शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ७, ब्रा० १, कं० १५-२२ शतपथब्राह्मण / ४६३ अब वह गाड़ता है इस मन्त्रांश को पढ़कर — “या ते धामान्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गाऽअयासः। अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमवभारि भूरि” (यजु० ६।३) — “हम तेरे उन धामों में जाना चाहते हैं जिनमें तेज और बहुत-से सींगोंवाली गायें (सूर्य की किरणें) रहती हैं। वहाँ वस्तुतः विशाल विष्णु के परम पद की ज्योति अनेक प्रकार से चमकती है।” (यहाँ 'गावो' का अर्थ गाय नहीं किन्तु सूर्य की किरणें और ईश्वर की भक्ति है, अर्थात् एक से भौतिक प्रकाश और दूसरे से आत्मिक प्रकाश का तात्पर्य है।) इस त्रिष्टुप् छन्द के द्वारा वह गाड़ता है। त्रिष्टुप् वज्र है और यूप वज्र है, इसलिए त्रिष्टुप् से गाड़ता है ॥१५॥ जो सिरा अग्नि के सामने था उसको अग्नि की ओर कर देता है। क्योंकि यजमान अग्नि के सम्मुख होता है और यज्ञ अग्नि है। यदि उस सिरे का मुँह फेर दिया जाय तो यजमान का मुँह यज्ञ से फिर जाय, इसलिए उसका मुँह अग्नि की ओर कर देता है। अब वह उसके चारों ओर मिट्टी डालता है और चारों ओर दबाकर पानी को उस पर डाल देता है ॥१६॥ अब इसको छूकर यजमान से कहलवाता है — “विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा” (यजु० ६।४, ऋ० १।२२।१९) — “विष्णु के कर्मों को देखो जिससे व्रत बँधे हुए हैं। जो इन्द्र का उचित सखा है।” इन्द्र यज्ञ का देवता है। यूप विष्णु का है। उसको इन्द्र से युक्त करता है, इसलिए कहा ‘इन्द्रस्य’ इत्यादि ॥१७॥ अब इस मन्त्र को पढ़कर चषाल को देखता है — “तद् विष्णोः परमं पद॒ सदा पश्यन्ति सूरयः दिवीव चक्षुराततम्” (यजु० ६।५, ऋ० १।२२।२०) — “विष्णु के उस परम पद को बुद्धिमान् लोग सदा देखते हैं जैसे विकसित आँख सूर्य को।” क्योंकि जिसने यूप लगाया उसने वज्र छोड़ दिया। जब यह कहता है ‘तद् विष्णोः’ इत्यादि, तब मानो वह कहता है कि विष्णु की विजय की ओर देखो ॥१८॥ अब वह कुश की रस्सी को (यूप के चारों ओर) बाँधता है। नंगापन दबाने के लिए ऐसा करता है। इसलिए धोती को कमर में बाँधते हैं। इससे वह उसमें अन्न रखता है, क्योंकि अन्न भी तो वहीं (पेट में) रहता है। इसलिए वह (यूप की कमर में) रस्सी बाँधता है ॥१९॥ वह तीन लपेट लगाता है। अन्न तीन भागोंवाला है। पशु अन्न है। (पहला) माता, (दूसरा) पिता और (बच्चा) जो पैदा होता है तीसरा है। इसलिए वह तीन लपेट लगाता है ॥२०॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर तीन लपेट लगाता है — “परिवीरसि परि त्वा दैवीर्विशो व्ययन्तां परीमं यजमानं॒ रायो मनुष्याणाम्’ (यजु० ६।६) — “तू लिपटा हुआ है। दिव्य लोक के लोग तुझे लिपटें। मनुष्यों में यजमान धन से लिपटा होवे।” जब वह कहता है, ‘परीमं यजमानं’ आदि, तो मानो वह यजमान को आशीर्वाद देता है ॥२१॥ अब वह यूप-शकल को प्रवेश कराता है, इस मन्त्र से — “दिवः सूनुरसि” (यजु० ६।६) - “तू द्युलोक का पुत्र है।” वस्तुतः वह उसीकी सन्तान है। इसलिए यदि ग्यारह यूप हों तो हर एक में उसी का यूप-शकल (चीपुटी) लगाना चाहिए। ऐसा करने से उसकी सन्तान मूर्ख (मुग्धा) या अननुव्रता (न व्रत पालनेवाली) न होगी। जो यूपों में यूप-शकल लगाने के समय उसी-उसी यूप की चीपुटी नहीं लगाता और गड़बड़ कर देता है, उस-उसकी सन्तान मूर्ख और