शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० १, अ० २, ब्रा० ४, कं० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३५ हैं। उन्हीं की भुजाओं से उठाता है, अपनी से नहीं। यह वज्र है। वज्र कोई मनुष्य उठा नहीं सकता। इसलिए वह देवों की सहायता से यह काम करता है ॥४॥ 'मैं तुझे देवों के अध्वर के लिए लेता हूँ'; 'अध्वर' का अर्थ है यज्ञ। इसका तात्पर्य है कि वह देवों के लिए यज्ञ करता है। इसको बायें हाथ से उठाकर और दाहिने हाथ से छूकर जप करता है; जप का प्रयोजन है 'तेज करना' ॥५॥ वह जपता है (यजु० १।२४)-"तू इन्द्र की दाहिनी बाहु है।" इन्द्र की दाहिनी बाहु बहुत बलवान् होती है। इसीलिए कहा कि 'तू इन्द्र की दक्षिण बाहु है'-'हजार नोकों वाला, सैकड़ों धारों वाला'। वज्र हजारों नोकों वाला था। इन्द्र ने जो वज्र फेंका, वह सैकड़ों धारों वाला था। इस प्रकार वह स्फ्या में वैसी ही भावना करता है ॥६॥ 'तू तेज धार वाला वायु है।' वायु जो बहता है तेज धार वाला होता है, क्योंकि वह संसार-भर को चीरकर बहता है, इस प्रकार वह उसको तेज करता है-'वैरी के वध के लिए'। चाहे किसी को मारना चाहे, या न, उसको कहना चाहिए 'अमुक को मारने के लिए'। जब वह तेज हो जाय तो इससे न अपने को छुए, और न पृथिवी को, यह सोचकर कि 'कहीं इससे मुझे वा जमीन को हानि न पहुँच जाय।' इसीलिए वह न स्वयं को छूता है न उससे पृथिवी को छूता है ॥७॥ देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान अपनी बड़ाई के लिए झगड़ बैठे। देवों ने असुरों को हरा दिया। परन्तु असुर भी देवों को कष्ट देने लगे ॥८॥ देवों ने कहा, 'हमने असुरों को हरा दिया, फिर भी असुर हमको सताते रहे। क्या काम करें कि अब फिर हम असुरों को हरा दें और दोबारा लड़ना न पड़े' ॥६॥ अग्नि ने कहा-'हम उत्तर को भागें।' वहाँ वे बच गये। उत्तर में भागने से वस्तुतः बच गये ॥१०॥ अग्नि ने कहा--'मैं उत्तर की ओर से इनको घेरे लेता हूँ, तुम इधर से रोको। जब हम रोकेंगे तो तीनों लोकों से इनको दबा देंगे और तीनों लोकों के आगे जो चौथा लोक है, इससे वे फिर सिर न उठा सकेंगे' ॥११॥ इस पर अग्नि उत्तर को चला गया और दूसरे देवों ने उन असुरों को इधर से रोक दिया। रोककर उनको तीनों लोकों से दबा दिया, और जो चौथा लोक इन लोकों से परे है उससे वे फिर न उठ सके। यह जो घास फेंकता है यह वही असुरों को दबाने के कृत्य का रूप है ॥१२॥ अग्नीध्र उत्तर की ओर जाता है क्योंकि अग्नीध्र अग्नि है। अध्वर्यु उनको उधर से रोक देता है। इनको रोककर इन लोगों द्वारा उनको दबा देता है। इन तीन लोकों के अतिरिक्त जो चौथा लोक हो वहाँ से भी वे उठने न पावें। वे इस प्रकार नहीं उठ पाते क्योंकिजैसे देवों ने पहले उनको रोक दिया था, इसी प्रकार इन ब्राह्मणों ने भी उनको रोक दिया ॥१३॥