भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १७-२२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३७३ आगे और पीछे शुभ हो' ॥१७॥ अब कहता है- "मित्रस्त्वा यदि बध्नीताम्" (यजु० ४।१६)-"मित्र तुझे पैर में बाँधे ।" क्योंकि रस्सी वरुण की होती है। यदि वह रस्सी से बँधेगी तो वरुण की हो जायगी। और यदि बाँधी न जायगी तो वश में न रहेगी। जो मित्र की है वह वरुण की नहीं है। जैसे गाय रस्सी से बँधकर वश में रहती है इसी प्रकार यह है, इसलिए कहा कि 'मित्र तुझे पैर में बाँधे' ॥१८॥ अब कहता है-"पूषाऽध्वनस्पातु" (यजु० ४।१६)-"पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे।" पूषा यह पृथिवी है। पृथिवी जिसकी मार्ग में रक्षा करती है वह विचलित नहीं होता। इसलिए कहा-'पूषा तेरे मार्ग की रक्षा करे' ॥१९॥ अब कहता है- "इन्द्राय अध्यक्षाय" (यजु० ४।१६)-"अध्यक्ष इन्द्र के लिए।" इसका अर्थ यह है कि 'वह सुरक्षित रहे।' अब कहता है-"अनु त्वा माता मन्यताम्, अनु पिता, अनु भ्राता सगर्भ्योऽनु सखा सयूथ्यः" (यजु० ४।२०) - "तुझे तेरी माता अनुमति दे, तेरा पिता, तेरा भ्राता, तेरा समूह में रहनेवाला सखा।" अर्थात् तेरे जो अपने सम्बन्धी हैं उनकी अनुमति से सोम को ला। अब कहता है-"सा देवि देवमच्छेहि" (यजु० ४।२०)-'देवि, तू देव के पास जा।" अर्थात् वाणी देवी है और सोम देव है। इसीलिये कहा कि 'देवि, तू देव के पास जा।' "इन्द्राय सोमम्" (यजु० ४।२०)-"इन्द्र के लिए सोम के पास जा।" इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा 'इन्द्र के लिए सोम के पास जा।' "रुद्रस्त्वावर्त्तयतु" (यजु० ४।२०)-"रुद्र तुझे सुरक्षित लौटा लावे।" यह उसकी रक्षा के लिए कहा, क्योंकि पशु रुद्र से आगे नहीं जा सकते। "स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि" (यजु० ४।२०) - "स्वस्ति हो। हे सोम-सखा, तू लौट आ।" इसका अर्थ है कि 'तू सोम लेकर वापस आ' ॥२०॥ जैसे पहले देवों ने उसको सोम के पास भेजा और वह सोम को लेकर वापस आ गई, इसी प्रकार वह सोम के पास जाती है और सोम लेकर वापस आ जाती है ॥२१॥ जैसे देवों ने गन्धर्वों के साथ उसका मोह न किया और वह देवों के पास आ गई, ऐसे ही यजमान उसको विद्वान करता है और वह यजमान के पास लौट आती है। वे उसको उत्तर की ओर ले जाते हैं। उत्तर मनुष्यों की दिशा है इसलिए यह यजमान की भी दिशा है। इसलिए वे उसे उत्तर की दिशा में ले जाते हैं ॥२२॥ अध्याय ३- ब्राह्मण १ उस (सोम-गौ) के पीछे सात पग चलता है। सात पग चलने का तात्पर्य यह है कि वह उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है। जब वाणी से छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्त का सात पदवाला शक्वरी था। वह इस छन्द को ऊपर से अपनी ओर खींचता है, इसलिए सात पग चलता है ॥१॥ वह वाणी के समान पग भरता है यह पढ़कर - "वस्व्यसि, अदितिरसि, आदित्यासि, रुद्रासि, चन्द्रासि" (यजु० ४।२१)-' 'तू वस्वी है, तू अदिति है, तू आदित्या है, तू रुद्रा है, तू चन्द्रा है।" यह वस्वी है, यह अदिति है, यह आदित्या है, यह रुद्रा है, यह चन्द्रा है। "बृहस्पतिष्ट्वा सुम्ने रण्वातु" (यजु० ४।२१)-"बृहस्पति तुझको आनन्द में रक्खे।" बृहस्पति ब्रह्म है। इस