भारतकोश
शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

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श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्र बोले- हे कृपासागर भगवन् ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुक्ति का स्वरूप और लक्षण वर्णन कीजिये ॥२॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले, हे राम! सालोक्य, सारूप्य, सार्ष्ट्य सायुज्य और कैवल्य यह मुक्तिके पांच भेद है ॥३॥ जो कामना रहित अज्ञानसे हीन होकर मूर्तिमें मेरा पूजन करते है वह मेरे लोकको प्राप्त होकर सालोक्य मुक्ति को प्राप्त होते है और अनेक प्रकार के इच्छित भोग भोगते है ॥४॥ और जो मेरा स्वरूप जानकर निष्काम बुद्धिसे मेरा भजन करता है वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होकर अनेक प्रकारके अभिलाषित भोगोंको भोगता है इसे सारूप्य मुक्ति कहते है ॥५॥ जो पुरुष मेरी प्रीतिके निमित्त इष्टपूर्तादिकर्मोंको करता है वह भी उसी फलको प्राप्त होता है इसमें संशय नही ॥६॥ जो कर्ता जो भोजन करता और जो अग्निमें हवन करता है जो देखता है और जो कुछ तपस्या आदि करता है, वह सब मेरे ही अर्पण करता है, वह मेरे लोक की सब लक्ष्मी जगत् के कर्तापन आदिसे व्यतिरिक्त सब दिव्य संपत्ति भोगता है, इसे सार्ष्ट्य मुक्ति कहते है ॥७॥ जो शान्ति आदि साधनसे युक्त होकर श्रवण मनन निदिध्यासनपूर्वक मुझेही आत्मारूप जानता है वह अद्वैत स्वप्रकाश ब्रह्मके तद्रूपको प्राप्त होता है, जो जीवका यथार्थ स्वरूप है इस स्वरूपसे अवस्थान करने का नाम सायुज्यमुक्ति है ॥८॥९॥ सत्य ज्ञान अनंत आनंद इत्यादि लक्षण युक्त और सब धर्मरहित मन और वाणीसे परे ॥१०॥ सजातीय और विजातीय पदार्थोंके उसमें न होनेसे इस ब्रह्मको अद्वैत कहते है ॥११॥ हे राम! यह जो शुद्ध स्वरूप का वर्णन किया है; इसे आत्मरूप जानकर सम्पूर्ण स्थावर जंगम जगतको मेरे ही रूपमें देखता है ॥१२॥ जिस प्रकार आकाशमें गन्धर्वनगर नही है और उसकी मिथ्या प्रतीति होती है इसी प्रकारसे यह अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुआ जगत् मुझमें कल्पना किया जाता है, वास्तविक मिथ्या है ॥१३॥ जिस समय मेरे स्वरूपके ज्ञानसे अविद्या नष्ट हो जाती है तब मन वाणीसे परे एक म ही विद्यमान रहता हूँ ॥१४॥ मै नित्य परमानन्द स्वप्रकाश और चिदात्मा हूँ, काल दिशा विदिशा पंचभूत इस स्वरूपमें कुछ नही है, मेरे सिवाय दूसरी कोई वस्तू नही है, मै केवल एकही विद्यमान रहता हूँ ॥१५॥ मेरे निर्गुण स्वरूप कोईनील पीतादि आकार और वर्णका नही है और इन चर्मचक्षुसे भी कोई मुझे देखनेको समर्थ नही हो सकता, जो कोई हृदयमें बुद्धिसे मेरे स्वरूपको जानते है, वे ही ज्ञान मुक्त हो जाते है ॥१६॥ श्रीराम उवाच । श्रीरामचन्द्रजी बोले, हे भगवन!! ! मनुष्योंको शुद्ध ज्ञान किस प्रकारसे होता है, हे शंकर! जो आपकी कृपा मेरे ऊपर है तो इसका उपाय वर्णन कीजिये ॥१७॥ श्रीभगवानुवाच । श्रीभगवान बोले, ब्रह्मलोकपर्यन्त दिव्य देहको भी नाशवत समझकर भार्या, मित्र, पुत्रादि इन सबको क्लेशदाता और अनित्य समझकर इनसे चित्तकी वृत्ति पृथक करे ॥१८॥ और श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त होने के निमित्त मोक्षशास्त्र वेदांतमें निष्ठाशील होकर उसी के जाननेका उपाय करता हुआ ब्रह्मवेत्ता गुरुके निकट जाय ॥१९॥ उस गुरुके आगे अपने हाथमें लाया हुआ पदार्थ रखेके दंडवत नमस्कार करे फिर उठके हाथ जोड़के इच्छित अर्थका निवेदन करे ॥२०॥ बहुत कालतक सावधान हो इन्हे सेवासे संतुष्ट करे और मन लगाकर सब वेदान्तके वाक्योंका अर्थ श्रवण करे ॥२१॥ और सम्पूर्ण वेदान्तके वाक्यों का तात्पर्यभी निश्चय करले (यह नही कि अहं ब्रह्म करता फिरे) इसका नाम ब्रह्मवादियोंने श्रवण कहा है ॥२२॥