शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished44 पृष्ठ
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सर्वव्यापक सच्चिदानन्दस्वरूप रूपरहित उत्पत्तिशून्य आश्रय युक्त मुझ ब्रह्मरूपको शुद्ध स्फटिक मणिकी समान शरीर और अर्धांगमे पार्वतीको धारण किये ॥२८॥ व्याघ्रचर्म ओढे, नीलकंठ, त्रिलोचन, जटाजूट धारण किये चन्द्रमा शिरपर धरे, नागोंका यज्ञोपवीत पहरे ॥२९॥ व्याघ्रचर्मकाही उत्तरीय (डुपट्टा) ओढे, सर्वश्रेष्ठ भक्तोंके अभयदाता, पीठकी ओरके ऊँचे दोनों हाथोंमें मृग और परशु धारण किये, सब अंग में विभूति लगाये, तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे भूषित ॥३०॥ इस प्रकारसे आत्माकी अरणी और प्रणवको उत्तर अरणी करके उसका मथन करता हुआ मेरा ऊपर कहे अनुसार ध्यान करे तौ यह मेरा साक्षात्कार पाता है, जब यज्ञको करते है तब अग्निके निमित्त खैर वा शमीकी दो लकडी ले ऊपर नीचे रख अग्निके निमित्त उसे मथते है ॥३१॥ वेदवचन और शास्त्रोंके वचनसे मुझे कोई नही पा सकता परन्तु जो एकाग्रचित्तसे सदैव मेरा ध्यान करता है, मै उसे प्राप्त होता हूँ और उसे फिर त्याग नही करता ॥३२॥ जो पापसे पराङ्मुख नही जिसकी तृष्णा शान्त नही श्रवण मनन निदिध्यासनसे जिसका मन समाधान नही है जिसका मन चंचल है ऐसी पुरुष केवल शास्त्रके अध्ययनसे मुझे प्राप्त नही कर सकता ॥३३॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाका प्रपंच जिस साक्षीरूप अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूपके द्वारा प्रकाशित होता है, वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसी यथार्थ जाननेसे यह सम्पूर्ण बंधनोंसे मुक्त हो जाता है ॥३४॥ तीनों अवस्थामें जो भोग पदार्थ जो भोक्ता और जो भोग्य वस्तु है, यह तीनों ब्रह्मकी ही सत्तासे कल्पित है, इनका प्रकाशक गति करनेहारा सदाशिव मै ही हूँ ॥३५॥ इस प्रकार निर्गुण कथन कर अब फिर मद अधिकारियोंको सगुणरूप का उपदेश करते है, मध्याहनकालके करोडों सूर्यकी समान तेजयुक्तँ और करोडों चन्द्रमाकी समान शीतल सूर्य चंद्रमा अग्नि जिसके नेत्र है उनके मुखकमलका स्मरण करे ॥३६॥ एक ही परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंमे गुप्त है, सर्वव्यापी और सब भूतोंका अन्तरात्मा है, सबका अध्यक्ष और सब भूतोंमें निवास करनेवाला सबको साक्षी चित्तकी प्रेरणा करनेवाला निर्लेप और निर्गुण है ॥३७॥ स्वाधिक सब भूतोंका आत्मा वह एकही देव है, मायारूप प्रपंचका बीज प्रगट करता है, वह पुरुष मै ही हूँ मुझको जो धीर पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे साक्षात्कार करते है उन्हीको निरन्तर शान्ति और कैवल्य मुक्ति होती है, दूसरों को नही ॥३८॥ जिस प्रकार से एक ही अग्नि सब संसारमें प्रविष्ट होकर उन काष्ठ लोह आदिमें सीधे टेढे चतुष्कोण आदिरूपसे उसी वस्तुके आकारसी हो ही है, इसी प्रकार सबका अन्तरात्मा एकही है, और शरीरमें प्राप्त होनेसे उसीके आकारसा प्रतीत होता है, यद्यपि उपाधिके वशीभूत होनेसे भिन्न २ प्रकार का प्रतीत होता है, तथापि सर्व लोकके दुःख से वह दुःखी और सुखसे सुखी नही होता ॥३९॥ जो विद्वान ज्ञानी मुझको सर्वान्तर्यामी महान व्यापक स्वप्रकाश, मायासे रहित आत्मस्वरूप जानता है, वही संसार बंधनसे मुक्त होता है, इसके सिवाय मुक्तिके प्राप्त होने का दूसरा उपाय नही है, तथा च श्रुति (वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात ॥ तमेव विदित्वातिमृत्युनेति नान्यः पंथा विद्यतेयनाय ) ॥४०॥ प्रथम सृष्टिके आरंभ में मै ब्रह्माको उत्पन्न करके उसके निमित्त वेद को उपदेश करना वही स्तुतिके योग्य पुराण पुरुष मै हूँ, जो इस निश्चयसे मुझे जानते है, वे मृत्यु के मुखसे छूट जाते हैं तथा च श्रुतिः (या वै ब्रह्माणं विदधौति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै) इत्यादि श्रुतिमें प्रसिद्ध हैं ॥४१॥ इस प्रकार शान्ति आदि गुणोंसे युक्त हो जो मुझको तत्त्वसे जानता है वह दुःखोंसे छूटकर अन्तमें मुझको प्राप्त हो जाता है ॥४२॥ इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे उपासनाज्ञानफलं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥
अध्याय १३ सूतजी बोले, बुद्धिमानोंमे श्रेष्ठ रघुनाथजी इस प्रकार श्रवण करके प्रसन्न हो गिरिजापतिसे मुक्तिका लक्षण पूछने लगे ॥१॥