॥ तद्धैके । प्र॒थमे॑ व्र॒ते सर्वौ॑षधꣳ सर्व॑सुर॒भ्याव॑पन्ति॒ यदि॑ दीक्षि॒तमा॑र्ति-
का० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० ८-१५ शतपथब्राह्मण / ३५७ यज्ञ को प्रबल बनाता है और न यज्ञ को चंगा करता है। पहला वाक् बोलकर वह सच बोलता है ॥८॥ वह कहता है—'अग्निर्ब्रह्म' क्योंकि अग्नि ही ब्रह्म है। 'अग्निर्यज्ञः' क्योंकि अग्नि ही यज्ञ है। 'वनस्पतिर्यज्ञियः' क्योंकि वनस्पतियां ही यज्ञ है। यदि वनस्पतियां न हों तो मनुष्य यज्ञ कैसे करें ? इसलिए कहा, 'वनस्पतिर्यज्ञियः' ॥९॥ अब वह उसके लिए 'व्रत के भोजन' को पकाते हैं। जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप हो जाता है, देवों में से एक हो जाता है। देवों का खाना पका होना चाहिए, न कि बे-पका। इसलिए पकाते हैं। वह इस दूध (व्रत-भोजन) को पीता है, आहुति नहीं देता। वह स्वयं खा लेता है, और आहुति क्यों नहीं देता इसका कारण यह है—॥१०॥ देवों को जो विजय प्राप्त है वह उन्होंने यज्ञ के द्वारा प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि कौन- सी विधि हो कि इसको मनुष्य न पा जायें ? उन्होंने यज्ञ के रस को ऐसे चूस लिया जैसे शहद की मक्खियाँ शहद को, और बचे हुए यज्ञ के फोक को यूप के द्वारा बिखेरकर छुप गये। चूंकि इसके द्वारा यज्ञ के फोक को बिखेरा (अयोपयन्), इसलिए इसका यूप नाम पड़ा ॥११॥ इसको ऋषियों ने सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे वह यज्ञ इकट्ठा किया गया, उसी प्रकार वह जो दीक्षित होता है यज्ञ ही हो जाता है, क्योंकि यही उसको तानता है और उत्पन्न करता है। यज्ञ का रस चूस लिया गया था, उस रस से वह फिर यज्ञ को युक्त कर देता है जब वह व्रत-भोजन (दूध) को पीता है और आहुतियाँ नहीं देता। यदि वह इसकी आहुति देवे तो यज्ञ को इससे युक्त न कर सके। परन्तु उसको सोचना चाहिए कि मैं आहुति ही दे रहा हूँ न कि आहुति नहीं दे रहा ॥१२॥ यह प्राण (मनोजाता) मन से ही उत्पन्न हुए हैं। और (मनोयुजः) मन से युक्त और (दक्ष ऋतवः) ज्ञान से युक्त हैं। अग्नि वाणी है। मित्र और वरुण प्राण और उदान हैं। आदित्य चक्षु है और सब देव श्रोत्र हैं। इन्हीं देवताओं को वह आहुति देता है (दूध पान करना मानो इन देवताओं के लिए आहुति देना है) ॥१३॥ कुछ लोग पहले दिन के व्रत-भोज में चावल और जौ मिला लेते हैं। उनका कहना है कि यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया, उसको हम इन दोनों पदार्थों के द्वारा फिर प्राप्त कराते हैं। और यदि व्रत की गाय दूध न दे तो इन्हीं पदार्थों से व्रत का भोजन बना ले। इस प्रकार चावल और जौ दोनों अन्वारब्ध हो जाते हैं। लेकिन ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि जो चावल और जौ दोनों मिलाता है वह न तो यज्ञ को रस से युक्त करता है न उसे चंगा करता है। इसलिए इनमें से एक ही मिलाना चाहिए। चावल और जौ (दर्शपूर्णमास में तो) हवि के काम में आते हैं। और उस समय उनका आरब्ध हो ही जाता है। यदि व्रत की गौ दूध न दे तो इन दोनों पदार्थों में से किसी एक से अपनी इच्छानुसार व्रत-भोज बना ले ॥१४॥ कुछ लोग प्रथम दिवस के व्रत-भोज में सब औषध और सब सुगन्धित पदार्थ मिला लेते
३५८ शतपथ ब्राह्मण वि॒न्देद्ये॒नैवा॑तः कामयेत तेन॑ भिषज्ये॒द्यथा॑ व्र॒तेन॑ भिषज्ये॒दिति॒ तदु॒ तथा॒ न कुर्या- न्मानु॒षँ ह॒ ते य॒ज्ञे कुर्व॒न्ति व्यृ॑द्धं वै तद्य॒ज्ञस्य॒ यन्मानु॑षं नेदृ॒द्धं य॒ज्ञे करवाणी॑ति यदि॑ दीक्षि॒तमार्ति॑र्वि॒न्देद्ये॒नैवा॑तः कामयेत॒ तेन॑ भिषज्येत्स॒माप्ति॒र्ह्येव पु॑ण्या ॥ १५॥ अथास्मै॑ व्र॒तं प्रय॑च्छति । अतिनीय॒ मानु॑षं का॒लं साय॑न्दुग्धमपररा॒त्रे प्रात॑र्दुग्धमप- राह्ने व्या॒कृत्या॒ऽएव दे॒वं चै॒वैतन्मानु॑षं च व्याक॑रोति ॥ १६॥ अथास्मै॑ व्र॒तं प्रदा- स्यन्न॒प उप॑स्पर्शयति । दे॒वीं धियं॑ मनामहे सु॒मृडी॒काम॒भिष्ट॑ये वर्चो॒धां य॒ज्ञवाह॑सँ सु॒ती॒र्था नो॒ऽअसद्द्द्रश॒ऽइति मानु॒षाय॒ वाऽए॒ष पुराश॒नायाव॑नेनिक्तेऽथैवात्र॑ दे॒व्यै धि- ये तस्मादाह दे॒वीं धियं॑ मनामहे सु॒मृडी॒काम॒भिष्ट॑ये वर्चो॒धां य॒ज्ञवाह॑सँ सु॒ती॒र्था नो॒ऽअसद्द्द्रश॒ऽइति स याव॑त्कियच्च व्र॒तं व्र॑तयिष्य॒न्नप॒ उप॑स्पृशे॒त्तेनै॒वोप॑स्पृशेत् ॥ १७॥ अथ व्र॒तं व्र॑तयति । ये दे॑वा मनो॒जाता मनो॒युजो॒ दक्ष॑क्रतवस्ते नो॑ऽवन्तु॒ ते नः॑ पान्तु॒ तेभ्यः॒ स्वाहेति॒ तद्यथा॒ वष॑ट्कृतँ हु॒तमे॒वमस्यै॒तद्भवति ॥ १८॥ अथ व्र॒तं व्रतयित्वा॒ नाभि॒मुप॑स्पृशति । श्वा॒त्राः पी॒ता भ॑वत यू॒यमापो॒ऽअस्माकम॒न्तरुदरे॑ सु॒- शेवाः॑ । ता अ॒स्मभ्यमयक्ष्मा॒ अन॑मीवा॒ अना॑गसः स्वद॑न्तु दे॒वीर॒मृता॑ ऋता॒वृध॒ इ- ति दे॒वान्वाऽए॒ष उपाव॑र्तते यो दीक्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवत्यनुत्सिक्तं॒ वै दे॒- वानाँ॑ ह॒विर्यद्ये॑तद्व्रतप्र॒दो मिथ्य करो॑ति व्र॒तमुपो॑त्सिश्चेन्व्रतं॑ प्रमीणाति तस्यै॒ है- षा प्राय॑श्चित्तिस्तथो हास्यैत॒न्न मिथ्या॑कृतं भव॑ति॒ न व्र॒तं प्रमी॑णाति॒ तस्मा॑दाह श्वा॒त्राः पी॒ता भ॑वत यूयमापो॒ऽअस्माकम॒न्तरुदरे॑ सु॒शेवाः॑ । ता अ॒स्मभ्यमय॑क्ष्मा॒ अन॑- मीवा अना॑गसः स्वद॑न्तु देवीर॒मृता ऋता॒वृध॒ इति स याव॑त्कियच्च व्र॒तं व्र॑तयि- त्वा नाभि॒मुप॑स्पृशेदे॒तेनै॒वोप॑स्पृशेत्कस्तद्दिद यद्व्रतप्र॒दो व्र॒तमुपो॑त्सिश्चेत् ॥ १९॥ अथ यत्र॑ मेद्ध्यन्भव॑ति । तत्कृ॒ष्णविषाणा॑या लो॒ष्टं वा किंचि॒द्द्द्रोप॑हृत्यै॒यं ते॑ य॒ज्ञिया त॒- नूरिती॒यं वै पृ॑थि॒वी दे॒वी दे॑वय॒जनी सा दीक्षि॒तेन॒ नाभि॑मृश्या तस्या ए॒तद॒ङ्गच्छे- व॒ य॒ज्ञियां॑ तनू॒मपा॑यञ्छियँ शरी॑रमभिमे॒हृत्यपो॑ मुञ्चामि॒ न प्रजा॒मित्यु॒भयं वाऽअत
