शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(१०) (क) केतपूःकेतम्, इसमें के॒ के नीचे स्वर-चिह्न है, अतः पूः के नीचे लगा उदात्त-चिह्न बेकार है, अतः इसे केतपूःकेतम् ही लिखेंगे (पूः के नीचे का स्वर-चिह्न निकाल देंगे।) (ख) 'महो ये॒ धूनम्' को ऐसा न लिखकर 'महो ये धूनम्' लिखेंगे (ये॒ के नीचे का चिह्न बेकार है।) (ग) 'प॒र्णं न॒ वे॒रनु' को ऐसा न लिखकर 'पर्णं न वेरनु' लिखेंगे—र् के पहले के सभी उदात्त बेकार हो गए—र्णं, न॒, वे॒,—इनके नीचे लगे उदात्त-चिह्न बेकार हो गए। जिन पाठकों को स्वर-विषयक गम्भीरता से विचार करना हो, वे डॉ० वेबेर के अंग्रेजी Preface को पढ़ें।
उपाध्यायजी का हिन्दी अनुवाद
प्रयाग के श्री पं० गंगाप्रसादजी उपाध्याय ने अपनी वृद्धावस्था में ऐतरेय ब्राह्मण और शतपथ ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद किये। ऐतरेय ब्राह्मण के हिन्दी-अनुवाद का प्रकाशन (बिना मूल संस्कृत के) 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग' ने प्रकाशित किया था। प्रयाग के ही अथर्ववेद-भाष्य- कार पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी ने गोपथ ब्राह्मण का मूल और हिन्दी अनुवाद बड़े परिश्रम से सम्पादित और प्रकाशित किया। दिल्ली के स्व० पं० रामस्वरूप शर्मा के प्रयास से उपाध्यायजी का शतपथ ब्राह्मण तीन खण्डों में १६६७, १६६६ और १६७० ई० में प्रकाशित हुआ था। बहुत दिनों से यह अनुवाद अनुपलब्ध था। मूल शतपथ ब्राह्मण का पाठ वैदिक यन्त्रालय, अजमेर के एक संस्करण से लिया गया था, किन्तु मुद्रण की कठिनाई होने के कारण उसमें स्वर-चिह्न न दिये जा सके। शतपथ ब्राह्मण का एक पाठ काशी से अच्युत ग्रन्थमाला ने भी प्रकाशित किया था (१६६४ वि०) दो जिल्दों में—श्री चन्द्रधर शर्मा द्वारा सम्पादित, एशियाटिक सोसायटी ऑव् बंगाल, कलकत्ता से शतपथ ब्राह्मण और उस पर सायणाचार्य की टीका या भाष्य प्रकाशित हुए। खेमराज कृष्णदास यन्त्रालय, बम्बई से भी सायनानुवाद छपा। अंग्रेजी में जूलियस ऐगर्लिंग (Julius Eggeling) का शतपथ ब्राह्मण का पूर्ण अनुवाद विस्तृत टिप्पणियों और भूमिकाओं सहित १८८२-८५ में सेक्रेड बुक्स ऑव् द ईस्ट सीरीज (Sacred Books of the East Series— Max Muller) में प्रकाशित हुआ था, जिसका पुनर्मुद्रण मोतीलाल बनारसीदास (दिल्ली- वाराणसी) नामक विख्यात प्रकाशक ने कर दिया है। शतपथ ब्राह्मण मुख्यतया कर्मकाण्ड का ग्रन्थ है। ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ का प्रमाणत्व उतना ही स्वीकार किया है, जितना वेदार्थ में सहायक है। शतपथ ब्राह्मण की ही तरह कात्यायन श्रौतसूत्र का भी यजुर्वेदी कर्मकाण्ड से गहरा सम्बन्ध है। उवट और महीधर दोनों आचार्यों ने यजुर्वेद के भाष्य में इन दोनों को आधार माना है। ये आचार्य जब शतपथ के सन्दर्भों का उल्लेख करते हैं, तो उसे "इति श्रुतेः" कहते हैं, और साधारणतया कात्यायन श्रौतसूत्र का प्रामाण्य सभी प्रकार स्वीकार करते हैं। शतपथ का आधार धीरे-धीरे उनके भाष्यों में कम होता जाता है। (यजुर्वेद के १३-१४ अध्यायों के बाद शतपथ का प्रयोग बहुत कम है। कात्यायन श्रौतसूत्र और पाणिनि की अष्टाध्यायी का आधार महीधर ने अपने भाष्य में यजुर्वेद के अन्तिम अध्यायों तक लिया है।) साधारणतया शतपथ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य की रचना समझी जाती है, पर ऐसा लगता है कि शाण्डिल्य भी उसका मुख्य सहयोगी था : काण्ड ७, ८ और १० तो शायद उसी की रचना हैं—इन काण्डों में याज्ञवल्क्य का नाम तक नहीं आया।