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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / ४६३ वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'अग्नि-सोम के लिए बकरे के हवि की प्रेरणा कर।' 'प्रस्थित' है ऐसा नहीं कहता। ऐसा तो सोम निचोड़ने पर कहा जाता है ॥२६॥ याज्य की दो आधी ऋचाओं के बीच में वसाहोम देता है। यहीं से मेध ऊपर को उठा था,—पृथिवी का वह रस जिससे प्रजाएँ द्यौलोक के इस ओर जीती हैं। वसाहोम रस है, मेध रस है। रस से रस को तीव्र करता है। इससे रस खाया जाकर क्षीण नहीं होता ॥३०॥ याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की आहुति क्यों दी जाती है ? आधी ऋचा यह पृथिवी है। आधी ऋचा वह द्यौलोक है। द्यौ और पृथिवी के बीच में अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष के लिए यह आहुति है। इसलिए याज्य की दो अर्द्ध ऋचाओं के बीच में वसाहोम की आहुति देता है ॥३१॥ इस मन्त्र से आहुति देता है —‘‘घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरि- क्षस्य हविरसि स्वाहा’’ (यजु० ६।१६)—‘‘घी के पीनेवालो, घी पियो। वसा के पीनेवालो, वसा पियो। तू अन्तरिक्ष की हवि है, स्वाहा।’’ इस यजुः से विश्वेदेवों को आहुति देता है। अन्तरिक्ष विश्वेदेवों का है। इस अन्तरिक्ष में प्रजा प्राण और उदान लेती हैं। इसलिए यह अन्तरिक्ष विश्वे- देवों का है। जुहू में जो कुछ टुकड़े रहते हैं उनसे वषट्कृत आहुति दी जाती है ॥३२॥ अब जुहू में पृषदाज्य लेकर (होता से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए अनुवाक कह।' श्रौषट् कहकर वह (मैत्रावरुण से) कहता है कि 'वनस्पति के लिए प्रेरणा कर।' वषट्कार करने पर वह आहुति दे देता है। वह वनस्पति के लिए इसलिए आहुति देता है कि इस यूप वज्र को वह भागी बनाता है। सोम वनस्पति है। इस प्रकार वह पशु को सोम कर लेता है। दो आहुतियों के बीच में आहुति क्यों देता है ? इस प्रकार वह दोनों को व्याप्त कर लेता है। इसलिए वह दो आहुतियों के बीच में आहुति देता है ॥३३॥ अब जो उपभृत् के लिए टुकड़े होते हैं उनको साथ-साथ डालकर कहता है 'अग्नि- स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक कह।' श्रौषट् कहकर 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए प्रेरणा कर' ऐसा कहता है और वषट्कार के बाद आहुति दे देता है ॥३४॥ वसाहोम से जो बचता है उसे दिशाओं में फेंकता है, इस मन्त्र से—‘‘दिशः प्रदिशऽ आदिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा’’ (यजु ६।१६)—‘‘वसाहोम रस है। सब दिशाओं में रस को पहुँचाता है। इसलिए पृथिवी पर सब दिशाओं में रस मिलता है’’ ॥३५॥ अब पशु का स्पर्श करता है। यही स्पर्श का समय है। चाहे पहले इस डर से ही छुआ हो कि राक्षस उपस्थित हैं, वे इसने नष्ट कर डाले, या इस प्रकार शंका न भी की हो तो भी इस समय छूना अवश्य चाहिए ॥३६॥ ‘‘ऐन्द्रः प्राणोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीद्यदैन्द्रऽउदानोऽअङ्गेऽअङ्गे निधीतः’’ (यजु० ६।२०)— ‘‘प्राण इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में स्थापित है। उदान इन्द्र-सम्बन्धी है। यह अंग-अंग में स्थापित है।’’ जहाँ-जहाँ अङ्ग से काटा गया है वहाँ-वहाँ प्राण और उदान से संयुक्त करता है।

अध्याय-८, ब्राह्मण-४

समे॑तु॒ सुलद्मा यद्वि॒षुरूपं॒ भवा॒तीति॑ कृ॒त्स्नावृत॒मेवैतत्क॑रोति दे॒वत्रा यन्त॒मव॑से स- खायो॒ऽनु वा मातापि॒तरो॑ मद॒न्विति॑ तद्यत्रैनमम॑हीषी॒त्तदेनं॑ कृ॒त्स्नं कृ॒त्वानुसम॑स्य- ति॒ सोऽस्य कृ॒त्स्नोऽमुष्मिंल्लो॒कऽआ॒त्मा भ॑वति ॥ ३७॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [८. ३] ॥ ॥ त्रीणि ह॒ वै प॑शोरेकाद॒शानि॑ । एकादश प्रया॒जा एकादशानुया॒जा एकादशो- पय॒जो दश॒ पाण्या अ॒ङ्गुलयो॒ दश॑ पा॒द्या दश॑ प्रा॒णाः प्रा॒ण उ॑दा॒नो व्या॑न इत्ये- तावा॒न्वै पु॑रुषो यः परा॒र्ध्यः पशू॒नां य᳭ सर्वेऽनु पशवः ॥ १॥ तदा॒हुः । किं त- द्य॒ज्ञे क्रि॑यते येन प्रा॒णाः सर्वे᳭भ्यो॒ऽङ्गेभ्यः शि॒व इति॑ ॥ २॥ य॒द्वेव॒ गुदं॑ त्रे॒धा करो॑- ति । प्रा॒णो वै गु॒दः सोऽयं प्रा॒ङाततस्तमयं॒ प्राणो॒ऽनुसं॑चरति ॥ ३॥ स य॒द्वेव गु- दं॒ त्रेधा॒ करो॑ति । तृतीयमुपय॒ड्भ्यस्तृतीयं॑ गु॒ल्दां तृतीयमुपभृ॑ति॒ तेन॑ प्रा॒णाः सर्वे᳭- भ्यो॒ऽङ्गेभ्यः शि॒वः ॥ ४॥ स ह॒ त्वेव प॑शुमा॒लभेत॑ । य एनं॑ मे॒धमु॑पनये॒द्यदि॑ कृ॒शः स्या॒द्यद्य॒स्य मेद॑सः परि॒शिष्यत तद्गुदे॑ न्यषे॒त्प्राणो॒ वै गु॒दः सोऽयं प्रा॒ङाततस्त- मयं॒ प्राणो॒ऽनुसं॑चरति प्रा॒णो वै प॒शुर्या॒वद्ध्वेव॒ प्राणे॑न॒ प्राणिति॒ तावत्यशुरथ य- दास्मात्प्रा॒णोऽपक्रा॑मति दार्वि॑व त॒र्हि भूतो॒ऽनर्थ्यः शेते ॥ ५॥ गु॒दो वै प॒शुः । मे- दो वै मेध॒स्तदेनं॑ मे॒धमु॑पनयति॒ यद्यु॒ऽअच॑त्तलो॒ भव॑ति स्वयमुपै॒त एव त॒र्हि मेधं॑ भव॑ति ॥ ६॥ अथ पृषदा॒ज्यं गृ॑ह्णाति । द्वयं॒ वा॒ऽइद᳭ सर्पि॑श्चैव दधि॑ च द्वन्द्वं॒ वै मिथु॒नं प्र॒जन॑नं मिथु॒नमे॒वैतत्प्र॒जन॑नं क्रियते ॥ ७॥ तेना॑नुया॒जेषु चरति । प॒शवो वा॒ऽअनु॑या॒जाः पयः पृषदा॒ज्यं तत्पशू॒ष्वेवैतत्पयो दधाति तदि॒दं प॒शुषु॒ पयो हि॒तं प्रा॒णो हि पृषदाज्यमन्नं॑ हि पृषदाज्यमन्नं॑ हि प्रा॒णाः ॥ ८॥ तेन पु॒रस्ता॑दनुया॒जे- षु चर॑ति । स यो॒ऽयं पु॒रस्ता॑त्प्रा॒णस्तमे॒वैतद्द॑धाति॒ तेन पश्चा॒दुप॑र्यङ्क्ते॒ स यो॒ऽयं प॒श्चात्प्रा॒णस्तमे॒वैतद्द॑धाति तावि॒मा॒ऽउभयतः॑ प्रा॒णौ हि॒तौ यश्चायमु॒परि॑ष्टाद्यश्चाध- स्ताात् ॥ ९॥ तद्वा॒ऽएतदेकौ द्वाभ्यां॒ वष॑ट्करोति । अध्व॒र्यवे च यश्चैष उपय॒जत्य॑थ यद्यज॑न्तमुपय॒जति॒ तस्मा॑डुपय॒जो नामा॑थ यदुपय॒जति॒ प्रैवैतञ्जन॑यति प॒श्चाद्ध्युपय॒ज-

