भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ३, ब्रा० ४, क० १४-२२ शतपथब्राह्मण / ३६१ लोग आते हैं और वह पहले उनका अभिवादन करता है और कल्याणकारी होता है, इसीलिए कहा, ‘भद्रो मे ऽ असि’ इत्यादि। यह भुवनों का पति है। इसलिए कहा है ‘चल’। “विश्वान्यभि धामानि” (यजु० ४।३४)-“सब धामों के लिए।” ‘विश्वानि धामानि’ से तात्पर्य है अंगों से। “मा त्वा परिपारिणो विदन् मा त्वा परिपन्थिनो विदन् मा त्वा वृकाऽअघायवो विदन्” (यजु० ४।३४)-“तुझे लुटेरे न मिलें, तुझे डाकू न मिलें, तुझे खाऊ भेड़िये न मिलें।” यह इसलिये कहता है कि दुष्ट राक्षस उसको किसी प्रकार से न सतावें ॥१४॥ “श्येनो भूत्वा परापत” (यजु० ४।३४)-“बाज होकर उड़ जा।” उसको पक्षी बनाकर उड़ाता है। जो बलवान् होता है, दुष्ट राक्षस उसका पीछा नहीं करते। श्येन या बाज सब पक्षियों में बलवान् होता है। उसको बाज बनाकर उड़ाता है। इसलिये कहा, ‘श्येनो भूत्वा’ आदि ॥१५॥ अब वे उसके शरीर को लाते हैं। “यजमानस्य गृहान् गच्छ तन्नौ संस्कृतम्” (यजु० ४।३४)—“यजमान के घरों को जा, जो हमारे लिए तैयार किया हुआ है।” यह बहुत स्पष्ट है ॥१६॥ अब सुब्रह्मण्य-सम्बन्धी जाप करता है। जैसे जिन लोगों के लिए खाना पकाना हो उनसे कहे कि मैं आपके लिए अमुक दिन भोजन बनाऊँगा, इसी प्रकार देवताओं के लिए यज्ञ का निवेदन करता है। ‘सुब्रह्मण्यमो ३ म्’ ऐसा तीन बार कहता है, क्योंकि ब्रह्मा ही देवताओं को प्रेरणा करता है। तीन बार कहने का प्रयोजन यह है कि यज्ञ के तीन भाग हैं ॥१७॥ 'इन्द्र, आ।' इन्द्र यज्ञ का देवता है। इसलिए कहा कि इन्द्र आ। ‘आ जा; घोड़ोंवाले मेधातिथि के भेड़े, आ ! वृषणश्व की स्त्री (या बाणी), आ ! भैंस के सवार, आ ! अहल्या के जार या उपपति, आ !' इन प्रकार वह उसको उसके व्यवहार में प्रसन्न करता है। (पता नहीं कि इन्द्र के ये नाम क्यों हैं ? या इनका वास्तविक अर्थ क्या है) ॥१८॥ ‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’ (ये भी इन्द्र के ही नाम मालूम होते हैं)। आजकल आरुणि ने यह वाक्य निकाला है अर्थात् ‘कौशिक, ब्राह्मण, गौतम कहलानेवाले’। यदि जी चाहे तो इस वाक्य को कहे, जी चाहे न कहे। ‘इतने दिनों में सोम-यज्ञ होगा।' यहाँ जितने दिनों में होनेवाला हो उनके नाम ले दे ॥१९॥ ‘देव और ब्राह्मण, आओ !' यह वह देवों और ब्राह्मणों से कहता है, क्योंकि इन्हीं देवों और ब्राह्मणों की उसको आवश्यकता है ॥२०॥ अब प्रतिप्रस्थाता शाला के आगे अग्नि और सोम के पशु को लाता है। जो दीक्षा लेता है वह अपने-आपको अग्नि और सोम को दाढ़ों में रख देता है। दीक्षा की हवि वस्तुतः अग्नि और विष्णु की होती है। जो विष्णु है वही सोम है। हवि वही है जो दीक्षा लेता है। इस प्रकार उन्होंने उसको दाढ़ों में दबा लिया है और इस पशु के द्वारा ही उसका छुटकारा होता है ॥२१॥ कुछ लोग आहवनीय में से जलती लकड़ी निकाल लाते हैं यह कहते हुए, ‘यह अग्नि है, यह सोम है। इन्हीं दोनों के सहारे हमारा उद्धार होगा।' परन्तु ऐसा नहीं करना चाहिए। जहाँ कहीं वे हों वे साथ ही होते हैं ॥२२॥