शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Shishupalavadham of Magha Hindi
महाकवि माघ द्वारा
स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिशुपालवधे प्रथमः सर्गः
✡ यहाँ पर महर्षि नारद द्वारा रावण के स्वर्ग का लुण्ठन करने का वर्णन किया जा रहा है—
पुरीमवस्कन्द लुनीहि नन्दनं
मुषाण रत्नानि हराऽमराङ्गनाः ।
विगृह्य चक्रे नमुचिद्विषा बली¹
य इत्थमस्वास्थ्यमहर्दिवं² दिवः ॥ ५१ ॥
✡ अब नारदजी समर में इन्द्र के भागने का वर्णन कर रहे हैं—
सलील-यातानि न भर्तुरभ्रमोर्
न चित्रमुच्चैःश्रवसः पदक्रमम् ।
अनुद्रुतः संयति येन केवलं
बलस्य शत्रुः प्रशंस शीघ्रताम् ॥ ५२ ॥
✡ रावण से भयभीत होकर इन्द्र ने सुमेरु पर्वत की शरण ली। 'कौशिक' शब्द के श्लेष से उनके समययापन का वर्णन किया जा रहा है—
अशक्नुवन् सोढुमधीरलोचनः
सहस्ररश्मेरिव यस्य दर्शनम् ।
प्रविश्य हेमाद्रिगुहागृहान्तरं
निनाय बिभ्यद्दिवसानि कौशिकः ॥ ५३ ॥
✡ प्रस्तुत श्लोक में रावण के कण्ठच्छेद में भगवान् विष्णु के चक्र की भी विफलता वर्णित है—
बृहच्छिलानिष्ठुरकण्ठघट्टनाद्
विकीर्णलोलाग्निकणं सुरद्विषः³ ।
जगत्प्रभोरप्रसहिष्णु वैष्णवं
न चक्रमस्याक्रमताधिकन्धरम् ॥ ५४ ॥
✡ अब रावण द्वारा धनाधिपति कुबेर को प्रकम्पित करने का वर्णन किया जा रहा है—
विभिन्नशङ्खः कलुषीभवन्मुहुर्
मदेन दन्तीव मनुष्यधर्मणः ।
निरस्तगाम्भीर्यमपास्तपुष्पकं
प्रकम्पयामास न मानसं न सः ॥ ५५ ॥
✡ अब रावण द्वारा किये गये वरुण पर विजय का वर्णन किया जा रहा है—
रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा
सरोषहुङ्कारपराङ्मुखीकृताः ।
प्रहर्तुरेवोरगराजराज्जुवो
जवेन कण्ठं सभयाः⁴ प्रपेदिरे ॥ ५६ ॥
✡ प्रस्तुत श्लोक में रावण द्वारा यमराज पर विजय वर्णित है—
परेतभर्तुर्महिषोऽमुना धनुर्
विधातुमुत्खातविषाणमण्डलः ।
हृतेऽपि भारे महतस्त्रपाभराद्
उवाह दुःखेन भृशानतं शिरः ॥ ५७ ॥
✡ इस श्लोक में रावण कृत सूर्यविजय का वर्णन है—
स्पृशन् सशङ्कः समये शुचावपि
स्थितः कराग्रैरसमग्रपातिभिः ।
अघर्मघर्मोदकबिन्दुमौक्तिकैर्
अलञ्चकारायस्य वधूरहस्करः ॥ ५८ ॥
✡ प्रस्तुत श्लोक में नारद जी वर्णन कर रहे हैं कि चन्द्रमा भी रावण की सेवा में रहता था—
कलासमग्रेण गृहानमुञ्चता
मनस्विनीरुत्कयितुं पटीयसा ।
विलासिनस्तस्य वितन्वता रतिं
न नर्मसाचिव्यमकारि नेन्दुना ॥ ५९ ॥
✡ रावण द्वारा गणेश जी के दन्तोत्पाटन का वर्णन किया गया है—
विदग्धलीलोचितदन्तपत्रिका
विधित्सया⁵ नूनमनेन मानिना ।
न जातु वैनायकमेकमुद्धृतं
विषाणमद्यापि पुनः प्ररोहति ॥ ६० ॥
✡ वायु ने भी रावण की अधीनता स्वीकार कर ली थी —
निशान्तनारीपरिधानधूनन-
स्फुटागसाऽप्यूरुषु लोलचक्षुषः ।
प्रियेण तस्यानपराधबाधिताः
प्रकम्पनेना⁶नुचकम्पिरे सुराः ॥ ६१ ॥
¹ 'वशी' इति पाठान्तरम् ।
² 'महर्निशं' इति पाठान्तरम् ।
³ 'सुरद्विषाम्' इति पाठान्तरम् ।
⁴ 'सभयं' इति पाठान्तरम् ।
⁵ 'चिकीर्षया' इति पाठान्तरम् ।
⁶ 'प्रभञ्जनेना' इति पाठान्तरम् ।
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