कां० ३, अ० ८, ब्रा० ३-४, कं० ३७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४९५ “देव त्वष्टर्भूरि ते संँ समेतु सलक्ष्मा यद् विषुरूपं भवाति” (यजु० ६।२०)—“हे त्वष्टा देव, तेरी शक्ति संयुक्त हो जिससे जो अलग-अलग रूप की चीज है वह एकरूप हो जाय।” इस प्रकार वह इसको पूरा चारों ओर से घेर देता है। “देवत्रा यन्तमवसे सखायोऽनु त्वा माता पितरो मदन्तु” (यजु० ६।२०)—“तेरे सखा, माता-पिता, देवलोक में जाते हुए तुझसे प्रसन्न हों।” जहाँ-जहाँ इसके अंगों की आहुति दी है वहाँ-वहाँ इसको पूरा करके समन्वय करता है जिससे परलोक में उसको पूरा शरीर मिले ॥३७॥ अध्याय ८—ब्राह्मण ४ पशुयाग में ग्यारह-ग्यारह के तीन होते हैं—ग्यारह प्रयाज, ग्यारह अनुयाज और ग्यारह उपयाज। दस हाथ की अंगुलियाँ, दस पैर की, दस प्राण, प्राण, व्यान और उदान। इतने मिल- कर पुरुष होता है जो पशुओं में सबसे श्रेष्ठ है और पशु जिसके पीछे हैं ॥१॥ इस पर कहते हैं कि यज्ञ में क्या किया जाता है जिससे प्राण सब अंगों के लिए कल्याण- कारी हो ॥२॥ गुदा के तीन भाग करता है। गुदा प्राण है (प्राण निकलने का स्थान है)। वहाँ से यह (पशु) फैलता है और यह प्राण उसका संचार करता है ॥३॥ वह गुदा के तीन भाग करता है—एक-तिहाई उपयाज, एक-तिहाई जुहू में और एक- तिहाई उपभृत् में। इस प्रकार प्राण सब अंगों के लिए कल्याणकारी होता है ॥४॥ केवल वही पशु का आलभन करे जो उसे मेध्ययुक्त कर सकता हो। यदि दुबला हो तो जो कुछ चर्बी बची वह गुदा में भर दे। गुदा प्राण है। वहाँ से यह (पशु) फैलता है और यह प्राण उसका संचार करता है। प्राण ही पशु है। जब तक प्राण रहता है तब तक वह पशु है। जब उससे प्राण निकल जाता है तो लकड़ी के समान वह व्यर्थ पड़ा रहता है ॥५॥ गुदा पशु है। चर्बी मेध है। इसमें मेध देता है। यदि यह पतली हो तो स्वयं ही मेध हो जाता है ॥६॥ अब पृषदाज्य को लेता है। यह दो प्रकार का है, घी भी और दही भी। द्वन्द्व का नाम है जोड़ा। प्रजनन का नाम भी जोड़ा है। इस प्रकार प्रजनन करता है ॥७॥ उससे अनुयाज में काम लेता है। पशु अनुयाज हैं। पृषदाज्य दूध है। इस प्रकार वह पशुओं में दूध धारण कराता है और इस प्रकार पशुओं में दूध रखा जाता है। प्राण पृषदाज्य है। अन्न पृषदाज्य है। अन्न प्राण है ॥८॥ इनको अनुयाज, में आहवनीय के सम्मुख काम में लाता है। इस प्रकार यह जो आगे प्राण है उसको (पशु में) रखता है। (प्रतिप्रस्थाता) इसी से पीछे की ओर उपयाज करता है। इसके द्वारा यह जो पीछे प्राण है उसको (पशु में) धारण कराता है। इस प्रकार दो प्राणों की प्रतिष्ठा होती है, एक ऊपर, दूसरी नीचे ॥६॥ यह एक (होता) दो के लिए वषट्कार करता है—एक तो अध्वर्यु के लिए और दूसरे उसके लिए जो उपयाज करता है (अर्थात् प्रतिप्रस्थाता के लिए)। और चूंकि यजन के बाद दी जाती है इसलिए इसका नाम उपयाज है। उपयाज करने में पीछे से उत्पत्ति होती है। स्त्रियों के

अध्याय-८, ब्राह्मण-५

४६६ शतपथ ब्राह्मण

ति पश्चाद्धि योषायै प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते ॥ १०॥ स उ॑पय॒न्नति॑ । स॒मु॒द्रं गङ् स्वाहेत्या॑- पो वै॑ स॒मुद्र आ॒पो रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सिञ्चति ॥ ११॥ अ॒न्तरि॑क्षं गङ् स्वाहेति॑ । अ॒न्तरि॑क्षं वा॒ऽअनु॒ प्रजाः प्र॒जाय॑न्ते॒ऽन्तरि॑क्षमे॒वैतद॒नु प्र॒जन॑यति ॥ १२॥ दे॒वं स॑वि॒- ता॒रं गङ् स्वाहेति॑ सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता स॑वितृप्रसूत॒ ऽए॒वैतत्प्र॒जन॑यति ॥ १३॥ मि॒त्रावरु॑णौ गङ् स्वाहेति॑ । प्रा॒णो॒दा॒नौ वै मि॒त्रावरु॑णौ प्रा॒णो॒दा॒नावे॒वै- तत्प्र॒जासु॑ दधाति ॥ १४॥ अ॒हो॒रा॒त्रे गङ् स्वाहेति॑ । अ॒हो॒रा॒त्रे वा॒ऽअनु॒ प्रजाः प्र॒- जाय॑न्ते॒ऽहोरा॒त्रेऽए॒वैतद॒नु प्र॒जन॑यति ॥ १५॥ छन्दां॑सि गङ् स्वाहेति॑ । स॒प्त वै छन्दां॑सि स॒प्त ग्राम्याः॑ प॒शवः॑ स॒प्तार॑ण्या॒स्ताने॒वैतदु॑भ॒यान्प्र॒जन॑यति ॥ १६॥ द्यावा॑- पृथि॒वी गङ् स्वाहेति॑ । प्र॒जाप॑ति॒र्वै प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्या॑वापृथि॒वीभ्यां॒ पर्य॑गृह्णा॒त्ता इ॒मा द्या॑वापृथि॒वीभ्यां॒ परि॑गृहीता॒स्तद्यो॒ऽहैवैष ए॒तत्प्र॒जाः सृ॒ष्ट्वा ता द्या॑वापृथि॒वी- भ्यां॒ परि॑गृह्णाति ॥ १७॥ अथा॑त्युपय॒न्नति॑ । स यन्नात्यु॑पय॒न्नेद्याव॑त्यो ह्यै॒वाग्रे॑ प्र॒जाः सृ॒ष्टास्ताव॑त्यो ह्यै॒व स्युर्न प्र॒जाये॑र॒न्नथ॒ यदत्यु॑पय॒न्नति॑ प्रैवैतज्ज॑नयति॒ तस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः पुन॑र॒भ्याव॑र्तं प्र॒जाय॑न्ते ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ५ [८.४] ॥ ॥ षष्ठः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या ११२ ॥ ॥ सोऽत्यु॑पय॒न्नति॑ । य॒ज्ञं गङ् स्वाहेत्या॑पो॒ वै य॒ज्ञ आपो॒ रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैत॒त्सि- ञ्चति ॥ १॥ सोमं॑ गङ् स्वाहेति॑ । रे॒तो वै सोमो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सि॑ञ्चति ॥ २॥ दि॒व्यं नभो॑ गङ् स्वाहेति॑ । आ॒पो वै दि॒व्यं नभ॒ आपो॒ रेतो॒ रेत॒ ऽए॒वैतत्सि॑ञ्चति ॥ ३॥ अ॒ग्निं वै॑श्वान॒रं गङ् स्वाहेति॑ । इ॒यं वै पृ॑थि॒व्य॒ग्निर्वै॑श्वान॒रः सेयं प्रति॑ष्ठे॒मामे॒वैतत्प्र- ति॒ष्ठाम॒भिप्र॒जन॑यति ॥४॥ अथ॒ मुखं॑ वि॒मृष्टे॑ । मनो॑ मे॒ हार्दि॒ यच्छेति॒ तथो॑ ह्योप- य॒ष्टाऽऽत्मा॒नं नानु॒प्रवृ॑णक्ति ॥५॥ अथ जघन्यया पत्नीः संयाजयन्ति । जघनार्धो वै ज॒घनी जघनार्द्धाद्धि योषायै प्रजाः प्रजायन्ते तत्प्रैवैतज्जनयति यज्जघन्यया पत्नीः सं- या॒जय॑न्ति ॥ ६॥ अ॒न्तर॒तो दे॒वानां॑ पत्नी॒भ्योऽव॑द्यति । अ॒न्तर॒तो वै यो॒षायै॑ प्र॒जाः

कां० ३, अ० ८, ब्रा० ४-५, कं० १०-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ४६७ भी सन्तान पीछे से ही उत्पन्न होती है ॥१०॥ वह उपयाज को इस मन्त्र से देता है—"समुद्रं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२२) जल समुद्र है। जल वीर्य है। यह वीर्य ही है जिसको सींचते हैं ॥११॥ "अन्तरिक्षं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) अन्तरिक्ष में ही सन्तान उत्पन्न होती हैं। अन्तरिक्ष में ही वह उत्पत्ति करता है ॥१२॥ "देवं सवितारं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) देवों का प्रेरक सविता है। सविता से प्रेरित होकर जीवों को प्रेरित कर रहा है ॥१३॥ "मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्राण और उदान मित्र और वरुण हैं। इस प्रकार प्रजाओं में प्राण और उदान धारण कराता है ॥१४॥ "अहोरात्रे गच्छ स्वाहा" (यजु० ६।२१) दिन-रात में ही सन्तान उत्पन्न होती है। दिन-रात में ही वह जीवों को उत्पन्न कराता है ॥१५॥ "छन्दाँ७सि गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१)। सात छन्द हैं—सात घर के (ग्राम्य) और सात वन के (आरण्य) पशु हैं। इन दोनों को वह उत्पन्न कराता है ॥१६॥ "द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) प्रजापति ने प्रजा को रचकर द्यौ और पृथिवी के बीच में भर दिया, इसलिए वह द्यौ और पृथिवी के बीच में है। इसी प्रकार यह आहुति देनेवाला भी प्राणियों को उत्पन्न करके उनको द्यौ और पृथिवी के बीच में रख देता है ॥१७॥ अब वह अन्य उपयाज करता है। यदि इन अन्य उपयाजों को न करे तो उतने ही पशु रहें जितने आरम्भ में उत्पन्न हुए थे। और न उत्पन्न हों। परन्तु अधिक उपयाजों को करके वह सन्तान को बढ़ाता है, जिससे इस पृथिवी पर फिर-फिर उत्पन्न हो ॥१८॥ अध्याय ८—ब्राह्मण ५ वह उपयाज करता है—"यज्ञं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल यज्ञ है, जल वीर्य है। इसके द्वारा वीर्य को सींचता है ॥१॥ "सोमं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) वीर्य सोम है। वीर्य को इससे सींचता है ॥२॥ "दिव्यं नभो गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) जल 'दिव्य नभ' है। जल वीर्य है। वीर्य को इससे सींचता है ॥३॥ "अग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा।" (यजु० ६।२१) यह पृथिवी अग्नि वैश्वानर है। यही प्रतिष्ठा है। इस प्रकार इस प्रतिष्ठा को उत्पन्न करता है ॥४॥ अब इस मन्त्र से मुख का स्पर्श करता है—"मनो मे हार्दि यच्छ" (यजु० ६।२१)— "मुझे मन और हृदय दे।" इस प्रकार उपयाज करनेवाला अपने को नहीं आहुति देता ॥५॥ अब (पशु की) पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करते हैं। पूंछ पिछला भाग है। स्त्रियों के पिछले भाग से ही सन्तान की उत्पत्ति होती है। इसलिए पूंछ से 'पत्नी-संयाज' करके सन्तान की उत्पत्ति करता है ॥६॥ देवों की पत्नियों के लिए भीतर से भाग काटता है; स्त्रियों के अन्दर से ही सन्तान