कां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० १५-२० शतपथब्राह्मण./ ३५६ हैं कि यदि दीक्षित पुरुष को कोई रोग हो जाय तो जिस पदार्थ की इच्छा हो उसके द्वारा चंगा हो जाय, जैसे व्रत-भोज से चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि यह अशुभ है। यह मानुषी प्रवृत्ति है, और जो मानुषी है वह यज्ञ के लिए अशुभ होती है। यदि दीक्षित पुरुष को रोग हो जाय तो वह जिससे चाहे उससे अपने को चंगा कर सकता है। पूर्णता होनी चाहिए (अर्थात् रोग की अवस्था में जो उपचार हो उसको यज्ञ का अंश क्यों बनाया जाय) ।।१५।। मानुषी काल को बिताने के पश्चात् अध्वर्यु उसे व्रत-भोज देता है-शाम का दूध रात के पिछले पहर में और प्रातः का दूध दोपहर के बाद। यह व्याकृति (Distinction) के लिए। इस प्रकार वह दैवी कार्य को मानुषी कार्य से अलग करता है ।।१६।। जब वह उसको व्रत-भोज देता है तो उससे जल छुआता है इस मन्त्र को पढ़कर- “दैवी धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये. वर्चोधां यज्ञवाहसं सुतीर्था नोऽअसद्वशे” (यजु० ४।११) “अपने सुख की पूर्ति के लिए हम सुख देनेवाली, ब्रह्मवर्चस् को बढ़ानेवाली, यज्ञ को धारण करने- वाली दैवी बुद्धि को चाहते हैं। वह हमारे लिए सुतीर्थ और वश में रहनेवाली हो जाय ।” इससे पहले वह मानुषी भोजन के लिए अपने-आपको पवित्र बनाता था, अब दैवी भोजन के लिए इसीलिए यह ऊपर का मन्त्र पढ़ता है। जब-जब व्रत-भोज ग्रहण करने के लिए वह कोई विधि करे तो यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ।।१७।। अब वह व्रत-भोज को इस मन्त्र से ग्रहण करता है-“ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्ष- क्रतवस्ते नोऽवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा” (यजु० ४।११)-“जो मनोजाता, मनोयुजः और दक्षक्रतु देव हैं, वे हमारी रक्षा करें, हमको सुरक्षित रखें। उनके लिए स्वाहा ।” इस प्रकार ग्रहण किया हुआ व्रत-भोज वषट्कार की आहुति के समान हो जाता है ।।१८।। व्रत-भोज को ग्रहण करने के अनन्तर वह नाभि को इस मन्त्र से छूता है—“स्वात्राः पीता भवत यूयमापोऽअस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः । ताऽअस्मभ्यमयक्ष्माऽअनमीवाऽअनागसः स्वदन्तु देवी- रमृताऽऋतावृधः” (यजु० ४।१२)-“हे जलो, जो तुम पिये गये हो वह हमारे पेट में जाकर अच्छी सेवा करनेवाले होओ। ये पवित्र दिव्य और अमृतरूपी जल हमको नीरोग और बलिष्ठ करें ।” जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप हो जाता है और देवों में से एक हो जाता है। देवों की हवि किसी बाह्य वस्तु से मिली नहीं होती। अब यदि व्रत-भोज में कुछ मिल जाय तो ऐसा समझना चाहिए मानो देवों की हवि मिलावट कर दी गई। इस पाप का यह प्रायश्चित्त है जो ऊपर का मन्त्र पढ़ा गया (अर्थात् यजु० ४।१२), क्योंकि सम्भव है कि व्रत-भोज बनाने में कुछ मिलावट हो गई हो। जब व्रत-भोज पीने के पश्चात् नाभि-स्पर्श करें तो इस मन्त्र को पढ़कर करना चाहिए ।।१९।। जब पेशाब करे तो काले मृग के सींग से मिट्टी का ढेला उठावे और पढ़े—“इयं ते यज्ञिया तनूः” (यजु० ४।१३)—“यह तेरा यज्ञ-सम्बन्धी शरीर है ।” क्योंकि यह पृथिवी देवी है और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि इसे दूषित न करे। उस (पृथिवी) के इस यज्ञ- सम्बन्धी शरीर को (अर्थात् ढेले को) उठाकर इस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर द्वारा लघुशंका से अपने को पवित्र करता है यह कहकर—“अपो मुंचामि न प्रजांम्” (यजु०४।१३)—“जलों को छोड़ता हूँ, न कि सन्तान को ।” इस स्थान से दोनों निकलते हैं, जल भी और वीर्य भी। यहाँ वह जल को
३६० शतपथ ब्राह्मण इत्याप॑श्च॒ रेत॑श्च॒ स ए॒तद॒प ए॒व मुञ्च॑ति॒ न प्र॒जाम॑ꣲहोमुचः स्वाहाकृता इत्यु॑ल्बस- इव॒ ह्ये॑ता मुञ्च॑ति यद्दु॒द्रे गुष्टिं॒ भव॑ति॒ तस्मा॑दाहाꣲहोमुच॒ इति॒ स्वाहा॑कृताः पृथि॒वीमावि॑श॒तेत्याहु॑तयो भूत्वा शा॒न्ताः पृ॑थि॒वीमावि॑श॒तित्ये॒वैतदा॑ह ॥२०॥ अथ॑ पुन॒र्लोष्टं॒ न्यस्य॑ति । पृथि॒व्या सम्भ॑वेती॒यं वै पृ॑थि॒वी दे॒वी दे॑वयज॒नी सा दी॒क्षिते॑न॒ नाभि॑मृश्या त॒स्या ए॒तद॒ङ्क्त्यैव य॒ज्ञियां॑ तनूम॒थाय॒ज्ञियं॒ शरीर॑मुभय॒मिव॒न्तामे॑वा- स्याम॑तत्पुनर्य॒ज्ञियां॑ त॒नूं द॑धाति॒ तस्मा॑दाह पृथि॒व्या सम्भ॑वेति ॥२१॥ अथा॒ग्नये॑ प- रि॒दाय॑ स्वपिति । दे॒वान्वाऽए॒ष उ॒पाव॑र्तते॒ यो दी॒क्षते॒ स दे॒वताना॒मेको॑ भवति न वै दे॒वाः स्वप॑न्त्यनव॒रुद्धो वाऽए॒तस्या॑स्व॒प्नो भव॑त्य॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ व्रत॒पति॒स्त- स्मा॑ऽए॒वैतत्प॑रि॒दाय॑ स्वपि॒त्यग्ने॒ त्वꣳ सु जा॑गृ॒हि व॒यꣳ सु म॑न्दिषीमहीत्यग्ने॒ त्वं जा॑- गृ॒हि व॒यꣳ स्वप्स्याम इत्ये॑वै॒तदा॑ह॒ रक्षा॒ णोऽप्र॑युच्छ॒न्निति॑ गोपाय नोऽप्रमत्त इ- त्ये॒वैतदा॑ह प्रबु॒धे नः॒ पुन॑स्कृधी॒ति यथे॒तः सु॒प्त्वा स्व॒स्ति प्रबु॑ध्यामहाऽए॒वं नः॒ कु- र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥२२॥ अथ॒ यत्र॑ऽसु॒प्त्वा पुन॒र्नाव॑दा॒स्यन्भव॑ति । तदा॒ह्वय॑ति पुन॒र्मनः॒ पुन॒रायु॑र्मऽआगन्पुनः॑ प्रा॒णः पुन॑रा॒त्मा मऽआग॑न्पुन॒श्चक्षुः॒ पुनः॒ श्रोत्रं॑ मऽआगन्नि- ति॒ सर्वे॑ ह॒ वाऽए॒ते स्वप॑तोऽप॒क्राम॑न्ति प्रा॒ण ए॒व न तैरे॒वैतत्सु॒प्त्वा पुन॑ः संगृह्ते तस्मा॑दाह॒ पुन॒र्मनः॒ पुन॒रायु॑र्मऽआगन्पुनः॑ प्रा॒णः पुन॑रा॒त्मा मऽआग॑न्पुन॒श्चक्षुः॒ पुनः॒ श्रोत्रं॑ मऽआगन् । वैश्वान॒रोऽअद॑ब्धस्तनू॒पा अ॒ग्निर्नः॑ पातु दुरि॒तादव॑द्या॒दिति॑ त- द्य॑दे॒वात्र॑ स्वप्ने॒न वा॒ येन॑ वा मिथ्याक॑र्म॒ तस्मान्नः॒ सर्व॑स्माद॒ग्निर्गोपायत्वित्ये॒वैतदा॑ह तस्मा॑दाह वैश्वान॒रो अद॑ब्धस्तनू॒पा अ॒ग्निर्नः॑ पातु दुरि॒तादव॑द्या॒दिति॑ ॥ २३॥ अथ॒ यद्दी॒क्षितः॑ । अ॒व्रत्यं॒ वा व्याह॒रति॒ क्रुध्य॑ति वा॒ तन्मिथ्या॑करोति व्र॒तं प्रमी॑णात्य- क्रोधो॒ ह्ये॑व दी॒क्षितस्या॒ग्निर्वै दे॒वानां॑ व्रत॒पति॒स्तमे॒वैतदुप॑धावति त्वम॑ग्ने व्रतपा अ- सि दे॒वऽआ मर्त्ये॒ष्वा । त्वं य॒ज्ञेष्वीद्य॒ऽइति॒ तस्यो॑ है॒षा प्राय॑श्चित्तिस्तथो॒ हास्यैतन्न॑ मि॒थ्याकृ॑तं भव॑ति॒ न व्र॒तं प्रमी॑णाति॒ तस्मा॑दाह॒ त्वम॑ग्ने व्रतपा॒ असि दे॒वऽआ म॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० २०-२४ शतपथब्राह्मण / ३६१ छोड़ता है, न कि प्रजा को। अब कहता है—‘‘अं॒होमुचः स्वाहाकृताः’’ (यजु० ४।१३)— अर्थात् ‘‘(यह जल) कष्ट को दूर करनेवाले और स्वाहा से पवित्र किये गये हैं’’ अर्थात् पहले दूध के रूप में पान किये गये थे। क्योंकि उदर में जो कष्ट-युक्त जल (मूत्र) होता है उसको दूर करते हैं। अब कहता है—‘‘पृथिवीमाविशत’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी में प्रवेश करो’’ (मूत्र को सम्बोधन करके)। अर्थात् यह कहता है कि ‘आहुति बनकर शान्त होकर पृथिवी में प्रवेश करे’ ॥