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शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Shishupalavadham of Magha Hindi

महाकवि माघ द्वारा

स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

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प्रास्ताविकम्

अस्य संस्करणस्य आवश्यकता —

अब परीक्षाओं का स्तर ऐसा हो गया है जिसमें मूल श्लोकों को लेकर भीतर से प्रश्न पूछे जाते हैं। एतदर्थ हमें ऐसे संस्करण की आवश्यकता थी जिसमें ‘शिशुपालवधम्’ प्रथमसर्ग का केवल मूलपाठ दिया गया हो ताकि अधिक पेज पलटने का श्रम न हो, जिससे ग्रन्थ को कण्ठस्थ किया जा सके, लेकिन बाद में ध्यान आया केवल ‘तोता-रटन्त’ से भी ज्यादा लाभ नहीं होता। यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि कम से कम श्लोक में किसके बारे में क्या कहा जा रहा है। पाठ करते-करते यह पता चल जाए इसलिए प्रत्येक श्लोक का प्रसङ्ग भी शुरुआत में जोड़ दिया गया है। वैसे श्लोक के सम्पूर्ण अर्थ-ज्ञान के लिए अन्य सरल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। इसलिए श्लोकों की व्याख्या का समावेश हम यहाँ नहीं कर रहे हैं।

अस्य पाठस्य वैशिष्ट्यम्—

❖ दाक्षिणात्य-संस्करण या निर्णयसागर प्रेस के संस्करण में या अन्यत्र जहाँ भी हमें पाठभेद मिला उसको हमने टिप्पणी में अलग से दर्शा दिया है, जिससे किसी भी प्रदेशवासी के लिए यह संस्करण अतीवोपयोगी बन सके, किन्तु हमने अपने संस्करण के मूल पाठ में ‘शिशुपालवधम्’ के प्रसिद्ध टीकाकार महामहोपाध्याय श्रीमल्लिनाथ ने जो पाठ स्वीकार किया है, उसी पाठ को प्राथमिकता दी है। यथा श्लोक संख्या तीन में देखें—
चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा यहाँ पर ‘पुरा’ एवं ‘पुरस्’ दोनों ही पाठ मिलते हैं लेकिन सर्वङ्कषाकार श्रीमल्लिनाथ ने ‘पुरा’ पाठ माना है, अतः हमने भी अपने मूल में ‘पुरा’ पाठ ही दिया है।

❖ इस ग्रन्थ के प्रथम-सर्ग में वंशस्थ-छन्द का प्रयोग किया गया है। जिसकी यति (जिह्वा विश्रान्ति स्थान) १२-१२ अक्षरों पर होती है। श्लोकोच्चारण करते समय आप १२वें अक्षर पर रुकें। एतदर्थ हमने प्रत्येक श्लोक के चारों चरणों को चार अलग-अलग पङ्क्तियों में कर दिया है तथा साथ ही पादान्त में विभक्ति के अर्धाक्षर को पूर्व-पद के साथ ही जोड़ दिया है, जिससे छात्र वर्ग को शुद्ध उच्चारण करने तथा अर्थावगति में भी सरलता होगी। यथा —

अथ प्रयत्नोन्नमिताऽऽनमतफणैर्
धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः।
न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं
सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥१३॥

यहाँ पर आप देख सकते हैं ‘फणैर्- धृते’ में रेफ जो पूर्वपद में स्थित है जिसका उत्तरपद ‘धृते’ के धकार पर ऊर्ध्वगमन नहीं किया, ताकि ‘फणैर्’ पूर्वपद सविभक्तिक ही दिखाई दे।

अन्यच्च—