भारतकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 699 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

कां० १, अ० ४, ब्रा० २, क० १-१० शतपथब्राह्मण / ७७ अग्नि हव्य का ले जाने वाला है। इसीलिए कहा 'वृणीध्वं हव्यवाहनम्' ॥३६॥ 'अध्वर' शब्द वाले तृच् (तीन ऋचाओं के समूह) को पढ़ता है। जब देव यज्ञ कर रहे थे तो उनके शत्रु असुरों ने उस यज्ञ का विध्वंस करना चाहा 'दुधूर्षाञ्चक्रुः' । परन्तु विध्वंस की इच्छा करते हुए भी वे विध्वंस न कर सके। वे हार गए। इसलिए यज्ञ का नाम अध्वर हुआ (न शेकुर्धूर्तितम्)। जो इस रहस्य को समझता है और अध्वर शब्द वाले तृच् को पढ़ता है उसके शत्रु उसका विध्वंस चाहते हुए भी उसका विध्वंस नहीं कर सकते। वे परास्त हो जाते हैं। वह सौम्य-अध्वर को करके विजय प्राप्त कर लेता है, जीत जाता है। (सौम्येन अध्वरेण = सोम- याग = सम्बन्धी अध्वर) ॥४०॥ अध्याय ४-ब्राह्मण २ पहले देवों ने अग्नि को मुख्य होता के पद पर नियुक्त किया, और उसको इस मुख्य पद पर नियुक्त करके कहा, 'तू हमारी हवि को ले जा' और यह कहकर बड़ाई करने लगे, 'निश्चय करके तू वीर्यवान् है। निश्चय करके तू इस काम के योग्य है।' इस प्रकार उसको बल देते हुए जैसा कि आजकल की जातियों में जब किसी को मुख्य पद पर चुनते हैं तो यह कहकर बड़ाई करते हैं, 'आप वीर्यवान् हैं, आप इसी कार्य के लिए हैं' और उसको बल-सम्पन्न करते हैं। इसलिए जो कुछ पढ़कर वह उसकी बड़ाई करता है, मानो उसकी स्तुति करता है अर्थात् उसको बल से सम्पन्न करता है ॥१॥ वह स्तुति यह है—'अग्ने महाँऽअसि ब्राह्मण भारत'-'हे ब्राह्मण, भारत, अग्नि, तू बड़ा है।' अग्नि ब्रह्म है इसलिए कहा 'ब्राह्मण'। 'भारत' इसलिए कहा कि यही देवों के लिए हव्य रखता है (भरति)। इसलिए कहता है 'अग्नि भारत है'। इन प्रजाओं का प्राण बनकर पोषण करता है इसलिए भारत है ॥२॥ अब वह (अग्नि को) आर्ष होता चुनता है, अर्थात् ऋषियों की शैली के अनुसार। इस प्रकार वह ऋषियों और देवों से उसका परिचय कराता है (निवेदयति) - 'यह महावीर्य है जो यज्ञ को कराता है।' यही कारण है कि यह (अग्नि को) आर्ष होता बनाता है ॥३॥ वह अति पुराने से नये तक का वरण करता है (अर्थात् ऋषियों में सबसे प्रथम से लेकर पीढ़ी-पर-पीढ़ी आज तक के ऋषि का वरण करता है) क्योंकि प्राचीन से ही तो नई पीढ़ी उत्पन्न होती है। इस प्रकार वह सबसे बड़े को नियुक्त करता है, क्योंकि पहले पिता होता है, फिर पुत्र, फिर पौत्र। इसलिए पूर्वजों से लेकर नई पीढ़ी तक का वरण करता है ॥४॥ उसको आर्ष होता बनाकर कहता है-'देवेद्धो मन्विद्धः'-'तुझे देवों ने प्रज्वलित किया, तुझे मनु ने प्रज्वलित किया।' देवों ने पहले इसे जलाया। इसलिए कहा 'देवेद्धः' । मनु ने पहले इसे जलाया इसलिए कहा 'मन्विद्धः' ॥५॥ अब कहता है—'ऋषिष्टुत' - 'ऋषियों से स्तुति किया गया'। पहले ऋषियों ने ही इसकी स्तुति की। इसलिए इसको कहा 'ऋषिष्टुत' ॥६॥ अब कहा—'विप्रानुमदित'—'विप्रों से प्रसन्न किया गया'। ये विप्र ऋषि ही थे जिन्होंने उसे प्रसन्न किया। इसलिए कहा 'विप्रानुमदित' ॥७॥ अब कहा—'कविशस्त'-'कवियों से प्रशंसित'। ये कवि ऋषि ही थे जिन्होंने इसकी प्रशंसा की। इसलिए कहा 'कविशस्त' ॥८॥ अब कहा—'ब्रह्मसंऽशित'—'वेद से प्रशंसित', क्योंकि वह ब्रह्म अर्थात् वेदमंत्रों से प्रशंसित होता है। 'घृताहवन' भी कहा क्योंकि वह घी को लेता है ॥६॥ अब कहा-'प्रणीर्यज्ञानांऽ रथीरध्वराणाम्' - 'यज्ञों का प्राणी और अध्वरों का रथी' ।