शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकां० ४, अ० ६, ब्रा० ७, कं० २-१० शतपथब्राह्मण / ६६७ जो एक विद्या को जानता हो उसको चाहिए कि अन्य दो विद्याओं को भी जान ले, क्योंकि ऋक् से पृथिवी को जीतता है, यजुः से अन्तरिक्ष को और साम से द्यौ लोक को ॥२॥ यह वाणी की सहस्र प्रजा है। इन्द्र ने दो-तिहाई ले लिया और विष्णु ने एक-तिहाई। ऋक् और साम को इन्द्र ने और यजुः को विष्णु ने। इसलिए सदस् में ऋक् और साम से स्तति करते हैं क्योंकि सदस् इन्द्र का अपना है ॥३॥ यजुओं से इस विष्णु अर्थात् यज्ञ को आगे लाते हैं, इसलिए इसका नाम पुरश्चरण है ॥४॥ वाणी ही ऋक् और साम ह। मन ही यजुः है। जहा वाणी थी वहाँ सब काम हो गया, सब ज्ञात हो गया। जहाँ मन था वहाँ कुछ न हुआ, कुछ न ज्ञात हुआ। क्योंकि जो कोई मन में विचार करता है उसको कोई भी नहीं जानता ॥५॥ उन देवों ने वाणी से कहा, 'आगे चल और इसका ज्ञान करा।' उसने कहा, 'मुझे क्या होगा?' उन्होंने कहा कि 'जो कुछ बिना वषट्कार के स्वाहाकार से दिया जाता है वह सब तेरा लाभ होगा।' इसलिए जो कुछ वषट्कार के बिना स्वाहाकार से दिया जाता है वह सब वाणी का होता है। वह आगे बढ़ी और यह विज्ञप्ति दी कि 'ऐसा करो, ऐसा करो' ॥६॥ इसलिए वे भी हविर्धान में ऋक् से ही यज्ञ करते हैं। (होता) प्रातःकाल अनुवाक् पढ़ता है, सामिधेनियों को पढ़ता है। वह (ग्रावस्तुत) ग्राव्ण की स्तुति करता है। इस प्रकार ये दोनों अर्थात् मन और वाणी संयुक्त हो गए ॥७॥ इसलिए सदस् में यजुः से यज्ञ करते हैं। वे औदुम्बरी को उठाते हैं, सदस् को खड़ा करते हैं। वे धिष्ण्या का निर्माण करते हैं। इस प्रकार मन और वाणी दोनों संयुक्त हो जाते हैं ॥८॥ इस सदस् को वे चारों ओर से घेर देते हैं, मैथुन के लिए, यह सोचकर कि 'गुप्त रीति से ही मैथुन (मन और वाणी का संयोग) होगा।' क्योंकि यदि कोई देख ले तो मैथुन अनुचित हो जाता है। इसीलिए जब स्त्री-पुरुष मैथुन करते हुए देख लिये जाते हैं तो वे एक-दूसरे को छोड़कर अलग हो जाते हैं क्योंकि यह बुरा लगता है। इसलिए जो कोई सदस् में द्वार के सिवाय अन्य स्थान से झाँके, उससे कहना चाहिए कि मत झाँको, क्योंकि यह ऐसी ही बात है जैसे किसी को मैथुन करते हुए देखे। द्वार की ओर से कोई देख सकता है क्योंकि द्वार तो देवों का बनाया हुआ है ॥९॥ इसी प्रकार हविर्धान को भी चारों ओर से घेर देते हैं, मैथुन के लिए, अर्थात् मैथुन गुप्त रीति से किया जाय। जो कोई दूसरा मैथुन करते देख लेता है वह मैथुन अनुचित समझा जाता है। इसलिए यदि पति-पत्नी मैथुन करते हुए देख लिये जाते हैं तो वे अलग हो जाते हैं क्योंकि यह बुरी बात समझी जाती है। इसलिए यदि कोई द्वार के अतिरिक्त और किधर से ही हविर्धान में झाँके तो उससे कहना चाहिए कि 'मत झाँको' अर्थात् मानो वह मैथुन को देख रहा है। द्वार में होकर कोई देख सकता है, क्योंकि द्वार देवों द्वारा निर्मित है ॥१०॥