शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० १५-२० शतपथब्राह्मण./ ३५६ हैं कि यदि दीक्षित पुरुष को कोई रोग हो जाय तो जिस पदार्थ की इच्छा हो उसके द्वारा चंगा हो जाय, जैसे व्रत-भोज से चंगा हो जाता है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि यह अशुभ है। यह मानुषी प्रवृत्ति है, और जो मानुषी है वह यज्ञ के लिए अशुभ होती है। यदि दीक्षित पुरुष को रोग हो जाय तो वह जिससे चाहे उससे अपने को चंगा कर सकता है। पूर्णता होनी चाहिए (अर्थात् रोग की अवस्था में जो उपचार हो उसको यज्ञ का अंश क्यों बनाया जाय) ।।१५।। मानुषी काल को बिताने के पश्चात् अध्वर्यु उसे व्रत-भोज देता है-शाम का दूध रात के पिछले पहर में और प्रातः का दूध दोपहर के बाद। यह व्याकृति (Distinction) के लिए। इस प्रकार वह दैवी कार्य को मानुषी कार्य से अलग करता है ।।१६।। जब वह उसको व्रत-भोज देता है तो उससे जल छुआता है इस मन्त्र को पढ़कर- “दैवी धियं मनामहे सुमृडीकामभिष्टये. वर्चोधां यज्ञवाहसं सुतीर्था नोऽअसद्वशे” (यजु० ४।११) “अपने सुख की पूर्ति के लिए हम सुख देनेवाली, ब्रह्मवर्चस् को बढ़ानेवाली, यज्ञ को धारण करने- वाली दैवी बुद्धि को चाहते हैं। वह हमारे लिए सुतीर्थ और वश में रहनेवाली हो जाय ।” इससे पहले वह मानुषी भोजन के लिए अपने-आपको पवित्र बनाता था, अब दैवी भोजन के लिए इसीलिए यह ऊपर का मन्त्र पढ़ता है। जब-जब व्रत-भोज ग्रहण करने के लिए वह कोई विधि करे तो यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ।।१७।। अब वह व्रत-भोज को इस मन्त्र से ग्रहण करता है-“ये देवा मनोजाता मनोयुजो दक्ष- क्रतवस्ते नोऽवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यः स्वाहा” (यजु० ४।११)-“जो मनोजाता, मनोयुजः और दक्षक्रतु देव हैं, वे हमारी रक्षा करें, हमको सुरक्षित रखें। उनके लिए स्वाहा ।” इस प्रकार ग्रहण किया हुआ व्रत-भोज वषट्कार की आहुति के समान हो जाता है ।।१८।। व्रत-भोज को ग्रहण करने के अनन्तर वह नाभि को इस मन्त्र से छूता है—“स्वात्राः पीता भवत यूयमापोऽअस्माकमन्तरुदरे सुशेवाः । ताऽअस्मभ्यमयक्ष्माऽअनमीवाऽअनागसः स्वदन्तु देवी- रमृताऽऋतावृधः” (यजु० ४।१२)-“हे जलो, जो तुम पिये गये हो वह हमारे पेट में जाकर अच्छी सेवा करनेवाले होओ। ये पवित्र दिव्य और अमृतरूपी जल हमको नीरोग और बलिष्ठ करें ।” जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप हो जाता है और देवों में से एक हो जाता है। देवों की हवि किसी बाह्य वस्तु से मिली नहीं होती। अब यदि व्रत-भोज में कुछ मिल जाय तो ऐसा समझना चाहिए मानो देवों की हवि मिलावट कर दी गई। इस पाप का यह प्रायश्चित्त है जो ऊपर का मन्त्र पढ़ा गया (अर्थात् यजु० ४।१२), क्योंकि सम्भव है कि व्रत-भोज बनाने में कुछ मिलावट हो गई हो। जब व्रत-भोज पीने के पश्चात् नाभि-स्पर्श करें तो इस मन्त्र को पढ़कर करना चाहिए ।।१९।। जब पेशाब करे तो काले मृग के सींग से मिट्टी का ढेला उठावे और पढ़े—“इयं ते यज्ञिया तनूः” (यजु० ४।१३)—“यह तेरा यज्ञ-सम्बन्धी शरीर है ।” क्योंकि यह पृथिवी देवी है और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि इसे दूषित न करे। उस (पृथिवी) के इस यज्ञ- सम्बन्धी शरीर को (अर्थात् ढेले को) उठाकर इस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर द्वारा लघुशंका से अपने को पवित्र करता है यह कहकर—“अपो मुंचामि न प्रजांम्” (यजु०४।१३)—“जलों को छोड़ता हूँ, न कि सन्तान को ।” इस स्थान से दोनों निकलते हैं, जल भी और वीर्य भी। यहाँ वह जल को