शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० २, ब्रा० २-३, कं० २४-३० व १ शतपथब्राह्मण / ३६३ “त्वमग्ने व्रतपा···यज्ञेष्वीड्यः” (यजु० ४।१६) ॥२४॥ अब लोग दीक्षित पुरुष के लिए जो भेंट देते हैं उस समय (अध्वर्यु) उससे यह जाप कराता है— “रास्वेयत् सोमा भूयो भर” (यजु० ४।१६)—“हे सोम ! इतने को दे, और अधिक को भरपूर कर ।” जो भेंट लाई जाती है उसका सोम ही देनेवाला है, इसलिए कहता है “रास्वेयत् सोमा भूयो भर ।” तात्पर्य यह है कि हे सोम ! इतना हमारे लिए दे और आगे के लिए अधिक ला। अब कहता है—“देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात्” (यजु० ४।१६)—“धन के दाता सविता देव ने यह धन मुझे दिया ।” इस प्रकार यह दान सविता से प्रेरित हुआ होता है ॥२५॥ सूर्यास्त से पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी को रोक।’ सूर्यास्त से पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। सूर्योदय के पहले (अध्वर्यु) कहता है, ‘दीक्षित पुरुष, तू वाणी को रोक।’ सूर्योदय के पीछे वह वाणी को छोड़ देता है। यह वह सिलसिला कायम रखने के लिए करता है। दिन का रात के साथ सिलसिला कायम करता है और रात का दिन के साथ ॥२६॥ ऐसा न हो कि वह (यज्ञशाला से) बाहर हो और सूर्य अस्त हो जाय, और न ऐसा हो कि वह सोता रहे और सूर्योदय हो जाय । यदि वह बाहर हो और सूर्यास्त हो जाय तो सूर्य उसके और रात के बीच में अन्तर डाल देगा, और अगर सूर्योदय के समय सोता रहेगा तो सूर्य उसके और दिन के बीच में अन्तर डाल देगा अर्थात् उसका सिलसिला (सन्तति) टूट जायगा। इसका कोई प्रायश्चित्त भी नहीं है। इसलिए इससे बचा रहे। स्नान से पहले जलों में न जावे और न वर्षा में भीगे, क्योंकि स्नान से पहले जलों में प्रवेश करना या वर्षा में भीगना अनुचित है। रुक- रुककर बोलता है, मनुष्य की भाँति नहीं। रुक-रुककर क्यों बोलता है और मनुष्य की भाँति क्यों नहीं ? इसका कारण नीचे दिया है—॥२७॥ देवों ने उस विजय को जो उनको प्राप्त है यज्ञ के द्वारा ही प्राप्त किया। उन्होंने कहा— ‘यह जगत् ऐसा कैसे हो जिसमें मनुष्य न रह सकें?’ उन्होंने यज्ञ के रस को चूस लिया जैसे मधु- मक्खी शहद को। यज्ञ को दुहकर उसे यूप से तितर-बितर करके छिप गये। चूंकि यूप के द्वारा तितर-बितर किया इसलिए इसका नाम यूप पड़ा ॥२८॥ ऋषियों ने इसको सुना। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। जैसे यज्ञ इकट्ठा किया गया, उसी प्रकार जो दीक्षित होता है वह यज्ञ को इकट्ठा करता है, क्योंकि वाणी ही यज्ञ है। और यज्ञ का जो भाग चूस लिया गया उसको रुक-रुककर बोलकर फिर स्थापित कर देता है और मनुष्य के समान नहीं बोलता। यदि वह मनुष्य की भाँति जल्दी-जल्दी बोले तो उस भाग को स्थापित न कर सके । इसलिए वह मनुष्य की भाँति नहीं बोलता, किन्तु रुक-रुककर बोलता है ॥२९॥ अब वह ‘दीक्षते’ अर्थात् दीक्षा लेता है। वाणी के लिए दीक्षा लेता है। यज्ञ के लिए दीक्षा लेता है। वाणी ही यज्ञ है। ‘धीक्षा’ को ही ‘दीक्षा’ कहते हैं ॥३०॥ अध्याय २-ब्राह्मण ३ अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है। (यहाँ प्रायणीय-इष्टि का वर्णन है।) जब देव