शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ५, ब्रा० ६, क० १-६ शतपथब्राह्मण / ६५३ व्यूढ द्वादशाह धर्मः अध्याय ५—ब्राह्मण ६ जब द्वादशाह यज्ञ को (जो यज्ञ बारह दिन का हो वह द्वादशाह कहलाता है) व्यूढ छन्दों से करता है तो ग्रहों का क्रम बदल देता है (जिन छन्दों का क्रम बदल दिया जाय वे व्यूढ छन्द हैं)। उद्गाता और होता दोनों ही छन्दों के क्रमों को बदल देते हैं। पहले तो छन्दों के सामान्य क्रम से त्र्यह (तीन दिन का यज्ञ) होता है। इसमें वह ऐन्द्रवायव आदि ग्रहों को लेता है ॥१॥ चौथे दिन ग्रहों का क्रम बदल देता है। वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। इसमें वह आग्रयण आदि ग्रहों को लेता है। चौथा दिन प्रजापति का अपना है, और आग्रयण आत्मा है, प्रजापति आत्मा है। इसलिए आग्रयण से आरम्भ होनेवाले ग्रहों को लेता है ॥२॥ उस ग्रह को लेकर रखता नहीं। ये ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में कुछ विक्षोभ उत्पन्न हो जाय। यदि वह इसको रख देगा तो अवश्य ही प्राणों को विक्षुब्ध कर देगा। वे ग्रहों को लिये-लिये पास बैठे रहते हैं। अध्वर्यु दूसरे ग्रहों को लेता रहता है। जब वह ग्रहों को लेता है तो हर एक ग्रह की पारी आने पर वह हिङ्कार का उच्चारण करता है और ग्रह को रख देता है। अब साधारण पाँचवाँ दिन आता है। उस दिन ऐन्द्रवायव से आरम्भ होनेवाले ग्रह लिये जाते हैं ॥३॥ अब छठे दिन वह ग्रहों के क्रम को बदल देता है और वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन शुक्र से आरम्भ होनेवाले ग्रह लिये जाते हैं। यह जो छठा दिन है वह इन्द्र का अपना है। शुक्र वह है जो ऊपर तपता है (सूर्य) और वही इन्द्र है। इसलिए वह शुक्र से आरम्भ होनेवाले ग्रहों को लेता है ॥४॥ उसको लेकर रखता नहीं। ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ हो जाय। यदि रक्खेगा तो अवश्य ही प्राणों में विक्षोभ होगा। उसको लिये-लिये पास में बैठे रहते हैं। और अध्वर्यु दूसरे ग्रहों को लेता रहता है। इन ग्रहों के लेने में जब इनकी पारी आती है तो रख देता है ॥५॥ अब सातवें दिन वह ग्रहों के क्रम को बदल देता है, और वे छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन वह शुक्र ग्रह से आरम्भ करता है। यह सातवाँ दिन बृहस्पति का है। शुक्र वही है जो तपता है (सूर्य), और यह बृहत् अर्थात् बड़ा है। इसलिए शुक्र ग्रह से आरम्भ करता है ॥६॥ उसको लेकर रखता है। प्राण ग्रह हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ हो जाय। यदि रख देगा तो प्राणों में अवश्य विक्षोभ हो जायगा। उनको लिये-लिये पास बैठे रहते हैं। और अध्वर्यु दूसरे ग्रह निकालता रहता है। जब उसकी पारी आती है तो उसको रख देता है। आठवाँ दिन सामान्य होता है। उस दिन ऐन्द्रवायव ग्रह से आरम्भ करते हैं ॥७॥ अब नवें दिन वह ग्रहों के क्रम को बदलता है और वे लोग छन्दों के क्रम को बदल देते हैं। उस दिन आग्रयण ग्रह से आरम्भ करते हैं। यह नवाँ दिन जगती छन्द का होता है। आत्मा आग्रयण है। यह सब जगत् आत्मा है। इसलिए आग्रयण ग्रह से आरम्भ करते हैं ॥८॥ उसको लेकर रखता नहीं। ग्रह प्राण हैं। ऐसा न हो कि प्राणों में विक्षोभ उत्पन्न हो