भारतकोश
शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Shishupalavadham of Magha Hindi

महाकवि माघ द्वारा

स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 14 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 7

शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः


✡ वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण एवं श्रीकृष्ण द्वारा आकाश से उतरते हुए मुनि नारद को देखने का वर्णन—
श्रियः पतिः श्रीमति शासितुं जगज्
जगन्निवासो वसुदेवसद्मनि ।
वसन् ददर्शावतरन्तमम्बराद्
हिरण्यगर्भाङ्गभुवं मुनिं हरिः ॥ १॥

✡ सर्वप्रथम भगवान् कृष्ण ने नारद को आकाशमार्ग से आते हुए देखा। तदनन्तर नगरवासी उन्हें विस्मयपूर्वक देखने लगे—
गतं तिरश्चीनमनूरुसारथेः
प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलनं हविर्भुजः ।
पतत्यधो धाम विसारि सर्वतः
किमेतदित्याकुलमीक्षितं जनैः ॥ २ ॥

✡ लोगों के द्वारा आकुलता पूर्वक देखे जाने पर भगवान् ने उन्हें नारद समझा—
चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा¹
ततः शरीरीति विभाविताकृतिम् ।
विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति
क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः ॥ ३ ॥

✡ अब यहाँ से सात श्लोकों में (अर्थात् चौथे से दसवें श्लोक तक) नारद मुनि का वर्णन किया गया है।
उनकी उपमा सर्वप्रथम शिव से देते हैं —
नवानधोऽधो बृहतः पयोधरान्
समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोद्धिक्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्भुना ॥ ४ ॥

✡ इस श्लोक में महर्षि नारद की तुलना हिमालय से की गई है —
दधानमम्भोरुहकेसरद्युतीर्
जटाः शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् ।
विपाकपिङ्गास्तुहिनस्थलीरुहो
धराधरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥ ५ ॥

✡ यहाँ नारद मुनि का साम्य बलराम से प्रदर्शित किया है—
पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं
वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति ।
सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरं
विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥ ६ ॥

✡ इस श्लोक में नारद जी की समानता शरत्काल में विद्युत्पुञ्ज से युक्त शुभ्र मेघ से की गई है—
विहङ्गराजाङ्गरुहैरवायतैर्
हिरण्मयोर्वीरूहवल्लितन्तुभिः ।
कृतोपवीतं हिमशुभ्रमुच्चकैर्
घनं घनान्ते तडितां गणैरिव² ॥ ७ ॥

✡ झूल से सुशोभित इन्द्रवाहन ऐरावत से नारद का साम्य वर्णन किया है—
निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा
लसद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना ।
चकासतं चारुचमूरुचर्मणा
कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ॥ ८ ॥

✡ नारद मुनि अपने हाथ में स्फटिक की अक्षमाला लिए हुए हैं। उस पर रक्त अङ्गुष्ठ का प्रकाश पड़ने से ऐसा प्रतीत होता है मानो मूँगे की माला ही धारण किये हों—
अजस्रमास्फालित³वल्लकीगुण-
क्षतोज्ज्वलाङ्गुष्ठनखांशुभिन्नया ।
पुरः प्रवालै⁴रिव पूरितार्धया
विभान्तमच्छस्फटिकाक्षमालया ॥ ९ ॥

✡ भगवान् कृष्ण ने अपनी ‘महती’ नामक वीणा का (जिसमें ग्राम और मूर्च्छनाएँ स्पष्ट हो रही हैं) बार-बार अवलोकन करते हुए नारद मुनि को देखा —
रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः
पृथग्विभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः ।
स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूर्च्छनाम्
अवेक्षमाणं महतीं मुहुर्मुहुः ॥ १० ॥

✡ नारद जी अपने पीछे आते हुए देवताओं को लौटाकर भगवान् श्रीकृष्ण के निवासस्थान पर पहुँचते हैं —


¹ 'पुरस्' इति पाठान्तरम् ।
² 'गुणैरिव' इति पाठान्तरम् ।
³ 'माश्नावित' इति पाठान्तरम् ।
⁴ 'प्रचालै' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठम्ः- ०१

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 7, कुल 14 में से · BharatKosha