२०॥ अब फिर ढेले को फेंक देता है यह कहकर—‘‘पृथिव्या संम्भव’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी से मिल जा।’’ यह पृथिवी देवी और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि उसे मूत्र से अपवित्र न करे। उसके इस यज्ञ-सम्बन्धी शरीर को उठाकर उस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में मूत्र छोड़ा। अब उसको फिर यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में रख देता है। इसलिए कहता है—‘‘पृथिव्या संभव’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी में मिल जा’’॥२१॥ अब अपने-आपको अग्नि के सुपुर्द करके सो रहता है। जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप खिंच आता है। वह देवों में एक हो जाता है। देव तो सोते नहीं। परन्तु वह सोये बिना रह नहीं सकता। अग्नि देवों में व्रतपति है। इसलिए वह अपने को अग्नि के समर्पण करके सोता है यह पढ़कर—‘‘अग्ने॒ त्वं॑ सु॒ जागृ॑हि व॒यं॑ सु म॑न्दिषीमहि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हे अग्नि ! तू जाग और हम भली-भांति आराम कर लें।’’ अर्थात् वह अग्नि से कहता है कि तू जाग और हम सोवें। फिर वह कहता है—‘‘रक्षा णोऽअप्रयुच्छन्’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हमारी निरन्तर रक्षा कर।’’ अर्थात् प्रमादरहित होकर रक्षा कर। ‘‘प्रबुधे नः पुनस्कृधि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हम अच्छी तरह जागें।’’ अर्थात् हमको इस योग्य बना कि हम जब जागें तो स्वस्थ हों ॥२२॥ अब सो चुकने के पश्चात् फिर उसे आलस्य न आ जाय, इसलिए (अध्वर्यु) उससे यह मन्त्र बुलवाता है—‘‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मऽआगन्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘मेरा मन फिर आ गया। मेरी आयु फिर आ गई। मेरे प्राण फिर आ गये। मेरा आत्मा फिर आ गया। मेरी आंख फिर आ गई। मेरे कान फिर आ गये।’’ सोनेवाले के ये सब उससे दूर हो जाते हैं; केवल प्राण रह जाता है। इसलिए कहा—‘‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन् पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मऽआगन् । वैश्वानरोऽ- अदब्धस्तनूपाऽअग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘वैश्वानर अर्थात् सब पुरुषों का हितकारक और ‘अदब्ध’ अर्थात् किसी से न सताया हुआ अग्नि हमको निन्दित (नाम न लेने योग्य) पाप से बचावे।’’ उसके कहने का तात्पर्य यह है कि जो सोने में या अन्यथा पाप हो सकते हों उनसे ईश्वर हमारी रक्षा करे। इसलिए यह मन्त्र पढ़ता है, ‘‘पुनर्मनः...दुरितादवद्यात् (यजु० ४।१५) ॥२३॥ जो पुरुष दीक्षित हुआ है वह यदि व्रत के विरुद्ध आचरण करता है या क्रोध करता है तो वह पाप करता है और व्रत को भंग कर देता है। दीक्षित पुरुष को क्रोध नहीं करना चाहिए। अग्नि देवों का व्रतपति है। इसलिए उसी का आश्रय लेता है यह मन्त्र पढ़कर—‘‘त्वमग्ने व्रत- पाऽअसि देवऽआ मर्त्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः’’ (यजु० ४।१६)—‘‘हे अग्निदेव ! आप व्रत के पालने- वाले हैं, मनुष्यों के बीच में। आप यज्ञों में प्रशंसा के योग्य हैं।’’ यह उस पाप का प्रायश्चित्त है। ऐसा पढ़ने से वह यह दोष नहीं करता और न उसका व्रत भंग होता है। इसलिए वह कहता है
अध्याय-२, ब्राह्मण-३
र्त्ये॑धा॒ । त्वं य॒ज्ञष्वीड्य॒ इति॑ ॥ २४ ॥ अथ॒ यद्द्दी॑क्षिताया॒भिजु॒होति॑ । त॒स्मिन्वाच॒पति॒ रास्वे॒यत्सो॒मा भूयो॑ भरे॒ति सोमो॑ ह॒ वाऽअ॒स्माऽए॒तद्यु॑ते॒ यद्द्दी॑क्षिताया॒भिजु॒होति॒ स यदा॑ह॒ रास्वे॒यत्सोमेति॑ रा॒स्व न इ॒यत्सो॒मित्ये॒वैतदा॑हा॒ भूयो॑ भरे॒त्या नो॒ भूयो॑ ह॒- रे॒त्ये॒वैतदा॑ह देवो॒ नः॑ सविता वसोर्दा॒ता वस्व॑दा॒दिति॑ तथो हास्माऽए॒तत्स॑वि॒- तृप्र॑सूतमेव दा॒नाय॑ भवति ॥ २५ ॥ पु॒रास्त॒मया॒दाह॑ । दी॒क्षित॒ वाचं॒ यच्छेति॒ ताम॒- स्तमि॑ते॒ वाचं॒ विसृ॑जते पुरो॑दया॒दाह॑ दी॒क्षित॒ वाचं॒ यच्छेति॒ तामुदि॑ते॒ वाचं॒ विसृ॑- जते संतत्याऽए॒वाह॒रेवैतद्रात्र्या॒ संतनोध्या॒ रात्री॑म् ॥ २६ ॥ नैन॑मन्य॒त्र च॑र॒न्तम॒- भ्यस्त॑मियात् । न स्व॒पन्तम॒भ्युदिया॒त्स यदेन॑मन्य॒त्र चर॑न्तम॒भ्यस्त॑मियाद्रात्रे॒रनं तद॒- न्तरिया॒द्यत्स्व॒पन्तम॒भ्युदिया॒दह्न एनं॒ तद॒न्तरियान्नात्र प्रायश्चित्तिरस्ति प्रतिगुप्य॑मे॒वै- तस्मान् न पु॒रावभृथा॒दपोऽभ्य॑वेया॒न्नैनम॒भिव॑र्षेदनवकॢप्तं॑ ह तद्यत्पु॒रावभृथा॒दपो ऽभ्य॑वेया॒द्यदेनम॒भिव॑र्षेद्य॒त् परिह्वा॒लं वाचं॒ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒तां तद्यत्परि॑- ह्वा॒लं वाचं॒ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒ताम् ॥ २७॥ य॒ज्ञेन॒ वै दे॒वाः । इ॒मां जि॑तिं जि- ग्यु॒र्यैषामि॒यं जि॑ति॒स्ते होचुः कथं न इ॒दं मनु॑ष्यैरन॒न्वारो॒ह्यᳵ स्या॒दिति॑ ते य॒ज्ञस्य रसं धी॒त्वा यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतो॑ निर्धयेयु॒र्विदुह्य॑ य॒ज्ञं यूपेन॒ योपयित्वा॒ तिरो॑ऽभव॒- न्नथ॒ यदेने॑ना॒योप॑यं॒स्तस्मा॒द्यूपो॒ नाम॑ ॥ २८ ॥ तद्धा॒ऽऋषी॑णामनु॒श्रुतमा॑स । ते य॒ज्ञꣳ सम॑भर॒न्यथायं य॒ज्ञः सम्भृ॑त ए॒वं वाऽए॒ष य॒ज्ञꣳ सम्भ॑रति॒ यो दी॑क्षते॒ वाग्वै य॒ज्ञ- स्तद्य॒देवात्र॑ य॒ज्ञस्य॒ निर्धी॑तं॒ यद्विदु॑ग्धं॒ तदे॒वैतत्पुन॑रा॒प्याय॑यति॒ यत्परि॑ह्वा॒लं वाचं॑ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒तां न ह्याप्याययेद्यत्प्रसृ॒तां मानु॑षीं वाचं॒ वदे॒त्तस्मात्परि॑ह्वा- लं वाचं॑ वद॑ति॒ न मानु॑षीं प्रसृ॒ताम् ॥ २९॥ स वै दी॑क्षते । वाचे हि दी॑क्षते य- ज्ञाय॒ हि दी॑क्षते य॒ज्ञो हि वाग्दी॑क्षितो ह॒ वै नामैतद्यद्दी॑क्षित॒ इति॑ ॥ ३० ॥ ब्रा- ह्मणम् ॥ १ [२.२] ॥ ॥ आ॒दि॒त्यं च॒रुं प्रायणी॑यं॒ निर्व॑पति । दे॒वा ह॒ वाऽअ॒स्यां य॒ज्ञं तन्वा॒ना इ॒मां य॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० २-३, कं० २४-३० व १ शतपथब्राह्मण / ३६३ “त्वमग्ने व्रतपा···यज्ञेष्वीड्यः” (यजु० ४।१६) ॥२४॥ अब लोग दीक्षित पुरुष के लिए जो भेंट देते हैं उस समय (अध्वर्यु) उससे यह जाप कराता है— “रास्वेयत् सोमा भूयो भर” (यजु० ४।