शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० २, ब्रा० २, कं० २०-२४ शतपथब्राह्मण / ३६१ छोड़ता है, न कि प्रजा को। अब कहता है—‘‘अं॒होमुचः स्वाहाकृताः’’ (यजु० ४।१३)— अर्थात् ‘‘(यह जल) कष्ट को दूर करनेवाले और स्वाहा से पवित्र किये गये हैं’’ अर्थात् पहले दूध के रूप में पान किये गये थे। क्योंकि उदर में जो कष्ट-युक्त जल (मूत्र) होता है उसको दूर करते हैं। अब कहता है—‘‘पृथिवीमाविशत’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी में प्रवेश करो’’ (मूत्र को सम्बोधन करके)। अर्थात् यह कहता है कि ‘आहुति बनकर शान्त होकर पृथिवी में प्रवेश करे’ ॥२०॥ अब फिर ढेले को फेंक देता है यह कहकर—‘‘पृथिव्या संम्भव’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी से मिल जा।’’ यह पृथिवी देवी और यज्ञ की स्थली है। दीक्षित को चाहिए कि उसे मूत्र से अपवित्र न करे। उसके इस यज्ञ-सम्बन्धी शरीर को उठाकर उस अ-यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में मूत्र छोड़ा। अब उसको फिर यज्ञ-सम्बन्धी शरीर में रख देता है। इसलिए कहता है—‘‘पृथिव्या संभव’’ (यजु० ४।१३)—‘‘पृथिवी में मिल जा’’॥२१॥ अब अपने-आपको अग्नि के सुपुर्द करके सो रहता है। जो दीक्षित होता है वह देवों के समीप खिंच आता है। वह देवों में एक हो जाता है। देव तो सोते नहीं। परन्तु वह सोये बिना रह नहीं सकता। अग्नि देवों में व्रतपति है। इसलिए वह अपने को अग्नि के समर्पण करके सोता है यह पढ़कर—‘‘अग्ने॒ त्वं॑ सु॒ जागृ॑हि व॒यं॑ सु म॑न्दिषीमहि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हे अग्नि ! तू जाग और हम भली-भांति आराम कर लें।’’ अर्थात् वह अग्नि से कहता है कि तू जाग और हम सोवें। फिर वह कहता है—‘‘रक्षा णोऽअप्रयुच्छन्’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हमारी निरन्तर रक्षा कर।’’ अर्थात् प्रमादरहित होकर रक्षा कर। ‘‘प्रबुधे नः पुनस्कृधि’’ (यजु० ४।१४)—‘‘हम अच्छी तरह जागें।’’ अर्थात् हमको इस योग्य बना कि हम जब जागें तो स्वस्थ हों ॥२२॥ अब सो चुकने के पश्चात् फिर उसे आलस्य न आ जाय, इसलिए (अध्वर्यु) उससे यह मन्त्र बुलवाता है—‘‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन्पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मऽआगन्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘मेरा मन फिर आ गया। मेरी आयु फिर आ गई। मेरे प्राण फिर आ गये। मेरा आत्मा फिर आ गया। मेरी आंख फिर आ गई। मेरे कान फिर आ गये।’’ सोनेवाले के ये सब उससे दूर हो जाते हैं; केवल प्राण रह जाता है। इसलिए कहा—‘‘पुनर्मनः पुनरायुर्मऽआगन् पुनः प्राणः पुनरात्मा मऽआगन् पुनश्चक्षुः पुनः श्रोत्रं मऽआगन् । वैश्वानरोऽ- अदब्धस्तनूपाऽअग्निर्नः पातु दुरितादवद्यात्’’ (यजु० ४।१५)—‘‘वैश्वानर अर्थात् सब पुरुषों का हितकारक और ‘अदब्ध’ अर्थात् किसी से न सताया हुआ अग्नि हमको निन्दित (नाम न लेने योग्य) पाप से बचावे।’’ उसके कहने का तात्पर्य यह है कि जो सोने में या अन्यथा पाप हो सकते हों उनसे ईश्वर हमारी रक्षा करे। इसलिए यह मन्त्र पढ़ता है, ‘‘पुनर्मनः...दुरितादवद्यात् (यजु० ४।१५) ॥२३॥ जो पुरुष दीक्षित हुआ है वह यदि व्रत के विरुद्ध आचरण करता है या क्रोध करता है तो वह पाप करता है और व्रत को भंग कर देता है। दीक्षित पुरुष को क्रोध नहीं करना चाहिए। अग्नि देवों का व्रतपति है। इसलिए उसी का आश्रय लेता है यह मन्त्र पढ़कर—‘‘त्वमग्ने व्रत- पाऽअसि देवऽआ मर्त्येष्वा। त्वं यज्ञेष्वीड्यः’’ (यजु० ४।१६)—‘‘हे अग्निदेव ! आप व्रत के पालने- वाले हैं, मनुष्यों के बीच में। आप यज्ञों में प्रशंसा के योग्य हैं।’’ यह उस पाप का प्रायश्चित्त है। ऐसा पढ़ने से वह यह दोष नहीं करता और न उसका व्रत भंग होता है। इसलिए वह कहता है