भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 699 में से

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कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / ४६३ वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'अग्नि-सोम के लिए बकरे के हवि की प्रेरणा कर।' 'प्रस्थित' है ऐसा नहीं कहता। ऐसा तो सोम निचोड़ने पर कहा जाता है ॥२६॥ याज्य की दो आधी ऋचाओं के बीच में वसाहोम देता है। यहीं से मेध ऊपर को उठा था,—पृथिवी का वह रस जिससे प्रजाएँ द्यौलोक के इस ओर जीती हैं। वसाहोम रस है, मेध रस है। रस से रस को तीव्र करता है। इससे रस खाया जाकर क्षीण नहीं होता ॥३०॥ याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की आहुति क्यों दी जाती है ? आधी ऋचा यह पृथिवी है। आधी ऋचा वह द्यौलोक है। द्यौ और पृथिवी के बीच में अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष के लिए यह आहुति है। इसलिए याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की आहुति देता है ॥३१॥ इस मन्त्र से आहुति देता है —‘‘घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरि- क्षस्य हविरसि स्वाहा’’ (यजु० ६।१६)—‘‘घी के पीनेवालो, घी पियो। वसा के पीनेवालो, वसा पियो। तू अन्तरिक्ष की हवि है, स्वाहा।’’ इस यजुः से विश्वेदेवों को आहुति देता है। अन्तरिक्ष विश्वेदेवों का है। इस अन्तरिक्ष में प्रजा प्राण और उदान लेती हैं। इसलिए यह अन्तरिक्ष विश्वे- देवों का है। जुहू में जो कुछ टुकड़े रहते हैं उनसे वषट्कृत आहुति दी जाती है ॥३२॥ अब जुहू में पृषदाज्य लेकर (होता से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए अनुवाक कह।' श्रौषट् कहकर वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करने पर वह आहुति दे देता है। वह वनस्पति के लिए इसलिए आहुति देता है कि इस यूप वज्र को वह भागी बनाता है। सोम वनस्पति है। इस प्रकार वह पशु को सोम कर लेता है। दो आहुतियों के बीच में आहुति क्यों देता है ? इस प्रकार वह दोनों को व्याप्त कर लेता है। इसलिए वह दो आहुतियों के बीच में आहुति देता है ॥३३॥ अब जो उपभृत् के लिए टुकड़े होते हैं उनको साथ-साथ डालकर कहता है 'अग्नि- स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक कह।' श्रौषट् कहकर 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए प्रेरणा कर' ऐसा कहता है और वषट्कार के बाद आहुति दे देता है ॥३४॥ वसाहोम से जो बचता है उसे दिशाओं में फेंकता है, इस मन्त्र से—‘‘दिशः प्रदिशऽ आदिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा’’ (यजु ६।१६)—‘‘वसाहोम रस है। सब दिशाओं में रस को पहुँचाता है। इसलिए पृथिवी पर सब दिशाओं में रस मिलता है’’ ॥३५॥ अब पशु का स्पर्श करता है। यही स्पर्श का समय है। चाहे पहले इस डर से ही छुआ हो कि राक्षस उपस्थित हैं, वे इसने नष्ट कर डाले, या इस प्रकार शंका न भी की हो तो भी इस समय छूना अवश्य चाहिए ॥३६॥ ‘‘ऐन्द्रः प्राणोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीद्यदैन्द्रऽउदानोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीतः’’ (यजु० ६।२०)— ‘‘प्राण इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में स्थापित है। उदान इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में स्थापित है।’’ जहाँ-जहाँ अङ्ग से काटा गया है वहाँ-वहाँ प्राण और उदान से संयुक्त करता है।

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