शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० १, ब्रा० २, कं० १३-२२ शतपथब्राह्मण / ११ चढ़े।” यज्ञ का नाम विष्णु है। यज्ञ ने ही अपने पराक्रम से देवों को पराक्रमयुक्त किया जो पराक्रम कि देवों में है। पहले पैर से पृथिवी को, दूसरे से अन्तरिक्ष को, तीसरे से द्यौलोक को। इस यजमान के लिए भी यह विष्णु नामक यज्ञ इस सब पराक्रम को प्राप्त कराता है ॥१३॥ अब वह (चावलों को देखता है और) गाड़ी को सम्बोधन करके इस मन्त्रांश (यजु० १।६) का जाप करता है— “वायु के लिए खुल।” वायु प्राण है। इस मन्त्र के जाप से वह यजमान के प्राण को खुली वायु प्रदान करता है ॥१४॥ (अगर चावलों पर कोई तिनका या घास आ जावे तो) इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को पढ़कर उड़ाता है— “राक्षस भाग गया।” यदि न हो, तो भी छू ले और इस मन्त्र को पढ़ ले। इससे राक्षस दूर भाग जाय ॥१५॥ अब वह चावलों को इस मन्त्रांश (यजु० १।६) को जपकर छूता है— “पांचों इसको ले लेवें।” ‘पांचों’ का अर्थ है पांच अंगुलियां; यज्ञ को भी पांक्त (पांच वाला) कहते हैं। इस प्रकार यज्ञ को धारण करता है ॥१६॥ यजु० १।१० के इस अंश को पढ़कर (चावल) लेता है— “देव सविता की प्रेरणा से, पूषा के दोनों हाथों से अग्नि के लिए तुझको लेता हूँ।” सविता देवों का प्रेरक है। सविता की इसी प्रेरणा से इसको लेता है, अश्विन की दोनों भुजाओं से। दोनों अध्वर्यु अश्विन हैं। “पूषा के दोनों हाथों से”, पूषा बांटनेवाला है, जो हाथों से भागों को बांटता है। देव सत्य हैं। मनुष्य अनृत है। इस प्रकार सत्य के द्वारा ही चावलों को ग्रहण करता है ॥१७॥ अब देवताओं का नाम निर्देश करता है। जब अध्वर्यु हवि देने को होता है तो सभी देव घिर आते हैं, ‘वह मुझको देगा, वह मुझको देगा’ इस प्रकार सोचकर। इस प्रकार वह आये हुए देवों में सामञ्जस्य उत्पन्न करता है ॥१८॥ देवों के नामों के निर्देश का एक प्रयोजन यह भी है कि जिन देवताओं के लिए हवि ग्रहण की जाती है उन देवताओं का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे यजमान की इच्छाओं की पूर्ति करें, इसलिए भी देवताओं का निर्देश करता है। पूर्ववत् देवताओं के लिए निर्देश करके—॥१९॥ वह (बचे हुए चावलों को) यजु० १।११ के इस अंश को जपकर छूता है— “विभूति के लिए तुझको, न कि शत्रु के लिए।” जितना वह लेता है उतनी ही उसकी पूर्ति कर देता है ॥२०॥ अब (गाड़ी पर बैठकर) पूर्व की ओर देखता है इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को जपकर, “मैं प्रकाश का अवलोकन करूँ।” गाड़ी ढकी होती है, मानो उसकी आंख पापयुक्त है। यज्ञ प्रकाश है, यज्ञ दिन है, यज्ञ देव है, यज्ञ सूर्य है। इस प्रकार वह प्रकाशरूपी यज्ञ का अवलोकन करता है ॥२१॥ इस मन्त्रांश (यजु० १।११) को पढ़कर गाड़ी से उतरता है— “दरवाजोंवाले पृथिवी पर सुदृढ़ रहें।” दरवाजोंवाले घर हैं। जब अध्वर्यु यज्ञ के साथ चलता है तो सम्भव है कि उसके पीछे यजमान के घर टूट जायें और उसका परिवार नष्ट हो जाय। अतः इस प्रकार यजमान के घर को भूमि पर सुदृढ़ करता है कि वे टूटें न और परिवार नष्ट न हो। इसलिए वह कहता है,