१६)—“हे सोम ! इतने को दे, और अधिक को भरपूर कर ।” जो भेंट लाई जाती है उसका सोम ही देनेवाला है, इसलिए कहता है “रास्वेयत् सोमा भूयो भर ।” तात्पर्य यह है कि हे सोम ! इतना हमारे लिए दे और आगे के लिए अधिक ला। अब कहता है—“देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात्” (यजु० ४।१६)—“धन के दाता सविता देव ने यह धन मुझे दिया ।” इस प्रकार यह दान सविता से प्रेरित हुआ होता है ॥२५॥ सूर्यास्त से पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी को रोक।’ सूर्यास्त से पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। सूर्योदय के पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी को रोक।’ सूर्योदय के पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। यह वह सिलसिला कायम रखने के लिए करता है। दिन का रात के साथ सिलसिला कायम करता है और रात का दिन के साथ ॥२६॥ ऐसा न हो कि वह (यज्ञशाला से) बाहर हो और सूर्य अस्त हो जाय, और न ऐसा हो कि वह सोता रहे और सूर्योदय हो जाय । यदि वह बाहर हो और सूर्यास्त हो जाय तो सूर्य उसके और रात के बीच में अन्तर डाल देगा, और अगर सूर्योदय के समय सोता रहेगा तो सूर्य उसके और दिन के बीच में अन्तर डाल देगा अर्थात् उसका सिलसिला (सन्तति) टूट जायगा। इसका कोई प्रायश्चित्त भी नहीं है। इसलिए इससे बचा रहे। स्नान से पहले जलों में न जावे और न वर्षा में भीगे, क्योंकि स्नान से पहले जलों में प्रवेश करना या वर्षा में भीगना अनुचित है। रुक- रुककर बोलता है, मनुष्य की भाँति नहीं। रुक-रुककर क्यों बोलता है और मनुष्य की भाँति क्यों नहीं ? इसका कारण नीचे दिया है—॥२७॥ देवों ने उस विजय को जो उनको प्राप्त है यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त किया। उन्होंने कहा— ‘यह जगत् ऐसा कैसे हो जिसमें मनुष्य न रह सकें?’ उन्होंने यज्ञ के रस को चूस लिया जैसे मधु- मक्खी शहद को। यज्ञ को दुहकर उसे यूप से तितर-बितर करके छिप गये। चूंकि यूप के द्वारा तितर-बितर किया इसलिए इसका नाम यूप पड़ा ॥२८॥ ऋषियों ने इसको सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे यज्ञ इकट्ठा किया गया, उसी प्रकार जो दीक्षित होता है वह यज्ञ को इकट्ठा करता है, क्योंकि वाणी ही यज्ञ है। और यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया उसको रुक-रुककर बोलकर फिर स्थापित कर देता है और मनुष्य के समान नहीं बोलता। यदि वह मनुष्य की भाँति जल्दी-जल्दी बोले तो उस भाग को स्थापित न कर सके । इसलिए वह मनुष्य की भाँति नहीं बोलता, किन्तु रुक-रुककर बोलता है ॥२९॥ अब वह ‘दीक्षते’ अर्थात् दीक्षा लेता है। वाणी के लिए दीक्षा लेता है। यज्ञ के लिए दीक्षा लेता है। वाणी ही यज्ञ है। ‘धीक्षा’ को ही ‘दीक्षा’ कहते हैं ॥३०॥ अध्याय २-ब्राह्मण ३ अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है। (यहाँ प्रायणीय-इष्टि का वर्णन है।) जब देव
ज्ञाद॑न्त॒रयुः॒ सा हे॑षा॒मियं॑ य॒ज्ञं मो॒रूं॑ चकार क॒थं नु मयि॑ य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना मां य- ज्ञाद॑न्त॒रयु॒रिति॒ तं च॒ य॒ज्ञं न प्र॑ज॒ज्ञुः ॥१॥ ते हो॑चुः । यन्न्व॑स्या॒मेव॑ य॒ज्ञमत॑न्म॒- न्हि क॒थं नु नो॒ऽमुहू॒त्कथं॑ न प्र॒जानी॒म इति॑ ॥२॥ ते हो॑चुः । अ॒स्यामे॒व य॒ज्ञं त- न्वा॒ना इ॒मां य॒ज्ञाद॑न्त॒रगा॑म॒ सा न इ॒यमे॒व य॒ज्ञम॑मूमूहदि॒मामे॒वोप॑धावा॒मेति॑ ॥३॥ ते हो॑चुः । यन्नु॒ वय्ये॒व य॒ज्ञमत॑न्मन्हि क॒थं नु नो॒ऽमुहू॒त्कथं॑ न प्र॒जानी॒म इति॑ ॥४॥ सा हो॑वाच । मय्ये॒व य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना मां य॒ज्ञाद॑न्त॒रगा॑त॒ सा वो॒ऽहमे॒व य॒ज्ञ- म॒मूमू॒हं भा॒गं नु मे॑ कल्पयताथ य॒ज्ञं द्र॑क्ष्यथाथ प्र॒ज्ञास्य॒थेति॑ ॥५॥ तथेति॑ दे॒वा अब्रुवन् । तवै॒व प्रा॑यणी॒यस्त्वो॑दय॒नीय॒ इति॒ तस्मा॑दे॒ष आ॑दि॒त्य ए॒व प्रा॑यणी॒यो भव॑त्यादि॒त्य उ॑दय॒नीय॒ इयꣳ॑ ह्ये॒वादि॑ति॒स्ततो॑ य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्वत ॥६॥ स य- दादि॒त्यं च॒रुं प्रा॑यणी॒यं नि॒र्व॑पति । य॒ज्ञस्यै॒व दृष्ट्यै॑ य॒ज्ञं दृष्ट्वा॑ क्रीणा॑नि॒ तं त॑नवा॒- ऽइति॒ तस्मा॑दादि॒त्यं च॒रुं प्रा॑यणी॒यं नि॒र्व॑पति॒ तद्वै निरु॑क्तꣳ ह॒विरा॑सीदनि॑रुक्ता दे॒व- ता ॥७॥ अथै॑भ्यः प॒थ्या स्व॒स्तिः प्रारो॑चत । ताम॑यज॒न्वाग्वै प॒थ्या स्व॒स्तिर्वाग्य॒ज्ञ- स्तद्य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्वत ॥८॥ अथै॑भ्यो॒ऽग्निः प्रारो॑चत । तम॑यजं॒स्तद्य॒दाग्ने॒यं य॒ज्ञ- स्यासी॒त्तद॑पश्य॒न्यद्धि शुष्कं॑ य॒ज्ञस्य॒ तदा॑ग्ने॒यं तद॑पश्यं॒स्तदत॑न्वत ॥९॥ अथै॑भ्यः॒ सोमः॑ प्रारो॑चत । तम॑यजं॒स्त यत्सौ॒म्यं य॒ज्ञस्यासी॒त्तद॑पश्य॒न्यद्वाऽआ॒र्द्रं य॒ज्ञस्य॒ तत्सौ॒म्यं तद॑पश्यं॒स्तदत॑न्वत ॥१०॥ अथै॑भ्यः सवि॒ता प्रारो॑चत । तम॑यज॒न्पश॑वो॒ वै स॑वि॒ता पश॑वो य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञमप॑श्यं॒स्तमत॑न्व॒ताथ॒ यस्यै॑ दे॒वता॑यै ह॒विर्नि॑रु॒प्तमासी॒त्ताम॑यजन् ॥११॥ ता वा॒ऽए॒ताः । पञ्च॑ दे॒वता॑ यजति॒ यो वै स य॒ज्ञो मु॒ग्ध आसी॑त्पा॒ङ्को वै स आसी॒त्तमे॒ताभिः॑ प॒ञ्चभि॑र्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१२॥ ऋ॒तवो॑ मु॒ग्धा आ॑संस्तूंश्च॑ । ताने॒ताभि॑रेव॒ पञ्च॑भिर्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१३॥ दिशो॑ मु॒ग्धा आ॑संस्तूंश्च॑ । ता ए॒- ताभि॑रेव॒ पञ्च॑भिर्देव॒ताभिः॑ प्राजा॑नन् ॥१४॥ उदी॑चीमेव दिशम् । प॒थ्या स्व॒स्त्या प्राजा॑नं॒स्तस्मा॑दुत्त॒राद्धि वाग्व॑दति कुरुपञ्चा॒लत्रा वाग्व्ये॒षा निदा॑नेनोदीचीꣳ॒ ह्ये-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ३, कं० १-१५ शतपथब्राह्मण / ३६५ इस पृथिवी पर यज्ञ रचाने लगे तो उन्होंने इस पृथिवी को ही यज्ञ से बहिष्कृत कर दिया। उस पृथिवी ने उनके इस यज्ञ को मोहित (गड़बड़) कर दिया। उसने कहा कि ये लोग मेरे ऊपर तो यज्ञ रचते हैं और मुझी को यज्ञ से बाहर निकाले देते हैं ! उनको इस यज्ञ का प्रज्ञान न हुआ ॥१॥ उन्होंने कहा—'हमने जिस यज्ञ को इस पृथिवी में रचा, वह यज्ञ गड़बड़ कैसे हो गया ? हमको इसका प्रज्ञान क्यों न हो सका ?' ॥