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शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Shishupalavadham of Magha Hindi

महाकवि माघ द्वारा

स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

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शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः


इति ब्रुवन्तं तमुवाच स व्रती
न वाच्यमित्थं पुरुषोत्तम ! त्वया ।
त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः
किमस्ति कार्य्यं गुरु योगिनामपि ॥ ३१॥

✡ ऊपर जो कहा गया है कि आप ही योगियों द्वारा साक्षात्कारणीय हैं उसी का समर्थन करते हुए नारद जी कह रहे हैं—
उदीर्णरागप्रतिरोधकं जनैर्
अभीक्ष्णमक्षुण्णतयातिदुर्गमम् ।
उपेयुषो मोक्षपथं मनस्विनस्
त्वमग्रभूमिर्निरपायसंश्रया ॥ ३२॥

✡ नारद जी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि कपिल आदि महर्षि प्रकृति से विविक्तरूप से वेद्य सांख्योक्त पुरुष आपको ही मानते हैं—
उदासितारं निगृहीतमानसैर्
गृहीतमध्यात्मदृशा कथञ्चन ।
बहिर्विकारं प्रकृतेः पृथग्विदुः
पुरातनं त्वां पुरुषं पुराविदः ॥ ३३॥

✡ इस प्रकार भगवान् के निर्गुणस्वरूप का वर्णन करके अब उपयोगी सगुण रूप का वर्णन आगे के ६ श्लोकों में करते हैं। सर्वप्रथम वराहावतार लेकर पृथ्वी के उद्धार का वर्णन किया गया है—
निवेशयामासिथ हेलयोद्धृतं¹
फणाभृतां छादनमेकमोकसः ।
जगत्त्रयैकस्थपतिस्त्वमुच्चकैर्
अहीश्वरस्तम्भशिरःसु भूतलम् ॥ ३४॥

✡ प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण की अपूर्व महिमा का नारदजी वर्णन कर रहे हैं—
अनन्यगुर्व्या²स्तव केन केवलः
पुराणमूर्तेर्महिमाऽवगम्यते ।
मनुष्यजन्माऽपि सुरासुरानुगैर्
भवान् भवच्छेदकरैः³ करोत्यधः ॥ ३५॥


✡ नारद मुनि भगवान् श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि पृथ्वी का भार हलका करने के लिए आप अवतीर्ण होकर उसे अधिक भारवती बना रहे हैं—
लघूकरिष्यन्नतिभारभङ्गुराम्
अमूं किल त्वं त्रिदिवादवातारः ।
उदूढलोकत्रितयेन साम्प्रतं
गुरुर्धरित्री क्रियतेतरां त्वया ॥ ३६॥

✡ इस श्लोक में महर्षि नारद द्वारा प्रकारान्तर से श्रीकृष्ण के अवतार का महत्त्व वर्णन किया गया है—
निजौजसोज्जासयितुं जगद्द्रुहाम्
उपाजिहीथा न महीतलं यदि ।
समाहितैरप्यनिरूपितस्ततः
पदं दृशः स्याः कथमीश ! मादृशाम् ? ॥ ३७॥

✡ नारद जी कह रहे हैं हे श्रीकृष्ण ! दुष्टों को दमन करने की क्षमता आप में ही हैं दूसरे के द्वारा वह साध्य नहीं—
उपप्लुतं पातुमदो मदोद्धतैस्
त्वमेव विश्वम्भर ! विश्वमीशिषे ।
ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः
क्षपातमस्काण्डमलीमसं नभः ॥ ३८॥

✡ आपने जो कंस आदि अल्पपराक्रमी राजाओं का संहार किया है, वह अपार सामर्थ्यवाले आपकी प्रशंसा नहीं अपितु तिरस्कार है—
करोति कंसादिमहीभृतां वधाज्
जनो मृगाणामिव यत्तव⁴ स्तवम् ।
हरे !⁵ हिरण्याक्षपुरःसरासुर-
द्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया ॥ ३९॥

✡ इस प्रकार श्रीकृष्ण की प्रशंसा करने के पश्चात् महर्षि नारद अपने आगमन के प्रयोजन को बतलाने का उपक्रम करते हैं—
प्रवृत्त एव स्वयमुज्झितश्रमः
क्रमेण पेष्टुं भुवनद्विषामसि ।
तथापि वाचालतया युनक्ति मां
मिथस्त्वदाभाषणलोलुपं मनः ॥ ४०॥


¹ ‘हेलयोद्धृतम्’ इति पाठान्तरम् ।
² ‘अनन्यगुर्वी’ इति पाठान्तरम् ।
³ ‘भवोच्छेदकरः’ इति पाठान्तरम् ।
⁴ ‘यस्तव’ ‘यमिति’ वा पाठान्तरम् ।
⁵ ‘हरेर्’ इति पाठान्तरम् ।

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