भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 44 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

दुराचारी नही हो सकता, कारण कि अनन्य भक्तिका और स्थानमें मन नही जाता ॥८॥ जो एकनिष्ठबुद्धि होकर जीवात्मा परमात्माको एकही रूप जानता है, अर्थात् जीवरूपभी मेरेको ही जानता है और अनन्य बुद्धिसे मेरा भजन करता है उसको पाप स्पर्श नही करता बहुत क्या उसे ब्रह्महत्याभी स्पर्श नही करती ॥९॥ उपासनाकी विधि चार प्रकारकी है संपत्, आरोप, संवर्ग और अध्यास ॥१०॥ अल्प वस्तुकाभी गुणयोगसे मन की वृत्तिसे अनन्त गुणोंकी भावनासे चिंतन करना जैसे कि, मूर्तिमें अनंत गुणविशिष्ट शिव तथा ³विष्णुका ध्यान करना इसका नाम संपत है ³॥११॥ एक देश वा अंगमें सम्पूर्ण उपास्य वस्तु का आरोप करके जो उपासना करनी है उसे आरोप कहते है, जैसे ओंकारकी उद्गीथसाम रूप से उपासना की जाती है ॥१२॥ आरोप और अध्यास इनका स्वरूप बहुधा एकसा है, भेद इतनाही है कि बुद्धिपूर्वक किसी एक वस्तुमें विवक्षित धर्मका आरोप करके उसकी उपासना करना, ³जैसे स्त्रीपर अग्निका आरोप (अर्थात् ³) स्त्रीको अग्निरूप मानना यह अध्यास है ॥ १३॥ कर्मयोगसे उपासना करने का नाम संवर्ग है अर्थात् सम्पूर्ण भूतोंको उपासनाके योगसे वशमें करना, जैसे प्रलय कालमें संवर्त नामक, वायु अपनी शक्तिसे सब भूतोंको वश करती है ॥१४॥ गुरुसे प्राप्त हुए ज्ञानसे देवतामें और अपनेमें भेद न मानना और अन्तःकरणसे देवताके समीप प्राप्त होना और अन्त:करणसे ³ही सब पूजन कल्पित करना, इसका नाम अंतरग उपासना है, और इसके उपरांत दूसरी विधिसे बहिरंग उपासना कहाती है ॥१५॥ तब इस प्रकार किसी की उपासना करनी और कहां तक करनी किसी भी देवताकी उपासना करते हुए, ध्यानसे उस देवताके स्वरूपका जो ज्ञान होता है उस ज्ञानको विजातीय ज्ञानसे शिवका ध्यान करते हुए कामिनी के ध्यानसे-मध्यमें विच्छिन्न न होकर व्यवधानरहित ज्ञानपरम्परासे-निदिध्यासना करके ध्यानयोग्य देवताओंमें अपनी बुद्धि लगाकर एकरूपका साक्षात् होने तक उपासना करता रहे ॥१६॥ संपादादि जो चार उपासना वर्णन की है, यह दृढ बुद्धिकी उपासना तथा उपासनाकी परम अवधि है और सगुण उपासना इस प्रकार है कि, मूर्तिकी उपासना करनेके समय ³उसके प्रत्येक अंगोंमें अक्षय दृष्टि लगाकर उपासना करनी, इस उपासनाके अंगोको श्रवण करो ॥१७॥ उपासनोके योग्य देशोंका कथन करते है कि, तीर्थ और क्षेत्रादिकोंमें ही जानेसे उपासना होगी यह विचार न करे, क्षेत्रादिकोंमें जानेकी श्रद्धा त्याग दे, और जहां अपना चित्त स्वच्छ और एकाग्रतायुक्त होय तहां ही सुखसे बैठकर उपासना करे ॥१८॥ कम्बल मृदुकुपास वस्त्र अथवा मृगचर्मपर स्थित होकर एकान्त देशमें स्थितहो समान ग्रीवा और शरीरको सरल करेंगे ॥ १९॥ विधिपूर्वक भस्म धारणकर और सम्पूर्ण इन्द्रियोंको रोककर तथा भक्तिपूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके, ज्ञानशास्त्रद्वारा ज्ञानकी प्राप्तिके निमित्त भक्तिसे प्राणायाम करे ॥२०॥ जिसका अन्तःकरण मूढ और विवेकशून्य है उसकी इन्द्रियें दुष्ट घोडोंकी समान है, अर्थात् जैसे दुष्ट घोड़ा सारथीके वशमें नही आता तैसे ³दुष्ट इन्द्रिय वाले उन्हे वश नही कर सकते ॥२१॥ और जो ज्ञानसम्पन्न है उनके यत्न करने से सम्पूर्ण इन्द्रिये मनके सहित वशमें हो जाती है, जिस प्रकार सुशिक्षित अश्व सारथीके वशमें हो जाता है ॥२२॥ और जो विवेकशून्य चंचलचित्त बाह्य और अन्तर शौचसे हीन और अनुभवज्ञानरहित है वे उस स्थानको नही प्राप्त होते परन्तु निरंतर संसारमें ही भ्रमण करते है ॥२३॥ और जो ज्ञानी स्थिरचित्त बाह्य आभ्यन्तर पवित्रतासे युक्त है वे उस स्थानको प्राप्त होते है जहांसे फिर आना नही होता (न स पुनरावर्तते २) यह श्रुतिमें लिखा है ॥२४॥ जिसका विज्ञानरूपी सारथी मनरूपी लगाम धारण किये है, इन्द्रियरूपी घोड़े जुते शरीररूपी रथमे जो बैठा है वह संसाररूपी मार्गसे पारहो परमपद (मोक्ष) स्थानपर पहुँच जाता है ॥२५॥ हृदयकमल कामादिदोष रहित शमदमादिगुणसम्पन्न स्वच्छ और शोकरहित करके उसमें मेरा ध्यान करना उचित है ॥ २६॥ जो अचिन्त्यस्वरूप सीमारहित है, जिससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नही है, जो नाशरहित कल्याणस्वरूप आदिअन्तशून्य प्रशांत और सबका कारण है ॥२७॥