भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

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का० १, अ० ३, ब्रा० ५, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ६५ कहना चाहिए, क्योंकि अभी वह 'होता' तो बना नहीं। जब यजमान उसका वरण कर लेगा तभी तो वह होता बनेगा। इसलिये (बिना होता को सम्बोधन किये) केवल इतना ही कहना चाहिए 'जलती हुई अग्नि के लिए मंत्र बोलो' ॥३॥ अग्नि की ऋचाएँ बोली जाती हैं, अर्थात् अग्नि को उसीके देवता के द्वारा प्रज्वलित करता है। गायत्री छन्द के मंत्र बोलता है। गायत्री अग्नि का छन्द है, अतः अपने ही छन्द से अग्नि प्रज्वलित होती है। गायत्री वीर्य है। गायत्री ब्रह्म है। अतः वीर्य से ही इसको प्रज्वलित करता है ॥४॥ ग्यारह मंत्र बोलता है। त्रिष्टुभ् में ग्यारह ही अक्षर होते हैं। गायत्री ब्राह्मण है। त्रिष्टुभ् क्षत्रिय है। इन्हीं दो शक्तियों द्वारा आग को प्रज्वलित करता है। इसीलिये ग्यारह मंत्र बोलता है ॥५॥ पहले मंत्र को तीन बार बोलता है और अन्तिम मंत्र को तीन बार। यज्ञ आदि में त्रिवृत् है और अन्त में भी त्रिवृत्। इसलिये वह आदिम और अन्तिम मंत्रों को तीन-तीन बार बोलता है ॥६॥ सामिधेनियां १५¹ होती हैं। १५ का अंक वज्र है। वज्र वीर्य है। अतः वीर्यरूपी वज्र से वह यज्ञ को समन्वित करता है। यदि वह किसी से द्वेष करता हो तो जब सामिधेनियों का उच्चारण हो रहा हो, उस समय वह अपने पैर से शत्रु को कुचल सकता है। वह उसको उस वज्र से मार सकता है ॥७॥ अर्ध-मास या आधे महीने में पन्द्रह रातें होती हैं। वर्ष पाख-पाख करके ही समाप्त हो जाता है। इसलिये वह रातों की प्राप्ति करता है ॥८॥ पन्द्रह गायत्रियों में ३६० अक्षर हुए। एक वर्ष में ३६० दिन होते हैं। इस प्रकार वह दिनों की प्राप्ति करता है और वर्ष की भी ॥६॥ यदि (किसी विशेष उद्देश्य से) इष्टि करना हो तो सत्रह सामिधेनियां पढ़नी चाहिएँ। जिस देवता की इष्टि देनी होती है उसके लिए चुपचाप धीरे से इष्टि दी जाती है। वर्ष में बारह मास होते हैं और पाँच ऋतुएँ। इस प्रकार प्रजापति में सत्रह हो गये। प्रजापति है सम्पूर्ण, इस- लिये जिस देवता के लिए इष्टि की जाती है वह सब सम्पूर्णता के लिए, अर्थात् यज्ञ करनेवाले को सम्पूर्णता प्राप्त हो जाती है। इष्टि के लिए यही उपचार है ॥१०॥ कुछ लोगों का कहना है कि दर्श और पूर्णमास यज्ञों में इक्कीस सामिधेनियां पढ़नी चाहिएँ। बारह मास हुए, पाँच ऋतुएँ, तीन लोक और इक्कीसवाँ वह जो नित्य तपता है अर्थात् सूर्य। वही गति है, वही प्रतिष्ठा है। गति और प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है। इसलिये इक्कीस सामिधेनियां पढ़नी चाहिएँ ॥११॥ इनको गतश्री ही पढ़े, जो चाहे कि मुझे न इससे अधिक होना है न कम। क्योंकि जिस देवता के लिए पढ़ते हैं, पढ़नेवाला उसी देवता के समान होगा या कम। जो इस रहस्य को १. ग्यारह मंत्रों में से पहले और पिछले को तीन-तीन बार पढ़ने से १५ हो जाते हैं।