अध्याय-९, ब्राह्मण-१

४६८ शतपथ ब्राह्मण प्र॒जाय॑न्त॒ऽउप॑रिष्टाद॒ग्नये॑ गृ॒हपत॑य॒ऽउप॑रिष्टाद्वृ॒षा योषा॑मधि॒द्रव॑ति ॥७॥ अथ हृ- दय॒शूले॒नाव॒भृथं॑ यन्ति । प॒शोर्ह॒ वाऽआ॒लभ्य॑मानस्य॒ हृदयँ॑ शुक्सम॒भ्ये॑ति हृ- दयाद्धृदयशू॒लमथ॒ यद्धृतस्य॑ परि॒तृन्द॑न्ति॒ तदल॑ङ्गुषं॒ तस्मा॒त्परितृ॒द्यैव शू॒लात्कुर्यात्त- न्निःप्रच्यु॑ते प॒शौ हृद॑यं प्र॒वृक्योत्त॑मं॒ प्रत्यव॑दधाति ॥८॥ अथ॑ हृदयशू॒लं प्रय॑ह्व- ति । तन्न पृ॑थि॒व्यां परा॒स्ये॒न्नाप्सु॒ स यत्पृ॑थि॒व्यां परा॒स्येदोष॑धीश्च वन॒स्पतीँ॑श्चैषा शुक्प्र॑विशेद्यद॒प्सु परा॒स्येद॒प ए॒षा शुक्प्र॑विशेत्त॒स्मान्न पृ॑थि॒व्यां नाप्सु ॥९॥ अ॒प ए॒वाभ्य॑वेत्य । यत्र॒ शुष्क॑स्य चा॒र्द्रस्य॑ च सं॒धिः स्यात्तद॑पगू॒हेद्यद्यु॒ऽअभ्य॒वाय॑नाय ग्लायेद्ये॒तेन॒ यूप॑मु॒दपात्रं॑ निनी॒य यत्र॒ शुष्क॑स्य चा॒र्द्रस्य॑ च सं॒धिर्भव॑ति तद॑पगू॒हति॒ मापॊ॒ मौषधी॑र्हिंसी॒रिति॒ तथा॒ नापो नौषधी॑र्हिनस्ति॒ धाम्नो॑-धाम्नो राजँस्ततो व- रु॒ण नो मुञ्च । यदाहु॒रघ्या॒ इति॒ वरु॑णेति शपामहे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्चेति॒ तदे॒- नँ सर्व॑स्माद्वरुणपा॒शात्स॒र्व॑स्माद्वरुण्या॒त्प्रमु॑ञ्चति ॥१०॥ अ॒थाभि॒मन्त्र॑यते । सुमि॒त्रि- या न॒ आप॒ ओष॑धयः सन्तु दुर्मि॒त्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु॒ योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्म इति॒ यत्र॒ वाऽए॒तेन॒ प्रच॑रन्त्याप॒श्च ह॒ वाऽअ॒स्मात्ताव॒दोष॑धयश्चाप॒क्रम्ये॑व तिष्ठन्ति तद् ताभि॑र्मि॒त्रधेयँ॑ कुरुते॒ तथो॒ हैन॑ ताः पुन॑ः प्र॒विश॑न्त्येषो तत्र॒ प्राय॑श्चित्तिः क्रि- यते॒ स वै नाग्नीषोमीय॑स्य प॒शोः क॑रो॒ति॒ नाग्नेय॑स्य व॒शाया॑ऽए॒वानू॒बन्ध्या॑यै ताँ हि सर्वो॒ऽनु य॒ज्ञः संति॑ष्ठत॒ऽएत॒द्ध ह्या॑ग्नीषोमी॒यस्य॑ च प॒शो राग्नेय॑स्य च हृद॒य- शू॒लेन॒ चरितं॑ भवति॒ यद्वशायाश्चर॑न्ति ॥११॥ ब्राह्म॒णम् ॥ १ [८. ५.] ॥ अष्टमोऽध्या- यः [२३.] ॥ ॥ प्र॒जाप॑ति॒र्वै प्र॒जाः स॑सृजा॒नो रि॑रिचा॒न-इ॒वाम॑न्यत । तस्मा॒त्पराच्यः॑ प्र॒जा आ- सुर्न्नास्य॑ प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य तस्थिरे ॥१॥ स ऐक्ष॒ता॒रिच्य् अहम् । अ॒स्माऽउ॒ कामा॒- यासृ॒क्षि न मे॒ स काम॑ः समार्धि॒ परा॑च्यो मत्प्र॒जा अ॑भूव॒न् न म॑ प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑- यास्थिषतेति ॥२॥ स ऐक्षत प्रजापतिः । कथं नु पुनरात्मानमाप्याययेयोप मा

कां० ३, अ० ८-६, ब्रा० ५-१, कं० ७-११ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४६६ उत्पन्न होती है। ऊपर से गृहपति अग्नि के लिए, क्योंकि ऊपर से ही नर स्त्री में वीर्य धारण कराता है ॥७॥ इस पर वे हृदय-शूल के साथ 'अवभृथ' स्नान को जाते हैं। जब पशु को मारते हैं तो उसका शोक हृदय में ही इकट्ठा होता है, हृदय से हृदयशूल में। पकाये हुए मांस का जो भाग छिदा होता है वह स्वादिष्ट होता है।१ इसलिए उसे छेदकर काँटे पर पकाना चाहिए। पशु के तीन बार हिलाये हुए भाग पर काँटे से निकालकर हृदय को रखता है ॥८॥ अब (शमिता अध्वर्यु को) हृदय-शूल देता है। उसे पृथिवी पर न फेंके, न जल में । यदि पृथिवी पर फेंकेगा तो शोक ओषधि और वनस्पतियों में घुस जायगा। यदि जल में फेंकेगा तो शोक जल में घुस जायगा। इसलिए न पृथिवी पर फेंके, न जल में ॥६॥ किन्तु जल में जाकर ऐसे स्थान पर गाड़ दे जहाँ नमी और खुश्की का मेल हो। परन्तु जल में जाने की इच्छा न हो तो यूप के सामने जल का पात्र लाकर जहाँ नमी और खुश्की का मेल हो वहाँ गाड़ दे, इस मन्त्र से— "मापो॒ मौषधीर्हिँ॒सीः" (यजु० ६।२२)—"जल और ओषधि न सतावें।" इस पर जल और ओषधि हानि नहीं पहुँचाते। "धाम्नो॑ धाम्नो॒ राज॑स्ततो वरु॑ण नो मुञ्च। यदा॒हुरघ्न्या॒ इति॒ वरु॒णेति॒ शपामहे॒ ततो॑ वरुण नो मुञ्च" (यजु० ६।२२)— "हे राजा वरुण, हर (थान) जल से हमको छुड़ा। हे वरुण, हमको छुड़ा जिससे वे कहें कि न हने जानेवाली और वरुण की हम शपथ खाते हैं।" इस प्रकार वह वरुण के सब जालों से या सम्बन्धी पापों से उसको छुड़ा देता हैं ॥१०॥ अब वह जलों को कहता है—"सुमित्रिया॑ न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मित्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः" (यजु० ६।२२)—"जल और ओषधियाँ हमको लाभ पहुंचावें और हानि उनको जो हमको द्वेष करते हैं या जिनसे हम द्वेष करते हैं।" क्योंकि जब वे शूल के साथ जाते हैं तो जल और ओषधियाँ मानो उनसे पीछे हटते हैं। परन्तु इस प्रकार वह उनसे मित्रता करता है। इस प्रकार वे फिर उसके पास आते हैं। अब वह वहां प्रायश्चित्त करता है। वह यह (अवभृथ) अग्नि-सोम के पशु-याग में नहीं करता, न अग्नि के; किन्तु अनुबन्ध्या-गौ के सम्बन्ध में करता है। इस प्रकार सब यज्ञ पूर्ण हो जाता है। यह जो वशा-गौ के साथ अवभृथ किया जाता है उससे अग्नि-सोम या अग्नि के भी पशु-याग की पूर्ति हो जाती है ॥११॥ अध्याय ६—ब्राह्मण १ प्रजापति प्रजा को उत्पन्न करके थक-सा गया। प्रजा उसके पास से हट गई। उसकी श्री और भोजन के लिए वह उसके पास न ठहरी ॥१॥ उसने सोचा—'मैं थक गया और जिस कामना के लिए मैंने सृष्टि की रचना की वह भी पूरी न हुई। मेरी प्रजा मेरे पास से चली गई। मेरी श्री और भोजन के लिए मेरे पास ठहरी नहीं' ॥२॥ प्रजापति ने सोचा कि—'मैं फिर अपने को कैसे पुष्ट करूँ ? कैसे मेरी प्रजा लौटे और १. पशु-हिंसा सर्वथा अवैदिक है और ऐसे स्थल पूर्णतः प्रक्षिप्त हैं। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

