भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

घटपटादि विषय, बुद्धि आदि इन्द्रिय और स्वप्नसमयके भोग देनेवाले पदार्थ की समान सब सृष्टि अन्तःकरणने कल्पना करी है, जिस प्रकार इकला मनुष्य स्वप्न में अनेक मनुष्य देखता, भोग भोगता और संसार की सब रचना भिन्न भिन्न जानता है, यथार्थ में एकही है, इसी प्रकार वास्तविक आत्मा है, परन्तु अन्तःकरणकी कल्पना से यह जगत् अनेक भावसे दीखता है ॥४२॥ इन सबको देखनेहारा स्वयंज्योति आत्मा साक्षीरूपसे सबमे वर्तमान है ॥४३॥ इस अवस्थामें अन्तःकरणादि सर्व पदार्थों की वासना भावनासे की हुई असत्य होनेसे वह वासनारूपी ही है और परमात्मा उसही स्थानमें वासनामात्र से साक्षी है ॥४४॥ जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें कर्ता कर्म किया इत्यादि संपूर्ण कारणोंसे युक्त व्यवहार चलता है इसी प्रकार पूर्व जन्मके किये कर्मोकी प्रेरणासे वासनारूप प्रपंच है परन्तु जाग्रत् अवस्थामें प्रपंचका व्यवहार समर्थ होता है और स्वप्ने अवस्थामें कल्पित है यही इसमें भेद है ॥४५॥ सम्पूर्ण बुद्धि वृत्तिका साक्षी आत्मा स्वयंही प्रकाश करता है, उस साक्षीका जो वासनामात्र साक्षीपना है उसे स्वप्न कहते है ॥४६॥ बाल्य अवस्थामें जाग्रत् जो कर्म स्तनपान कन्दुकक्रीडा आदि किये है, उस समय उसीकी वासना हृदयमें प्रबल रहती है, इस कारण वे ही स्वप्न दीखते है ॥४७॥ और तरुण अवस्थामें इन्द्रिय अपने व्यापारमें कुशल हो जाती है यह प्राणी अनेक व्यापारमें व्यग्र हो जाता है, अध्ययन, कृषि, व्यापार आदिकी वासना हृदयमें अत्यन्त दृढ हो जाती है, इस कारण तद्रूप ही स्वप्न देखता है ॥४८॥ और जो वृद्धावस्थामें परलोक जानेके निमित्त दान धर्म विद्यादि दान ऐसे उत्तम कर्म करते है उनके हृदयमे यह वासना दृढ हो जाती है तो प्रायः यहभी इसी प्रकार के स्वप्ने देखा करते है, कि हमने दान किया, इस प्रकार लोककी प्राप्ति हुई ॥४९॥ जिस प्रकारसे श्येन पक्षी आकाशमें भ्रमण करते २ जब थक जाता है, तब विश्रामका और कोई उपाय नही देखकर निज पंखो को सकोडकर अपने घोसलेमे विश्राम लेता है ॥५०॥ इसी प्रकार जाग्रत और स्वप्न अवस्थामें विचरनेसे जब आत्मा शांत होता है तब संपूर्ण इन्द्रियोंके शिथिल होने से सब साधनाओंको लयकर देता है अर्थात संपूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारको समाप्तकर निद्रित हो जाता है ॥५१॥ नाडियोंके मार्गसे इन्द्रियकी वासना को आकर्षणकर जाग्रत और स्वप्न अवस्थाके सब कार्य समाप्तकर आत्मा लीन हो जाता है ॥५२॥ जिस समय यह मायासे आच्छादित चैतन्य अव्याकृत स्वरूपमें लय होता है, उस समय सम्पूर्ण प्रपंच लय हो जाता है, परन्तु यह लय आत्यंतिक नही है, इसमें केवल कार्यरूपका नाश होता है कारण रूपवासना बनी रहती है ॥५३॥ जिस पुरुषकी किसी स्त्री को अत्यंत इच्छा हो, और वह उसे प्राप्त हो जाय उसके सम्भोगसे जो सुख हो जाता है उसकी ³ सीमा है परन्तु उससे कही अधिक सुख निद्रा अवस्थामें जीवको आनन्दमय कोशमें प्राप्त होनेसे होता है जब जीवको बाह्य विषयका ज्ञान नही होता, वह अन्तर अर्थात् मोक्षकी अवस्थाकी समान जिसमें विषयवासना अत्यन्त निवृत्त होती है, निवृत्त वासनावाला भी नही होता ॥५४॥ निद्रावस्थामें जीवात्मा जब ईश्वरको प्राप्त होता है तब जाग्रत आदि अवस्थामें जैसे ईश्वर से भिन्न रहता है तैसा भी भिन्न रहता है, तब भी भेद नही जाता ऐसा होनेसे ही वह उस समय दुःख रहित होता है, क्योकि कारणात्मामें उसका साम्य माना जाता है एकत्व पाता है, इस कारण औपचारिक है ॥५५॥ जो भी उस अवस्थामें अविद्याकी सूक्ष्मत्व वृत्ति आनेसे जैसे सुख अनुभव करता है उस सुखको जैसे, 'सुखमहमस्वाप्सम् अर्थात् मै सुखसे सोआ' 'नकिंचिदवेदिषम' 'और दूसरा कुछ भी न जाना केवल अज्ञानका ही अनुभव किया ॥५६॥ परन्तु यह अज्ञानभी साक्षी आदिकी वृत्तिसे अनुभव किया जाता है, कि सुखसे सोया यदि साक्षी न हो तो सुखसे सोनेकी स्मृति किसी प्रकार नही हो सकती, क्योंकी गाढ निद्रामें सोते समंय तो उसे सुखका अनुभव होता नही, उसके पश्चात जाग्रत होकर साक्षीके द्वारा जानता है ॥५७॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति यह तीन अवस्था जैसी इस लोककी है तैसी देवलोक की है, सुषुप्तिके अन्तमें जब जाग्रत अवस्था आती है तो ³ अपने कारणरूप जीवके प्रारब्धके कर्मसे फिर इन्द्रिये इस प्रकार जाग ³ उठती है जिस प्रकार अग्निसे विस्फुलिंग (चिनगारियां) उठने लगती है इसी प्रकार सूक्ष्मरूपमें लीन हुई इन्द्रियमे उठती है ॥५८॥ जिस प्रकार जलभरा हुआ घडा जलमें डुबादो और यदि उसे फिर निकालो तो वह उस जल से भराही आताहै इसी प्रकार से यह जीवात्मा इन्द्रिये आदि सहित कारणमें लयको प्राप्त हो उन इन्द्रियों सहित ही जाग्रत अवस्थाको प्राप्त होता है ॥५९॥