शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० १, अ० २, ब्रा० १, क० १२-२१ शतपथब्राह्मण / २५ नहीं। अतः कहता है-“सब दिशाओं के लिए।” शेष कपालों को वह चुपचाप रख देता है या इस मन्त्रांश को पढ़कर (यजु० १।१८)-“तुम चित हो, तुम ऊर्ध्वचित हो” (चिने हुए हो, ऊपर को चिने हुए हो) ॥१२॥ अब उनको अंगारों से ढक देता है इस मन्त्रांश (यजु० १।१८ c) को पढ़कर- “भृगु और अंगिरसों के तप से तपो।” भृगु और अंगिरसों का तेज बहुत बलिष्ठ है। इसीलिये वह इसको अंगारों से ढक देता है ॥१३॥ अब जिसने दो पत्थरों को चमड़े पर रखा था वह उस चमड़े को यजु० १।१६ के इस मन्त्रांश को पढ़कर उठाता है-“तू शर्म अर्थात् कल्याणप्रद है।” अब उसी मन्त्र के अगले टुकड़े को पढ़कर झाड़ता है-“राक्षस झड़ गये! शत्रु झड़ गये!” अर्थ वही है। अब उसको पश्चिम की ओर गर्दन हो इस प्रकार बिछा देता है, इस मन्त्रांश को पढ़कर-“तू अदिति का चमड़ा है। अदिति तुझे स्वीकार करे।” इसका तात्पर्य वही है ॥१४॥ अब उस पर दृषद अर्थात् नीचे का पाट रखता है इस मन्त्रांश को पढ़कर-“तू पहाड़ी पत्थर है। अदिति का चमड़ा तुझे स्वीकार करे।” यह पत्थर भी है और पहाड़ी भी। यह जो कहा, 'अदिति का चमड़ा तुझे स्वीकार करे' इसका तात्पर्य है कि इसमें और चमड़े में सम्बन्ध स्थापित हो जाय जिससे वे एक-दूसरे को हानि न पहुँचायें। नीचे का पाट पृथिवी का रूप है ॥१५॥ अब उसके ऊपर शमी¹ को रखता है और इस प्रकार कि उसका सिरा उत्तर की ओर रहे, यह मन्त्रांश (यजु० १।१६) पढ़कर-“तू द्यौ लोक को थामनेवाला है।” यह अन्तरिक्ष का रूप है। द्यौ और पृथिवी अन्तरिक्ष के द्वारा ही थमे हुए हैं। इसलिये कहता है 'तू द्यौलोक को थामनेवाला है' ॥१६॥ अब ऊपर के पाट (उपल) को नीचे के पाट पर रखता है यह मन्त्रांश (यजु० १।१६) पढ़कर-“तू पर्वत से उत्पन्न हुआ पाट है। पहाड़ी तुझे स्वीकार करे।” यह पाट छोटा होता है, इसलिये यह नीचे के बड़े पाट की लड़की हुआ। इसलिये नीचे के पाट को पर्वती और ऊपर के पाट को पार्वतीय कहा—'पर्वती पार्वतीय को स्वीकार करे।' क्योंकि सजातीय सजातीय को स्वीकार करता है। इस प्रकार वह इन दोनों पाटों में सम्बन्ध स्थापित करता है, जिससे वे एक- दूसरे को न सतावें। यह द्यौलोक का रूप है। या ये दोनों पाट दो हनु या जबड़े हैं और शमी जीभ (जिह्वा) है। इसीलिये शमी से पाटों को थपथपाता है। जीभ से ही तो बोला जाता है ॥१७॥ अब यजु० १।२० से नीचे के पाट पर हवि को छोड़ता है-“तू धान्य है। देवों की तृप्ति कर।” हवि इसलिये ली जाती है कि देवताओं की तृप्ति हो सके ॥१८॥ अब यजु० १।२० को पढ़कर पीसता है-“तुझको प्राण के लिए, उदान के लिए, व्यान के लिए, मैं यजमान के जीवन में वृद्धि करूँ।” अब पिसे हुए भाग को चमड़े पर छोड़ता है यह पढ़कर-“सविता देव सोने के हाथोंवाला, छिद्ररहित हाथों से तुझे स्वीकार करे” ॥१९॥ वह इसको इस प्रकार इसलिये पीसता है कि हवि देवताओं का जीवन है। अमरों के लिए अमृत है। अब उखली-मूसली (उलूखल-मुसल) और दो पाटों (दृषद-उपल) से हवि को पीसते हैं ॥२०॥ यह जो कहा कि 'प्राण के लिए तुझको, उदान के लिए तुझको' इससे प्राण और उदान धारण कराता है। 'व्यान के लिए तुझको' इससे व्यान को धारण कराता है। 'बड़ी आयु हो', इससे १. शमी के द्वारा चक्की का नीचे का पाट ऊपर के पाट से संयुक्त रहता है।