शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ५, ब्रा० ८, क० ६-१६ शतपथब्राह्मण ६५१ “उरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः” (यजु० ८।४२)–“हे बड़ी धार वाली और दूधवाली ! मुझे फिर धन मिले।” ऐसा कहने से वह खाली को फिर भरता है ॥६॥ अब वह उसके दाहिने कान में जपता है–“इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे ज्योतिरदिते सर- स्वति महि विश्रुति । एता ते ऽअघ्न्ये१ नामानि देवेभ्यो मा सुकृतं ब्रूतात्” (यजु० ८।४३)–“हे गाय, तेरे इतने नाम हैं—इडा, रन्ता, हव्या, काम्या, चन्द्रा, ज्योति, अदिति, सरस्वती, मही, विश्रुती। तू देवताओं से मेरे पुण्य को कह दे।” वस्तुतः देवों में इसके यही नाम हैं। इसका यही तात्पर्य है कि देवों में तेरे जो-जो नाम प्रचलित हैं उनके द्वारा मेरे पुण्य को देवलोक में पहुँचा दे ॥१०॥ उसको छोड़ देते हैं। यदि वह किसी पुरुष की प्रेरणा के बिना ही पूर्व की ओर चल दे तो समझना चाहिए कि यह यजमान सफल हो गया; उसने कल्याणलोक को जीत लिया। यदि उत्तर को जाय तो समझना चाहिए कि यजमान इस लोक में ही यशस्वी होगा। यदि पश्चिम की ओर जाय तो समझना चाहिए कि धन-धान्य आदि से पूर्ण होगा। यदि दक्षिण की ओर जाय तो समझना चाहिए कि यजमान शीघ्र ही इस लोक से चल बसेगा। ऐसी सूचनायें हैं ॥११॥ ये जो गायें तीस से तीन-तीन हजार ऊपर होती हैं, उनमें इसको मिला देते हैं। जब विराट् छन्द को लेते हैं और उसका विश्लेषण करते हैं तो वह विच्छिन्न हो जाता है, अर्थात् उस विराट् छन्द के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। यह जो दश अक्षर का विराट् है वह पूरा-पूरा है। इस प्रकार दस अक्षर पूरा करने से विराट् छन्द पूरा हो जाता है। इस गाय को होता के अर्पण करना चाहिए। होता साहस्र (हजारवाँ) है, इसलिए इसको होता को देना चाहिए ॥१२॥ दो उन्नेताओं की नियुक्ति करनी चाहिए। इनमें से जो श्रौषट् न पढ़े उसी को इस गाय को दे। वह उन्नेता अपूर्ण है जो ऋत्विज् होता हुआ भी श्रौषट् नहीं पढ़ता। जिस विराट् छन्द का विश्लेषण कर दिया गया वह भी तो अपूर्ण है। इस प्रकार अपूर्ण में अपूर्ण को रखता है ॥१३॥ इस पर कुछ लोगों का कहना है कि हजार गायों से अधिक कुछ न देना चाहिए, क्योंकि हजार गायों का दान ही सब कामनाओं की पूर्ति कर देता है। परन्तु आसुरि का मत है कि जितनी इच्छा हो उतना देवे। अवश्य ही सहस्र गायों के दान से सब कामनायें पूर्ण हो जाती हैं। परन्तु जो अधिक दिया जाय अपनी इच्छा से दिया जाय ॥१४॥ अब यदि घोड़े जुते हुए रथ को देना हो तो या तो उसकी वशा की वपा की आहुति के पश्चात् देना चाहिए या अन्तिम आहुति के पीछे ॥१५॥ जब दक्षिणा के लिए (गायें) लावे तो दस-दस करके लावे; कम न हों। यदि किसी को एक गाय देनी हों तो दस गायें दस को दे देवे। यदि किसी को दो-दो देनी हों तो पाँच को दे देवे। यदि तीन-तीन देनी हों तो दस गायों को तीन को दे देवें। यदि पाँच-पाँच देनी हों तो उन दस को दो को दे देवे। इस प्रकार सौ तक। इस प्रकार यह पूर्ण विराट् परलोक में उसके लिए कामधेनु हो जाती है ॥१६॥ १. मंत्र में गाय का 'अघ्न्या' नाम भी है, किन्तु मांसाहारियों ने व्याख्या में इसलिए छोड़ दिया है कि (उनके द्वारा प्रक्षिप्त) पशु-बलि के प्रसंग झूठे न पड़ जायें। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती