भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ५, ब्रा० ३, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मणं / ४२७ भीतर डालता है ॥३॥ यूप उसके सिर की चोटी है। अग्नीध्रीय और मार्जालीय उसके बाहू हैं ॥४॥ सदः (ऋत्विजों का स्थान) उसका उदर है। इसलिए सदः में ही भोजन करते हैं। इस संसार में जो कुछ खाया जाता है वह सब उदर में ही रखा जाता है। इसको 'सदस्' इसलिए कहते हैं कि इसमें सब देव बैठे थे (आसीदन्), और सब गोत्रों के ब्राह्मण इसी में बैठते हैं ॥५॥ और पिछली जो दो अग्नियां हैं वे पैर हैं। तानने से यज्ञ उतना ही हो जाता है जितना पुरुष है। इसलिए कहा है कि यज्ञ पुरुष है ॥६॥ हविर्धान-गृह के दोनों ओर द्वार होते हैं। सदस् के भी दोनों ओर द्वार होते हैं। इसी प्रकार पुरुष के भी दोनों ओर छिद्र होते हैं। जब हविर्धान धुल जाते हैं तो वह उनमें प्रवेश करता है ॥७॥ वे उनको घुमा देते हैं, दाहिना दक्षिण की ओर और बायां उत्तर की ओर। जो बड़ा होता है वह दाहिना होता है ॥८॥ घुमाये हुए उन पर एक चटाई रखते हैं। यदि चटाई न मिले तो बेत को चीरकर चटाई के समान बना लें ! आगे के द्वार में टट्टी लगाते हैं। दो सीधी टट्टियां खड़ी करके गाड़ियों को उनके बीच में रखते हैं और उनके ऊपर चटाई या बेत का पाल-सा डाल देते हैं ॥६॥ अब वह शाला में जाकर और चार चम्मच घी लेकर सविता की प्रेरणा के लिए आहुति देता है, क्योंकि सविता देवों का प्रेरक है। वह सोचता है कि सविता की प्रेरणा के लिए मैं यज्ञ करूँगा। इसलिए वह सविता के लिए आहुतियां देता है ॥१०॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है—"युञ्जते मनऽउत युञ्जते धियः" (यजु० ५।१४)— "मन को लगाते हैं और बुद्धियों को लगाते हैं।" मन और वाणी से यज्ञ किया जाता है। जब कहता है 'युञ्जते मन' तब मन को लगाता है। जब कहता है 'युञ्जते धियः' तो वाणी को लगाता है, क्योंकि इसी वाणी के द्वारा मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जीविका कमाते हैं, वेदपाठ द्वारा या बातचीत द्वारा, या गीत गाकर। उन दोनों (मन और बुद्धि) को लगाकर यज्ञ किया जाता है ॥११॥ "विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः" (यजु० ५।१४)—"बड़े ज्ञानी, विप्र के विप्र।" ये जो वेदपाठी विद्वान् ब्राह्मण हैं उनका नाम विप्र है। उन्हीं के विषय में यह कथन है। 'बृहतो विपश्चितः' यह यज्ञ के विषय में है। "वि होत्रा दधे वयुना विदेकऽइत्" (यजु० ५।१४)—"एक वयुनावित् अर्थात् सर्वज्ञ ने ही होताओं का काम निश्चित किया है" [नोट—'वयुनं वेत्तेः कान्तिर्वा प्रज्ञा वा'—यास्क, निरुक्तं ५।१५]—"मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा" (यजु० ५।१४)—"देव सविता की स्तुति बड़ी है।" यह कहकर प्रेरक सविता के लिए आहुति देता है ॥१२॥ अब फिर चार चम्मच घी लेकर शाला के बाहर निकलता है। दक्षिण द्वार से पत्नी को निकालते हैं। दायें हविर्धान के दायें पहिये के मार्ग में सोना रखकर आहुति देता है, यह मन्त्र पढ़कर—"इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पाँसुरे स्वाहा" (यजु० ५।१५ तथा ऋ० १।२२।१७)—"विष्णु ने इस संसार को पार किया। उसने तीन बार पग रक्खा। यह