भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

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( ६ ) दामोदर था (१७०५ वि०)। इसी लिपि पर ४० वर्ष बाद विद्याधर नामक दूसरे व्यक्ति ने स्वर- चिह्न लगाये थे (१७४८ वि० के लगभग)। शतपथ ब्राह्मण के स्वरचिह्नों के सम्बन्ध में डॉ० वेबेर का कथन है—शतपथ ब्राह्मण की पुरानी पाण्डुलिपियों में एक ही स्वरचिह्न मिलता है—पंक्ति के नीचे 'पड़ी' (horizontal) रेखा (—)। शतपथ में इस रेखा द्वारा उदात्त और स्वरित दोनों स्वरों को व्यक्त किया जाता है (ऋग्वेद और यजुर्वेद में पंक्ति के नीचे की यह 'पड़ी' रेखा अनुदात्त का सूचक होती है)। उदात्त का सूचक जब यह रेखा (—) होती है, तो इसे तत्सम्बन्धी वर्णस्वर के नीचे ही लगाया जाता है, पर जब यह स्वरित होती है, तो इसे पहले के (बगलवाले) वर्णस्वर के नीचे लगाते हैं। उदात्त का उदाहरण—नृ॒षदम् (ष उदात्त है) स्वरित का उदाहरण—वी॒र्यम् (य स्वरित है) उदात्त और स्वरित चिह्नों में अन्तर व्यक्त करने के लिए डॉ० वेबर ने स्वरितसूचक 'पड़ी', रेखा को एक जगह दो पड़ी रेखाओं (=) से व्यक्त किया है। यह युग्म स्वरित स्वर के वाम पार्श्व के वर्ण- स्वर में लगाया जाता है—वी॒॒र्यम्। उदात्त के सम्बन्ध में निम्न नियम स्मरण रखने चाहिएँ— १. अकारादि स्वरों से युक्त वर्ण ही उदात्त, अनुदात्त या स्वरित होते हैं—हलन्त व्यंजन न उदात्त होंगे, न अनुदात्त, न स्वरित। २. किसी भी एक पद में एक से अधिक उदात्त नहीं हो सकता। यह तो हो सकता है कि किसी पद में कोई भी उदात्त न हो। ३ एक पद में अनुदात्त कई हो सकते हैं—हो सकता है कि सभी स्वरान्त-वर्ण अनुदात्त हों। इसी प्रकार एक पद में एक से अधिक स्वरित भी हो सकते हैं। शतपथ ब्राह्मण में अनुदात्त व्यक्त करने के लिए कोई चिह्न नहीं है। हमने अपने शतपथब्राह्मण में समस्त पाठ वेबेर का लिया है, और इसलिए इस ग्रन्थ के स्वरचिह्न उदात्त (—), और स्वरित (=) वे ही हैं जिनका उपयोग डॉ० वेबेर ने किया है। स्वर-संकेत का एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है— १. अग्ने॑ने॒वृ जुहुयात्। सजू॒र्देवे॒न सवि॒त्रेति। तत्सवितृ॒मुत्प्रस॒वाय सजू रा॒त्रेन्द्रे व॒ण्येति तद्रा॒त्र्या मिथुनं करोति। —(शत० २।३।१।३७) इसमें जिन-जिन स्वर-वर्णों के नीचे 'पड़ी' लकीरें '(-)' खिंची हैं वे सब उदात्त-स्वर- सूचक हैं। २. य॒ त्नै॒॒ याग्निहोत्रस्य देवताग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति तन्न॒॒ नाग्नये स्वाहा। —(शत० २।३।१।३६) इस उदाहरण में त्नै और न्न के नीचे रेखा-युग्म (=) है। इसका अर्थ यह है कि इनके अगले अक्षर "या" से लेकर 'ता' तक स्वरित या एकश्रुति (या प्रचय) हैं, अर्थात् बराबर एक ही स्वर चल रहा है। डॉ० वेबेर ने अपनी भूमिका में स्पष्ट इंगित कर दिया है कि यदि अगले वर्ण पर स्वर- चिह्न लगा हो तो उससे पूर्व के उदात्त पर स्वर-चिह्न लगाना अनावश्यक हो जाता है। [Be- fore a following accented syllable, the preceding udatta loses its denota- tion.]