शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 9, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११ ) श्री उपाध्यायजी ने शतपथ ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र किया है, न कि उसका भाष्य । शतपथ- ब्राह्मण के समय से पूर्व कर्म (कर्मप्रेरक यज्ञ) का युग समाप्त हो गया था, और उसका स्थान कर्मकाण्ड ने ले लिया था—स्वामी दयानन्द “कर्मकाण्ड के पोषक नहीं” वे “कर्म” के पोषक थे । कात्यायन श्रौतसूत्र तो निम्नतम कर्मकाण्ड का पोषक बना, अतः महीधर के समान विद्वान् आचार्यों ने इससे प्रेरणा ली । ऋषि दयानन्द ने अपने यजुर्वेद-भाष्य में शतपथ के कर्मकाण्ड को कोई महत्त्व नहीं दिया । स्पष्ट है कि ये ब्राह्मणग्रन्थ हमारी दार्शनिक आस्थाओं और मान्यताओं के ग्रन्थ नहीं हैं । सभी विद्वान् पाठक अपनी रुचियों और मान्यताओं के आधार पर उपाध्यायजी के इस अनुवाद से लाभ उठा पायेंगे । यह अनुवाद किसी आस्था के परिप्रेक्ष्य में नहीं किया गया है, यही इसकी विशेषता है । निश्चय है कि यह ग्रन्थ हमारे उस युग का ग्रन्थ है, जब समाज का विकास शिथिल हो गया था, और उस अधोगति के समय कर्मकाण्ड को प्रश्रय प्रचुरता से मिलने लगा था । हमें प्रसन्नता है कि उपाध्यायजी का यह शतपथ-अनुवाद डॉ० वेबेर के स्वरांकित शतपथ-संस्करण के साथ प्रकाशित किया जा रहा है। इस हिन्दी-टीका का नाम “रत्नकुमारी- दीपिका” रहा है। डॉ० रत्नकुमारीजी उपाध्यायजी की ज्येष्ठ पुत्रवधू थीं। “डॉ० रत्नकुमारी प्रकाशन योजना” के अन्तर्गत शतपथ ब्राह्मण के इस अनुवाद का प्रथम संस्करण १९६७-७० में दिल्ली से निकला था । यह दूसरा संस्करण दिल्ली के यशस्वी प्रकाशक गोविन्दराम हासानन्द के सौजन्य से प्रकाशित किया जा रहा है। आयोजन के लिए हम इस प्रकाशन-संस्थान के वर्तमान अध्यक्ष श्री विजयकुमार जी और उनके परिवार के अनुगृहीत हैं । शतपथ ब्राह्मण और उसके अनुवाद के सम्बन्ध में कतिपय भ्रान्तियाँ हैं। बहुत-से स्थल ब्राह्मणग्रन्थ में ऐसे हैं, जिनमें पशुबलि की गन्ध मिलती है, अथवा जिनमें मांस खाने का भ्रम होता है। कर्मकाण्ड के ग्रन्थों में यथार्थता का निश्चय करना सरल नहीं है। जिस प्रकार हत्या या बलि के दृश्य नाटक की स्टेज पर नहीं दिखाये जाते, केवल संकेत मात्र से काम निकाल लिया जाता है, ऐसा ही इन यज्ञों में भी सम्भवतया होता था । पशु-यज्ञ बहुधा सृष्टि-रचना की नाटिका थे । सूर्य और बादल के युद्ध थे । इस नाटिका में प्रतीक से काम चला लिया जाता था; यह चित्रण भी ब्राह्मण-ग्रन्थों में मिलेगा । बहुत-से स्थल प्रक्षिप्त भी हो सकते हैं । भारत के इतिहास में एक समय ऐसा भी रहा जब वेदों के नाम पर पशु-बलि निःसन्देह होने लगी थी । महात्मा बुद्ध को इसीलिए वैदिक साहित्य से ग्लानि हुई । ऐसे पतनकाल के समय में हमारा समस्त आर्ष साहित्य प्रक्षेपों से विकृत कर दिया गया । प्रस्तुत शतपथ ब्राह्मण प्राचीन ग्रन्थ का अनुवाद-मात्र हैं। पाठकों से आग्रह हैं कि किस बात को सिद्धान्त के अनुकूल मानें, और किसको प्रतिकूल, इसका स्वयं निर्णय करें । हिन्दी अनु- वादक का कर्त्तव्य केवल इतना है कि मूलग्रन्थ का सच्चा-सच्चा अनुवाद प्रस्तुत कर दे । अनुवादक अपना अनुवाद अपनी आस्था के आधार पर नहीं करता । निस्सन्देह वेद, दयानन्द और आर्य- समाज में एवं आर्ष साहित्य में निष्ठा रखनेवाला व्यक्ति न तो पशु-बलि को मानता है, न मांस- भोजन को और न किसी अनैतिकता को । श्री उपाध्यायजी के इस अनुवाद को इसी भावना से देखना चाहिए । नई दिल्ली —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ६ अप्रैल १९८८