शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Shishupalavadham of Magha Hindi
महाकवि माघ द्वारा
स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished14 पृष्ठ
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शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः
| निवर्त्य सोऽनुव्रजतः कृतानतीन्<br>अतीन्द्रियज्ञाननिधिर्नभःसदः ।<br>समासदत् सादितदैत्यसम्पदः<br>पदं महेन्द्रालयचारु चक्रिणः ॥ ११ ॥ | महामहानीलशिलारुचः पुरो<br>निषेदिवान् कंसकृषः स विष्टरे ।<br>श्रितोदयाद्रेरभिसाद्यमुच्चकैर्<br>अचूचुरच्चन्द्रमसोऽभिरामताम् ॥ १६ ॥ |
| ✡ भगवान् श्रीकृष्ण ने नारद जी के भूमि पर आने के पूर्व अपने आसन से उठकर उनका स्वागत किया —<br>पतत्पतङ्ग¹प्रतिमस्तपोनिधिः<br>पुरोऽस्य यावन्न भुवि व्यलीयत ।<br>गिरेस्तडित्वानिव तावदुच्चकैर्<br>जवेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः ॥ १२ ॥ | ✡ नारद जी के यथाविधि पूजन के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का कवि वर्णन कर रहा है —<br>विधाय तस्यापचितिं प्रसेदुषः<br>प्रकाममप्रीयत यज्वनां प्रियः ।<br>ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्<br>महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः ॥ १७ ॥ |
| ✡ महाकवि माघ नारद जी के पृथ्वी पर पैर रखने का वर्णन करते हैं —<br>अथ प्रयत्नो²न्नमिताऽऽनमतफणैर्<br>धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः ।<br>न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं<br>सुतेन धातुश्चरणौ भुवतले ॥ १३ ॥ | ✡ नारदजी ने अपने कमण्डलु में रखे हुए समस्त तीर्थों के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया तथा भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर ग्रहण किया—<br>अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलोर्<br>निधाय पाणाववृषाभिभाभ्युदीरिताः ।<br>अघौघविध्वंसविधौ पटीयसीर्<br>नतेन मूर्ध्ना हरिरग्रहीदपः ॥ १८ ॥ |
| ✡ इसके अनन्तर आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण ने पूजार्ह नारद का विधिपूर्वक पूजन किया—<br>तमर्घ्यमर्घ्या³दिकयाऽऽदिपूरुषः<br>सपर्यया साधु स पर्य्यपूजत् ।<br>गृहानुपैतुं प्रणयादभीप्सवो<br>भवन्ति नाऽपुण्यकृतां मनीषिणः ॥ १४ ॥ | ✡ नारद मुनि की आज्ञा से भगवान् श्रीकृष्ण जिस सुवर्णमय आसन पर विराजमान हुए उसका वर्णन कवि कर रहा है—<br>स काञ्चने यत्र मुनेरनुज्ञया<br>नवाम्बुद⁵श्यामवपुर्न्यविक्षत ।<br>जिगाय जम्बूनजनितश्रियः श्रियं<br>सुमेरुशृङ्गस्य तदा तदासनम् ॥ १९ ॥ |
| ✡ इस श्लोक में कवि भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा नारद जी को आसन प्रदान करने का वर्णन करते हैं—<br>न यावदेतावुपदश्यदुत्थितौ<br>जनस्तुषाराञ्जनपर्वताविव⁴ ।<br>स्वहस्तदत्ते मुनिमासने मुनिश्<br>चिरन्तनावदभिन्यवीविशत् ॥ १५॥ | ✡ यहाँ कवि आसनोपविष्ट कृष्ण की समुद्र से क्षमता प्रदर्शित करते हुए कहते हैं—<br>स तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरः<br>कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः ।<br>विद्युद्युते वाडवजातवेदसः<br>शिखाभिराश्लिष्ट इवाम्भसां निधिः ॥ २०॥ |
| ✡ नीलपर्वत के समान श्रीकृष्ण के सम्मुख आसन पर स्थित नारद जी ने उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा की शोभा को धारण किया — | ✡ इस श्लोक में नारद जी के कान्ति की हरि के श्यामल किरणों से मिश्रित होने का वर्णन है— |
| ¹ 'पतन् पतङ्ग' इति पाठान्तरम् ।<br>² 'प्रयत्ने' इति पाठान्तरम् ।<br>³ 'तमर्घ्यमर्घा' इति पाठान्तरम् । | ⁴ 'पर्वताकृती' इति पाठान्तरम् ।<br>⁵ 'नवाम्बुज' इति पाठान्तरम् । |