शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Shishupalavadham of Magha Hindi
महाकवि माघ द्वारा
स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिशुपालवधे प्रथमः सर्गः
✡ नारदमुनि भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि आप कृपया इन्द्र का सन्देश सुनें—
तदिन्द्रसन्दिष्टमुपेन्द्र ! यद्वचः
क्षणं मया विश्वजनीनमुच्यते।
समस्तकार्येषु गतेन धुर्यताम्
अहिद्विषस्तद्भवता निशम्यताम् ॥ ४१॥
✡ नारदजी शिशुपाल को मारने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण से आग्रह करते हैं कि वह अवध्य है केवल आपके द्वारा ही उसका वध हो सकता है। उसके पूर्व जन्म के पराक्रम का वर्णन करते हैं—
अभूद्भूमिः प्रतिपक्षजन्मनां
भियां तनूजस्तपनद्युतिर्दितेः।
यमिन्द्रशब्दार्थनिषूदनं हरेर्
हिरण्यपूर्वं कशिपुं प्रचक्षते ॥ ४२॥
✡ नारद जी कह रहे हैं कि हिरण्यकशिपु ने देवताओं के हृदय में भय का प्रथम प्रवेश कराया—
समत्सरेणासुर इत्युपेयुषा
चिराय नाम्नः प्रथमाभिधेयताम्।
भयस्य पूर्वावतरस्तरस्विना
मनस्सु येन द्युसदां न्यधीयत¹ ॥ ४३॥
✡ प्रस्तुत इस लोक में हिरण्यकशिपु द्वारा दिक्पालों को जीतने का वर्णन किया जा रहा है—
दिशामधीशांश्चतुरो यतः सुरान्
अपास्य तं रागहृताः सिषेविरे।
अवापुरारभ्य ततश्चला इति
प्रवादमुच्चैरयशस्करं श्रियः ॥ ४४॥
✡ हिरण्यकशिपु के भय से देवताओं ने दुर्ग आदि का निर्माण किया इसका वर्णन करते हैं—
पुराणि दुर्गाणि निशातमायुधं
बलानि शूराणि घनाश्च कञ्चुकाः।
स्वरूपशोभैकफलानि² नाकिनां
गणैर्यमाशङ्क्य³ तदादि चक्रिरे ॥ ४५॥
✡ हिरण्यकशिपु जिस दिशा में जाता था उस दिशा को देवता लोग नमस्कार करते थे—
स सञ्चरिष्णुर्भुवनान्तरेषु⁴ यां
यदच्छयाशिश्रियदाश्रयः श्रियः⁵।
अकारि तस्यै मुकुटोपलस्खलत्-
करैस्त्रिसन्ध्यं त्रिदशैर्दिशे नमः ॥ ४६॥
✡ नारद जी भगवान् श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि आपके ही द्वारा नृसिंहावतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया गया—
सटाच्छटाभिन्नघनेन बिभ्रता
नृसिंह ! सैंहीमतनुं तनुं त्वया।
स मुग्धकान्तास्तनसङ्गभङ्गुरैर्
उरोविदारं प्रतिचस्करे नखैः ॥ ४७॥
✡ प्रस्तुत श्लोक में उसी हिरण्यकशिपु का दूसरे जन्म में रावण होने का वर्णन है—
विनोदमिच्छन्नथ दर्पजन्मनो
रणेन कण्ड्वास्त्रिदशैः समं पुनः।
स रावणो नाम निकामभीषणं
बभूव रक्षः क्षतरक्षणं दिवः ॥ ४८॥
✡ अब यहाँ से १८ श्लोकों में (अर्थात् संख्या ६६ श्लोक तक) रावण के आतङ्क का वर्णन है।
नारद जी द्वारा सर्वप्रथम उसके तपःशौर्य का वर्णन किया जा रहा है—
प्रभुर्बुभूषुर्भुवनत्रयस्य यः
शिरोऽतिरागाद्दशमं चिकीर्षुषः।
अतर्कयद्विघ्नमिवेष्टसाहसः
प्रसादमिच्छासदृशं पिनाकिनः ॥ ४९॥
✡ प्रस्तुत श्लोक में रावण द्वारा कैलाश पर्वत के उठाने का वर्णन किया जा रहा है—
समुत्क्षिपन् यः पृथिवीभृतां वरं
वरप्रदानस्य चकार शूलिनः।
त्रसत्तुषाराद्रिसुताससम्भ्रम-
स्वयङ्ग्रहाश्लेषसुखेन⁶ निष्क्रयाम् ॥ ५०॥
¹ 'व्यधीयत' इति पाठान्तरम् ।
² 'गुणानि' इति पाठान्तरम् ।
³ 'गणैस्तमाशङ्क्य' इति पाठान्तरम् ।
⁴ 'भुवनान्तराणि' इति पाठान्तरम् ।
⁵ 'श्रियाम्' इति पाठान्तरम् ।
⁶ 'मुखेन' इति पाठान्तरम् ।
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