शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० २, अ० ५, ब्रा० १, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २७७ प्रजापति के निकटतम है। पुरुष के दो पैर होते हैं, इसलिए चिड़ियों के भी दो पैर होते हैं ॥१॥ प्रजापति ने सोचा कि मैं पहले भी अकेला था और अब भी अकेला हूँ। इसलिये उसने दुबारा सृष्टि की। वह भी गुजर गई। ये वे कीड़े हैं जो साँप के अतिरिक्त हैं। कहते हैं कि उसने तीसरी बार सृष्टि की। वह भी गुजर गई। वे साँप हैं। याज्ञवल्क्य उसको दो प्रकार के बताते हैं, परन्तु ऋग्वेद के अनुसार तीन प्रकार के हैं ॥२॥ प्रजापति ने पूजा और श्रम करते हुए सोचा कि मेरी बनाई प्रजा गुजर कैसे जाती है ? तब उसे मालूम हुआ कि मेरी प्रजा बिना भोजन के मर जाती है। इसलिये उसने अपने स्तनों में पहले से ही दूध भर दिया। तब उसने प्रजा उत्पन्न की, और यह उत्पन्न प्रजा स्तनों का दूध पीकर जीती रही। ये वे हैं जो मरे नहीं ॥३॥ इसीलिये ऋषि ने ऐसा कहा—"प्रजा ह तिस्रोऽत्यायमीयुः" (ऋ० ८।१०१।१४)— "तीन प्रजाऐं मर चुकीं" यह उसके लिए कहा गया जो मर चुकीं। "न्यन्याऽअर्कमभितो विविश्रे" (ऋ० ८।१०१।१४)--"दूसरी आग (प्रकाश) के चारों ओर बस गई।" 'अग्नि' ही 'अर्क' है। इसलिये कहा कि जो प्रजा जीती रही वह अग्नि के चारों ओर बस गई ॥४॥ "महद्ध (बृहद्व) तस्थौ भुवनेष्वन्तः" (ऋ० ८।१०१।१४)—"महान् (आत्मा) भुवनों के भीतर रही।" यह प्रजापति के विषय में कहा गया। "पवमानो हरितऽआविवेश" (ऋग्वेद ८।१०१।१४)—"पवमान (पवित्र करनेवाला वायु) देशों में प्रवेश हो गया।" 'हरित' का अर्थ है दिशाएं। 'पवमान' यह हवा है। यह हवा ही दिशाओं में भर गई। इसी का ऋचा में संकेत है। जिस प्रकार प्रजापति ने इन प्रजाओं को उत्पन्न किया, उसी प्रकार ये उत्पन्न होते हैं। क्योंकि जब स्त्रियों और पशुओं के थनों में दूध आ जाता है तभी बच्चा पैदा होता है, और स्तन को पीकर ही वे जीते हैं ॥५॥ यह दूध ही अन्न है, क्योंकि प्रजापति ने पहले इसी भोजन को उत्पन्न किया। अन्न ही प्रजा है क्योंकि अन्न ही से यह उत्पन्न होती हैं। जिनके स्तनों में दूध है उसको पीकर ही वे जीते हैं। और जिनके दूध नहीं होता वे अपने बच्चों को जन्मते ही 'चुगा' देते हैं। इस प्रकार वे अन्न से ही जीते हैं, इसलिये अन्न ही प्रजा है ॥६॥ जो सन्तान की कामना करता है वह इस हवि से यज्ञ करता है। इस प्रकार अपने को प्रजापतिरूपी यज्ञ बना लेता है ॥७॥ अग्नि का पुरोडाश आठ कपालों में होता है। अग्नि ही देवतागणों का मुख और उत्पादक है। वह प्रजापति है। इसलिए अग्नि के लिए पुरोडाश होता है ॥८॥ इसके पीछे सोम का चरु होता है। सोम वीर्य है और वह उत्पादक अग्नि में है। वह