५०० शतपथ ब्राह्मण

प्र॒जाः स॒मावर्त्तेरँस्तिष्ठे॑रन्मे प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॒येति॑ ॥ ३॥ सोऽर्चञ्छ्राम्यंश्चचार प्र- जाकामः॑ । स ए॒तामे॑काद॒शिनी॑मपश्यत्स एकादशि॒न्येष्टा॑ प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒- प्यायय॒तोपै॑नं प्र॒जाः स॒माव॑र्त्तन्तात्तिष्ठन्तास्य प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य स वसी॑याने॒वेष्टा- ऽभवत् ॥ ४॥ तस्मै॑ कमेकाद॒शिन्या॒ यजे॑त । ए॒व꣫ हैव॑ प्र॒जया॑ प॒शुभि॒राप्या॑यत॒ऽ- पैनं॑ प्र॒जाः स॒माव॑र्त्तन्ते॒ तिष्ठ॑न्तेऽस्य प्र॒जाः श्रिये॒ऽन्नाद्या॑य स वसी॑याने॒वेष्टा भव॑त्ये- तस्मै॑ कमेकाद॒शिन्या॒ यज॑ते ॥ ५॥ स आ॑ग्ने॒यं प्र॑थ॒मं प॒शुमा॒लभ॑ते । अ॒ग्निर्वै दे॒वता॑- नां मुखं॑ प्र॒जनयि॒ता स प्र॒जाप॑तिः स उ॒ऽए॒व यज॑मानस्तस्मादाग्ने॒यो भव॑ति ॥ ६॥ अथ सार॑स्व॒तम् । वाग्वै सर॑स्वती वा॒चैव तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नमा॒प्याय॑यत वा॒गेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तत वा॒चम॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत वा॒चोऽᳵवै॒ष ए॒तदाप्या॑यते वा॒गे- न॒मुप॑स॒माव॑र्त्तते वा॒चम॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ७॥ अथ सौ॒म्यम् । अन्नं॒ वै सोमो॒ ऽन्ने॑नै॒व तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यतान्न॒मेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्ततान्न॒मनु॑क॒मात्म॑नो ऽकुरुतान्नोऽᳵए॒वैष ए॒तदाप्या॑य॒त्यन्न॑मेन॒मुप॑स॒माव॑र्त्त॒तेऽन्न॒मनु॑क॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ८॥ तद्य॒त्सार॑स्व॒तम॑नु भव॑ति । वाग्वै सर॑स्व॒त्यन्नं॑ सो॒मस्तस्मा॒द्यो वा॒चा प्र॒साम्यन्ना- दो हैव भव॑ति ॥ ९॥ अथ पौष्णम् । प॒शवो॒ वै पू॒षा प॒शुभि॑रेव॒ तत्प्र॒जाप॑तिः पु- न॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यत पश॑व एन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तन्त प॒शून॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत प॒शुभि॑- र्वेᳵष ए॒तदाप्या॑यते पश॑व एन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तन्ते प॒शून॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ १०॥ अथ बार्हस्प॒त्यम् । ब्रह्म॒ वै बृ॒हस्पति॒र्ब्रह्म॑णैवैतत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नमा॒प्याय॑यत ब्रह्मैन॒मुप॑स॒माव॑र्त्तत ब्रह्म॑नुका॒मात्म॒नो॑ऽकुरुत ब्र॒ह्मणो॑ऽᳵवै॒ष ए॒तदाप्या॑यते ब्र॒ह्मै- न॒मुप॑स॒माव॑र्त्तते ब्रह्म॑नुका॒मात्म॑नः कुरुते ॥ ११॥ तद्य॒त्पौष्ण॒मनु॑ भव॑ति । प॒शवो॒ वै पू॒षा ब्रह्म॒ बृह॒स्पति॒स्तस्मा॒द्ब्राह्म॑णः प॒शून॒भिधृ॑ष्णुतमः पुराहि॒ता ह्य॑स्य भव॑न्ति मु॒खऽआ॒हिता॒स्तस्मा॒द् तत्सर्वं॑ दृ॒त्वाजि॑नवासी॒ चर॑ति ॥ १२॥ अथ वैश्वदे॒व꣫ । सर्वं॒ वै विश्वे॑ दे॒वाः सर्वै॑णेव॒ तत्प्र॒जाप॑तिः पुन॒रात्मा॑नम॒प्याय॑यत॒ सर्व॑मेन॒मुप॑स॒मावर्त्त-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० ३-१३ शतपथब्राह्मण / ५०१ मेरी श्री और भोजन के लिए ठहरे' ॥३॥ वह सन्तान की इच्छा से पूजा और श्रम करता रहा। उसने तब इस एकादशिनी (ग्यारह का समूह) को देखा। उस एकादशिनी की इष्टि करके उसने अपने को पुष्ट किया। प्रजा उसके पास लौट आई और उसकी श्री और भोजन के लिए उसके पास ठहरी। इस इष्टि से वह वस्तुतः अच्छा हो गया ॥४॥ इसलिए ग्यारह इष्टि करनी चाहिएँ। इस प्रकार प्रजा और पशुओं के द्वारा पुष्टि हो जाती है। प्रजा उसके पास लौट आती है। उसकी प्रजा श्री और भोजन के लिए ठहरती है। वह इष्टि करके अच्छा हो जाता है। इसलिए ग्यारह की इष्टि करनी चाहिए ॥५॥ पहले वह अग्नि देवता सम्बन्धी पशु का आलभन करता है। अग्नि देवताओं का मुख और उत्पन्न करनेवाला है। वह प्रजापति है। इस प्रकार यजमान अग्नि का हो जाता है ॥६॥ फिर सरस्वती के लिए। वाणी सरस्वती है। वाणी से ही प्रजापति ने फिर अपने को पुष्ट किया। वाणी फिर उसके पास वापस आई। वाणी को उसने अपने अनुकूल किया। वाणी से यह भी अपने को पुष्ट करता है। वाणी उसके पास लौट आती है और वह वाणी को अपने अनुकूल बनाता है ॥७॥ फिर सोम के लिए। सोम अन्न है। अन्न से ही तब प्रजापति ने अपने को पुष्ट किया। अन्न उसके पास लौटकर आया। अन्न को ही उसने अपने अनुकूल बनाया। अन्न से यह भी अपने को पुष्ट करता है। अन्न उसके पास लौटकर आता है और अन्न को वह अपने अनुकूल बनाता है ॥८॥ सरस्वती के पीछे सोम क्यों आता है ? सरस्वती वाणी है, सोम अन्न है, इसलिए जो वाणी के द्वारा अधूरा रहता है अन्न का खानेवाला होता है ॥६॥ अब पूषा के लिए। पशु पूषा हैं। पशुओं से ही तब प्रजापति ने अपने को पुष्ट किया। पशु उसके पास लौट आये। पशुओं को उसने अपने अनुकूल बनाया। इसी प्रकार यह भी पशुओं के द्वारा अपने को पुष्ट करता है। पशु उसके पास लौट आते हैं,और वह पशुओं को अपने अनुकूल बनाता है ॥१०॥ अब बृहस्पति के लिए। ब्रह्म बृहस्पति है। ब्रह्म के द्वारा ही प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। ब्रह्म उसके पास लौट आया। ब्रह्म को वह अपने अनुकूल करता है। यह भी ब्रह्म के द्वारा अपने को पुष्ट करता है। ब्रह्म उसके पास लौट आता है। ब्रह्म को वह अपने अनुकूल करता है ॥११॥ बृहस्पति पूषा के पीछे क्यों होता है ? पशु ही पूषा हैं। ब्रह्म बृहस्पति है। इसलिए पशु ब्रह्म के हैं। उसी ने उनको आगे रक्खा है, मुख के स्थान में रक्खा है। इसलिए इन सबको देकर वह भेड़ के चमड़े को पहनकर चलता है ॥१२॥ अब विश्वेदेवों के लिए। विश्वेदेव 'सर्व या सब' हैं। सबके द्वारा ही प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। 'सब' उसके पास लौट आये। 'सबको' उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी

५०२ शतपथ ब्राह्मण त॒ सर्व॑मनुकमा॒त्मनो॑ऽकुरुत सर्वैरे॒वैष ए॒तदाप्या॑यते॒ सर्व॑मेनमुपसमा॒वर्त॑ते सर्व॑मनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १३॥ तद्यद्बार्हस्प॒त्यम॑नु भ॒वति॑ । ब्रह्म॒ वै बृह॒स्पति॑ः सर्व॒मिदं विश्वे॑ दे॒वा अ॒स्यैवैतत्स॑र्वस्य॒ ब्रह्म॑ मु॒खं क॑रोति॒ तस्मा॑दस्य॒ सर्व॑स्य ब्रा- ह्म॒णो मु॒खम् ॥ १४॥ अथैन्द्रम् । इ॒न्द्रियं॒ वै वी॒र्य॒मिन्द्र॑ इन्द्रि॒येणै॒व तद्वी॒र्येण प्र॒- जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒तेन्द्रि॒येणै॒व वी॒र्य॒मुप॑समा॒वर्त॑तेन्द्रि॒यं वी॒र्य॑मनुकमा॒त्म- नो॑ऽकुरुतेन्द्रि॒येणै॒वैष ए॒तद्वी॒र्येणाप्या॑यत॒ऽइन्द्रि॒यमे॑नं वी॒र्य॒मुप॑समा॒वर्त॑त॒ऽइन्द्रि॒- यं वी॒र्य॑मनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १५॥ तद्यद्वैश्वदे॒वम॑नु भ॒वति॑ । क्ष॒त्रं वाऽइ॒न्द्रो वि॒- शो विश्वे॑ दे॒वा अ॒न्नाद्य॑मे॒वास्मा॒ऽएतत्पुर॒स्तात्क॑रोति ॥ १६॥ अथ मारु॒तम् । वि॒- शो वै म॒रुतो॒ भूमो॒ वै विड्भूत्वैव तत्प्र॒जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒ भूमि॑नमु॒- पस॑मा॒वर्त॑त॒ भूमा॑नमनुकमा॒त्मनो॑ऽकुरुत॒ भूम्नो॒ऽवैष ए॒तदाप्या॑यते॒ भूमि॑नमुपसमा॒- वर्त॑ते॒ भूमा॑नमनुकमा॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १७॥ तद्यदैन्द्र॒मनु॑ भवति । क्ष॒त्रं वाऽइ॒न्द्रो विशो विश्वे॑ दे॒वा विशो वै म॒रुतो॒ विशै॒वैतत्क्ष॒त्रं परि॑बृ॒ह्यति॒ तदि॒दं क्ष॒त्रमु॑भय॒तो वि॒शा परि॑बृढम् ॥ १८॥ अथैन्द्रा॒ग्नम् । तेजो वाऽअ॒ग्निरि॑न्द्रि॒यं वी॒र्य॑मिन्द्र॒ उभाभ्या॑- मे॒व तद्वी॒र्या॑भ्यां प्र॒जाप॑तिः पुनरा॒त्मान॒माप्या॑यत॒तोभे॒ऽएनं॑ वी॒र्ये॒ऽउप॑समा॒वर्त॑ता- मुभे वी॒र्ये॒ऽअनु॑के॒ऽआ॒त्मनो॑ऽकुरुतो॒भाभ्या॑मे॒वैष ए॒तद्वी॒र्या॑भ्यामाप्या॑यत॒ऽउभे॒ऽएनं॑ वी॒र्ये॒ऽउप॑समा॒वर्त॑ते॒ऽउभे वी॒र्ये॒ऽअनु॑के॒ऽआ॒त्मनः॑ कुरुते ॥ १९॥ अथ सावित्र॒म् । सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता त॒थो हास्मा॒ऽएते॑ सवितृप्रसूता ए॒व सर्वे॒ कामाः॑ समृ॑ध्यन्ते ॥ २०॥ अथ वारु॒णम॒न्तत॒ आलभ॑ते । तदे॒न॑ सर्व॑स्माद्वरु॒णपाशा॑त्स॒र्व- स्माद्वरु॒ण्यात्प्रमु॑ञ्चति ॥ २१॥ तस्माद्यदि॒ यूपै॑कादशिनी स्यात् । आग्ने॒यमे॒वाग्निष्ठे॒ नियु॒ञ्ज्यादथे॑तरा॒न्व्युप॑नयेयुर्यथापूर्वम् ॥ २२॥ यद्यु प॒श्वे॑कादशिनी स्यात् । आग्ने॒यमेव॑ यूप॒ऽआल॑भेर॒न्नथे॑त॒रान्यथापूर्वम् ॥ २३॥ तान्यत्रोदीचो नय॑न्ति । आग्ने॒यमेव॑ प्रथ॒मं नय॑न्त्यथे॑त॒रान्यथापूर्वम् ॥ २४॥ तान्य॒त्र निवि॑ध्यन्ति । आग्ने॒यमेव॑ प्रथ॒मं दक्षि॑णा॒र्धं

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १, कं० १३-२५ शतपथब्राह्मण / ५०३ 'सब' के द्वारा अपने को पूर्ण करता है। सब उसके पास लौट आते हैं और सबको वह अपने अनुकूल कर लेता है ॥१३॥ यह बृहस्पति के पीछे क्यों होता है ? बृहस्पति ब्रह्म है। यह सब विश्वेदेव हैं। वह ब्रह्म को इन सबका मुख बनाता है। इसी से ब्राह्मण सबका मुख है ॥१४॥ अब इन्द्र के लिए। इन्द्र का अर्थ है शक्ति, वीर्य। इसी शक्ति तथा वीर्य के द्वारा प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। यही शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आया। इसी शक्ति या वीर्य को उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी शक्ति या वीर्य के द्वारा अपने को पूर्ण करता है। यह शक्ति या वीर्य उसके पास लौट आता है और वह उसको अपने अनुकूल बना लेता है ॥१५॥ यह विश्वेदेवों के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है। विश्वेदेव वैश्य हैं। इस प्रकार वह अन्न को सामने रखता है ॥१६॥ अब मरुत् के लिए। मरुत् वैश्य है। वैश्य का अर्थ है भूमः या बहुतायत। बहुतायत (भूमः) से ही प्रजापति ने तब अपने-आपको पूर्ण किया। बहुतायत उसके पास लौट आई। बहुतायत को उसने अपने अनुकूल बना लिया। इसी प्रकार वह भी बहुतायत से अपने को पूर्ण करता है। बहुतायत उसके पास लौट आती है। बहुतायत को अपने अनुकूल बना लेता है ॥१७॥ वह इन्द्र के पीछे क्यों होता है ? इन्द्र क्षत्रिय है, विश्वेदेव वैश्य हैं, मरुत् वैश्य हैं। इस प्रकार वैश्यों से क्षत्रिय की रक्षा होती है। यह क्षत्रिय दोनों ओर से वैश्यों के द्वारा सुरक्षित है ॥१८॥ अब इन्द्राग्नी के लिए। अग्नि तेज है। इन्द्र वीर्य है। इन दोनों शक्तियों के द्वारा प्रजापति ने अपने को पूर्ण किया। दोनों शक्तियाँ उसके पास आईं। उन दोनों शक्तियों को उसने अपने अनुकूल बनाया। यह भी इन दोनों शक्तियों द्वारा अपने को पूर्ण करता है। ये दोनों शक्तियाँ उसके पास लौट आती हैं और वह दोनों को अपने अनुकूल कर लेता है ॥१९॥ अब सविता के लिए। सविता देवों का प्रेरक है। इस प्रकार सविता से प्रसवित होकर उसकी सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥२०॥ अन्त में वह वरुण के लिए (पशु का) आलभन करता है। वह इसको वरुण के सब पाशों से और सब पापों से मुक्त कर देता है ॥२१॥ इसलिए यदि ग्यारह यूप हों तो अग्निवाले पशु को अग्नि के सामनेवाले यूप से बाँधे। अन्य सब को इसी प्रकार क्रमशः ॥२२॥ यदि ग्यारह पशु हों तो अग्निवाले पशु को यूप में आलभन करे। अन्यों को इसी प्रकार क्रमशः ॥२३॥ जब उनको उत्तर की ओर ले जाते हैं तो अग्निवाले को पहले ले जाते हैं, फिर औरों को इसी क्रम से ॥२४॥ जब उनको पहले गिराते हैं, तो अग्निवाले को पहले दक्षिण की ओर गिराते हैं। औरों

अध्याय-९, ब्राह्मण-२

५०४ शतपथ ब्राह्मण

निविध्यत्येतैरा॒नुदीचो॒ऽतिनीय यथापू॒र्वम् ॥ २५॥ तेषां यत्र वपाभिः प्रचर॑न्ति । आग्ने॒यस्यैव प्रथमस्य व॒पया प्रचर॒न्त्येत॑रेषां यथापू॒र्वम् ॥ २६॥ तैर्यत्र प्रचर॑न्ति । आग्ने॒येनैव प्रथमेन प्रचर॒न्त्येतै॑र्यथापू॒र्वम् ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ २ [१.१.] ॥ ॥ यत्र॒ वै यज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत । तस्य॒ रसो द्रुत्वापः प्रवि॑वेश तेनैवैतद्र॒सेनापः स्यन्द॑न्ते तमेवैतद्र॒सꣳ स्यन्दमानं मन्यन्ते ॥ १॥ स यद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति । तमेवैतद्र॒- समाहृत्य यज्ञे॑ दधाति र॒सवन्तं यज्ञं करोति तस्माद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति ॥ २॥ ता वै सर्वे॑षु सव॑नेषु विभजति । सर्वे॑ष्वेवैतत्सव॑नेषु रसं दधाति सर्वाणि सव॑नानि र॒- सव॑न्ति करोति तस्मात्सर्वे॑षु सव॑नेषु विभज॑ति ॥ ३॥ ता वै स्यन्द॑मानानां गृह्णी- यात् । ए॒द्धि स यज्ञस्य॒ रस॑स्तस्मात्स्यन्द॑मानानां गृह्णीयात् ॥ ४॥ गोपीथाय वा ऽए॒ता गृह्य॑न्ते । सर्वं वा॒ऽइदमन्यदिलयति यदि॒दं किं चापि योऽयं पव॑ते॒ऽथैता ए॒व नेलयन्ति तस्मात्स्यन्द॑मानानां गृह्णीयात् ॥ ५॥ दिवा गृह्णीयात् । पश्यन्य॒ज्ञ- स्य रसं गृह्णानीति॒ तस्माद्दिवा गृह्णीयादे॒तस्मै वै गृह्णाति य॒ एष तपति विश्वे॑भ्यो ह्येना देवेभ्यो॑ गृह्णाति र॒श्मयो॒ ह्यस्य विश्वे॑ देवा॒स्तस्माद्दिवा गृह्णीयाद्दि॒वेव वा ऽए॒ष तस्माद्दि॒व दिवा गृह्णीयात् ॥ ६॥ एतद्वै विश्वे॑ देवाः । य॒जमानस्य गृहा- नागच्छ॑न्ति स यः पु॒रादित्या॑स्यास्तमयाद्वसतीवरीर्गृह्णा॑ति यथा श्रेयस्यागमिष्यत्याव- सथेनोपकॢप्तेनोपासी॑तैवं तत्स॒ऽएतद्धविः प्रविश॑न्ति त॒ऽएतासु वसतीवरीषूपवस- न्ति स उपवसथः ॥ ७॥ स यस्यागृ॑हीता अभ्यस्तमिया॑त् । तत्र प्रायश्चित्तिः क्रि- यते यदि पुरेज्ञानः स्यान्निनाव्याद्गृह्णीयाद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भव॑न्ति यद्यु॒ऽअनीज्ञानः स्याद्य एनमीज्ञान उपावस॑तो वा पर्यवस॑तो वा स्यात्तस्य नि- नाव्याद्गृह्णीयाद्दिवा हि तस्य ताः पुरा गृहीता भव॑न्ति ॥ ८॥ यद्यु॒ऽएतदुभयं न विन्देत् । उल्कुषीमेवादा॒योप॑परियात्तामु॒पर्युपरि धारयन्गृह्णीयाद्धिर॒ण्यं वोप॒र्युपरि धारयन्गृह्णीयात्तदेतस्य रूपं क्रियते य॒ एष तपति ॥ ९॥ अथानो गृह्णात्येव । हृ-

कां० ३, अ० ६, ब्रा० १-२, क० २५-२७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५०५ को उत्तर की ओर ले जाते हुए उसी क्रम से ॥२५॥ अब उनकी वपा की आहुति देते हैं तो पहले अग्नि की, फिर औरों की उसी क्रम से ॥२६॥ जब उनसे अन्य आहुतियां देते हैं तो पहले अग्निवाले से । फिर औरों से उसी क्रम से ॥२७॥ अध्याय ६-ब्राह्मण २ जब यज्ञ का शिर काट दिया गया तो उसका रस बहकर जलों में मिल गया । इसी रस के कारण वे जल बहते हैं। यह माना जाता है कि वही रस बहता है ॥१॥ जब वह वसतीवरी जल के पास जाता है तो इसी रस को लाकर यज्ञ में रखता है और यज्ञ को रसयुक्त करता है । इसलिए वह वसतीवरी जल के पास जाता है ॥२॥ उनको वह सब सवनों में बाँट देता है । इससे वह सब सवनों में रस को धारण करता है । सब सवनों को रसयुक्त करता है । इसलिए सब सवनों में उसे बाँटता है ॥३॥ उसको वह बहते हुए में से लेवे । चूंकि यज्ञ का रस बह रहा था, इसलिए उसे बहते हुए जलों में से लेना चाहिए ॥४॥ इनको रक्षा के लिए लेते हैं। इस संसार में जो कुछ है वे सब आराम लेते हैं, यहाँ तक कि यह वायु भी जो चलता है । परन्तु जल आराम नहीं लेते, इसलिए इन बहते हुए जलों में से ही लेवे ॥५॥ इन (जलों) को दिन में लेना चाहिए, यह सोचकर कि यज्ञ के रस को देखकर ग्रहण करूँ । इसलिए इनको दिन में लेना चाहिए । यह जो तपता है (अर्थात् सूर्य) उसी के लिए इनका ग्रहण करता है, क्योंकि विश्वेदेवों के लिए ग्रहण करता है । उसकी किरणें ही विश्वेदेव हैं। इसलिए दिन में ग्रहण करना चाहिए । वह (सूर्य) केवल दिन में ही (उदय होता है) इसलिए दिन में ही ग्रहण करना चाहिए ॥६॥ विश्वेदेव यजमान के घर आते हैं। यदि वसतीवरी जलों को सूर्यास्त से पहले ग्रहण करता है तो यह सर्वथा ऐसा ही है कि जैसे कोई बड़ा (मान्य) आवे तो वह उसे अपने घर को शुद्ध करके स्वागत करे। ऐसा ही यह है। ये देव हवि के पास आते हैं और उन वसतीवरी जलों में प्रविष्ट हो जाते हैं। यही उपवसथ कहलाता है ॥७॥ यदि कोई इन जलों को लेने में सूर्यास्त कर दे तो प्रायश्चित्त किया जाता है। यदि उस पुरुष ने पहले (सोम) यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े (निनाह्य) से ले लेना चाहिए। क्योंकि उसके जल सूर्यास्त से पहले ही के लिए होते हैं। यदि उसने पहले सोमयज्ञ न किया हो तो यदि उसके पास या पड़ोस में कोई और पुरुष हो जिसने यज्ञ किया हो तो उसी के घड़े से लेवे, क्योंकि उसके जल भी सूर्यास्त से पहले ही ग्रहण किये हुए होते हैं ॥८॥ अगर ये दोनों न मिलें तो एक जलती लकड़ी लेकर उन जलों के ऊपर दिखाकर ग्रहण करे । वह स्वर्ण को ऊपर दिखाकर ग्रहण करे । इससे उसी का रूप हो जाता है जो ऊपर तपता है । (अर्थात् जलती लकड़ी या सोने का टुकड़ा सूर्य के बराबर हो जाता है) ॥६॥ इन जलों को इस मन्त्र से लेता है—

