भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० २, ब्रा० ३-४, कं० १५-२३ व १ शतपथब्राह्मण / ३६७ दिशा को पहचाना। इस (पथ्य-स्वस्ति) की दिशा उत्तर है ॥१५॥ पूर्व दिशा को अग्नि के द्वारा पहचाना। इसलिए अग्नि के पीछे से होकर पूर्व की ओर ले जाते हैं, और उसकी उपासना करते हैं। क्योंकि (अग्नि) के द्वारा उन्होंने पूर्व दिशा को पहचाना और पूर्व दिशा उसी की है ॥१६॥ दक्षिण दिशा को सोम के द्वारा पहचाना। इसलिए सोम-क्रय के पीछे उसको दक्षिण को ले जाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि सोम पितृ-देव वाला है। उसी के द्वारा उन्होंने दक्षिण दिशा को पहचाना। दक्षिण दिशा इसी की है ॥१७॥ सविता के द्वारा उन्होंने पश्चिम दिशा को पहचाना। क्योंकि सविता तपता है, इसीलिए वह पश्चिम को जाता है। उसी के द्वारा उन्होंने पश्चिम को पहचाना। पश्चिम दिशा उसी की है ॥१८॥ अदिति के द्वारा उन्होंने ऊर्ध्व (ऊपर की) दिशा को पहचाना। यह (पृथिवी) ही अदिति है। इसलिए इस पृथिवी पर ओषधियां ऊपर को उगती हैं। उसी के द्वारा उन्होंने ऊपर की दिशा को पहचाना। ऊपर की दिशा उसी की है ॥१९॥ (सोम के प्रति) जो आतिथ्य किया जाता है वह यज्ञ का शिर है। प्रायणीय और उदय- नीय (अर्थात् आरम्भ की और अन्त की क्रियाएं) यज्ञ के बाहू हैं। बाहू शिर के दोनों ओर रहते हैं। इसलिए प्रायणीय और उदयनीय आतिथ्य के दोनों ओर होती हैं ॥२०॥ कुछ लोग कहते हैं कि जो कृत्य प्रायणीय में हो, वही उदयनीय में भी हो; जो प्रायणीय की बर्हि हैं वही उदयनीय की भी। वह इसको वहाँ से हटाकर अलग रख देता है। थाली को भुने हुए कर्ष के साथ और चमचे (मेक्षणं) को माँजकर एक ओर रख देता है। जो प्रायणीय के ऋत्विज् होते हैं वही उदयनीय के भी होते हैं। ये यज्ञ में एक-से होते हैं। इसलिए एक-सा स्वरूप होने के कारण ये यज्ञ के बाहू कहलाते हैं ॥२१॥ परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। बर्हि को (आग में) डाल देना चाहिए और चमचे को भी, और थाली को माँजकर अलग रख देना चाहिए। जो प्रायणीय के ऋत्विज् हों वही उदय- नीय के भी हों। यदि कोई मर जाय तो दूसरे नियत कर लिये जायें। ये दोनों यज्ञ के बाहू इसलिए हैं कि इनके देवता एक ही हैं और आहुतियाँ एक ही। इस प्रकार इनका स्वरूप भी एक ही है ॥२२॥ प्रायणीय में पाँच देवताओं की आहुतियाँ दी जाती हैं, और उदयनीय में भी। इसलिए पाँच अंगुलियाँ यहाँ हैं और पाँच अंगुलियाँ वहाँ। प्रायणीय के अन्त में शम्यु होता है, पत्नी- संयाज नहीं होता। भुजाएं शरीर का अगला भाग हैं। यह प्रायणीय भी यज्ञ का अगला भाग है। इसलिए इसके अन्त में शम्यु होता है, पत्नी-संयाज नहीं होता ॥२३॥ अध्याय २—ब्राह्मण ४ सोम द्यौलोक में था, और देव यहां (पृथिवी पर) थे। देवों ने चाहा कि सोम हमारे समीप