भारतकोश
शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Shishupalavadham of Magha Hindi

महाकवि माघ द्वारा

स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

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शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः
रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषाम्<br>ऋषित्त्विषः संवलिता विरेजिरे ।<br>चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरोस्<br>तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥ २१ ॥<br><br>✡ यहाँ पर कवि भगवान् श्रीकृष्ण और नारदजी के श्यामल और गौरवर्ण किरणों के सम्मिश्रण से एकवर्णत्व का वर्णन करता है—<br>प्रफुल्लपिच्छन्निभैरभीषुभिः<br>शुभैश्च सप्तच्छदपांशुपाण्डुभिः ।<br>परस्परेणच्छुरितामलच्छवी<br>तदैकवर्णाविव तौ बभूवतुः ॥ २२ ॥<br><br>✡ कवि वर्णन कर रहा है कि महर्षि नारद के समागम से भगवान् श्रीकृष्ण को इतना हर्ष हुआ कि वह समा नहीं सका—<br>युगान्तकालप्रतिसंहतात्मनो¹<br>जगन्ति यस्यां सविकासमासत ।<br>तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विषस्<br>तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः ॥ २३ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण के ‘पुण्डरीकाक्ष’ नाम की सार्थकता बताई है—<br>निदाघधामानमिवाधिदीधितिं<br>मुदा विकासं मुनि²मभ्युपेयुषी ।<br>विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी<br>स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् ॥ २४ ॥<br><br>✡ इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण का नारदजी से वार्तालाप का वर्णन किया जा रहा है—<br>सितं सितिम्ना सुतरां मुनेर्वपुर्<br>विसारिभिः सौधमिवाथ लम्भयन् ।<br>द्विजावलि³व्याजनिशाकरांशुभिः<br>शुचिस्मितां वाचमवोचदच्युतः ॥ २५ ॥<br><br>✡ भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से नारदजी के दर्शन का महत्त्व बतलाया गया है—हरत्यघं सम्प्रति हेतुरेष्यतः<br>शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः ।<br>शरीरभाजां भवदीयदर्शनं<br>व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥ २६ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण जी नारदमुनि से कह रहे हैं कि आपका तेज सहस्रों सूर्य के तेज से भी बढ़कर है—<br>जगत्यपर्याप्तसहस्रभानुना<br>न यन्नियन्तुं समभावि भानुना ।<br>प्रसह्य तेजोभिरसङ्ख्यतां गतैर्<br>अदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ॥ २७ ॥<br><br>✡ यहाँ पर भगवान् श्रीकृष्ण नारद जी को वेदों का अक्षयनिधि बतलाते हैं—<br>कृतः प्रजाक्षेमकृता प्रजासृजा<br>सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना ।<br>सदोपयोगेऽपि गुरुस्त्वमक्षयो⁴<br>निधिः श्रुतीनां धनसम्पदामिव ॥ २८ ॥<br><br>✡ श्रीकृष्ण जी नारद से कह रहे हैं कि आपके दर्शन से कृतकृत्य होकर भी मैं आपके सारगर्भित वचन सुनना चाहता हूँ—<br>विलोकनेनैव तवामुना मुने !<br>कृतः कृतार्थोऽस्मि निबर्हितांहसा⁵ ।<br>तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीर्<br>गिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ? ॥ २९ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण जी के आगमन का उद्देश्य पूछते हैं—<br>गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजनं<br>वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।<br>तनोति नस्तामुदितात्मगौरवो<br>गुरुस्त्वैवागम एष धृष्टताम् ॥ ३० ॥<br><br>✡ अब नारद जी उत्तर में अपना कथन आरम्भ करते हैं—

¹ 'संहतात्मना' इति पाठान्तरम् ।<br>² 'यति' इति पाठान्तरम् ।<br>³ 'द्विजावली' इति पाठान्तरम् ।⁴ 'क्षतिर्' इति पाठान्तरम् ।<br>⁵ 'निबृंहितांहसा' इति पाठान्तरम् ।
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