शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Shishupalavadham of Magha Hindi
महाकवि माघ द्वारा
स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकरोति कंसादिमहीभृतां वधाज् जनो मृगाणामिव यत्तव स्तवम्। हरे! हिरण्याक्षपुरःसरासुर- द्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया ॥ ३९॥
ऐसे स्थलों पर सविभक्ति ‘वधाज्’ पादान्त पदों के कृतसन्धि अर्धाक्षर को अन्य संस्करणों की भांति अग्रिम पाद के साथ ‘वधाज्जनो’ इस प्रकार से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि ‘वधाज्’ इस सविभक्तिक को एक साथ कर अग्रिम पाद के ‘जनो’ को नई पङ्क्ति से आरम्भ किया गया है जिससे उच्चारण में सौकर्य हो। इस प्रकार आपको हमारे संस्करण में सर्वत्र ऐसा पाठ देखने को मिलेगा।
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❖ इस संस्करण के संस्कृत पाठ-सम्पादन संबन्धित कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रो. विजयपाल शास्त्री जी (साहित्यविभागाध्यक्ष केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथकीर्ति परिसर, देवप्रयाग) ने दिये हैं तथा इसी परिसर के हिंदी विभाग के सहायकाचार्य डॉ. वीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल जी ने इस संस्करण में प्रयुक्त हिंदी वाक्यों को परिशुद्धता प्रदान की है, एतदर्थ हम दोनों महानुभावों के चिर कृतज्ञ रहेंगे।
❖ इस संस्करण में हमने निम्नलिखित ग्रन्थों से पाठान्तर पाठसंशोधन इत्यादि में पर्याप्त सहायता ली गई है, एतदर्थ हम इन व्याख्याकारों या सम्पादकों के सदैव ऋणी रहेंगे –
सहायकग्रन्थाः
| व्याख्याकारः/ सम्पादकः | प्रकाशकः | संस्करणम् | वर्षम् |
|---|---|---|---|
| तारिणीशझा | रामनारायणलाल- विजयकुमारः | प्रथमम् | २०२० |
| जनार्दनशास्त्री | मोतीलाल-बनारसीदासः | द्वितीयम् | २०१२ |
| हरगोविन्द शास्त्री | चौखम्बाविद्याभवनम् | पुनर्मुद्रितम् | २०१५ |
| सी. राजेन्द्रः | साहित्य-अकादमी | प्रथमम् | २०१८ |
| शिवदत्त दाधिमथः | निर्णयसागरः मुम्बई | सप्तमम् | १९१७ |
| डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगाँवकरः | चौखम्बासंस्कृतभवनम् वाराणसी | प्रथमम् | वि०सं० २०५५ |