२॥ उन्होंने कहा—'हमने इसी पर यज्ञ रचा और इसी को यज्ञ से बाहर कर दिया। इसी ने यज्ञ को गड़बड़ा दिया। इसलिए इसी के पास चलें' ॥३॥ उन्होंने कहा—'जब हमने तेरे ही ऊपर यज्ञ रचा तो यह यज्ञ गड़बड़ा कैसे गया ? हमको इस यज्ञ का प्रज्ञान कैसे न हो सका ?' ॥४॥ उसने उत्तर दिया—'तुमने मेरे ही ऊपर यज्ञ रचा, मुझी को यज्ञ से बाहर कर दिया। मैंने ही यज्ञ को गड़बड़ा दिया। मेरा भाग निकाल दो। तब तुम यज्ञ को देखोगे, तभी तुमको इसका परिज्ञान होगा' ॥५॥ देवों ने कहा—'अच्छा ऐसा ही करेंगे। प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ तेरी ही होंगी।' इसलिए प्रायणीय आहुति अदिति की होती है और उदयनीय भी अदिति की। यह पृथिवी ही अदिति है। तब उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको रच डाला ॥६॥ वह जो अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है, वह यज्ञ के दर्शन के लिए। 'यज्ञ को देखकर मैं (सोम) को खरीदूँगा और यज्ञ को रचूँगा' ऐसा सोचकर वह अदिति के लिए प्रायणीय चरु तैयार करता है। हवि तो तैयार हो गई थी, परन्तु (अदिति) देवता के लिए दी नहीं गई थी ॥७॥ अब इनको पथ्य-स्वस्ति (मार्ग का कल्याण) मिली। उसके लिए इन्होंने आहुति दी। वाणी ही पथ्य-स्वस्ति है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको रचा ॥८॥ अब उनको अग्नि मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग को देखा जो अग्नि का भाग था। यज्ञ का जो शुष्क भाग है वह अग्नि का है। उसको उन्होंने देखा और रचा ॥९॥ अब इनको सोम मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग को देखा जो सोम का भाग था। यज्ञ का जो गीला भाग है वह सोम का भाग है। उसको उन्होंने देखा और रचा ॥१०॥ अब इनको सविता मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। पशु ही सविता है। पशु ही यज्ञ हैं। उस यज्ञ को उन्होंने देखा। उस यज्ञ को रचा। इस प्रकार जिस देवता के लिए हवि बनाई गई उसी के लिए दी गई ॥११॥ अब वह पाँच देवताओं को आहुति देता है। क्योंकि जब यह यज्ञ गड़बड़ाया गया तो इसके पाँच भाग हो गये। इन पाँच देवताओं के द्वारा उनको उनका ज्ञान हुआ ॥१२॥ ऋतुएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा जाना गया ॥१३॥ दिशाएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा पहचाना गया ॥१४॥ पथ्य-स्वस्ति के द्वारा उन्होंने उत्तर दिशा को पहचाना। इसलिए कुरु-पांचालों में वाणी ही उत्तर (उत्कृष्ट) होती है। यह (पथ्य-स्वस्ति) वाणी ही तो है। इसी के द्वारा उन्होंने उत्तर
अध्याय-२, ब्राह्मण-४
३६६ शतपथ ब्राह्मण तया॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्नुदीची॒ ह्येतस्यै॒ दिक् ॥ १५॥ प्राची॑मेव॒ दिश॑म्। अ॒ग्निना॒ प्रा- जानं॒स्तस्मा॑द॒ग्निं प॒श्चात्प्राञ्च॒मुद्धृत्योपा॑सते प्राची॑ꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्प्राची॒ ह्ये- तस्य॒ दिक् ॥ १६॥ दक्षि॑णामेव॒ दिश॑म्। सोमे॑न॒ प्राजा॑नं॒स्तस्मा॒त्सोमं॑ क्री॒तं दक्षि॑णा प॒रिव॑हन्ति तस्मादाहुः पितृदे॒वत्यः॒ सोम॒ इति॒ दक्षि॑णाꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्द- क्षिणा॒ ह्येतस्य॒ दिक् ॥ १७॥ प्रतीची॑मेव॒ दिश॑म्। स॒वित्रा॒ प्राजा॑नन्ने॒ष वै स॑वि॒ता य ए॒ष तप॑ति॒ तस्मा॑दे॒ष प्रत्य॒ङ्ङेति॑ प्रतीची॑ꣳ ह्येतस्य॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्प्रतीची॒ ह्येतस्य दिक् ॥ १८॥ ऊ॒र्ध्वामेव॒ दिश॑म्। अदि॑त्या प्राजा॑नन्नियं वाऽअदि॑ति॒स्तस्मा॑द॒स्यामूर्ध्वा ओष॑धयो जायन्त॒ऽऊर्ध्वा वन॒स्पत॑य ऊ॒र्ध्वाꣳ ह्येतया॒ दिशं॑ प्राजा॑नन्नू॒र्ध्वा ह्येतस्यै॒ दिक् ॥ १९॥ शिरो॒ वै य॒ज्ञस्या॑ति॒थ्यम्। बा॒हू प्रायणी॑योदयनी॒याव॒भितो॒ वै शिरो॑ बा॒हू भ॑वत॒स्तस्मा॑द॒भित॑ आति॒थ्यमे॒ते ह॒विषी॑ भवतः प्रायणी॒यश्चो॑दयनी॒यश्च॑ ॥ २०॥ त- द्दाहुः। यदे॒व प्रायणी॑ये क्रि॒येत॒ तदु॑दयनी॒ये क्रि॑येत यदे॒व प्रायणी॑यस्य ब॒र्हिर्भव॑- ति॒ तदु॑दयनी॒यस्य ब॒र्हिर्भवतीति॒ तद॒पोद्धृ॑त्य निद॑धाति॒ ताꣳ स्थालीꣳ सन्नामक॑र्षां प्रमृ॑ज्य मे॒क्षणं॒ निद॑धाति॒ यऽए॒व प्रायणी॑यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति तऽउ॑दयनी॒यस्य॒ऽर्त्वि- जो भव॑न्ति॒ तद्यदे॒तत्समा॒नं य॒ज्ञे क्रि॒यते॒ तेन॑ बा॒हू स॒दृशौ॒ तेन॑ स॒रूपौ॑ ॥ २१॥ तदु॑ तथा॒ न कु॒र्यात्। काम॒मेवैतद्ब॒र्हिरनु॑प्रहरेदे॒वं मे॒क्षणं॑ निर्णि॑ज्य॒ स्थालीं॑ निद॒ध्याद्य ऽए॒व प्रायणी॑यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति तऽउ॑दयनी॒यस्य॒ऽर्त्विजो॒ भव॑न्ति य॒द्यु ते वि॑प्रे॒ताः स्यु॒रप्य॒न्यऽए॒व स्युः स यद्वै समा॑नीर्देव॒ता यज॑ति समा॒नानि॑ ह॒वीꣳषि॒ भव॑न्ति ते- नैव बा॒हू स॒दृशौ॒ तेन॑ स॒रूपौ॑ ॥ २२॥ स वै पञ्च प्रायणी॑ये दे॒वता॑ यज॑ति । प- ञ्चोदयनी॒ये तस्मा॒त्पञ्चेत्या॑हु॒रङ्गुल॑यः प॒ञ्चैत्यात्त॒त्कुभ्यू॑तं भवति न पत्नीः संया॑जयति पूर्वा॒र्धं वाऽअ॒न्वात्मनो॒ बाहू पूर्वा॒र्धमे॒वैतद्य॒ज्ञस्या॒भिसंस्क॑रोति॒ तस्मा॒त्कुभ्यू॑तं भव- ति॒ न पत्नीः संया॑जयति ॥ २३॥ ब्रा॒ह्मणम् ॥ २ [२.३.] ॥ ॥ दि॒वि वै सोम॑ आसी॒त् । अथेह॒ देवा॑स्ते देवा॑ अकामयन्ता॒ नः॑ सोमो॑ गच्छेते॒-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ३-४, कं० १५-२३ व १ शतपथब्राह्मण / ३६७ दिशा को पहचाना। इस (पथ्य-स्वस्ति) की दिशा उत्तर है ॥१५॥ पूर्व दिशा को अग्नि के द्वारा पहचाना। इसलिए अग्नि के पीछे से होकर पूर्व की ओर ले जाते हैं, और उसकी उपासना करते हैं। क्योंकि (अग्नि) के द्वारा उन्होंने पूर्व दिशा को पहचाना और पूर्व दिशा उसी की है ॥१६॥ दक्षिण दिशा को सोम के द्वारा पहचाना। इसलिए सोम-क्रय के पीछे उसको दक्षिण को ले जाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि सोम पितृ-देव वाला है। उसी के द्वारा उन्होंने दक्षिण दिशा को पहचाना। दक्षिण दिशा इसी की है ॥१७॥ सविता के द्वारा उन्होंने पश्चिम दिशा को पहचाना। क्योंकि सविता तपता है, इसीलिए वह पश्चिम को जाता है। उसी के द्वारा उन्होंने पश्चिम को पहचाना। पश्चिम दिशा उसी की है ॥१८॥ अदिति के द्वारा उन्होंने ऊर्ध्व (ऊपर की) दिशा को पहचाना। यह (पृथिवी) ही अदिति है। इसलिए इस पृथिवी पर ओषधियां ऊपर को उगती हैं। उसी के द्वारा उन्होंने ऊपर की दिशा को पहचाना। ऊपर की दिशा उसी की है ॥१९॥ (सोम के प्रति) जो आतिथ्य किया जाता है वह यज्ञ का शिर है। प्रायणीय और उदय- नीय (अर्थात् आरम्भ की और अन्त की क्रियाएं) यज्ञ के बाहू हैं। बाहू शिर के दोनों ओर रहते हैं। इसलिए प्रायणीय और उदयनीय आतिथ्य के दोनों ओर होती हैं ॥२०॥ कुछ लोग कहते हैं कि जो कृत्य प्रायणीय में हो, वही उदयनीय में भी हो; जो प्रायणीय की बर्हि हैं वही उदयनीय की भी। वह इसको वहाँ से हटाकर अलग रख देता है। थाली को भुने हुए कर्ष के साथ और चमचे (मेक्षणं) को माँजकर एक ओर रख देता है। जो प्रायणीय के ऋत्विज् होते हैं वही उदयनीय के भी होते हैं। ये यज्ञ में एक-से होते हैं। इसलिए एक-सा स्वरूप होने के कारण ये यज्ञ के बाहू कहलाते हैं ॥२१॥ परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। बर्हि को (आग में) डाल देना चाहिए और चमचे को भी, और थाली को माँजकर अलग रख देना चाहिए। जो प्रायणीय के ऋत्विज् हों वही उदय- नीय के भी हों। यदि कोई मर जाय तो दूसरे नियत कर लिये जायें। ये दोनों यज्ञ के बाहू इसलिए हैं कि इनके देवता एक ही हैं और आहुतियाँ एक ही। इस प्रकार इनका स्वरूप भी एक ही है ॥२२॥ प्रायणीय में पाँच देवताओं की आहुतियाँ दी जाती हैं, और उदयनीय में भी। इसलिए पाँच अंगुलियाँ यहाँ हैं और पाँच अंगुलियाँ वहाँ। प्रायणीय के अन्त में शम्यु होता है, पत्नी- संयाज नहीं होता। भुजाएं शरीर का अगला भाग हैं। यह प्रायणीय भी यज्ञ का अगला भाग है। इसलिए इसके अन्त में शम्यु होता है, पत्नी-संयाज नहीं होता ॥२३॥ अध्याय २—ब्राह्मण ४ सोम द्यौलोक में था, और देव यहां (पृथिवी पर) थे। देवों ने चाहा कि सोम हमारे समीप
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३६८ शतपथ ब्राह्मण नागतेन॒ धने॑न॒ह्वीति॒ तऽए॒ते मा॒येऽअ॑सृजन्त सुपर्णीं च क॒द्रूं च॒ तद्दि॒क्ष्यानां ब्रा॑- ह्मणे व्याख्यायते सौपर्णिकाद्रवं यथा॒ तदा॑स ॥ १॥ तेभ्यो गायत्री॒ सोम॒महा॑प- तत् । तस्या॒ऽआहर॑न्त्यै गन्ध॒र्व्वो विश्वावसुः॒ पर्य्युम्नात्ते देवा॒ अविदुः प्रच्युतो वै प॒रस्ता॒त्सोमो॒ऽथ नो नागच्छति गन्ध॒र्वा वै पर्य्यमोषिषुरिति॑ ॥ २॥ ते होचुः । यो- षित्कामा वै गन्धर्वा वाच॑मे॒वैभ्यः॒ प्रहि॑णवाम सा नः सह सोमे॒नाग॑मिष्यतीति तेभ्यो॒ वाचं॒ प्राहि॑ण्वन्त्सेनात्स॒ह सोमे॑नागच्छत् ॥ ३॥ ते गन्ध॒र्वा अन्वागत्या॑ब्रु- वन् । सोमो यु॒ष्माकं वागेवास्माक॒मिति तथेति देवा॒ अब्रुवन्निहो चेदागान्नैना- मभिषहेव नेष्ट वि॒ह्वयाम॑हाऽइति तां व्यह्वयन्त ॥ ४॥ तस्यै गन्ध॒र्वाः । वेदानॆव प्रोचि॒रऽइति वै वयं वि॒द्मेति वयं वि॒द्मेति ॥ ५॥ अथ देवाः । वीणामेव सृष्ट्वा वादयन्तो निगायन्तो निषेदुरिति वै ते वयं गास्याम॒ इति त्वा प्रमोदयिष्यामह ऽइति सा देवानुपाववर्त सा वै सा तन्मोघमुपाववर्त या स्तुवद्भ्यः शंस॑द्भ्यो नृत्तं॑ गीतम॒पाव॑वर्त तस्मा॒दप्ये॒तर्हि मोघसं॑हिता ए॒व योषा एवꣳ हि वागुपा- वर्तत तासु ह्यन्या अनु॒ योषा॒स्तस्माद्य एव नृत्यति यो गायति तस्मिन्नेवैता नि- मिश्नतमा-इव ॥ ६॥ तद्वा॒ऽएतदु॒भयं॑ दे॒वेष्वासी॑त् । सोमश्च वाक् स यत्सोमं क्री- णात्याग॒त्याऽए॒वागतेन यज्ञाऽइत्युनागतेन ह वै स सोमेन यजते योऽक्रीतेन यज॑ते ॥ ७॥ अथ यद्द्रुवा॒यामाज्यं॑ परिशिष्टं भव॑ति । तच्छु॒क्लां च॑तुष्कुलो विगृह्णा- ति ब॒र्हिषा हिर॑ण्यं प्रब॒ध्यावधाय जुहोति कृत्स्नेन पयसा जुहुवानीति समानङ्ग- न्वं॒ वै पयश्च॒हिर॑ण्यं चोभयꣳ ह्यमृिरेतस॒म् ॥ ८॥ स हिर॑ण्यमवदधाति । ए॒षा ते शुक्र तनूरेत॒दृचं॒ इति॒ वर्चो॒ वाऽए॒तद्यद्धिर॑ण्यं तया॒ सम्भव भ्राजं गहेति स प्रदा- ह तपा सम्भवे॑ति तया॒ सम्पृच्यस्वे॒त्ये॒वैतदाह भ्राजं गहेति सोमो वै भ्राट् सोमं गहेत्ये॒वैतदाह ॥ ९॥ तां यथै॒वादो देवाः । प्राहि॑ण्वन्त्सोमम॒हैवमे॒वैनामेष एत- त्प्रहि॑णोति॒ सोमम॒ह वाग्वै सोमक्रयणी निदानेन तामेतयाऽऽहुत्या प्रीणाति प्री-
का० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-१० शतपथब्राह्मण / ३६६ आ जाय तो उसके द्वारा यज्ञ करें। उन्होंने दो माया बनाईं, सुपर्णी और कद्रू। सुपर्णी और कद्रू की कथा धिष्ण्यों के ब्राह्मण में लिखी है ॥१॥ उनके लिए गायत्री सोम के पास उड़ गई। जब वह उसे ला रही थी तो गन्धर्व विश्वा- वसु ने उसको चुरा लिया। देवताओं ने जान लिया कि सोम अब द्युलोक में नहीं है, गन्धर्वों ने इसे चुरा लिया है ॥२॥ उन्होंने कहा—'गन्धर्व लोगों को स्त्रियां प्रिय हैं। उनके पास वाणी भेज दें। वह सोम के साथ हमारे पास चली आवेगी।' उन्होंने वाणी को भेजा और वह सोम को लेकर चली आई ॥३॥ गन्धर्व उसके पीछे-पीछे आये और कहने लगे कि 'सोम तुम्हारा और वाणी हमारी।' देवों ने कहा 'अच्छा। परन्तु यदि वह यहाँ आना चाहे तो उसको बलात्कार से न ले जाओ। उसको राजी करो।' इस प्रकार उन्होंने उसको राजी करना चाहा ॥४॥ गन्धर्वों ने उसके लिए वेदों का पाठ किया और कहने लगे—'हम जानते हैं, हम जानते हैं' ॥५॥ तब देवों ने वीणा बनाई और बजा-बजाकर कहने लगे कि 'हम इस प्रकार बजायेंगे, हम इस प्रकार तुझे प्रसन्न करेंगे।' वह देवों के पास चली आई। परन्तु वह व्यर्थ ही आई क्योंकि जो लोग स्तुति और प्रार्थना करते थे (अर्थात् वेद-पाठी गन्धर्व) उनसे हटकर गाने-बजानेवालों के पास आ गई। इसीलिए स्त्रियाँ आज तक व्यर्थ बातों में फँसी रहती हैं। जैसे वाणी ने किया वैसे ही अन्य स्त्रियाँ भी करती हैं, और जो गाता-बजाता है उसी पर वे मोहित हो जाती हैं ॥६॥ इस प्रकार सोम और वाणी दोनों देवों को मिल गये। सोम को खरीदा इसलिए जाता है कि अपनी सम्पत्ति से यज्ञ किया जा सके। यदि बिना खरीदे सोम से यज्ञ किया तो मानो नाजायज सम्पत्ति से यज्ञ किया गया ॥७॥ ध्रुवा में जो घी बचा था, उसको चार भाग करके जुहू में डाल देता है, और बर्हि (कुशा) से सोने का टुकड़ा बाँधकर (जुहू में) रख देता है और आहुति देने में यह समझता है कि मैं शुद्ध घी से आहुति देता हूँ, क्योंकि घी और सोना दोनों समान-जन्मा है। दोनों की उत्पत्ति अग्नि के वीर्य से हुई ॥८॥ सोने के टुकड़े को रखने में यह मन्त्र पढ़ता है—"एषा ते शुक्र तनूरेतद् वर्चः" (यजु० ४।१७)—"हे चमकनेवाले शुक्र या अग्नि ! यह (घी) तेरा शरीर है, यह (सोना) तेरी ज्योति है।" हिरण्य यानी सोना वस्तुतः ज्योति ही है। अब कहता है—"तया सम्भव भ्राजं गच्छ" (यजु० ४।१७)—"उससे मिल और ज्योति को प्राप्त कर।" 'उससे मिल' का अर्थ है 'उसके साथसंयुक्त हो जाय', 'ज्योति को प्राप्त कर' का अर्थ है 'सोम को प्राप्त कर', क्योंकि 'भ्राजं' या 'ज्योति' का अर्थ है 'सोम' ॥९॥ जिस प्रकार देवों ने वाणी को सोम के पास भेजा था, इसी प्रकार इसको भी वह सोम के पास भेजता है। वाणी ही सोम-क्रय करनेवाली है। इस आहुति से वह इसी को प्रसन्न करता है
