शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानात्मा (जीव) कारणात्मा (ईश्वर) यह दोनों वास्तवमें एकही रूप है परन्तु अविद्याके प्रपंच से उनमें भेद प्रतीत होता है, जब यह अविद्या नष्ट होजाय तो ऐसा नही होता उस समय दोनों एकरूप हो जाते है ॥६०॥ जिस प्रकार से एक ही सूर्य जलादि पदार्थों से प्रतिबिंबित होनेसे अनेकरूप दीखता है और जलके चलायमान होनेसे सूर्यादिमें ही चञ्चलता प्रतीत होती है, इसी प्रकार कूटस्थ एक (जीवात्मा) ईश्वर एकही है, और अनेक देहोंमे प्रतिबिम्बित जीवरूपसे प्रविष्ट होकर अनेकरूप और गमनागमनादिरूपसे दीखता है ॥६१॥ आत्मा देहादि उपाधिसे रहित स्वप्रकाश है, परन्तु स्वरूपकी स्मृति लोप करनेवाली मायाने विस्मृति को प्राप्त कर दिया है, इससे सब प्रपंच इस में अज्ञानसे विदित होता है, कारण कि, यह माया तो (अघटितघटनापटीयसी) न होनेवाली बातको भी करके दिखा देती है । माया के योग से आत्मामें कितने ही विरुद्ध कर्म दीखे परन्तु मायाके दूर होते ही जीव ईश्वर और निर्विकार हो जाता है, हे दशरथकुमार! यह तुमसे जीवका स्वरूप वर्णन किया ॥६२॥६३॥ इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवस्वरूपकथनं नाम दशमोऽध्यायैः ॥१०॥
अध्याय ११ जीवकी देहान्तरगरि ओर परलोकगति लिंग देहके कारण होती है यह बात संक्षेपसे कहकर अब विस्तारसे वर्णन करते हुए श्रीभगवान बोले-हे नृपश्रेष्ठ! उस जीवकी देहान्तरगति और परलोकगति मैं तुमसे वर्णन करता हूं, सावधान होकर सुनो ॥१॥ इस स्थूलदेहसे जो कुछ भोजन किया जाता और पिया जाता है उसीके कारण लिंग और स्थूल देह में सम्बन्ध उत्पन्न होता है, उसीसे जीवन धारण होता है ॥२॥ जिस समय व्याधि वा जरा अवस्थासे कफ प्रबल होता है तब जाठरानल के मंद होने से भोजन किया हुआ अन्न अच्छी तरह नही पचता है ॥३॥ जब भोजन किये हुए रसके न प्राप्त होनेसे शीघ्र ही धातु सूख जाते है, और भोजन किये तथा पान किए रससे ही शरीरमें जाठराग्निके दीप्त रहते जो अन्न भक्षण किया जातो है, वह रसरूप होकर शरीर को पुष्ट करता है ॥४॥ उस समय प्राणवायु वह सम्पूर्ण रस लेकर सब धातुओं में पहुंचाता है इसी कारण से यह समान वायु कहाता है और वृद्धावस्थामें वह रस उत्पन्न नही होता इस कारण शरीरके बंधन जो दृढ़तासे परस्पर संघट्ट है शिथिल हो जाते है ॥५॥ जिस प्रकार कि, आम्र फल पककर अपने भारसे आपही शीघ्र पतित हो जाता है, इसी प्रकार शरीरके शिथिल होनेसे लिंगशरीरका स्थूल से वियोग हो जाता है ॥६॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोकी वासना, आध्यात्मिक-जीवसम्बन्धी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियादि आधिभौतिक-प्राप्त होनेवाले देहके कारणभूत सूक्ष्म रूपवाले कर्म यह तीनों आकर्षित होकर हृदयकमलमें एकता को प्राप्त होते है ॥७॥ तब मुख्य प्राणवायु शेष नौ वायुओंसे संयुक्त होकर ऊर्ध्वश्वासरूपी हो जाता है, और फिर वे सब एक होकर जीवात्मा से संयुक्त होते है ॥८॥ विद्या, कर्म और वासनासे युक्त हो यह जीव अपने कर्मसे नाडीमार्गका आश्रयकरके नेत्रमार्ग अथवा ब्रह्मरंधके द्वारा बहिर्गत होता है ॥९॥ जिस प्रकारसे घडेको इस देशसे दूसरे स्थानमें ले जाते है परन्तु वह आकाशासे पूर्ण हो जाता है, जहां घट जायगा उसी उसी स्थानमें घटाकाशभी जायगा इसी प्रकार से जहाँ जहाँ लिंगशरीर गमन करतो है उसी उसी स्थानमें जीव होता है ॥ १०॥११॥ और कर्मानुसार दूसरे देहको प्राप्त होता है, जिस प्रकार नदीका मच्छ कभी इस किनारे और कभी दूसरे किनारे जाता है, इसी प्रकारसे यह मोक्ष न होनेतक अनेक योनियोंमे भ्रमण करता रहता है ॥१२॥ जो पापी है उनको यमदूत ले जाते है यह यातना देहका जो नरक दुःख भोगनेके लिये दी जाती है, उसको आश्रय करके केवल नरकों ही को भोगता है ॥१३॥ और जिन्होंने सदा इष्ट (यज्ञादि) पूत- (वापीकूपतडागादि निर्माण करना) कर्म किये है, वह पितृलोकको गमन करते है, यमदूत उन्हे पितृलोकको प्राप्त करते है ॥१४॥