भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० ४, अ० ५, ब्रा० २-३, कं० १७-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६३७ को लेकर पूर्वाभिमुख होकर मरुतों के लिए इस मंत्र से आहुति दे देता है, “मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः" (यजु० ८।३१) - "हे द्यौलोक के वीर मरुतो ! जिसके घर में तुम पीते हो वह सबसे अधिक सुरक्षित होता है।" इसके साथ 'स्वाहा' का उच्चा- रण नहीं होता; देवों में मरुत् (साधारण जन) आहुति दिये हुए को नहीं खाते। 'स्वाहा' के बिना जो आहुति दी जाती है वह आहुति नहीं समझी जाती। मरुत् देवों में से हैं। इस प्रकार वह इसको मरुतों के साथ प्रतिष्ठित कर देता है ॥१७॥ अब वह इसको कोयले से ढक देता है, इस मंत्र से, “मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः" (यजु० ८।३२, ऋ० १।२२।१३) - "बड़े द्यौ-पृथिवी इस हमारे यज्ञ को मिलावें और हमको शक्ति देनेवाले पदार्थों से पूर्ण करें" ॥१८॥ षोडशिग्रहः अध्याय ५-ब्राह्मण ३ षोडशी ग्रह इन्द्र है। एक बार भूत अर्थात् प्राणी-वर्ग इन्द्र से बढ़ गये। प्राणी ही प्रजा हैं। वे उसकी बराबरी करने लगे ॥१॥ इन्द्र ने सोचा मैं इन सबसे कैसे बढ़ सकूँ और ये सब मुझसे नीचे किस प्रकार रहें ? उसने इस ग्रह (षोडशी) को देखा और इसको ले लिया। वह इन सबसे बढ़ गया और ये सब उससे नीचे हो गये। जो इस रहस्य को समझकर इस ग्रह को ग्रहण करता है वह सबसे बढ़ जाता है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥२॥ इसीलिए तो ऋषि का वचन है- “न ते महित्वमनु भूदध द्यौर्यदन्यया स्फिग्या क्षाम- वंस्थाः” (ऋ० ३।३२।११)- "जब तू अपनी दूसरी जांघ के सहारे पृथिवी पर ठहरा तो द्यौलोक तेरी बड़ाई का अनुभव नहीं कर सका, या तेरी बड़ाई को न पहुँच सका।" वस्तुतः यह द्यौ उसकी दूसरी जांघ तक न पहुँच सका। इस प्रकार वह यहाँ की सब वस्तुओं से बढ़ गया और सब वस्तुएँ उसके नीचे हो गईं। वस्तुतः इस रहस्य को समझकर यदि जिस किसी के लिए इस ग्रह को निकालते हैं, वह सबसे बढ़ जाता है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥३॥ इस ग्रह को लेते समय 'हरिवती' ऋचा पढ़ी जाती है (अर्थात् वह मंत्र जिसमें 'इन्द्र हरिवान्' का उल्लेख हो)। (उद्गाता लोग) 'हरिवती' से ही स्तुति करते हैं और होता 'हरि- वती' का ही पाठ करता है। इन्द्र ने अपने शत्रु असुरों का वीर्य अर्थात् 'हर' ले लिया। इसी प्रकार यह (यजमान) भी अपने शत्रुओं के 'हर' को छीन लेता है। इसीलिए वह 'हरिवान्' वाली ऋचा से ग्रह को लेता है। हरिवान् की स्तुति होती है और हरिवती ऋचाओं का ही (उद्गाता लोग) पाठ करते हैं ॥४॥ वह इसको अनुष्टुभ् छन्द से लेता है। प्रातःसवन गायत्री का है, दोपहर का सवन त्रिष्टुभ् का, तीसरा सवन जगती का। अनुष्टुभ् इन सबके ऊपर है। इसी प्रकार इस ग्रह को भी सबके ऊपर रखता है। इसीलिए इसको अनुष्टुभ् छन्द से ग्रहण करता है ॥५॥ उसको चौकोर पात्र में लेता है। ये लोक तीन हैं। तीन कोनों से वह तीन लोकों का ग्रहण करता है। चौथे कोने से वह इस सोने को सबके ऊपर स्थापित करता है। इसलिए वह इसके चौकोर पात्र लेता है ॥६॥ इसको प्रातःसवन के आग्रयण के लेने के पीछे लेना चाहिए। प्रातःसवन में लेने के पश्चात्