५०६ शतपथ ब्राह्मण वि॒ष्मन्तीरि॒मा आप॒ इति॒ यज्ञ॑स्य॒ ह्यासु॒ रसः॒ प्रावि॑श॒त्तस्मा॑दाह ह॒विष्मती॑रि॒मा आप॒ इति॒ ह॒विष्माँ२॥ऽआ॒विवा॑सतीति॒ ह॒विष्मान्ह्ये॑ना यज॑मान॒ आ॒विवा॑सति तस्मा॑दाह ह॒विष्माँ२॥ऽआ॒विवा॑सतीति ॥ १०॥ ह॒विष्मान्दे॒वोऽअ॑ध्वर॒ इति॑ । अ- ध्व॒रो वै य॒ज्ञस्तद्यस्मै॑ य॒ज्ञाय॑ गृह्णाति॒ तꣳ ह॒विष्म॑तं करोति॒ तस्मा॑दाह ह॒विष्मा- न्दे॒वोऽअ॑ध्वर॒ इति॑ ॥ ११॥ ह॒विष्माँ२॥ऽअ॑स्तु॒ सूर्य॒ इति॑ । ए॒तस्मै॑ वै गृह्णाति॒ य ए॒ष त॑पति॒ विश्वे॑भ्यो ह्येना दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति र॒श्मयो॑ ह्यस्य॒ विश्वे॑ दे॒वास्तस्मा॑दाह ह॒विष्माँ२॥ऽअ॑स्तु॒ सूर्य॒ इति॑ ॥ १२॥ ता आ॒वृत्य॑ ज॒घने॑न गा॒र्हप॑त्यꣳ सादयति । अग्ने॒र्वैऽप॑त्नगृहस्य॒ सद॑सि सादयामीत्यग्ने॒र्वैऽनार्त॑गृहस्य॒ सद॑सि सादयामीत्ये॒वैत- द्दाहाय॒ यदा॒ग्नीषो॒मीयः॑ प॒शुः संतिष्ठ॑ते॒ऽथ परि॑हरति॒ व्युत्क्रा॒मतेत्या॑ह ह॒वि- र्धाने यज॑मान आस्ते॒ ता आद॑त्ते ॥ १३॥ स दक्षि॑णेन निष्क्रा॑मति । ता दक्षि॑णा- याꣳ श्रोणौ सादयतीन्द्रा॒ग्न्योर्भा॑ग॒धेयी॑ स्थेति॒ विश्वे॑भ्यो ह्येना दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाती- न्द्रा॒ग्नी हि विश्वे॑ दे॒वास्ताः पुन॑रा॒हृत्याग्रे॑ण पत्नीꣳ सादयति॒ स ज॒घने॑न पत्नीं॒ पर्ये॑- त्य ता आद॑त्ते ॥ १४॥ स उत्तरे॑ण निष्क्रा॑मति । ता उत्त॑रायाꣳ श्रोणौ सादयति मित्रावरु॑णयोर्भाग॒धेयी॑ स्थेति॒ नैवꣳ सा॑दयेदति॒रिक्त॒मेतन्नैवꣳ सम्पत॑त्सम्पद्यत॒ऽइन्द्रा- ग्न्योर्भा॑ग॒धेयी॒ स्थेत्ये॑व ब्रूयात्तद्दे॒वानति॑रिक्तं॒ तथा॒ सम्पत॑त्सम्पद्यते ॥ १५॥ गुप्त्यै॑ वा ऽए॒ताः प॒रिशि॑ष्यन्ते । अ॒ग्निः पु॒रस्ता॑दु॒द्येताः सम॑न्तं पर्य्यङ्‌गयन्ते॒ नाष्ट्रा रक्षा॑ꣳस्यपघ्नं- त्यस्ता आग्नीध्रे सादयति॒ विश्वे॑षां दे॒वानां॑ भाग॒धेयी॑ स्थेति॒ तदा॑सु॒ विश्वान्दे॒वात्स॑- वेशयन्त्ये॒ते वै व॑सतां॒ वरं॒ तस्मा॑द्वसतीवर्य्यो नाम॒ वसता॑ꣳ ह वै व॒रं भव॑ति॒ य एवमे॒तद्वेद॑ ॥ १६॥ तानि॒ वाऽए॒तानि॑ सप्त॒ यजूं॑षि भवन्ति । च॒तुर्भि॑र्गृह्णात्येके॑न ज॒घने॑न गा॒र्हप॑त्यꣳ सादयत्येके॑न॒ परि॑हरत्येके॑नाग्नी॒ध्रे तानि॑ सप्त॒ यत्र॒ वै वाचः॒ प्र॒जाता॑नि॒ च्छन्दा॑ꣳसि सप्त॒पदा॒ वै तेषां॑ परा॒र्ध्या शक्कर्यताम॒भिसम्प॑दं॒ तस्मा॑त्सप्त य- जूं॑षि भवन्ति ॥ १७॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [१. २.] ॥ ॥

का० ३, अ० ६, ब्रा० २, कं० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ५०७ "हविष्मतीरिमा आपः" (यजु० ६।२३) - "ये जल हवि-युक्त हैं।" यज्ञ का रस इनमें मिला है। इसलिए कहा 'हविष्मती'। "हविष्माँ२ऽआविवासति" (यजु० ६।२३) - "हवि- युक्त पुरुष इनको काम में लावे।" हवियुक्त यजमान इनको काम में लाता है। इसलिए कहा 'हविष्मान् आविवासति' ॥१०॥ "हविष्मान्देवोऽअध्वरः" (यजु० ६।२३) - "देव अध्वर हवियुक्त है।" अध्वर कहते हैं यज्ञ को। इस प्रकार जिस यज्ञ के लिए वह इन जलों को लेता है उसको वह हवियुक्त कर देता है। इसलिये कहा कि 'हविष्मान्देवोऽअध्वरः' ॥११॥ "हविष्माँ२ऽअस्तु सूर्यः" (यजु० ६।२३) - "सूर्य हवि-युक्त हो।" यह जो सूर्य तपता है उसी के लिए इनको ग्रहण करता है। यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण करता है। विश्वे-देव दस किरणें हैं। इसलिये कहा कि 'सूर्य हवि-युक्त हो' ॥१२॥ इनको लाकर वह गार्हपत्य के पीछे देता है- "अग्नेर्वोऽपन्नगृहस्य सदसि सादयामि" (यजु० ६।२४) अर्थात् "सुरक्षित गृहवाले अग्नि के घर में तुमको रखता हूँ।" जब अग्निसोम- वाला पशु निकट आवे तो वह (वसतीवरी जलों को) उसके पास ले जाता है और कहता है 'उत्क्राम' (चले जाओ)।' यजमान हविर्धान के सामने बैठता है और (अध्वर्यु जलों को) वहीं लेकर खड़ा होता है ॥१३॥ वह दक्षिण द्वार से निकलता है और दक्षिणी श्रोणि में रख देता है। "इन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम इन्द्र-अग्नि के भाग हो।" क्योंकि यह विश्वे-देवों के लिए ग्रहण करता है। इन्द्र-अग्नि विश्वे-देव हैं। वह इन जलों को लेकर पत्नी के आगे रख देता है और पत्नी के पीछे से घूमकर उनको उठा लेता है ॥१४॥ वह उत्तर द्वार से निकलता है। उन जलों को उत्तरी श्रोणि में रख देता है। "मित्रा वरुणयोर्भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम मित्र-वरुण के भाग हो।" उसी प्रकार न रखे। यह व्यर्थ है। इससे काम भी सिद्धनहीं होता। ऐसा कहे कि तू इन्द्र-अग्नि के भागधेय हो। इसमें कोई अनर्थकता नहीं है और काम भी सिद्ध हो जाता है ॥१५॥ इन जलों को रक्षा के लिए लाते हैं। अग्नि आगे है। और जल चारों ओर घूमकर दुष्ट राक्षसों को हटाते हैं। इनको वह आग्नीध्र (के स्थान) में रख देता है। "विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ" (यजु० ६।२४) - "तुम विश्वे-देवों के भाग हो।" इस प्रकार वह विश्वे-देवों को इनमें प्रवेश कराता है। यह 'वसतां' अर्थात् रहनेवालों के लिए 'वरं' शुभ होते हैं। इसलिए इनका नाम 'वसतीवरी' है। जो इस रहस्य को समझता है वह निवासियों के लिए श्रेष्ठ हो जाता है ॥१६॥ ये सात यजुः हैं। चार यजुओँ से ग्रहण करता है। एक से गार्हपत्य के पीछे ले जाता है। एक से चारों ओर फिराता है। एक से आग्नीध्र के स्थान में रखता है। ये सात हुए। जब वाणी से सात छन्द उत्पन्न हुए तो उनमें से अन्तिम शक्वरी था। इससे सम्पूर्ति हुई। इसलिए सात यजुः होते हैं ॥१७॥

