शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 475, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंका० ३, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ११-२२ शतपथब्राह्मण / ४५७ कि धुरे को हानि न पहुँचे। चूंकि वे गाड़ी में ले जाते हैं, इसलिए ऐसा करने से गाड़ी में कोई रुकावट नहीं होती। (अर्थात् वृक्ष को काटते समय नीचे से काटना चाहिए जिससे गाड़ी उस ठूंठ के ऊपर से निकल सके और गाड़ी का धुरा अटक न जाय) ॥११॥ उसको पूर्व की ओर गिरावे क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है, या उत्तर की ओर क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है, या पश्चिम की ओर। परन्तु दक्षिण की ओर गिरने से बचाना चाहिए क्योंकि दक्षिण पितरों की दिशा है। इसलिए दक्षिण की ओर गिराना नहीं चाहिए ॥१२॥ उस गिरते हुए वृक्ष को सम्बोधन करके यह मन्त्र पढ़े—"द्यां मा लेखीरन्तरिक्षं मा हिँ॒सीः पृथिव्या सम्भव” (यजु० ५।४३)—“द्योलोक को मत छील, अन्तरिक्ष को हानि मत पहुँचा। पृथिवी से मिल।” जो वृक्ष यूप के लिए काटा जाता है वह वज्र हो जाता है। इस वज्र से ये लोक काँप जाते हैं। इसलिए वह इस प्रकार इन लोकों के लिए उसको शान्त करता है। इस प्रकार शान्त हुआ वह इनको हानि नहीं पहुँचाता ॥१३॥ ‘द्यां मा लेखी:’ का तात्पर्य है कि द्योलोक को हानि न पहुँचा। ‘अन्तरिक्षं मां हिँ॒सी:’ तो स्पष्ट है। ‘पृथिव्या सम्भव’ से मतलब है कि तू पृथिवी के अनुकूल हो जा। “अयँ॒ हि त्वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभागाय” (यजु० ५।४३)—“इस तेज परशु ने तुझको बड़े सौभाग्य के लिए आगे बढ़ाया है।” क्योंकि वह तेज कुल्हाड़ी ही तो इसको आगे को बढ़ाती है ॥१४॥ अब ठूंठ पर आहुति देता है कि कहीं वहाँ से दुष्ट राक्षस न निकल पड़ें। घी वज्र है। इस वज्ररूपी घी से दुष्ट राक्षसों को रोकता है। इस प्रकार दुष्ट राक्षस उसमें से उत्पन्न नहीं होते। या घी वीर्य है। वह इस प्रकार वृक्ष को वीर्य-युक्त करता है, और उस ठूंठ के वीर्य में से वृक्ष उत्पन्न होते हैं ॥१५॥ इस मन्त्र से आहुति देता है—“अतस्त्वं देव वनस्पते शतवल्शो विरोह सहस्रवल्शा वि वयँ॒ रुहेम’ (यजु० ५।४३)—“हे वनस्पते, तू इसमें से सौ कुल्होंवाला होकर उग, और हम हजार कुल्हेवाले होकर उगें।” यह स्पष्ट है ॥१६॥ अब वह उसे काटता है। जितना पहले काटा जाय उतना ही रहने देना चाहिए ॥१७॥ पाँच हाथ (अरत्नि) भरके काटना चाहिए। यज्ञ पाँच अंगोंवाला है। पशु भी पाँच अंगोंवाला है। साल में ऋतुएँ भी पाँच होती हैं। इसलिए पाँच हाथ का काटना चाहिए ॥१८॥ या छः हाथ-भर काटे। वर्ष में छः ऋतुएँ होती हैं। वर्ष वज्र है। यूप वज्र है। इसलिए छः हाथ का काटना चाहिए ॥१९॥ या आठ हाथ-भर काटे। आठ अक्षर की गायत्री होती है। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए आठ हाथ-भर काटे ॥२०॥ या नौ हाथ का काटे। यज्ञ तीन अंगवाला होता है, और नौ तीन अंगोंवाला है। इस- लिए नौ हाथ का काटे ॥२१॥ या ग्यारह हाथ का काटे। त्रिष्टुप् में ११ अक्षर होते हैं। त्रिष्टुभ् वज्र है। यूप भी