३७० शतपथ ब्राह्मण तया॒ सोमं॑ क्रीणानीति॑ ॥१०॥ स॒ जुहोति । धू॒रसीत्येतद् वा अस्या एकं॒ नाम यद्धू॒रसीति॒ धृता॒ मन॑सेति॒ मन॑सा वाऽइ॒यं वाग्घृता॒ मनो॒ वाऽइ॒दं पु॒रस्ताद्वाच॒ इ- त्यं॒ वद॒ मैतद्वादी॒रित्यल॒ग्लामिव ह॒ वै वाग्वद॒त्यन्मनो॒ न स्यात्त॒स्मादाह॒ धृता॒ म- न॑सेति ॥११॥ जु॒ष्टा विष्ण॑व॒ऽइति॑ । जु॒ष्टा सोमा॒येत्ये॒वैतदाह॒ यन्म॑हि॒म इति॒ तस्या॑- स्ते॒ सत्यस॑वतः प्रस॒वऽइति॑ सत्यप्रसवा न एधि॒ सोमं॑ नोऽछेहीत्ये॒वैतदाह॒ तन्वो॒ यक्ष्म॑नशीय॒ स्वाहेति॒ स ह॒ वै तन्वो॒ यक्ष्म॑मश्नुते यो यज्ञस्योदृचं॒ गच्छ॑ति यज्ञस्योदृ- चं गछानीत्ये॒वैतदाह ॥१२॥ अथ॒ हिर॑ण्यमपोद्धरति । तन्मनु॒ष्येषु॒ हिर॑ण्यं करो- ति॒ स यत्स॒हिर॑ण्यं जुहुयात्प॒राङ् ह्यैवे॒तन्मनु॑ष्येभ्यो॒ हिर॑ण्यं प्र॒वृञ्ज्यात्तन्मनु॑ष्येषु हिर॑ण्यमभिग॒म्ये॑त ॥१३॥ सोऽपो॒द्धर॑ति । शु॒क्रम॑सि च॒न्द्रम॒स्यमृ॑तमसि वैश्वदे॒वम॑- सीति कृ॒त्स्नेन॒ पय॑सा ह्यवा पद्वेवे॒तदाह॒ शुक्रम॑सीति शु॒क्रꣳ ह्ये॑तच्च॒न्द्रम॑सीति चन्द्रꣳ॒ ह्ये॑तदमृ॑तमसीत्य॒मृतꣳ॒ ह्ये॑तद्वैश्वदे॒वम॑सीति वैश्वदे॒वꣳ ह्ये॑तत्प्रमुच्य तृणं॑ ब- र्॒हिष्य॑पिसृजति सूत्रेण॒ हिर॑ण्यं प्रब॒ध्नेति॑ ॥१४॥ अथाप॑रं चतुर्गृहीतमाज्यं॑ गृही॒त्वा । अ॒न्वार॒भस्व॒ यज॑मानेत्याहा॒पोर्णुवन्ति॒ शाला॑यै द्वा॑रे॒ दक्षि॑णतः सोमक्रय॒ण्युप॑तिष्ठते तत्प्र॒ह्निता॑मे॒वैना॑मे॒तत्सर्तो॒ प्राहि॑षीद्गा॒ग्वे सो॑मक्रयणी नि॒दाने॑न ता॒मेतया॒ऽभ्य॒त्याप्रे॑- षीत्प्री॒तया॒ सोमं॑ क्रीणानीति॑ ॥१५॥ अथोप॒निष्क्रम्या॑भिमन्त्रयते । चि॒दसि॒ मना॑- सीति चि॒त्तं वाऽइ॒दं मनो॑ वागनुवदति धीर॑सि दक्षि॑णेति धि॒या-धि॑या ह्ये॑त॒या म- नु॒ष्या॒ जुहु॑ष्य॒न्त्यनू॒क्तेनैव प्र॒कामो॒द्येने॑व गाथाभि॑रिव त॒स्मादाह॒ धीर॑सीति दक्षि॑णे- ति दक्षि॑णा ह्ये॑षा क्ष॒त्रिया॑सि य॒ज्ञिया॑सीति क्ष॒त्रिया॒ ह्ये॑षा य॒ज्ञिया॒ ह्ये॒षादिति॑र- स्युभयतःशी॒र्ष्णती स॒ यदेनया समा॒नꣳ स॒द्विप॑र्यासं॒ वद॑ति॒ यद॒परं॒ तत्पूर्वं॑ करोति यत्पूर्वं॒ तद॒परं॒ तेनोभयतःशी॒र्ष्णी त॒स्मादाहा॒दिति॑रस्युभयतःशी॒र्ष्णीति॑ ॥१६॥ सा नः॒ सु॒प्राची॒ सु॒प्रती॒च्येधी॑ति । सु॒प्राची न एधि॒ सोमं॑ नो॒ऽछेहीत्ये॒वैतदाह॒ सु॒प्रती॑- ची त एधि॒ सोमे॑न नः सह॒ पुन॒रेहीत्ये॒वैतदाह॒ तस्मा॑दाह॒ सा नः॒ सु॒प्राची॒ सु॒प्र-
कां० ३, अ० २, ब्रा० ४, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ३७१ कि इसको प्रसन्न करके ही सोम को क्रय करूँगा ॥१०॥ अब वह आहुति देता है इस मन्त्र से- "जूरसि" (यजु० ४।१७)- "तू स्तुतिकरनेवाला है।" 'जू' वाणी का एक नाम है। अब कहता है- "धृता मनसा" (यजु० ४।१७)- "मन से धारण की गई।" यह वाणी मन से धारण की जाती है क्योंकि पहले मन चलता है, और कहता है 'यह कह, यह मत कह।' यदि मन साथ न हो तो वाणी असंगत हो जाय, इसलिए वह कहता है 'मन से धारण की गई' ॥११॥ अब कहता है- "जुष्टा विष्णवे" (यजु० ४।१७)- "विष्णु के लिए प्रिय।" इसका तात्पर्य है 'सोम के लिए, जिसको हम प्राप्त हो रहे हैं।' अब कहता है— "तस्यास्ते सत्यसवसः प्रसवेः" (यजु० ४।१८)- "तुझ सत्य प्रेरणावाली की प्रेरणा के लिए।" अर्थात् तू सत्य प्रेरणवाली है। सोम के पास जा। अब कहता है— "तन्वो यन्त्रमशीय स्वाहा' (यजु० ४।१८)- "मैं अपने शरीर का बल प्राप्त करूँ।" जो यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करता है वह शरीर का बल भी प्राप्त करता है। इसका तात्पर्य है कि यज्ञ की पूर्णता प्राप्त करूँ ॥१२॥ अब वह सोने को (जुहू में से) निकालता है। इससे वह मनुष्यों को सोना देता है। यदि वह घी के साथ सोने की भी आहुति दे डाले तो मानो वह मनुष्यों से सोने को छीन ले अर्थात् मनुष्यों में सोना मिले ही नहीं ॥१३॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर सोने को निकालता है- "शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्व- देवमसि" (यजु० ४।१८)- "तू शुद्ध है, तू चमकदार है, तू सब देवों को प्रिय है।" सम्पूर्ण दूध से आहुति देकर जब कहता है कि 'तू शुक्र है' तो यह शुक्र ही है। 'तू चन्द्र है' कहता है तो यह चन्द्र ही है। 'तू अमृत है।' यह अमृत है ही। 'तू सब देवों को प्रिय है।' यह सब देवों को प्रिय है ही। अब तृण को खोलकर बर्हि के ऊपर डालता है और सूत्र के सोने को बाँधता है ॥१४॥ अब फिर घी के चार भाग करके कहता है— 'यजमान, चलो।' वे शाला के (दक्षिण और पूर्व के) द्वार खोलते हैं (और बाहर आ जाते हैं)। द्वार की दाहिनी ओर सोम-क्रय करने- वाली (गाय) खड़ी होती है। उसको सामने करके मानो उसने गाय को सोम-प्राप्ति के लिए भेज दिया, क्योंकि सोम-क्रयणी गाय ही वाणी है। इस आहुति से उसने इसी को प्रसन्न किया है, इस आशा से कि जब यह प्रसन्न हो जायगी तो मैं इससे सोम खरीद सकूँगा ॥१५॥ अब उसके पास जाकर अभिवादन करता है, यह मन्त्र पढ़कर- "चिदसि मनोसि" (यजु० ४।१६)- "तू चित् है, तू मन है।" वाणी चित् और मन की अनुगामिनी है। अब कहता है— "धीरसि दक्षिणासि" (यजु० ४।१६)- "तू बुद्धि है, तू दक्षिणा है।" बुद्धि से ही लोग जीविका कमाते हैं, वेदपाठ से या बातचीत करके या कथा कहकर। इसलिए कहा कि 'तू धी है।' उसको 'दक्षिणा' कहता है क्योंकि वह 'दक्षिणा' है ही। "क्षत्रियासि यज्ञियासि" (यजु० ४।१६)-"तू श्रेष्ठ है, तू पूज्या है।" वस्तुतः वह श्रेष्ठ और पूज्या है। "अदितिरसि उभयतः शीर्णी" (यजु० ४।१६)- "तू दो सिरवाली अदिति है।" क्योंकि वाणी से ही वह ठीक को बेठीक कहता है, पीछे को पहले कहता है। इसीलिए कहा कि 'तू दो सिरवाली अदिति है' ॥१६॥ अब कहता है— "सा नः सुप्राची सुप्रतीच्येधि" (यजु० ४।१६)- "वह हमारे लिए आगे और पीछे शुभ हो।" 'आगे शुभ हो' कहने से तात्पर्य है कि 'तू हमारे लिए सोम लाने के लिए आगे चल। और 'पीछे शुभ हो' से तात्पर्य है कि 'सोम के साथ लौट।' इसीलिए कहा कि 'तू