अध्याय-९, ब्राह्मण-३

५०८ शतपथ ब्राह्मण तात्त्सम्प्र॒बोधयन्ति । तेऽप॑ उ॒पस्पृ॒श्याग्नीध्र॒मुप॑समायन्ति त॒ऽग्राभ्यानि गृह्णते गृ- ही॒त्वाग्राभ्या॒न्याय॒त्त्यासाद्य॒ाग्राभ्या॑नि ॥ १॥ अथ॒ राजान॒मुपाव॑हरति । इ॒यं वै प्रति॑ष्ठा ज॒नूरासां॑ प्र॒जानामि॒मामे॒वैतत्प्रति॑ष्ठाम॒भ्युपाव॑हरति त॒मस्यै॑ तनुते त॒मस्यै॑ जनयति ॥ २॥ अ॒न्तरेणे॒षेऽउ॒पाव॑हरति । य॒ज्ञो वाऽअनस्तन्त॑न्वेव य॒ज्ञान् ब॒हिर्धा॑ करोति ग्रावसु॒ संमुखे॒ष्वधिनि॑दधाति क्ष॒त्रं वै सोमो विशो ग्रावाणः क्ष॒त्रमे॒वैतद्विश्य॒ध्यू॑ह- ति तद्यत्स॑न्मुखा भव॑न्ति विशमे॒वैतत्स॑न्मुखां क्ष॒त्रियम॒भ्यवि॑वादिनीं करोति॒ तस्मा- त्संमुखा भव॑न्ति ॥ ३॥ स उ॒पाव॑हरति । हृ॒दे वा मन॑से॒ त्वेति॑ यज॒मानस्यै॒तत्का- मायाह हृ॒दयेन॒ हि मन॑सा यज॒मानस्तं कामं॑ कामयते यत्काम्या॒ यज॑ते॒ तस्मादाह हृ॒दे वा मन॑से॒ त्वेति॑ ॥४॥ दि॒वे वा॒ सूर्या॑य॒ त्वेति॑ । दे॒वलो॒काय॒ त्वेत्ये॒वैतदा॑ह यदा॑ह दि॒वे त्वेति॒ सूर्या॑य॒ त्वेति दे॒वेभ्यस्त्वेत्ये॒वैतदा॒होर्ध्वमि॒ममध्व॒रं दि॒वि दे॒वेषु धे- हीत्य॑ध्व॒रो वै य॒ज्ञ ऊ॒र्ध्वमिमं॑ य॒ज्ञं दि॒वि दे॒वेषु धेहीत्ये॒वैतदा॑ह ॥५॥ सो॒म राज॒न्विश्वा॑स्त्वं प्र॒जा उपाव॑रोहेति । तदे॒नमासां॑ प्र॒जानामाधि॑पत्याय राज्या॒योपाव॑- हरति ॥ ६॥ अथानुसृ॒ज्योप॑तिष्ठते । विश्वा॑स्त्वां प्र॒जा उपाव॑रोहन्त्वित्य॒यथाय॒मि- व वाऽए॒तत्करोति॒ यदा॑ह॒ विश्वा॑स्त्वं प्र॒जा उपाव॑रोहेति क्ष॒त्रं वै सोमस्तत्पापव- स्यसं करोति॒ तद्येद॒मनु पापवस्यसं क्रियतेऽथायं यथायथं करोति यथापूर्वं यदा॑ह विश्वा॑स्त्वां प्र॒जा उपाव॑रोहन्त्विति तदे॒नमाभिः॑ प्र॒जाभिः॑ प्रत्यव॒रोहयति॒ तस्मा॑त् क्ष॒त्रियमायत्त॑मिमाः प्र॒जा विशः॑ प्रत्यव॒रोह॑न्ति तम॒धस्ता॑दु॒पासत॒ऽउपसन्नो होता प्रातरनुवा॒कमनु॑वक्ष्य॒न्भवति ॥ ७॥ अथ स॒मिधम॒भ्याद॑धा॒त् । दे॒वेभ्यः॑ प्रात॒र्याव- भ्योऽनु॑ब्रूहीति॒ च्छन्दा॑सि॒ वै दे॒वाः प्रात॒र्यावाणश्छन्दा॑स्यनुया॒जा दे॒वेभ्यः॑ प्रेष्य दे॒- वान्य॑जेति वाऽअ॒नुयज्ञंश्चर॑न्ति ॥ ८॥ तदु॒ हैकऽआहुः । दे॒वेभ्यो॑ऽनुब्रूहीति तदु तथा॒ न ब्रूयाच्छन्दा॑सि॒ वै दे॒वाः प्रात॒र्यावाणश्छन्दा॑स्यनुया॒जा दे॒वेभ्यः॑ प्रेष्य दे॒- वान्य॑जेति वाऽअ॒नुयज्ञंश्चर॑न्ति॒ तस्मा॑द् ब्रूयाद्दे॒वेभ्यः॑ प्रात॒र्यावभ्यो॑ऽनुब्रूहीत्येव ॥९॥

का० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ५०६ अध्याय ६-ब्राह्मण ३ उन (ऋत्विजों) को जगाते हैं। वे जलों को छूकर आग्नीध्र में जाते हैं और आज्यों को ग्रहण करते हैं। आज्यों को लेकर वे (वेदि पर) जाते हैं। आज्यों को रखकर-॥१॥ सोम राजा को उतारता है। यह पृथिवी इन प्रजाओं की प्रतिष्ठा और जन्म-स्थान है। वह राजा (सोम) को इसी प्रतिष्ठा में उतारता है। उसी पर फैलाता है। उसी मे उत्पन्न करता है ॥२॥ वह गाड़ी के जुओं के बीच में उसको उतारता है। गाड़ी यज्ञ (का साधन) है। इस प्रकार वह उसको यज्ञ से बाहर नहीं करता। वह उस (सोम) को उन पत्थरों पर रखता है जो एक-दूसरे के सम्मुख होते हैं। सोम क्षत्रिय है, पत्थर वैश्य है। इस प्रकार वह क्षत्रिय को वैश्य के ऊपर रखता है। पत्थर एक-दूसरे के सम्मुख क्यों होते हैं? इसलिए कि वह वैश्यों को एक-मुख होकर क्षत्रियों के सामने विवाद-रहित करता है। इसलिए पत्थर एक-दूसरे के सम्मुख होते हैं ॥३॥ वह (सोम को) इस मन्त्र से उतारता है- "हृदे त्वा मनसे त्वा" (यजु० ६।२५)- “हृदय के लिए तुझको, मन के लिए तुझको।" अर्थात् यजमान की कामना के लिए। यजमान हृदय और मन से कामना करता है। कामना करके ही यज्ञ करता है इसलिए कि 'हृदय के लिए तुझको, मन के लिए तुझको' ॥४॥ "दिवे त्वा सूर्याय त्वा" (यजु० ६।२५)- "अर्थात् तुझको देवलोक के लिए, तुझको सूर्यलोक के लिए।" जब वह कहता है 'दिवे त्वा सूर्याय त्वा' तो आशय होता है 'देवों के लिए'। “ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ" (यजु० ६।२५) - 'अध्वर' कहते हैं यज्ञ को। इसका तात्पर्य यह है कि “तू इस यज्ञ को और हवन को द्यौलोक में ऊपर देवों के लिए ले जा" ॥५॥ “सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजाऽउपावरोह" (यजु० ६।२६) - "हे सोम राजा, तू इस सब प्रजा पर उतर।" वह इस राजा को प्रजाओं के आधिपत्य और राज्य के लिए नीचे उतारता है ॥६॥ उसको रखकर उसके पास बैठ जाता है- "विश्वास्त्वां प्रजाऽउपावरोहन्तु" (यजु० ६।२६)- “सब प्रजाएँ तुझ तक उतरें।" यह जो उसने कहा कि 'तू सब प्रजा तक उतर' यह अनुचित था, क्योंकि सोम क्षत्रिय है। इस प्रकार बुरे-भले मिल गये। इसीलिए तो आज भी बुरे- भले मिल जाते हैं। यह जो कहा कि 'प्रजाएं तुझ तक उतरें' यह ठीक है, क्योंकि वैश्य लोग क्षत्रिय के सामने आकर झुकते हैं, अर्थात् सिर झुकाते हैं। पास बैठकर होता प्रातःकालीन अनुवाक पढ़ना आरम्भ करता है ॥७॥ अब समिधा को चढ़ाकर वह कहता है- 'प्रातःकाल आनेवाले देवों के लिए अनुवाक कह।' प्रातः आनेवाले देव छन्द हैं, जैसे कि अनुयाज भी छन्द हैं। अनुयाज यह कहकर किये जाते हैं- 'देवों के लिए भेजो, देवों के लिए यजन करो' ॥८॥ कुछ लोग कहते हैं 'देवों के लिए अनुवाक कहो।' ऐसा न कहना चाहिए। प्रातः आने- वाले देव छन्द हैं, और अनुयाज किये जाते हैं यह कहकर कि 'देवों के लिए भेजो, देवों के लिए यजन करो।' इसलिए कहना चाहिए कि 'प्रातःकाल आनेवाले देवों के लिए अनुवाक कह' ॥६॥

