भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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कां० १, अ० २, ब्रा० ३, क० १-६ शतपथब्राह्मण./ ३१ छूता हूँ, डर मत' ॥१५॥ जब पक जाय तो ढक देता है कि 'कहीं राक्षस इसको देख न लें', अथवा 'कहीं यह नग! और खुला न रहे।' इसलिए वह उसको ढक देता है ॥१६॥ उसको यजु० १।२३ के इस अंश से ढकता है—'यज्ञ हीन न हो, यजमान की सन्तान हीन न हो जब मैं इसको ढक दूँ।’—ऐसा सोचकर ॥१७॥ अब पात्री को धोकर और अंगुलियों को धोकर धोवन को आप्य देवों के लिए डालता है। आप्यों के लिए डालने का प्रयोजन (आगे कहा जायगा) ॥१८॥ अध्याय २—ब्राह्मण ३ अग्नि पहले चार प्रकार का था। वह अग्नि जिसको उन्होंने पहले होता के लिए वरण किया वह भाग गया। दूसरी बार जिसको चुना वह भी भाग गया। तीसरी बार जिसको चुना वह भी भाग गया। इस पर आजकल जो अग्नि है वह डरकर छिप गया। वह जलों में प्रविष्ट हो गया। देवों ने उसे खोज लिया और बलात् वहाँ से निकाल लाये। अग्नि ने जलों पर थूक दिया और कहा कि तुम रक्षा के स्थान नहीं हो, मेरी इच्छा के बिना ये देव मुझको तुममें से खींच लाये। उनमें से आप्य देव निकले—त्रित, द्वित और एकत ॥१॥ वे इन्द्र के साथ फिरते रहे जैसे आजकल ब्राह्मण राजा के साथ फिरा करते हैं। और जब इन्द्र ने त्वष्टा के तीन सिरवाले पुत्र विश्वरूप को मारना चाहा तो वे इसके मारे जाने की बात जान गये और त्रित ने उसको मार डाला। इन्द्र हत्या के इस पाप से बचा रहा। इन्द्र तो देव है ॥२॥ लोगों ने कहा, 'यह पाप उन्हीं को लगना चाहिए जो यह जानते थे कि इसका वध होगा।' उन्होंने कहा 'कैसे ?' उत्तर मिला, 'यज्ञ उन तक पाप लगा देगा।' इस प्रकार जब यह पात्री को धोते हैं और उसी जल में अध्वर्यु अपनी अंगुलियाँ धोता है तो वह पाप यज्ञ द्वारा आप्यों को लग जाता है ॥३॥ आप्यों ने कहा, 'इस पाप को हम आगे बढ़ा दें।' लोगों ने पूछा 'किस तक ?' आप्यों ने उत्तर दिया, 'उस तक जो बिना दक्षिणा दिये यज्ञ करता है।' अतः बिना दक्षिणा दिये यज्ञ नहीं करना चाहिए, अन्यथा यज्ञ उस पाप को आप्यों तक पहुँचा देगा और आप्य उस मनुष्य तक जो बिना दक्षिणा के यज्ञ करता है ॥४॥ इस पर देवों ने दर्श और पूर्णमास इष्टियों में उस दक्षिणा की योजना की जिसको अन्वा- हार्य कहते हैं, जिससे हवि बिना दक्षिणा के न रह जाय। इस जल को तीनों आप्यों में अलग- अलग बाँटता है, गरम करके, जिससे वह उनके लिए पक जाय—'हे त्रित, यह तुझको' 'हे द्वित, इतना तुझको' 'हे एकत, इतना तुझको' इस प्रकार झगड़ा न हो। यह जो पुरोडाश है वह मानो यज्ञ के पशु का आलभन है ॥५॥ देवों ने पहले-पहल पुरुषरूपी यज्ञ-पशु का आलभन किया। उस आलभन किये पुरुष से