अध्याय-३, ब्राह्मण-१
तीच्येधीति ॥ १७॥ मित्र॒स्या प॒दि ब॑ध्नीता॒मिति॑ । वरु॒ण्या वा॒ऽए॒षा यद्र॒ज्जुः सा यद्र॒ज्ज्वा॒भिहि॑ता स्याद्वरु॑ण्या स्याद्यद्य॒नभि॑हिता स्यादय॑तेव स्यादितद्याऽश्र॑वरु॒ण्यं व्व- न्मैत्रꣳ सा यथा॒ रज्ज्वा॒भिहि॑ता य॒तेवम॒स्यै तद्भवति॒ यदा॑ह मित्र॒स्या प॒दि ब॑ध्नीता- मिति॑ ॥ १८॥ पू॒षाध्व॑नस्पा॒त्विति॑ । इ॒यं वै पृ॑थि॒वी पू॒षा य॒स्य वा॒ऽइ॒यम॑ध्वनोगो॒प्त्री भ॑वति॒ तस्य॑ न का च॒न ह्वला भ॑वति॒ तस्मा॑दाह पू॒षाध्व॑नस्पा॒त्विति॑ ॥ १९॥ इ॒- न्द्राया॑ध्यक्षायेति॑ । स्व॒ध्यक्ष्या॒सादित्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॒हेन्द्राया॑ध्यक्षायेत्यनु॑ त्वा मा॒ता म॑- न्यता॒मनु॑ पि॒तानु॒ भ्राता॒ सगर्भ्योऽनु॒ सखा॒ सयूथ्य॒ इति॑ सा य॒त्ते जन्म॒ तेन॑ नो॒ ऽनु॑मता॒ सोम॑म॒च्छेहीत्ये॒वैतदा॑ह॒ सा दे॒वि दे॒वम॒च्छेहीति॑ दे॒वी ह्ये॑षा दे॒वम॑र्हति य- द्धाक्सोमं॒ तस्मा॑दाह॒ सा दे॒वि दे॒वम॒च्छेहीतीन्द्रा॑य॒ सोम॒मितीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॑दाहेन्द्रा॑य॒ सोम॒मिति॑ रु॒द्रस्त्वा॒वर्त्तय॒त्वित्य॑प्रणाशा॒यैतदा॑ह रु॒द्रो हि नाति॑ प- शव॑ः स्व॒स्ति सोम॑सखा॒ पुन॒रेहीति॑ स्व॒स्ति नः॒ सोमे॑न स॒ह पुन॒रेहीत्ये॒वैतदा॑ह ॥ २०॥ तां य॒थैवादो दे॒वाः । प्रा॒हिण्वन्त्सोम॑म॒च्छ सैना॑न्त्स॒ह सोमे॑नाग॒च्छदे॒वमे॒वै- नामे॒ष ए॒तत्प्रहि॑णोति॒ 'सोम॑म॒च्छ सैना॑ꣳ स॒ह सोमे॑नाग॒च्छति॑ ॥ २१॥ तां य॒थैवादो दे॒वाः । व्यभ॑जन्त गन्ध॒र्वैः सा दे॒वानुपावर्त्ततैवमे॒वैनामेतद्यज॑मानो वि॒क्रीणी॑ते सा यज॑मानमुपाव॑र्त्तते ताम॒दीची॑म॒त्याकु॑र्वन्त्युदीची॒ हि मनु॑ष्याणां दि॒क्सोऽए॒व य॒ज्ञ- मानस्य॒ तस्मा॑दुदीची॑म॒त्याकु॑र्वन्ति ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [२.४] ॥ द्वितीयोऽध्यायः [१७.] ॥ ॥ स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति । वृ॒ङ्क्तेऽवैनामे॒तत्त्स्मात्स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति य॒त्र वै वाचः॑ प्र॒जाता॑नि॒ छन्दा॑ꣳसि स॒प्तपदा वै तेषां॑ परा॒र्ध्या शक्वरी तामे॒वैतत्पु॒रस्ता- दर्वाचीं॑ वृ॒ङ्क्ते तस्मा॑त्स॒प्त प॒दान्यनु॑निष्क्रामति ॥ १॥ स वै वाच॑ ए॒व रू॒पेणानु॑नि- ष्क्रामति । व॒स्व्स्य॒दिति॑रस्यादि॒त्यासि॑ रु॒द्रासि॑ च॒न्द्रासीति॑ व॒स्वी ह्ये॑षादि॒तिर्व्वै- षादि॒त्या ह्ये॑षा रु॒द्रा ह्ये॑षा च॒न्द्रा ह्ये॑षा बृह॒स्पति॑स्त्वा सु॒म्ने र॑म्णात्विति॒ ब्रह्म॑ वै
कां० ३, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १७-२२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३७३ आगे और पीछे शुभ हो' ॥१७॥ अब कहता है- "मित्रस्त्वा यदि बध्नीताम्" (यजु० ४।१६)-"मित्र तुझे पैर में बाँधे ।" क्योंकि रस्सी वरुण की होती है। यदि वह रस्सी से बँधेगी तो वरुण की हो जायगी। और यदि बाँधी न जायगी तो वश में न रहेगी। जो मित्र की है वह वरुण की नहीं है। जैसे गाय रस्सी से बँधकर वश में रहती है इसी प्रकार यह है, इसलिए कहा कि 'मित्र तुझे पैर में बाँधे' ॥१८॥ अब कहता है-"पूषाऽध्वनस्पातु" (यजु० ४।१६)-"पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे।" पूषा यह पृथिवी है। पृथिवी जिसकी मार्ग में रक्षा करती है वह विचलित नहीं होता। इसलिए कहा-'पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे' ॥१९॥ अब कहता है- "इन्द्राय अध्यक्षाय" (यजु० ४।१६)-"अध्यक्ष इन्द्र के लिए।" इसका अर्थ यह है कि 'वह सुरक्षित रहे।' अब कहता है-"अनु त्वा माता मन्यताम्, अनु पिता, अनु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्यः" (यजु० ४।२०) - "तुझे तेरी माता अनुमति दे, तेरा पिता, तेरा भ्राता, तेरा समूह में रहनेवाला सखा।" अर्थात् तेरे जो अपने सम्बन्धी हैं उनकी अनुमति से सोम को ला। अब कहता है-"सा देवि देवमच्छेहि" (यजु० ४।२०)-'देवि, तू देव के पास जा।" अर्थात् वाणी देवी है और सोम देव है। इसीलिये कहा कि 'देवि, तू देव के पास जा।' "इन्द्राय सोमम्" (यजु० ४।२०)-"इन्द्र के लिए सोम के पास जा।" इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए सोम के पास जा।' "रुद्रस्त्वावर्त्तयतु" (यजु० ४।२०)-"रुद्र तुझे सुरक्षित लौटा लावे।" यह उसकी रक्षा के लिए कहा, क्योंकि पशु रुद्र से आगे नहीं जा सकते। "स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि" (यजु० ४।२०) - "स्वस्ति हो। हे सोम-सखा, तू लौट आ।" इसका अर्थ है कि 'तू सोम लेकर वापस आ' ॥२०॥ जैसे पहले देवों ने उसको सोम के पास भेजा और वह सोम को लेकर वापस आ गई, इसी प्रकार वह सोम के पास जाती है और सोम लेकर वापस आ जाती है ॥२१॥ जैसे देवों ने गन्धर्वों के साथ उसका मोह न किया और वह देवों के पास आ गई, ऐसे ही यजमान उसको विद्वान करता है और वह यजमान के पास लौट आती है। वे उसको उत्तर की ओर ले जाते हैं। उत्तर मनुष्यों की दिशा है इसलिए यह यजमान की भी दिशा है। इसलिए वे उसे उत्तर की दिशा में ले जाते हैं ॥२२॥ अध्याय ३- ब्राह्मण १ उस (सोम-गौ) के पीछे सात पग चलता है। सात पग चलने का तात्पर्य यह है कि वह उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है। जब वाणी से छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्त का सात पदवाला शक्वरी था। वह इस छन्द को ऊपर से अपनी ओर खींचता है, इसलिए सात पग चलता है ॥१॥ वह वाणी के समान पग भरता है यह पढ़कर - "वस्व्यसि, अदितिरसि, आदित्यासि, रुद्रासि, चन्द्रासि" (यजु० ४।२१)-' 'तू वस्वी है, तू अदिति है, तू आदित्या है, तू रुद्रा है, तू चन्द्रा है।" यह वस्वी है, यह अदिति है, यह आदित्या है, यह रुद्रा है, यह चन्द्रा है। "बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रण्वातु" (यजु० ४।२१)-"बृहस्पति तुझको आनन्द में रक्खे।" बृहस्पति ब्रह्म है। इस