भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० ३, अ० ६-७, ब्रा० ४-१, कं० २२-२७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ४५६ वज्र है। इसलिए ११ हाथ का काटे ॥२२॥ या बारह हाथ-भर काटे। साल में बारह मास होते हैं। वर्ष वज्र है। यूप भी वज्र है। इसलिए बारह हाथ का काटे ॥२३॥ या तेरह हाथ का काटे। वर्ष में तेरह मास होते हैं। वर्ष वज्र है। यह यूप वज्र है। इसलिए तेरह हाथ-भर का काटे ॥२४॥ या पन्द्रह हाथ का काटे। पन्द्रह वज्र है। यूप भी वज्र है। इसलिए पन्द्रह हाथ का काटे ॥२५॥ वाजपेय यज्ञ का यूप १७ हाथ का होता है। या यह अपरिमित या बे-नपा हो। बे-नपे वज्र से ही देवों ने बे-नपे (अपरिमित) को जीता। इसी प्रकार अपरिमित वज्र के द्वारा वह अपरिमित को जीतता है। इसलिए यह अपरिमित भी हो सकता है ॥२६॥ वह आठ कोण का होता है। गायत्री में आठ अक्षर होते हैं। गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। यह यूप यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए इसको आठ कोण का होना चाहिए ॥२७॥ अध्याय ७—ब्राह्मण १ इस मन्त्रांश को पढ़कर खुरपी (अभ्रि) लेता है—‘‘देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्वि- नोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामाददे नार्यसि’’ (यजु० ६।१)—‘‘देव सविता की प्रेरणा से अश्विनों को बाहुओं से, पूषा के दोनों हाथों से तुझको लेता हूँ। तू नारी है।’’ इस यजुः का वही तात्पर्य है जो पहले का। ‘अभ्रि’ स्त्रीलिङ्ग है। इसलिए कहता है कि तू नारी है ॥१॥ इस प्रकार (यूप के गाड़ने के लिए) सूराख खोदता है, इस मन्त्रांश से—‘‘इदमहँ ‿ रक्षसां ग्रीवाऽअपिकृन्तामि’’ (यजु० ६।१)—‘‘इससे मैं राक्षसों की गर्दनें काटता हूँ।’’ अभ्रि या खुरपी वज्र है। इसी खुरपी रूपी वज्र से राक्षसों की गर्दनें काटता है ॥२॥ अब खोदता है और मिट्टी को पूर्व की ओर फेंक देता है। अब इतना सूराख खोदता है जिसमें यूप का नीचे का भाग समा सके। आगे की ओर वह यूप को इस प्रकार रखता है कि पूर्व की ओर सिरा रहे। उतने ही बड़े कुशों को उसके ऊपर रखता है। उसके ऊपर यूप के शकल को रखता है। आगे बगल को चषाल रखता है (चषाल यूप के ऊपर सिर के समान रक्खा जाता है)। प्रोक्षणी में जौ होते हैं। इसका भी वही तात्पर्य है ॥३॥ अब वह जौ को बोता है इस मन्त्रांश को पढ़कर—‘‘यवोऽसि यवयास्मद् द्वेषो यवया- रातीः’’(यजु० ६।१)—‘‘तू यव है। हमसे द्वेष और शत्रुओं को दूर कर(यवय)।’’ यह स्पष्ट है। अब वह जल छिड़कता है। जल छिड़कने का एक ही तात्पर्य है, अर्थात् वह उसको यज्ञ के लिए पवित्र करता है ॥४॥ वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है—‘‘दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा’’ (यजु० ६।१)—‘‘द्यौलोक के लिए तुझको, अन्तरिक्ष के लिए तुझको, पृथिवी के लिए तुझको।’’ यूप वज्र है। इस काम को वह इन लोकों की रक्षा के लिए करता है। इससे इसका तात्पर्य यह है कि मैं इन लोकों की रक्षा के लिए तुझको जल से सींचता हूँ ॥५॥ प्रोक्षणी पात्र में जो जल बचा रहता है उसको सूराख में डाल देता है, इस मन्त्रांश को पढ़कर—‘‘शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः’’ (यजु ६।१)—‘‘पितरों के रहने के लोक शुद्ध हों।’’