भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ४, अ० ३, ब्रा० १, कं० १८-२६ शतपथब्राह्मण / ५८१ "उपयामगृहीतोऽसि सहसे त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम- गृहीतोऽसि सहस्याय त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों हेमन्त के महीने हैं। क्योंकि हेमन्त इन प्रजाओं को साहस के साथ वश में लाता है, इसलिए सहस और साहस ये दो हेमन्त के महीने हुए ॥१८॥ "उपयामगृहीतोऽसि तपसे त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे अध्वर्यु लेता है। "उपयाम- गृहीतोऽसि तपस्याय त्वा" (यजु० ७।३०) —इससे प्रतिप्रस्थाता। ये दोनों शिशिर ऋतु के महीने हैं। क्योंकि इनमें पाला बहुत पड़ता है, इसलिए तप और तपस्या ये शिशिर के महीने हैं ॥१९॥ "उपयामगृहीतोऽसि अँहसस्पतये त्वा" (यजु० ७।३०) —"इससे तेरहवां ग्रह (अध्वर्यु) लेता है। यदि तेरहवाँ लेना हो तो प्रतिप्रस्थाता अध्वर्यु के पात्र में बचा-खुचा छोड़ देता है, या अध्वर्यु प्रतिप्रस्थाता के पात्र में बचा-खुचा छोड़ देता है। (अध्वर्यु) अब पान करने के लिए (सदस् में) ले जाता है ॥२०॥ अब प्रतिप्रस्थाता उस पात्र से जिसमें से पिया नहीं गया इन्द्र-अग्नि के ग्रह को लेता है। ऐसे पात्र से इन्द्र-अग्नि के ग्रह को क्यों लेता है, जिसमें पिया न गया हो ? इसलिए कि ऋतु-ग्रहों पर तो दोबारा वषट्कार हुआ नहीं। और उन्हीं के लिए इन्द्र-अग्नि ग्रह लेता है। इस प्रकार इन्द्र-अग्नि के द्वारा इनका वषट्कार हो जाता है ॥२१॥ इन्द्र-अग्नि ग्रह को इसलिए भी लेता है कि ऋतु-ग्रहों को लेकर ही इसने इन 'सब' को उत्पन्न किया। वह इन 'सब' को उत्पन्न करके प्राण और उदान में इनकी प्रतिष्ठा करता है। इसीलिए ये 'सब' प्राण और उदान में प्रतिष्ठित हैं। इन्द्र-अग्नि प्राण और उदान हैं। इन्हीं में ये सब प्रतिष्ठित हैं ॥२२॥ इन्द्र-अग्नि ग्रह को लेने का यह भी प्रयोजन है कि ऋतु-ग्रहों से उसने इस 'सब' को उत्पन्न किया और इस 'सब' को उत्पन्न करके 'प्राण और उदान' की इस 'सब' में प्रतिष्ठा करता है, इसलिए प्राण और उदान इस सबमें प्रतिष्ठित हैं ॥२३॥ वह इसको (द्रोण कलश से) इस मन्त्र से लेता है—"इन्द्राग्नी ऽ आगत॑ ˏ सु॒तं गीर्भिर्न॑भो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषि॒ता । उपयामगृहीतोऽसीन्द्राग्निभ्यां त्वा" (यजु० ७।३१, ऋ० ३।१२।१) —'हे इन्द्र-अग्नि, हमारी वाणियों द्वारा तुम दोनों आओ इस निचोड़े हुए और आदित्य के समान वरने योग्य सोम के पास । बुद्धि के द्वारा प्रेरित हुए तुम दोनों इसको पियो। आश्रय के लिए लिया गया है तू इन्द्र और अग्नि के लिए तुझको।" "एष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा" (यजु० ७।३१) —"यह तेरी योनि है। इन्द्र और अग्नि के लिए तुझको।" यह कहकर वह रख देता है, क्योंकि इन्द्र और अग्नि के लिए उसने लिया था ॥२४॥ अब 'वैश्वदेव' ग्रह को लेता है। ऋतु-ग्रहों को लेकर ही उसने इस 'सब' को उत्पन्न किया। यदि इतना ही होता तो जितनी प्रजा पहले उत्पन्न हो गई उतनी ही रह जाती, आगे उत्पन्न न होती ॥२५॥ वैश्वदेव ग्रह को इसलिए भी लेता है कि वह इन सब प्रजाओं को क्रमशः कर देता है। इससे यह प्रजा बार-बार उत्पन्न होती रहती है। इसको शुक्र-पात्र से लेता है। यह जो सूर्य

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