शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 383, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० २, ब्रा० ३, कं० १-१५ शतपथब्राह्मण / ३६५ इस पृथिवी पर यज्ञ रचाने लगे तो उन्होंने इस पृथिवी को ही यज्ञ से बहिष्कृत कर दिया। उस पृथिवी ने उनके इस यज्ञ को मोहित (गड़बड़) कर दिया। उसने कहा कि ये लोग मेरे ऊपर तो यज्ञ रचते हैं और मुझी को यज्ञ से बाहर निकाले देते हैं ! उनको इस यज्ञ का प्रज्ञान न हुआ ॥१॥ उन्होंने कहा—'हमने जिस यज्ञ को इस पृथिवी में रचा, वह यज्ञ गड़बड़ कैसे हो गया ? हमको इसका प्रज्ञान क्यों न हो सका ?' ॥२॥ उन्होंने कहा—'हमने इसी पर यज्ञ रचा और इसी को यज्ञ से बाहर कर दिया। इसी ने यज्ञ को गड़बड़ा दिया। इसलिए इसी के पास चलें' ॥३॥ उन्होंने कहा—'जब हमने तेरे ही ऊपर यज्ञ रचा तो यह यज्ञ गड़बड़ा कैसे गया ? हमको इस यज्ञ का प्रज्ञान कैसे न हो सका ?' ॥४॥ उसने उत्तर दिया—'तुमने मेरे ही ऊपर यज्ञ रचा, मुझी को यज्ञ से बाहर कर दिया। मैंने ही यज्ञ को गड़बड़ा दिया। मेरा भाग निकाल दो। तब तुम यज्ञ को देखोगे, तभी तुमको इसका परिज्ञान होगा' ॥५॥ देवों ने कहा—'अच्छा ऐसा ही करेंगे। प्रायणीय और उदयनीय आहुतियाँ तेरी ही होंगी।' इसलिए प्रायणीय आहुति अदिति की होती है और उदयनीय भी अदिति की। यह पृथिवी ही अदिति है। तब उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको रच डाला ॥६॥ वह जो अदिति के लिए प्रायणीय चरु बनाता है, वह यज्ञ के दर्शन के लिए। 'यज्ञ को देखकर मैं (सोम) को खरीदूँगा और यज्ञ को रचूँगा' ऐसा सोचकर वह अदिति के लिए प्रायणीय चरु तैयार करता है। हवि तो तैयार हो गई थी, परन्तु (अदिति) देवता के लिए दी नहीं गई थी ॥७॥ अब इनको पथ्य-स्वस्ति (मार्ग का कल्याण) मिली। उसके लिए इन्होंने आहुति दी। वाणी ही पथ्य-स्वस्ति है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार उन्होंने यज्ञ को देखा और उसको रचा ॥८॥ अब उनको अग्नि मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग को देखा जो अग्नि का भाग था। यज्ञ का जो शुष्क भाग है वह अग्नि का है। उसको उन्होंने देखा और रचा ॥९॥ अब इनको सोम मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। अब उन्होंने यज्ञ के उस भाग को देखा जो सोम का भाग था। यज्ञ का जो गीला भाग है वह सोम का भाग है। उसको उन्होंने देखा और रचा ॥१०॥ अब इनको सविता मिला। उसके लिए उन्होंने आहुति दी। पशु ही सविता है। पशु ही यज्ञ हैं। उस यज्ञ को उन्होंने देखा। उस यज्ञ को रचा। इस प्रकार जिस देवता के लिए हवि बनाई गई उसी के लिए दी गई ॥११॥ अब वह पाँच देवताओं को आहुति देता है। क्योंकि जब यह यज्ञ गड़बड़ाया गया तो इसके पाँच भाग हो गये। इन पाँच देवताओं के द्वारा उनको उनका ज्ञान हुआ ॥१२॥ ऋतुएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा जाना गया ॥१३॥ दिशाएं भी गड़बड़ाकर पाँच हो गईं। इनको भी पाँच देवताओं के द्वारा पहचाना गया ॥१४॥ पथ्य-स्वस्ति के द्वारा उन्होंने उत्तर दिशा को पहचाना। इसलिए कुरु-पांचालों में वाणी ही उत्तर (उत्कृष्ट) होती है। यह (पथ्य-स्वस्ति) वाणी ही तो है। इसी के द्वारा उन्होंने उत्तर