अथ॒ यत्स॒मिधम॒भ्याद॑धाति । छ॒न्दा॑ꣳ॒स्ये॒वैतत्पु॒नरा॒प्याय॑यत्ययातयामानि करोति॒ यात॑यामानि वै दे॒वैश्छ॒न्दा॑- सि॒ च्छन्दो॑भि॒र्हि दे॒वाः स्वर्गं॑ लो॒कꣳ स॒माश्नु॑वत॒ न वाऽअ॒त्र स्तु॑वते॒ न शꣳ॑सन्ति॒ तच्छ॒न्दा॑ꣳ॒स्ये॒वैतत्पु॒नरा॒प्याय॑यत्ययातयामानि करोति तै॒रयात॑यामैर्य॒ज्ञं त॒न्वते॒ त॒- स्मा॒द्धोता॑ प्रातरनुवाकमन्वाह॑ ॥ १०॥ तदा॑हुः । कः प्रातरनुवा॒कस्य॑ प्रतिगर॒ इ- ति जाग्र॑दे॒वाध्व॒र्यु॒रुपा॑सीत॒ स यन्निमि॑षति॒ स है॒वास्य॑ प्रतिगर॒स्तद् तथा॒ न कु॒र्या- द्यदि॑ निद्रायादपि॑ कामꣳ स्वप्यादात्स यत्र॒ होता॑ प्रातरनुवा॒कं परि॑दधाति॒ तत्प्रचर॑- णीति शुग्भवति तस्यां॑ चतुर्गृही॒तमाज्यं॑ गृही॒त्वा जुहो॑ति ॥ ११॥ यत्र॒ वै य॒ज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत । तस्य॒ रसो॒ द्रुवापः॑ प्रवि॑वेश॒ तम॒द्भूः पूर्वैद्युर्व॑सतीवरीभिरा॒हर॒न्त्यथ॒ योऽअत्र॑ य॒ज्ञस्य॒ रसः॒ परिशि॑ष्टस्तमे॒वैतद्गृह्णा॑ति ॥ १२॥ यद्वेवैतामाहु॑तिं जु॒होति॑ । ए॒- तम्वे॒वैतद्य॒ज्ञस्य॒ रस॒मभि॒प्रस्तृ॑णीते॒ तमवा॑रुन्द्धे॒ याभ्य॑ उ॒ चैवैतां दे॒वता॑भ्य आ॒हुतिं॑ जु॒होति॒ ता ह्येवैतत्प्री॑णाति॒ ता अ॒स्मै तृप्ताः प्रीता एतं य॒ज्ञस्य॒ रसꣳ संन॑मन्ति ॥ १३॥ ॥ शतम् २२०० ॥ ॥ स जुहोति । शृणोत्व॒ग्निः स॒मिधा॒ हवं॑ म॒ऽइति॑ शृ- णोतु मऽइ॒दम॒ग्निर्ह्वनं मे॒ जाना॒त्वित्ये॒वैतदा॑ह॒ शृण्वन्त्वापो॑ धिष॒णाश्च॑ दे॒वीरिति॑ शृ- ण्वन्तु मऽइ॒दमापोऽनु॑ मे जान॒न्त्वित्ये॒वैतदा॑ह॒ श्रोता॒ ग्रावा॑णो वि॒दुषो॒ न य॒ज्ञ- मिति॑ शृ॒ण्वन्तु मऽइ॒दं ग्रावा॑णो॒ऽनु मे जान॒न्त्वित्ये॒वैतदा॑ह वि॒दुषो॒ न य॒ज्ञमिति॑ वि॒द्वाꣳसो॒ हि ग्रावा॑णः शृ॒णोतु॑ दे॒वः स॑वि॒ता हवं॑ मे॒ स्वाहेति॑ शृ॒णोतु मऽइ॒दं दे॒वः स॑वि॒तानु॑ मे जाना॒त्वित्ये॒वैतदा॑ह सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तत्स॑वितृप्र- सूत ए॒वैतद्य॒ज्ञस्य॒ रस॒मवैति॑ ॥ १४॥ अथाप॑रं चतुर्गृही॒तमाज्यं॑ गृही॒त्वा । उदङ् प्र- यन्नाहाप॒ इष्य॒ होत॒रित्युप॑ इ॒ह होत॒रित्‍ये॒वैतदा॑ह॒ तद्यद॒तो होता॒न्वाहै॒तमे॒वैत- द्य॒ज्ञस्य॒ रस॒मभि॒प्रस्तृ॑णीते॒ तमवा॑रुन्द्धे॒ऽएतानु॒ चैवैतदनूति॑ष्ठते॒ नैदे॑नानन्त॒रा नाष्ट्रा र॒क्षाꣳसि॑ हिन॒सन्निति॑ ॥ १५॥ अथ॒ सम्प्रेष्य॑ति । मै॒त्राव॒रुणस्य॑ चम॒साध्व॒र्यवेहि॒ ने-

का० ३, अ० ६, ब्रा० ३, क० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५११ जब वह समिधा रखता है तो इससे छन्दों को उत्तेजित करता है। और जब होता प्रातः- अनुवाक को कहता है उससे भी वह छन्दों को ही पुष्ट और पूर्ण करता है। देव छन्दों के द्वारा ही स्वर्गलोक को गये, इसलिए छन्द अपूर्ण हो गये, क्योंकि अब न तो स्तुति होती है न प्रशंसा। इसलिए अब वह छन्दों को पूर्ण करता है। और इन्हीं पूर्ण छन्दों से यज्ञ को करता है और होता अनुवाक पढ़ता है ॥१०॥ इस पर कुछ लोगों का कहना है कि 'प्रातरनुवाक का प्रतिगर या फल क्या है?' अध्वर्यु को जागते हुए उपासना करनी चाहिए और जब वह निमेष ले, वही उसका प्रतिगर है। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यदि नींद आ जाय तो सो जाय। जब होता प्रातः-अनुवाक को समाप्त करता है तब प्रचरणी आहुति दी जाती है। स्रुक् में चार बार आज्य लेकर आहुति देता है ॥११॥ जब यज्ञ का सिर काटा गया तो रस जलों में मिल गया। उसको गत दिवस वसतीवरी जलों के द्वारा लाये थे। अब जो कुछ रस बच गया उसको इसके द्वारा लाते हैं ॥१२॥ जब वह उस आहुति को देता है तो इसको यज्ञ के रस के लिए देता है। उस रस को अपनी ओर खींचता है। जिन देवताओं के लिए आहुति देता है उन्हीं को प्रसन्न करता है। इस प्रकार तृप्त होकर ये देवते यज्ञ के रस को इसके लिए दिलाते हैं ॥१३॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है- "शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे" (यजु० ६।२६) इसका अर्थ है कि "अग्नि समिधा द्वारा मेरी स्तुति सुने या स्वीकार करे।" "शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः" अर्थात् "दिव्य गुणयुक्त जल और धिष्ण हमारी स्तुति सुनें।" "श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञम्" (यजु० ६।२६) अर्थात् "यज्ञ को जाननेवाले ग्रावा (पत्थर के तुल्य दृढ़ गुरुजन) इस मेरी स्तुति को सुनें या स्वीकार करें।" 'विदुषः' इसलिए कहा कि यह ग्रावा विद्वान् है। "शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा" (यजु० ६।२५) अर्थात् "सविता देव मेरी इस स्तुति को स्वीकार करे।" सविता देवों का प्रेरक है। सविता की ही प्रेरणा से वह यज्ञ के रस की इच्छा करता है ॥१४॥ फिर चार चमसों में घी को लेकर उत्तर की ओर जाकर कहता है, 'हे होता, जलों को बुलाओ।' या 'जलों की इच्छा करो।' होता ऐसा क्यों कहता है ? इसका कारण यह है कि इसी आहुति के द्वारा अध्वर्यु घी को यज्ञ के रस में डालता है और अपनी ओर खींचता है। और होता (एकधन) ग्रहों के पास खड़ा रहता है कि दुष्ट राक्षस उसको सता न सकें ॥१५॥ अब अध्वर्यु आदेश देता है-'हे मित्रावरुण के चमसा रखनेवाले, आओ। नेष्टा, पत्नियों

ष्टः प्र॒नीदा॒ग्नये॑ऽग्नीधिन॒न् एता॒म्रीत्या॑चात्वाले वस॒तीव॒रीभिः प्रत्युप॑तिष्ठस्व होतुश्चम- सेन॒ चेति॒ सम्प्रैष॒ उद्वैषः ॥ १६ ॥ तऽउदञ्चो निष्क्रामन्ति । जघनेन चावालमग्रे- णाग्नीध्रꣳ स यस्यां ततो दिश्यापो भवन्ति तद्यन्ति ते वै सह पत्नीभिर्यन्ति तद्य- त्सह॒ पत्नी॑भि॒र्यन्ति॒ ॥ १७॥ यत्र॒ वै य॒ज्ञस्य॒ शिरो॑ऽछिद्यत । तस्य॒ रसो॒ द्रुवापः॑ प्र- विवेश॒ तम॑ते गन्ध॒र्वाः सोमर॒क्षा जु॑गुपुः ॥ १८ ॥ ते ह देवा॑ ऊचुः । इ॒यम्न्वे॒वे- ह नाष्ट्रा य॒दिमे ग॑न्ध॒र्वाः क॒थं न्वि॒ममभवे॑ऽनाष्ट्रे य॒ज्ञस्य॒ रस॒माह॑रे॒मेति॑ ॥ १९ ॥ ते होचुः । यो॒षित्कामा॒ वै ग॑न्ध॒र्वाः सह॒ पत्नी॑भिरियाम॒ ते पत्नी॑ष्वेव गन्ध॒र्वा ग॒र्धि- ष्य॒न्त्यथै॑तमभ॒वेऽना॑ष्ट्रे य॒ज्ञस्य॒ रस॒माह॑रिष्याम॒ इति॑ ॥ २० ॥ ते सह॒ पत्नी॑भिरीयुः । ते पत्नी॑ष्वेव॒ गन्ध॒र्वा अगृ॑ध्यु॒रयैत॒मभ॒वेऽना॑ष्ट्रे य॒ज्ञस्य॒ रस॒माज॑ह्रुः ॥ २१ ॥ तथोऽए॒- वैष ए॒तत् । मरु॑त्व॒ पत्नी॑भिरेति॒ ते पत्नी॑ष्वेव॒ गन्ध॒र्वा गृ॑ध्यन्त्ययैत॒मभ॒येऽना॑ष्ट्र य॒- ज्ञस्य॒ रस॒माह॑रति ॥ २२॥ सोऽपो॒ऽभिहु॑त्योति । ए॒ता॒ ह॒ वाऽअ॒ग्नाङ्क॑ति॒ हुतामेष य॒ज्ञस्य॒ रस उप॒संमेति॒ तां प्रत्युत्ति॑ष्ठति॒ तमे॒वैत॒दाविष्कृत्य गृह्णाति ॥ २३ ॥ यद्वेवे- तामाहु॑तिं जु॒होति॑ । ए॒तमे॒वैतद्य॒ज्ञस्य॒ रस॒मभिप्रस्तृ॑णीते तम॒ारुन्द्धे तमपो॑ याचति याभ्य उ चैवैता॑ दे॒वताभ्य॒ आहु॑तिं जु॒होति॒ ता ह्यैतत्प्रीणाति ता अस्मै तृप्ताः प्रीता॒ एतं य॒ज्ञस्य॒ रसꣳ संन॑मन्ति ॥ २४ ॥ स जुहोति । दे॒वो रापो॒ऽअपा॑न्नपादिति दे॒व्यो ह्य॒ापस्तम्मा॑दाह दे॒वो रापो॒ऽअपा॑न्नपादिति॒ यो व॑ ऊ॒र्मिर्ह॒विष्य॒ इति॒ यो व॑ ऊ॒र्मिर्य॒ज्ञिय उ॒त्येवैत॑दाहेन्द्रियावान्मदिन्तम॒ इति॑ वी॒र्य॑वानित्ये॒वैत॑दाह॒ यदा॒हे- न्द्रि॒यावा॒निति॑ मदिन्तम॒ इति॑ स्वा॒दिष्ट॒ इत्ये॒वैत॑दाह॒ तं दे॒वेभ्यो॑ देव॒त्रा दत्तेत्ये॒तद्दे- ना अयाचिष्ट यदा॑ह॒ तं दे॒वेभ्यो॑ देव॒त्रा द॑त्तेति शु॒क्रपेभ्य॒ इति॑ स॒त्यं वै शु॒क्रꣳ स- त्येपेभ्य इत्येवैतदाह येषां भाग स्थ स्वाहेति तेषामू ह्येष भागः ॥ २५॥ अथ मै- त्रावरुणचमसेनेनामाहुतिमपप्लावयति । कार्षिरसीति यथा वाऽङ्गारोऽग्निना स्नातः स्यादेवमेषाहुतिरनया देवतया स्नाता भवति राजानं वाऽएताभिरद्भिरुप-