शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंका० ४, अ० ६, ब्रा० ७-८, कं० २०-२१ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६७१ इस रहस्य को समझता है वह श्री और यश में आगे होता है ॥२०॥ यह पुरश्चरण वही है जो तपता है (अर्थात् सूर्य) । उसी की चाल के अनुसार चलना चाहिए। जब सोम ग्रह को लेवे तो उसी की चाल के अनुसार घुमावे। जब वे होता के गीत का अनुसरण करें, तो भी सूर्य की चाल का ही अनुसरण करना चाहिए। जब वे ग्रह की आहुति दें तब भी सूर्य की चाल का ही अनुसरण करना चाहिए। सूर्य ही भर्त्ता है। जो इस रहस्य को समझकर सूर्य का अनुसरण करता है वह अपने आश्रितों (भार्या) का पालन कर सकता है ॥२१॥ सत्रायणम् अध्याय ६-ब्राह्मण ८ यह जो दीक्षा है उसका नाम है निषत् (बैठना)। उसी को सत्र (बैठक, session) कहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि 'आसत्' अर्थात् वे बैठे हैं। और इसके पश्चात् जब यज्ञ करते हैं तब वे 'यन्ति' अर्थात् 'जाते हैं'। इनमें जो 'नयति' अर्थात् अगुआ होता है वह 'नेता' होता है। इसलिए इनको कहते हैं कि ये जाते हैं। (तात्पर्य यह है कि 'दीक्षा' के लिए 'बैठने' का और यज्ञ करने के लिए 'जाने' शब्द का प्रयोग होता है) ॥१॥ जो दीक्षा है वह निषत् या बैठना है। वही सत्र (बैठक) है। वह 'अयन' (जाना) भी है। वह 'सत्रायण' अर्थात् 'बैठने के लिए जाना' है। और जब यज्ञ की समाप्ति पर उठते हैं उसको 'उत्थान' कहते हैं। इसलिए कहते हैं कि 'वे उठ बैठे।' यह हुआ प्राक्कथन (पुरस्ताद् वदनम्) ॥२॥ जिनको दीक्षित होना है वे (समय तथा स्थान को) तय कर लेते हैं। जिनको वेदी बनानी है वे अरणियों में अग्नियों को लेकर वहां चले जाते हैं जहाँ प्रजापति के लिए पशु का आलभन करना है। आग को मथकर उसमें प्रजापति-सम्बन्धी पशु-यज्ञ करते हैं ॥३॥ उसके सिर को रख लेते हैं। यदि उसी दिन उनकी दीक्षा नहीं होनी है तो अरणियों में ही फिर आग लेकर अपने-अपने घर चले जाते हैं और दैनिक आहुतियों में ही देते हैं ॥४॥ यदि उनकी दीक्षा उसी दिन होती है तो अरणियों में ही अग्नि को लेकर उस स्थान पर आ जाते हैं जहाँ दीक्षा होनी है। शाला के बीच में वहीं पर गृहपति पहले (आग को) मथता है। इनमें से आधे उसकी दक्षिण की ओर बैठते हैं, आधे उत्तर की ओर। जब आग मथ जाती है और उस पर समिधा रख जाती है तो वे एक-एक लकड़ी को लेकर गृहपति की गार्हपत्य अग्नि तक आते हैं। गृहपति को ही गार्हपत्य से आहवनीय लेकर दीक्षा लेते हैं। दीक्षा और उपसद् में आहवनीय एक ही होती है और गार्हपत्य अलग-अलग ॥५॥ जिस दिन इनको (सोम) मोल लेना है, उस दिन गार्हपत्य को चिनते हैं और उपवास के दिन (सोमयज्ञ से पूर्व दिन को उपवसथ करते हैं) दूसरों के लिए धिष्ण्या चिनते हैं। विसर्जन के दिन पत्नियां भी साथ आती हैं। और यजमान उन दूसरी अग्नियों को (गार्हपत्यों को) छोड़ जाते हैं। जब वैसर्जन आहुति हो चुकती है तो-॥६॥ सोम राजा को लाते हैं। आग्नीध्रीय अग्नि उसी समय अभी लाई हुई होती है। वे इसमें से एक-एक लकड़ी लेकर अपनी-अपनी धिष्ण्या में चले जाते हैं। (याज्ञवल्क्य ने) कहा है कि